मेरा अंतःकरण,
मेरे ईश्वर !
हम बात काट कर उलझा आते हैं,
पर यह सब सुलझा आता है।
हम खत लिख मना कर आते हैं,
यह भाग-भाग कर हाँ कह आता है।
हम शत्रुता का दम्भ भर हुंकारते हैं,
यह सुलह का संदेशा पहुँचा आता है।
हम जब दो कदम बढ़ाते हैं,
यह मीलों आगे चल चुका होता है।
हम जब-जब कदम खींच लेते हैं,
यह वहाँ अटूट खम्भा गाड़ आता है।
हम जब क्रोधित हो आँखें लाल करते हैं,
यह जार-जार रो, आँसू बहा पछताता है।
हम जब दौड़ते-दौड़ते राह मापते हैं,
यह आगे-आगे राह दिखाता चलता है।
हम जब घुप अँधेरे में भटकने लगते हैं,
यह हाथ पकड़ हमें आगे सरकाता है।
हम कभी खड़े-खड़े समर्पण कर आते हैं,
पर यह बार-बार ढाढ़स दे बहलाता है।
हम चौराहे पर किंकर्तव्यविमूढ़ भटकते हैं,
अंतःकरण प्रकाश-पुंज बन राह दिखाता है।
हम जब शक्तिहीन और साधनहीन हो जाते हैं,
तब यह अंतःकरण पाथेय बन हमें जगाता है।
हम सताते हैं, गालियाँ बकते हैं, नफ़रत करते हैं,
पर यह माफी माँग सब बराबर कर आता है।
हम सदैव उसे अनसुना और अनदेखा करते हैं,
पर यह सतत हमें सुनता और देखता रहता है।
अन्तहीन अतल सागर, लहरों के थपेड़ों में हम उपलाते रहते हैं,
वह मेरा सहभागी, पतवार थाम मेरी नैया खेता रहता है।
मेरा अंतःकरण !
मेरे ईश्वर !
अमर नाथ ठाकुर , 14 मई , 2017, मेरठ ।