Saturday, 4 February 2017

जिन्दगी में कुछ नहीं कर सकते

जिन्दगी में कुछ नहीं कर सकते

जब नहीं बोल सकते थे
जब नहीं चल सकते  थे
जब नहीं सोच सकते  थे
क्योंकि तब तो बच्चे थे ।
तब जुबान कड़वी नहीं थी
शरीर में दम नहीं था
मन किन्तु कितना सच्चा था ।
और सब दिखता अच्छा था ।

फिर जब बोलने लगे तो गलत ही बोलते थे
फिर जब चलने लगे तो गलत रास्ते ही चलते थे
फिर जब सोचने लगे तो  फिर गलत ही सोचते थे
क्योंकि तब तक जवान जो हो गये  थे ।
मन ,शरीर और सोच लहूलुहान हो गये थे ।

अब फिर नहीं बोल सकते क्योंकि जबान लड़खड़ाती है
चल नहीं सकते  क्योंकि कदम लड़खड़ाते हैं
अब सोच भी  नहीं सकते क्योंकि सोच गड़बड़ाते हैं
क्योंकि बूढ़ा जो हो चले हैं ।

पूरी जिन्दगी न बोल सकते
पूरी जिन्दगी न चल सकते
पूरी जिन्दगी न सोच सकते ,
तो फिर क्या यही है जिन्दगी ?

यही जिन्दगी है जब नहीं कुछ कर सकते ।

अमर नाथ ठाकुर , 4 फरवरी , 2017 , मेरठ ।


कुरुक्षेत्र का उपदेशक


मैं उसे गृहस्थी का उपदेश देता रहता हूँ
अपने अनुभव की  गूढ़ बातें बताता रहता हूँ
ऐसा करते हुए मैं कब कृष्ण बन जाता हूँ ,
मुझे नहीं पता !
जाने अनजाने उसे मैं अर्जुन समझ बैठता हूँ क्या ?
यह भी मुझे नहीं पता  !
लेकिन होता है मेरे दृष्टि-पटल पर
 कुरुक्षेत्र के युद्ध क्षेत्र का  वह दृश्य अमर ,
सुदर्शन धारी श्री कृष्ण होते हैं रथ के सारथी
और गाण्डीव धारी शौर्य शाली अर्जुन महारथी ।

लेकिन नहीं होता है मेरी स्मृति-पटल पर ऐसा कोई विचार
कि कृष्ण के पास थी गोपियाँ  सोलह हज़ार
और सारी गोपियाँ कृष्ण - प्रेम में विलाप करती थीं जार- जार
कृष्ण भी सबको करते थे प्यार अपरम्पार ।
मैं इससे भी अनजाना- सा ही होता हूँ कि
मेरी एक ही गोपी होती है और वह भी अतृप्त ,
मैं भी होता हूँ  उदासीन और असन्तुलित ।

मेरा शिष्य अर्जुन की भाँति कर देता है प्रश्नों की बौछार
पर मेरे उपदेश को सुनने को नहीं होता वह तैयार
क्योंकि मैं उपदेशक कृष्ण का अंश भी नहीं दो-चार  ,
तिरस्कारी मुस्कान के बाद शिष्य मुझे देता है नकार ।
और इसलिये मैं उपदेश के लिये हो जाता हूँ अयोग्य ।
 गृहस्थ-जीवन का उपदेश देने का कैसे पाऊँ सुयोग ?

अमर नाथ ठाकुर , 3 फरवरी , 2017 , मेरठ ।




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