विजयादशमी : असत्य पर सत्य की जय
आज दशहरा है। आज विजयादशमी भी है। कहने में कोई हिचक नहीं कि आज अंधकार परास्त हो गया है। पाप ने पुण्य के समक्ष समर्पण कर दिया है। असत सत्य के सामने असहाय हो गया है। यह हमारी केवल मानसिक कल्पना नहीं, बल्कि राम और माँ दुर्गा में हमारी निष्ठा की पराकाष्ठा है, जो हमारे विश्वास को दृढ़ता और हमारी आत्मा को ऊर्जा प्रदान करती है।
आज रावण धू-धू कर जल उठेगा, राम के तरकश से निकले वाण की ज्वाला में। और उस अग्नि की आभा में हमारा मन निर्मल हो जाएगा। आज ही रामलीला का समापन होगा।
इधर, माँ दुर्गा ने महिषासुर का संहार कर दिया है। चण्ड-मुण्ड, शुम्भ-निशुम्भ, रक्त बीज पहले ही उनके पैरों तले कुचले जा चुके हैं। विजयी मुद्रा में, विजय-घोष के बीच, आज माँ अपनी सवारी पर सवार होकर प्रस्थान करेंगी। हम विजय की इस बेला में भी अश्रुपूरित हैं। ये आँसू हार के नहीं, बल्कि जीत और आनंद के आँसू हैं।
उल्लूक ध्वनि और शंख नाद से गूँजते वातावरण में, सिंदूर खेला के बीच जब माँ विदा लेंगी, पीछे मुड़कर हमें निहारेंगी, तो हर चौराहे पर, हर पंडाल में उनकी स्मृति बस जाएगी। कोलकाता की गलियाँ, मोहल्ले, चौक-चौराहे आज माँ को आँखों में भरकर विदा करेंगे। जनता के नेत्रों से उमड़ते आँसुओं में प्रेम और आस्था की गंगा बह निकलेगी।
आज से पंडाल से रोशनियों के झाड़-फनूस, सजावट की लकड़ियाँ, कपड़ों के पर्दे सब उतारे जाने लगेंगे। पर यह उत्सव की समाप्ति नहीं, बल्कि अगले आगमन की तैयारी का संकेत है। माँ के लौटते ही अगले वर्ष के पंडाल, उनकी थीम और साज-सज्जा पर चर्चा शुरू हो जाएगी।
यह आना-जाना जन्म-मृत्यु के शाश्वत चक्र जैसा है। हर वर्ष माँ आती हैं, और फिर चली जाती हैं, ताकि प्रतीक्षा और पुनर्मिलन का आनंद जीवित रहे। युगों-युगों से यह परंपरा चली आ रही है और न जाने कब तक चलती रहेगी। शायद तब तक, जब तक सारी आत्माएँ परम तत्व में विलीन न हो जाएँ।
उस अंतिम क्षण में, जब सृष्टि का पटाक्षेप होगा, ब्रह्मांड मौन हो जाएगा। फिर केवल एक उद्घोष गूँजेगा—"एकोऽहम् बहुस्यामः"। और उसी से एक नई सृष्टि का आविर्भाव होगा। एक नया चक्र, एक नया खेल, एक नया उत्सव।
इसलिए आज विजयादशमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह जीवन का दर्शन है—कि असत्य कितना भी शक्तिशाली क्यों न लगे, अंततः सत्य ही विजयी होता है।
जय श्रीराम
जय माँ दुर्गे
अमर नाथ ठाकुर, 2 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।