Friday, 5 September 2014

साथ-साथ का आनंद



मैं अकेला होता
बाहर ये हवा भी न होती
और न होता ये अन्तर्मन
तब तो जान पाता एकाकीपन
और तब न माप पाता संग-संग
चलने-बसने का आनंद ।

संभव नहीं ये परिकल्पना
परमेश्वर की जैसी है ये रचना
ये शरीर और ये चेतना
साथ-साथ ही सदा होना ।

चेतना का न होना
है शरीर का मर जाना
अतः एकाकीपन है दुःख का कारण
तो संग रहकर क्यों ये मरण-मारण ।

साथ-साथ है जब रहना
तो फिर क्यों है झगड़ना ।

साथ-साथ का दुःख होता क्षणिक 
और ये माया की प्रवंचना ।
साथ-साथ में सिर्फ चिर आनंद होता
क्योंकि साथ-साथ रहना ही है ईश्वर की साधना ।


अमर नाथ ठाकुर , 4 सितंबर , 2014 , कोलकाता ।  

अपनी धुन में अपने पथ पर


हमारा गाना उन्हें  बेसुरा लगता है
हमारा तुक उन्हें बेतुका लगता है  
हम तर्क करते हैं उन्हें कुतर्क लगता है  
हम पथ पर होते हैं लोग विपथी समझते हैं
हमारा पहनावा उन्हें उच्छृंखल लगता है
हमारी सोच उन्हें एकदम अलग लगती है
हमारी दया उन्हें दिखावा लगता है
हमारा प्रेम उन्हें पागलपन लगता है
हमारी करूणा उनमें घृणा पैदा करता है । 

लोग हँसते हैं , लोग मेरा मखौल उड़ाते हैं
इस तरह मैं तर्कहीन , बेतुका , बेसुरा होता हूँ
विपथी , उच्छृंखल , घृणित  और दिखावटी होता हूँ ।
तब मैं होने लग जाता हूँ विचलित और दीन
फिर मैं होने लगता हूँ अकेला और अस्तित्वहीन
लेकिन तब पाता हूँ तुम्हें,  निराकार और असीम
वह क्षण होता है इसलिये अप्रतिम
जब भज लेता हूँ तुम्हें हे ईश्वर !
और फिर तब मैं गाते हुए चल पड़ता हूँ
अपनी उसी धुन में
अपने पथ  पर  ।



अमर नाथ ठाकुर , 22 अगस्त , 2014 , कोलकाता ।   

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