Search This Blog

Thursday, 5 April 2012

क्यों न रहें अनजाने


कोई नहीं हो अपना
जब इस शहर में
नहीं घट सकती कोई दुर्घटना --

अनजाने को कौन जाने
जो कोई बन्दूक ताने
लूटें हमारे खजाने --

जरूरत भी क्या जो हम लगे यहाँ सजाने
धन , पद  और गुमान की ढोल बजाने --

झुक -झुक कर जब काम चले
क्यों कोई  चले यहाँ सीना ताने
और लोग बोलें  पागल -दीवाने --

पके फल जब खुद गिरे
क्यों कोई  पत्थर मारे --

मुस्की से जब काम चले
क्यों चले ठहाका लगाने --

फिर क्यों कोई देख ललचाए
और कुछ अनहोनी घट जाए

न कोई बने अपना --
क्यों घटे कोई दुर्घटना ---


अमर नाथ ठाकुर , ५ अप्रैल , २०१२. 

धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन...