हम परमानेन्ट मुर्गा होते हैं
जब भी लेट उठा और लेट से स्कूल आया
टीचर ने तब उकड़ूँ बैठाया
दोनों हाथों को दोनों टांगों के पीछे से फँसवाकर
और कान पकड़ कर मुर्गा बनवाया ।
शरीर में हलचल होते ही छड़ी की मार भी खाया ।
मुर्गा बनने के डर से समय पर स्कूल जाता रहा
समय पर होमवर्क करता रहा
नाखून की सफाई करता औऱ साफ कपड़े पहनता रहा
पहाड़े और कविताएँ याद करता रहा
मुर्गा बनने के डर से एक अनुशासित छात्र बना
और तब आज इस सरकारी नौकरी के पात्र बना ।
सरकारी नौकरी में यहाँ कोई टाँग खींचता है
और प्रोमोसन भी रुक जाता है
कोई कपड़े खींचता है
और ट्रांसफर भी रुक जाता है
कोई आंखों में पिन चुभोता है
और बॉस का कान भी भर आता है
कोई सीने पर डंडा चलाता है
और बॉस की फटकार भी आ जाती है
कोई गर्दन मरोड़ता है
और बॉस का मेमो भी मिल जाता है
टारगेट पूरा करने के लिए बॉस का शब्द-वाण दिल में चुभता है
सबऑर्डिनेट की मेडिकल बिल, एडवांस नहीं मिलने पर भड़ास सुनायी देती है
हमारी छुट्टी तो अक्सर रद्द हो जाती है
किन्तु हमारे अधीनस्थ की छुट्टी की जिद्द रह जाती है
बॉस और अधीनस्थ के पत्थरों के बीच हम पिसते रहते हैं ।
बाड़ में फड़फड़ाते मुर्गे की तरह
हलाल होते मुर्गे की तरह
ऑफिस रूपी जेल में हम चीखते रह जाते हैं ।
फाइलों के नोट शीट में एक - एक शब्द , कोमा
फुल स्टॉप की अशुद्धियां ठीक करते हुए
एक-एक कर दाना चुगते हुए
गुटरगूँ करते भविष्य- हीन मुर्गे की भाँति
जीना यहां - मरना यहां - इसके सिवा जाना कहां
हम सिर्फ गुनगुनाते भर रह जाते हैं ।
यहाँ हम क्या कम मुर्गा होते हैं !
मुर्गा छुरी से जब हलाल होता है
खून से लथपथ हो जाता है ,
यहाँ सी बी आई, विजिलेंस,सी वी सी के पास की
शिकायत और विभिन्न जाँच की छूरियाँ हमारे सीने में
भी सदा घुपती रहती है
रक्त-रंजित लथपथ हमारे विचार हो जाते हैं
हमारे प्राणों की हुक - हुकी निकलती होती है
भय से होंठ काँपते रहते हैं
कलेजा धक-धक करता रहता है
छटपटाहट में हम कहाँ चैन से सो पाते हैं
बुरी खबरों की संशय में हमारी नौकरी के दिन बीत रहे होते हैं।
मुर्गा तो एक ही दिन कटता है
पर मुक्त हो जाता है,
हम तो यहां रोज कटते हैं
यहाँ बार-बार कट-कट कर जीते हैं
यहाँ तो हम कई गुना मुर्गा होते हैं
हम परमानेंट अमृतपान किये हुए मुर्गा होते हैं ।
अमर नाथ ठाकुर , 29 अप्रैल , 2018, मेरठ।
जब भी लेट उठा और लेट से स्कूल आया
टीचर ने तब उकड़ूँ बैठाया
दोनों हाथों को दोनों टांगों के पीछे से फँसवाकर
और कान पकड़ कर मुर्गा बनवाया ।
शरीर में हलचल होते ही छड़ी की मार भी खाया ।
मुर्गा बनने के डर से समय पर स्कूल जाता रहा
समय पर होमवर्क करता रहा
नाखून की सफाई करता औऱ साफ कपड़े पहनता रहा
पहाड़े और कविताएँ याद करता रहा
मुर्गा बनने के डर से एक अनुशासित छात्र बना
और तब आज इस सरकारी नौकरी के पात्र बना ।
सरकारी नौकरी में यहाँ कोई टाँग खींचता है
और प्रोमोसन भी रुक जाता है
कोई कपड़े खींचता है
और ट्रांसफर भी रुक जाता है
कोई आंखों में पिन चुभोता है
और बॉस का कान भी भर आता है
कोई सीने पर डंडा चलाता है
और बॉस की फटकार भी आ जाती है
कोई गर्दन मरोड़ता है
और बॉस का मेमो भी मिल जाता है
टारगेट पूरा करने के लिए बॉस का शब्द-वाण दिल में चुभता है
सबऑर्डिनेट की मेडिकल बिल, एडवांस नहीं मिलने पर भड़ास सुनायी देती है
हमारी छुट्टी तो अक्सर रद्द हो जाती है
किन्तु हमारे अधीनस्थ की छुट्टी की जिद्द रह जाती है
बॉस और अधीनस्थ के पत्थरों के बीच हम पिसते रहते हैं ।
बाड़ में फड़फड़ाते मुर्गे की तरह
हलाल होते मुर्गे की तरह
ऑफिस रूपी जेल में हम चीखते रह जाते हैं ।
फाइलों के नोट शीट में एक - एक शब्द , कोमा
फुल स्टॉप की अशुद्धियां ठीक करते हुए
एक-एक कर दाना चुगते हुए
गुटरगूँ करते भविष्य- हीन मुर्गे की भाँति
जीना यहां - मरना यहां - इसके सिवा जाना कहां
हम सिर्फ गुनगुनाते भर रह जाते हैं ।
यहाँ हम क्या कम मुर्गा होते हैं !
मुर्गा छुरी से जब हलाल होता है
खून से लथपथ हो जाता है ,
यहाँ सी बी आई, विजिलेंस,सी वी सी के पास की
शिकायत और विभिन्न जाँच की छूरियाँ हमारे सीने में
भी सदा घुपती रहती है
रक्त-रंजित लथपथ हमारे विचार हो जाते हैं
हमारे प्राणों की हुक - हुकी निकलती होती है
भय से होंठ काँपते रहते हैं
कलेजा धक-धक करता रहता है
छटपटाहट में हम कहाँ चैन से सो पाते हैं
बुरी खबरों की संशय में हमारी नौकरी के दिन बीत रहे होते हैं।
मुर्गा तो एक ही दिन कटता है
पर मुक्त हो जाता है,
हम तो यहां रोज कटते हैं
यहाँ बार-बार कट-कट कर जीते हैं
यहाँ तो हम कई गुना मुर्गा होते हैं
हम परमानेंट अमृतपान किये हुए मुर्गा होते हैं ।
अमर नाथ ठाकुर , 29 अप्रैल , 2018, मेरठ।