रमता योगी
चार पैसों की है ज़िंदगी,
चाहे तुम खरीद लो,
चाहे वह बेच दे।
सुबह से शाम तक खटा लो,
या कोड़े की मार लगा दो,
कोल्हू के बैल-सी घुमा लो—
हमारी कराह भीतर ही सिसकती रहेगी,
हमारी वेदना भीतर ही भटकती रहेगी।
हमारी आँखें नहीं डबडबाएंगी,
चार पैसों की है हमारी ज़िंदगी,
चाहे तुम पीट लो,
चाहे वह पीट ले।
धरती की हरियाली मेरा बिछौना,
मेघ है मेरा झरना, झीलें और सागर हैं मेरे तरणताल।
सूरज मेरा दीपक,
चाँद करता रखवाली,
और तारों से सजा मुक्त आकाश
बनता मेरी मच्छरदानी ।
मैं खुश हूँ—मस्ती में डूबी है मेरी जिंदगानी,
मुझे नहीं कोई देनदारी।
चार पैसों की है मेरी ज़िंदगी,
चाहे तुम छोड़ दो,
चाहे वह छेड़ दे।
न कोई चाह धन-संचय की,
न कोई जीने की लालसा।
पंचभूतों का है यह बर्तन,
पर न पंच इंद्रियों का क्रंदन,
न पंच कोषों का कोई बंधन।
मैं हूँ रमता योगी,
मैं हूँ बहता पानी।
चार पैसों की है मेरी ज़िंदगी,
फिर क्यों फटके पास मेरे गंदगी?
न कोई प्रारब्ध शेष,
न कोई कर्म का बंधन।
न जन्म-मृत्यु से मैं सीमित,
न सुख-दुःख मुझे करते भ्रमित।
अतः चार पैसों की है मेरी ज़िंदगी,
चाहे तुम खरीद लो,
चाहे वह बेच दे।
मैं हूँ रमता योगी,
मैं हूँ बहता पानी।
अमर नाथ ठाकुर
11 अक्टूबर 2025, कोलकाता