Search This Blog

Thursday, 24 May 2012

बहुत दिनों बाद




बैलों को हल में जुतते देखा -
आसनसोल और अंडाल के बीच की मनभावन
हरियाली देखी -
दुर्गापुर की चिमनी का धुआँ देखा -
धान की हरियाली , जल-प्लावित नालों की रेखा -
देखा मजदूरिनों की वही पुरानी व्यथा
कीचड़ में लथपथ , ठेहुनों तक सिमटी साड़ी , हाथ में कचिया (हँसुआ ) सखा -
ठूंठ बांस ,फूस के घर का सिलसिला देखा -
लाल माटी वाली सड़कें देखीं -
सफेद - काले बादलों की उमड़ -घुमड़
फिर इन मेघों को बरसते देखा -




वही कोलाहल , वही मस्त भीड़
अर्द्ध - दशक उपरांत वही कोलकाता देखा -
वही सरकती बस और कारें
तथा अब भी खरासती ट्राम देखा -
कचोटता एक दृश्य जो अभी-अभी देखा
टुन-टुन करता , हांफता एक मनुज-बैल देखा -

फिर भी वही गरिमा, क्या दूं उपमा
भारत-बंग-संस्कृति-केन्द्र महानगरी कोलकाता
अनगिनत देश-भक्तों की कर्म-भूमि कोलकाता
कोलकाता          कोलकाता              कोलकाता


अमर नाथ ठाकुर  , २२.०८.२००२ कोलकाता पुनर्वापसी पर 

धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन...