Monday, 19 October 2015

होली



होली तूँ कितनी भोली
लाल पीली हरी नीली

पत्नी हो या कि शाली
या हो कोई बाहरवाली
साधु हो या कि मवाली
जब फाग मधुर गावे 
सब एक नज़र आवे 
भेद-भाव की दीवार मिटे
बिखरते रिश्तों की दरार पटे 
कीचड़ सनी गली हो या हो पथ कंकरीली
हर जगह मौजूद  होली भाई होली 

उड़े जब अबीर और गुलाल
कर दे सब को रंगे हाल 
रंगों से तब  तन खाली 
दुर्विचार से  मन भारी 
रंग - धन की  जब वर्षा चली
फिर क्यों हो  कहीँ कोई कंगाली
चारों ओर होली की खुशियाली ।
होली की खुशियाली

अमर नाथ ठाकुर 21.03.2008 कोलकाता

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