क्योंकि हम दलित हैं इसलिए?
सर से उतार देते हो साफ़ा,
फिर उतारते हो घोड़े से।
नाच-गाना जब हम करते हैं,
तो फिर पीट देते हो कोड़े से।
उत्पात मचा उत्सव रोक हमें भगाते,
और हम भागते भगोड़े-से।
क्योंकि तुम्हारी नज़रों में हम दलित हैं —
क्या बस इसी कारण थोड़े से?
शताब्दियों से जीते आए हैं झूझते
हम इन तानों, ठोकरों और थपेड़ों से,
फिर भी टिका है हमारा अस्तित्व
इन दुखों के पहाड़ों से, झंझावातों से।
पर कुंभ के संगम तट पर, साथ ही तो स्नान करते
भंडारे में संग बैठकर तुम साथ ही तो प्रसाद पाते
अखाड़े के साधु तुम्हें आशीष देते हैं,
तो उनके हाथ हमारे सिर पर भी तो होते हैं।
सत्संग के पंडालों में, रामकथा, भागवत,
गीता की स्वर लहरियाँ हमारे कानों में निर्बाध उतरती हैं।
सूरज और चाँद की किरणें हमारे आँगन में भी पसरती है।
गंगा हो या गोदावरी हमें देखकर भी
कल कल बहती ही रहती है।
आग की ज्वाला हमें ठंडी नहीं मिलती।
वर्षा की बूँदें हमारे मोहल्ले में भी पड़ती हैं।
हवा की शीतलता तुम्हारे लिए अलग तो नहीं होती होगी?
कचड़े नालों की सड़ांध तुम्हें भी तो आती होगी ?
पुष्प की महक तो हमें भी महसूस होती है।
मिठाई हमें भी मीठी ही लगती है,
और नमक लगता उतना ही नमकीन।
मिर्च तुम्हें भी तो जलाती होगी,
और मृत्यु करता होगा गमगीन !
बैजू का राग हो या तानसेन की तान,
हमारे परदादा के परदादा के कानों में भी गूँजी थी।
तुम्हारी बांसुरी की धुन हमारे दिल को अभी भी छूती है,
हमें देख यह बेसुरा नहीं हो जाती।
क्या हम शहनाई नहीं बजाते?
क्या उसकी गूँज राह भूल जाती है,
तुम्हारे कानों तक तो पहुँचती होगी?
क्या तुम्हारी माँ ने तुम्हें बिना प्रसव पीड़ा के जन्म दिया?
हमारी माएँ भी प्रसव पीड़ा में कराहती हैं।
तुम मौत पर रोते हो,
हमारी आत्माएँ भी मृत्यु पर बिलखती हैं।
मेरे जन्म पर मेरी मां ने खुशियां बांटी थीं,
क्या तुम्हारे जन्म पर तुम्हारी मां रोयी थी ?
कभी सुना नहीं कि चारों धामों में,
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में, बावन शक्तिपीठों
या वैष्णोदेवी के प्रांगण में,
बालाजी, बद्री विशाल या रामेश्वरम में,
हमारे हाथों से चढ़ाए फूलों ने रास्ता बदला हो।
हमारे भी हाथों से दुर्बा, बिल्वपत्र,
जौ और अक्षत शिवलिंगों पर,
वैसे ही चढ़ते हैं जैसे तुम्हारे।
फिर तुम हमारा रास्ता क्यों रोकते हो ?
हमें अपने समाज से विमुख क्यों करते हो?
हमारा साफ़ा उतारकर,
घोड़े से नीचे क्यों गिराते हो?
क्या सिर्फ इसलिए… क्योंकि हम दलित हैं?
अमर नाथ ठाकुर, 12 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।