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Sunday, 17 May 2026

बंगाल में नया विहान: भय के अवसान और विडंबनाओं के उदय की दास्तान


बंगाल में नया विहान: भय के अवसान और विडंबनाओं के उदय की दास्तान

चार मई के बाद से बंगाल में रोज़ एक नया सवेरा मालूम पड़ता है। नई दोपहर और नई शाम भी। प्रति दिन कुछ न कुछ ऐसा नया सुनने को मिल रहा है कि सहसा विश्वास ही नहीं होता। जो व्यवस्था पूरी तरह पलट चुकी थी, वह अब धीरे-धीरे सीधी हो रही है। बरसों से जिस घुटन को हमने अपनी नियति और जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा मान लिया था, उसकी जगह अब इतना खुलापन आ गया है कि खुद की आज़ादी पर ही अविश्वास होने लगा है।


यह वही बंगाल है जहां किसी शुक्रवार को लोकल ट्रेनें एक विशेष स्टेशन पर आकर ठिठक जाती थीं, क्योंकि पटरियों पर सैकड़ों लोग नमाज़ के लिए आ जाते थे। ट्रेन की मजबूरी थी कि वह थमी रहे। न्यू मार्केट हो, राजा बाजार हो या मटिया बुर्ज का इलाका—सड़कें और गलियां बंद हो जाती थीं। आगे जाने के लिए या खाली फुटपाथ ढूंढने के लिए आपको अपनी नागरिकता और समय को बंधक बनाकर इंतज़ार करना होता था। अज़ान की गूंज से पूरा परिवेश ऐसा गुंजायमान रहता था कि सुबह आप चाहकर भी सो नहीं सकते थे। दोपहर और शाम को आप अपने कॉर्पोरेट दफ्तरों या एक्सचेंज बिल्डिंग में कोई ज़रूरी मीटिंग नहीं रख सकते थे, क्योंकि बगल की मस्जिद से आती आवाज़ें पूरे ऑफिस में गूंजती थीं। इस इस्लामिक वातावरण से अब आप तंग नहीं होते थे, क्योंकि इसे आपके जीवन का अभिन्न हिस्सा बना दिया गया था। आप इसे पसंद करें या न करें, चारा ही क्या था? यहाँ तो नामी-गिरामी मुस्लिम डॉक्टर भी ऐन वक़्त पर मरीज़ को छोड़कर नमाज़ की रस्में पूरी करने चले जाते थे; और यह सिर्फ जुम्मे की बात नहीं थी, हर दिन का यही दस्तूर था। टेंगरा, तपसिया और मटिया बुर्ज जैसे इलाकों में जाकर तो भ्रम होता था कि आप भारत में हैं या किसी पाकिस्तानी-बांग्लादेशी क्षेत्र में! कहते हैं पूरे बंगाल का यही हाल था।


मदरसों में मौलानाओं को सरकारी खजाने से बकायदा तनख्वाह मिलती थी ताकि वे पवित्र कुरान की शिक्षा दे सकें, जहां खुलेआम गैर-मुस्लिमों को 'काफिर' कहा जाता था। शुरू-शुरू में यह शब्द किसी गाली की तरह चुभता था, पर धीरे-धीरे सुनते-सुनते यह किसी पदवी जैसा लगने लगा था।


मगर चार मई के बाद से अब अचानक कुछ अजूबा होने लगा है। अखबारों, टीवी और फेसबुक रील पर खबरें हैं कि सड़कों पर नमाज़ पढ़ना बंद हो रहा है, अज़ान की कानफाड़ू आवाजें अब वैसी नहीं रहीं। इस भगवा पार्टी ने चुनाव में नारा दिया था—"फियर आउट, भरोसा इन, बीजेपी के भोट दिन।" क्या यह वाकई उसी का प्रभाव है? क्या अब सभी समवेत स्वर में 'भारत माता की जय' बोलेंगे? क्या स्कूलों में बच्चे एक सुर में 'वंदे मातरम' गाएंगे? कल तक जिन मदरसों में राष्ट्रीय अवसरों पर तिरंगा फहराना एक असाधारण राष्ट्रीय समाचार और सुर्खियां बनता था, क्या वह अब एक सामान्य सी बात लगेगी? डर है कि यह सामान्य स्थिति कहीं हमें असामान्य न लगने लगे!


यहाँ कोलकाता में एक 'सोहरावर्दी पथ' भी है। क्यों है? क्योंकि इसी सोहरावर्दी ने रमजान के पवित्र महीने में वह खूनी मारकाट फैलाई थी जिसमें हिंदू गाजर-मूली की तरह काटे गए थे। वहीं कालीघाट और अलीपुर के बीच एक 'गोपाल नगर' भी है। कहते हैं यह गोपाल पाठा के नाम पर है—वह बहादुर हिंदू जिसने आत्मरक्षार्थ और हिंदू अस्मिता के लिए तलवार उठाई थी और करारा जवाब दिया था। ममता के राज में ये सारे पुराने इतिहास और प्रतिक्रियाएं खूब याद आने लगी थीं। हावड़ा की सड़कों पर जब नमाज़ के विरोध में लोगों ने हनुमान चालीसा का पाठ शुरू किया, तो तत्कालीन 'ममता की पुलिस' नमाज़ियों की हिफ़ाज़त में खड़ी होकर हनुमान पाठ करने वाली मंडलियों पर लाठियां भांजने आ जाती थी। वैसे नमाज़ियों ने अपना वर्चस्व इस कदर फैला लिया था कि उन्हें पुलिस की पहरेदारी की ज़रूरत ही कहाँ थी, सबने इसे अपनी दिनचर्या मान लिया था। मुर्शिदाबाद का 'भगवान गोला' मोहल्ला तो बोलचाल में 'अल्ला गोला' हो चुका था। सुना है कि यूपी के गोरखपुर में योगी जी ने उर्दू बाजार को हिंदी बाजार में बदल दिया था; वहां उनकी चलती थी, यहाँ इनकी चलने लगी है। मुस्लिम समाज रेडिकलाइज हो रहा था, तो जवाब में हिंदुओं के भीतर भी एक असहाय उबाल और प्रतिक्रियावादी समूह तैयार हो रहा था। लेकिन जब सरकार ही वैसी हो, तो कोई क्या कर लेता? झड़पें होतीं और फिर शांत हो जातीं। फिर वही ढर्रे पर पांचों वक्त की अज़ान, सड़कों पर नमाज़ और दफ्तरों से नमाज़ के नाम पर गायब होने का खेल शुरू हो जाता था। ऊपर से जातियों के नाम पर मुस्लिम समुदाय में खूब जाति प्रमाणपत्र बांटे गए और नौकरियां आरक्षण के तहत जाने लगीं।


अब नई सरकार ने इन जाति प्रमाणपत्रों की समीक्षा का आदेश दे दिया है। इसे सुनकर हिंदुओं में एक अजीब सुकून है। मुसलमान यकीनन दुखी हो रहे होंगे। लेकिन जो भी हो, हिंदू हो या मुसलमान, सबके लिए संविधान तो सर्वोपरि होना ही चाहिए—यह बात तो खुद मुसलमान भाई भी चिल्ला-चिल्ला कर कहते ही हैं!


बरसों से खेल चल रहा था कि घुसपैठिए आते, उनके आधार कार्ड, वोटर कार्ड और राशन कार्ड रातों-रात बन जाते। फिर दीदी की सरकार उन्हें 'लक्खी भंडार', 'कन्याश्री' और 'स्वास्थ्य साथी' जैसी तमाम योजनाओं से नवाज़ देती। राशन तो मिलता ही था। भाषा एक थी, तो मुस्लिम भाईचारा देशहित से ऊपर भारी पड़ता था। बिना किसी परिश्रम के सड़क किनारे या सरकारी जमीन पर ठिकाना और मुफ्त अनाज पाकर वे मानो सरकार को ही उपकृत करते थे, बदले में तत्कालीन पार्टी को उनके वोटों की पक्की गारंटी मिल जाती थी।


लेकिन यह क्या! जैसे ही वोटरों की शुद्धता के लिए 'SIR' की तलवार लटकी, भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर (माफ़ कीजिएगा, बांग्लादेश-भारत बॉर्डर कहना ही उचित होगा) अचानक भागने वाले घुसपैठियों की हज़ारों की भीड़ लग गई। उन्हें भनक लग गई कि अब मुश्किल वक्त आने वाला है। अब खबर है कि बांग्लादेशियों के न तो आधार बन रहे हैं, न राशन कार्ड। अब देखना यह है कि शुभेंदु अधिकारी कब यह घोषणा करते हैं कि इस जनसांख्यिकीय सफाई के बाद सरकारी खजाने से हर महीने होने वाली निकासी कितनी कम हुई है।


अजूबों की एक श्रृंखला है। सुना है कि ४ मई को परिणाम आया और ५ मई को ही आसनसोल के दुर्गा मंदिर का ताला खोलने का इंतज़ार किए बिना, उसे निर्ममतापूर्वक तोड़कर पूरी तरह खोल दिया गया। विरोध स्वरूप? लोगो ने बदले की कार्रवाई में उस मंदिर में रात को ताला लगाना ही बंद कर दिया है? यह तो मैंने बस ज़रा मज़ाक में कहा भाई, बुरा मत मानना! असल में पार्टी के लोगों ने अल्लाह के बंदों को मंदिर के भजनों, घंटों और बुतों के दर्शन से होने वाली 'दिक्कतों' के मद्देनज़र ही तो उस मंदिर में ताला लटकाया था! फिर उन बंदों की असीम उदारता थी कि दुर्गा पूजा के समय सिर्फ एक दिन के लिए मंदिर खोलने की इजाज़त देकर इस इलाके के बुतपरस्त काफिरों पर भारी एहसान जताया था। ऐसी खबरें अब बंगाल के कई कोनों से आ रही हैं। कई जगह तो भक्तों ने अभी से होली और दिवाली एक साथ मना ली है। बड़ा बाजार में भगवा रंग के गुलाल की रिकॉर्ड बिक्री हो रही है। कुछ चतुर पत्रकारों ने तो आखिरी दौर के मतदान से पहले ही इस भगवा गुलाल की बिक्री देखकर बीजेपी की जीत की भविष्यवाणी कर दी थी, और हम लोग इस डेटा पर बड़ा भरोसा भी करते थे। इस बार तो कम्बख्त सट्टा बाजार भी अंत तक बंगाल का सही ट्रेंड नहीं पकड़ पाया!


अंतिम चरण के मतदान से एक दिन पहले मेरे एक परम मित्र रहमत ने बड़े आत्मविश्वास से कहा था—"देखिएगा, दीदी भवानीपुर से भी जीतेंगी और तृणमूल दो सौ से ज्यादा सीटें लाएगी।" मैंने ठीक उलट दावा किया। एक-एक किलो रसगुल्ले की बाज़ी लग गई। चार मई को जब परिणाम आए, तो रहमत शर्त के मुताबिक रसगुल्ला लाने को तैयार था, लेकिन मैंने ही मना कर दिया। मैंने कहा—"रहमत भाई, तुम उम्र में मुझसे छोटे हो। दीदी सत्ता में रहें या जाएं, दोनों ही सूरतों में तुम्हें रसगुल्ला खिलाना मेरा ही दायित्व बनता है, और हम ज़रूर मिलेंगे और खाएंगे।"


अब हवा में एक नई गूंज है कि यूपी से बुलडोज़र मंगाए जा रहे हैं। पूरे भारतवर्ष में योगी जी के ही बुलडोज़र सफल और शुभ शकुन के द्योतक माने जाते हैं, इसलिए शायद उन्हें ही तकलीफ दी जा रही है। वैसे मैं तो यह सोचकर परेशान था कि क्या खैरात की रेवड़ियां बांटकर बंगाल का खजाना इतना खाली हो गया है कि हम सीधे बुलडोज़र कंपनियों से न खरीदकर योगी जी से उधार मांग रहे हैं? खैर, अब सरकारी जमीनों से बेदखलीकरण और ध्वस्तीकरण की खबरें रोज़ आ रही हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि एक विशेष समुदाय के ही ठिकाने ज्यादा टूट रहे हैं, क्योंकि वे खुद को विशेष अधिकार प्राप्त मानकर ऐसी हरकतों को अंजाम दे चुके थे। ये खबरें इस तेजी से आ रही हैं कि लगता है पूरा बंगाल ही न खाली हो जाय या ध्वस्त हो जाय । "भई , मैं तो अतिशयोक्ति का सहारा लेकर अपने भीतर की वेदना और भड़ास को न्यूट्रलाइज कर रहा हूँ।" लोगों का कहना है।


किसी परम भक्त ने जैसा कहा, मैं वैसा ही बयां कर देता हूँ—सियालदह स्टेशन फांका हो गया, न्यू मार्केट  के बाहर खाली हो गया, तमाम बाजार की सड़कें खाली-खाली दिख रही हैं। अब सड़क पर चलते हुए जब तक एक-दूसरे से कंधे न टकराएं, तब तक कलकत्ते के बाजारों का मज़ा ही क्या दादा? इतना फ्री चलना तो कभी हमारे नसीब में नहीं हुआ; अब इतना सीधा चलने में हमारा बैलेंस ही बिगड़ जाता है, 'की बोलबो!'


पार्किंग का पैसा अब हम किसे देंगे? हमारी गाड़ी की जिम्मेदारी अब कौन लेगा? रोड इतने चौड़े और खुले लग रहे हैं कि कुछ विचित्र सा अहसास हो रहा है। क्या सरकारी अस्पतालों से बिचौलिए और दलाल सचमुच गायब हो गए हैं? तब तो बड़ी मुसीबत होने वाली है भई! अब अस्पताल में बेड कैसे मिलेगा, ऑपरेशन का नंबर कैसे आएगा और मुफ्त वाली दवाएं कौन दिलाएगा? हम जैसे साधारण गरीब मरीजों का इलाज अब कैसे होगा? लोग कहते हैं कि अब 'पहले आओ, पहले पाओ' का नियम चलेगा। भाई, अगर अस्पताल का बेड टूटा मिला या ऑपरेशन की तारीख महीनों बाद की मिली, तो हमारी मदद कौन करेगा? ये पार्टी वाले सम्मानित और भद्र दलाल अगर चले गए, तो अस्पताल का पूरा सिस्टम ही न बैठ जाए! जो भी हो, इसी बीच एक सुकून वाली खबर भी आई कि आर.जी. कर मामले के तीन-तीन पुलिस अधिकारी सस्पेंड कर दिए गए हैं। कुछ अजूबा लगता है न? ये बेचारे तो तत्कालीन सरकार की सुन और मानकर काम कर रहे थे, फिर ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि सरकार अब 'पलटी' हो गई है और कोई नया 'अधिकारी' आ चुका है—मेरा मतलब, शुभेंदु अधिकारी!


इतिहास गवाह है कि जब सीपीएम की सरकार गई, तो टीएमसी वालों ने उनके दफ्तरों पर कब्ज़ा कर लिया था। फिर कांग्रेसियों के पार्टी दफ्तरों को भी निगल गए। २०२१ के बाद तो बीजेपी वालों का भी इन्होंने बुरा हाल किया था। इस बार चार मई के बाद सीपीएम, कांग्रेस और बीजेपी—सब झूम रहे हैं, क्योंकि दादा, अब दादागीरी का अंत हो गया है। बंगाल की परंपरानुसार, सीपीएम के गुंडे जैसे टीएमसी में आ गए थे, मेरा अनुमान था कि टीएमसी वाले भी अब बीजेपी में 'मास ट्रांसफर' पा जाएंगे। कई मोहल्लों में लोग भगवा गमछा डालकर और गुलाल लगाकर पार्टी स्विच करने भी लगे थे ताकि अपनी पुरानी विरासत पर कब्ज़ा बनाए रख सकें। लेकिन यह क्या? बीजेपी नेतृत्व ने उनके इस 'लेटरल एंट्री' और ट्रांसफर पर कड़ा ब्रेक लगा दिया! अब टीएमसी वाले छिपे-छिपे और भागे-भागे फिर रहे हैं; कुछ के पुराने केस खुल रहे हैं और एफआईआर दर्ज हो रही हैं। पर पब्लिक इतनी भोली है कि उसे अब भी भरोसा नहीं हो रहा कि क्या वाकई टीएमसी कार्यकर्ताओं की इस पोस्टिंग और एंट्री को रोक दिया गया है?


टॉलीगंज के एक पेट्रोल पंप पर बरसों से  पार्टी के लोग कुछ कमरों पर कब्ज़ा जमाए बैठे थे। चार मई की रात को ही वे सब धर लिए गए और लॉकअप में डाल दिए गए; जबकि वे सभी भगवा गमछे और गुलाल में खुद का 'स्वघोषित ट्रांसफर' कर चुके थे। गजब खेल है भाई! उधर एक महिला अलग ही खुशी मना रही है, क्योंकि पुरानी पार्टी के जिस छुटभैये नेता ने उसकी दुकान हड़प रखी थी, वह चार मई की रात को उसे स्वेच्छा से छोड़कर रफूचक्कर हो गया। एक मुसलमान चाचा तो भगवा गुलाल लगाए खुशी के आंसू बहा रहे हैं, क्योंकि हाईवे किनारे की उनकी आठ एकड़ की कीमती ज़मीन को पुरानी पार्टी के नेताओं ने 'स्वतः मुक्त' घोषित कर दिया है। हालांकि इस आज़ादी की कीमत उस पीड़ित चाचा को अपने बेटे और भाई को खोकर चुकानी पड़ी, जिसका अफ़सोस कभी कम नहीं होगा।


यूट्यूब और रील्स पर इस समय मुक्ति, बंधन टूटने और आत्मसम्मान की वापसी के अनगिनत वीडियो वायरल हो रहे हैं। कोई मिठाई खिला रहा है, कोई रो रहा है—एक भयावह खौफ से आज़ादी मिली है भाई! गांवों और मोहल्लों के क्लब सूने पड़े हैं, कैरम बोर्ड शांत हैं, अड्डेबाज़ी का स्वरूप बदल गया है। अब 'चा खाबो होच्छे ना' (चाय पीना नहीं हो रहा), बल्कि 'जय श्री राम' या 'राम-राम' के संबोधन आम हो गए हैं। इतनी जल्दी यह सब साक्षात होगा, यह तो सोच से परे था।


पुरानी पार्टी के गुंडों और नेताओं ने राज्य की सीमाओं पर जो अवैध टोल बूथ बना रखे थे, जहां से बंगाल आने वाली हर छोटी-बड़ी गाड़ी से दीदी की सरकार और पुलिस की मिलीभगत से टैक्स वसूला जाता था—वे सब के सब रातों-रात बंद हो गए। क्या वाकई सब के सब? हां भाई, सब के सब! अविश्वसनीय! यह तो कई सौ करोड़ का सालाना धंधा था जो मिट्टी में मिल गया।


कुछ लोगों ने तो मौका देखकर अपने घरों की रंगाई-पुताई भी शुरू कर दी है, क्योंकि अब उन्हें पार्टी वालों को कोई 'रंगदारी टैक्स' नहीं देना पड़ेगा। कुछ ने मकान का कंस्ट्रक्शन इस भरोसे के साथ शुरू कर दिया है कि अब वे अपनी मर्जी के ब्रांड और दुकान से सीमेंट-सरिया खरीद सकते हैं। बालू और गिट्टी भी मनचाहे सप्लायर से आएगी। क्या सचमुच सिंडिकेट राज चला गया? लग तो रहा है, पर भरोसा नहीं होता।


लेकिन मन में एक बड़ी शंका और व्यंग्यात्मक कौतूहल उठता है कि यह सिंडिकेट राज इतनी आसानी से ध्वस्त कैसे हो सकता है? और कब तक ऐसा रहेगा? तोलाबाजी कैसे खत्म हो सकती है? अगर यह सब खत्म हो गया, तो क्या बंगाल में वाकई कोई सरकार बची है? सरकार होने का औचित्य ही क्या रह जाता है यदि वहां कट-मनी सिस्टम न हो, तोलाबाजी न हो, सिंडिकेट न हो? आखिर सरकार के अस्तित्व में होने का अहसास हमें कैसे होगा दादा? हम कैसे भरोसा कर लें?


अब आप कहीं भी दुकान खोल सकते हैं, कोई भी बिजनेस शुरू कर सकते हैं। अपनी टैक्सी, ऑटो, टोटो या रिक्शा चला सकते हैं। लॉरी से ट्रांसपोर्ट का धंधा कर सकते हैं। किराने या चाय-समोसे की दुकान खोल सकते हैं—वह भी बिना किसी पार्टी ऑफिस के चक्कर काटे, बिना मेंबर बने और बिना कोई कमीशन दिए! सब कुछ संभव दिख रहा है। अब आपके परिवार के झगड़े पार्टी ऑफिस के गुंडे नहीं सुलझाएंगे, पुलिस वाले पार्टी की संस्तुति का इंतज़ार नहीं करेंगे, अस्पतालों में भर्ती के लिए पार्टी की पैरवी नहीं लगेगी, और वैक्सीन की वेटिंग लिस्ट भी पार्टी के आका तय नहीं करेंगे। 'लक्खी भंडार' या 'स्वास्थ्य साथी' के लिए अब किसी पार्टी का ठप्पा होना ज़रूरी नहीं रहा। हम पूरे बंगाल में अपनी ज़मीन बेच पाएंगे और घर खरीद पाएंगे। हां, कहीं भी! पार्टी के लोग हमें अपनी ही संपत्ति औने-पौने दाम में बेचने को विवश नहीं कर पाएंगे। लेकिन जब यह सब खत्म हो जाएगा, तो हमें पता कैसे चलेगा कि यहाँ किसी पार्टी की सरकार है? यह अराजकता की स्थिति से कैसे बेहतर होगी दादा?


सुनते हैं कि अब हम कार्टून भी बना पाएंगे और चुटकुलों को ट्विटर पर ट्वीट भी कर पाएंगे—वह भी खुलेआम सरकारी अधिकारियों और शुभेंदु अधिकारी की आलोचना करते हुए! बलात्कारी अब धर-पकड़ लिए जाएंगे, बच नहीं पाएंगे। थानों में शिकायत करने पर पुलिस अब पार्टी से पूछे बिना सीधे आपके घर आ जाएगी।


यकीनन, पीड़ित जनता की आशाएं नई सरकार और शुभेंदु अधिकारी से बहुत ज्यादा हैं, जिन पर बरसों अत्याचार हुए और फर्जी केस लादे गए। उनके ये केस कैसे हटेंगे? जो लोग टीएमसी के मेंबर नहीं थे और बरसों तक लक्खी भंडार, राशन और स्वास्थ्य साथी के लाभ से वंचित रहे, उन्हें नए मुख्यमंत्री कैसे मुआवजा देंगे? इन्हें शीघ्र संतुष्ट करना होगा, अन्यथा विक्षुब्धों का एक नया और विशाल वर्ग तैयार होने में देर नहीं लगेगी। सबसे बड़ी चुनौती इस नई सरकार के सामने यही होगी कि गुंडों, दलालों, तोलाबाजों और सिंडिकेट को किसी भी सूरत में बीजेपी में एंट्री करने से रोकना होगा, क्योंकि यह पब्लिक है, सब जानती है और बड़ी चौकन्नी होकर देख रही है।


यह एक नया विहान तो है, लेकिन मन फिर भी आशंकित है। यदि समाज में कोई भय ही न हो, तो कानून पर भरोसा कैसे होगा? शासन को अब कानून का भय पैदा करना होगा, गुंडों का नहीं। हम तो अब भी आशंकित हैं दादा, भला यह भी कोई सरकार है? हमें तो व्यवस्था पर भरोसा करने के लिए कोई न कोई भय चाहिए ही चाहिए, तभी तो यकीन होगा कि हुकूमत चल रही है!


अमर नाथ ठाकुर, 17 नई, 2026, कोलकाता।

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