Friday, 31 October 2025

बिहार की शराबबंदी: एक संकट/ भ्रष्टाचार का एक नया अध्याय?

बिहार की शराबबंदी: एक संकट/ भ्रष्टाचार का एक नया अध्याय?

बिहार में वर्षों से शराबबंदी लागू है। इस निर्णय के कारण बिहार सरकार को शराब उद्योग और शराब बिक्री से मिलने वाले टैक्स की सैकड़ों करोड़ की आमदनी से हाथ धोना पड़ा। सरकार ने यह कदम इस उद्देश्य से उठाया था कि समाज में शराब से फैल रही बुराइयों को दूर किया जा सके और बिहारी जनमानस का नैतिक स्तर ऊँचा उठे। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हुआ? आइए, इसका यथार्थ मूल्यांकन करें।

वास्तविकता यह है कि यह उद्देश्य लगभग विफल रहा। बिहार एक लैंडलॉक्ड राज्य है, जो नेपाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल से घिरा हुआ है — और इन सभी जगहों पर शराब की खुली बिक्री है। भारत के किसी राज्य से दूसरे राज्य में जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, और नेपाल के साथ भी आवाजाही लगभग बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के होती है। ऐसे में बिहार के लोग आसानी से इन सीमावर्ती क्षेत्रों या नेपाल जाकर शराब का सेवन कर लेते हैं।

सीमा के पास रहने वालों को तो कोई कठिनाई नहीं होती, वे पास के प्रदेशों में जाकर पीकर लौट आते हैं। शुरुआत में जो लोग बिहार के भीतर दूरवर्ती इलाकों में रहते थे, उन्हें थोड़ी दिक्कत हुई। रोज-रोज यात्रा करना संभव नहीं था, तो वे सप्ताह में एक या दो बार जाकर यह “जरूरत” पूरी करने लगे। लेकिन गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लोगों के लिए यह स्थिति बड़ी कठिन बन गई। उनके सामने तो जैसे संकट खड़ा हो गया — करें तो क्या करें?

जैसा कि कहा गया है — “आवश्यकता आविष्कार की जननी है।” लोगों ने जल्दी ही इसका समाधान भी खोज लिया। उपकरण का नहीं, बल्कि उपाय का आविष्कार हुआ। गाँवों में स्थानीय तौर पर शराब बननी शुरू हो गई। चावल को सड़ाकर, संथाल आदिवासियों के पारंपरिक तरीकों से देशी शराब तैयार की जाने लगी। आज स्थिति यह है कि बिहार के लगभग हर गाँव और हर शहर में यह लोकल शराब चोरी-छिपे बन रही है, बिक रही है और सेवन की जा रही है।

इतना ही नहीं, विदेशी और ब्रांडेड शराब की भी कोई कमी नहीं है। काला धंधा फल-फूल रहा है। दूसरे राज्यों और नेपाल से अवैध सप्लाई चेन हर गली-मोहल्ले तक फैली है। बोतलें और पाउच प्लास्टिक थैलियों में छिपाकर पहुँचाई जाती हैं। घर घर व्यक्ति व्यक्ति के पास मोबाइल फोन की उपलब्धता ने इस मांग और पूर्ति की प्रक्रिया को काफी आसान कर दिया है। निश्चित रूप से इनके दाम ज़्यादा हैं, क्योंकि “कानून से बचकर” मिलने की कीमत भी इनमें शामिल है। वर्षों में यह अवैध कारोबार बिहार में एक प्रकार के कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है।

हजारों युवा इस धंधे में जुड़ चुके हैं। बेरोजगारी की पीड़ा भुलाकर वे इस “नए रोजगार” से आमदनी कमा रहे हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सरकार के मंत्री, विपक्ष के नेता, अधिकारी और पुलिस — सबको इन गतिविधियों की पूरी जानकारी है। ये सारे कार्य पुलिस के संरक्षण में हो रहे हैं, क्योंकि यही अब भ्रष्टाचार से आमदनी का सबसे बड़ा स्रोत बन गया है।

नीतीश कुमार ने शराबबंदी को निश्चय ही एक अच्छी और नैतिक सोच के साथ लागू किया था, परंतु उसका उद्देश्य पूरा नहीं हो सका। उल्टे, इसने बिहार के युवाओं को काला बाज़ारी, अवैध धंधे और भ्रष्टाचार के नए गुर सिखा दिए।

वास्तव में शराबबंदी किसी भी राज्य में व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। राज्यों के बीच खुली आवाजाही को बंद नहीं किया जा सकता। ऐसे में शराबबंदी जैसे कानून सिर्फ भ्रष्टाचार और अवैध कमाई के नए रास्ते खोल देते हैं। इससे पुलिस और प्रशासन की “अतिरिक्त आमदनी” के अवसर बढ़ते हैं, पर समाज के नैतिक स्तर में गिरावट आती है।

बिहार में इस नीति ने युवाओं के नैतिक पतन को और तेज किया है। सामाजिक ताने-बाने को कमजोर किया है। संस्कृति को दूषित किया है। असभ्यता और अपराध को बढ़ाया है। समाजशास्त्रियों के लिए यह अध्ययन का विषय हो सकता है कि शराबबंदी के बाद बिहार में अपराध की दर में किस प्रकार की वृद्धि हुई। शराब की बिक्री, तस्करी और सेवन से जुड़े अपराधों की संख्या में तो उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई ही है।

दुखद यह भी है कि शराबबंदी से निम्न और निम्न-मध्यम वर्ग की महिलाओं की पीड़ा कम नहीं हुई। पियक्कड़ों की घरेलू हिंसा, कलह और उत्पीड़न की समस्या पहले जैसी ही बनी हुई है।

अब जबकि बिहार फिर चुनाव की दहलीज पर है, यदि नीतीश सरकार पुनः सत्ता में आती है, तो उसे चाहिए कि इस शराबबंदी नीति पर गंभीर पुनर्विचार करे। जन सुराज जैसे दलों का मत इस पर स्पष्ट है, और महागठबंधन के दलों को भी इस ज्वलंत सामाजिक समस्या पर शीघ्र सोचकर ठोस कदम उठाने चाहिए — इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।

अमर नाथ ठाकुर, 31 अक्तूबर, 2025, कोलकाता।

Sunday, 26 October 2025

बिहार का चुनाव

 बिहार का चुनाव कई मायने में अनोखा होता है।चुनावी विश्लेषक बिहार के चुनावी परिणामों की सटीक भविष्यवाणी करने में सामान्यतः असमर्थ साबित होते हैं। इतना पेचीदा है बिहार के वोटरों की मानसिकता और किसी समस्या को उसका पढ़ने समझने का तरीका कि ये चुनावी भविष्यवक्ता उसे समझ कर भी अपने सर्वेक्षण में पूर्णतः समेट नहीं पाते हैं। परिणाम यह होता है कि हम परसेप्शन से चलते हैं कि कौन सी पार्टी चुनावी गणितीय समीकरण का समाधान निकालने में सफल होगी।

 बिहार में जाति आधार पर अधिकांश लोग मतदान करते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि एक जाति वाले दूसरी जाति वाले नेता को वोट नहीं करते। हमने यहां बिहार के  इसी परिदृश्य को खासकर चित्रित किया है। 

चुनावी विश्लेषक विधानसभा-वार जाति- वार सैंपल न ले तो  उसकी चुनावी भविष्यवाणी का चुनावी सर्वेक्षण कभी भी सटीक नहीं बैठेगा। जातिगत आधार पर वोटों का बंटवारा ऐसा पहलू है कि प्रशांत किशोर के प्रभावशाली नेतृत्व के प्रदर्शन के बावजूद आप नहीं सोच सकते कि उन्हें कुछ सीटें मिल पाएंगी। जाति आधारित वोटिंग ऐसी स्थिति पैदा करती है कि बहुमत के लिए और सरकार बनाने के लिए जातियों का अथवा पार्टियों का गठबंधन अपरिहार्य है।इसके बिना सरकार बनाने की कोई पार्टी सोच भी नहीं सकती। और यही कारण है कि जातिगत विद्वेष होने के बावजूद पार्टियों के गठबंधन से जाति गत सौहार्द्र और सामंजस्य बिहार में बना रहता है।

उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक आदि राज्यों जैसी यहां भी चुनावी राजनीति पर पारिवारिक पार्टियों का कब्जा है। लेकिन अन्य अधिकांश राज्यों के प्रतिकूल पारिवारिक पार्टी यहां जातियों की पार्टी है। पारिवारिक पार्टी अपनी जाति को प्रतिनिधित्व देती है। यहां यादव, कुर्मी, कोयरी, कुशवाहा, मल्लाह, दुसाध, मुसहर,राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण आदि जाति के कुछ मुख्य नेता हैं और जाति के आधार पर उनकी पार्टी भी है तथा इन नेताओं के लिए उनकी जाति वाले वोट करते हैं चाहे वो नेता जिस भी पार्टी में हों । इससे बीजेपी को अलग रख सकते हैं क्योंकि ये न तो पारिवारिक पार्टी है और न किसी एक जाति विशेष की पार्टी। 

मुसलमानों का बिहार में एक सर्वमान्य नेता नहीं है लेकिन इससे बढ़कर एक मुश्त और एक होकर रणनीतिक तौर पर कोई जाति या समुदाय वोट नहीं करता। ये एंटी बीजेपी रहेंगे सिर्फ ये तय होता है।

बिहार में अच्छी खासी संख्या फ्लोटिंग वोटरों की भी है।ये ऐसे वोटर हैं जो जाति के फैक्टर को ज्यादे प्रश्रय नहीं देते हैं।ये खुलेआम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समस्याओं पर अपनी पैनी नजर रखते हैं और विकास, राष्ट्रवाद, मंहगाई, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था आदि मुद्दों को प्रमुखता देते हैं और वोट में पार्टिसिपेट करते हैं। इसमें सभी जातियों और समुदाय के वोटर होते हैं। कहीं कहीं किसी नेता की उनकी व्यक्तिगत योग्यता भी उनको ऐसे लोगों के द्वारा वोट दिलाती है। ऐसे में आप जन सुराज पार्टी को कुछ वोट मिलने का अनुमान लगा सकते हैं। हिंदू मुस्लिम विभेद के कारण, घुसपैठियों के मुद्दे पर वोटों के ध्रुवीकरण का मुद्दा कभी नहीं दरकिनार किया जा सकता है। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में इस वजह से बीजेपी को हिन्दू वोट के जाति सीमा को लांघकर मिलने के आसार बहुत बढ़ जाते हैं।

बिहार में अधिकांश वोट जातीय समीकरण के हिसाब से डाले जाते हैं।  यह तो तय है। हर जाति का अपना मान्य नेता होता है यह भी तय है। लोग अपनी जाति के नेता को वोट देते हैं। ये चीजें ऊपर आपके समक्ष हम रख चुके हैं। पार्टी इस वजह से कोई मायने नहीं रखती है।इसलिए यह समझना अत्यन्त आवश्यक होगा कि कौन सी जाति किस पार्टी को समर्थन देती है या देने जा रही है। और यह भी कोई निश्चित नहीं कि इस बार के चुनाव में अमुक जाति अमुक पार्टी को ही वोट देगी।यह देश, काल , पात्र के हिसाब से बदलते रहता है। और हां, जब यह कहते हैं कि अमुक जाति वाले अपनी जाति के नेता के हिसाब से चलते हैं तो इसका मतलब शत प्रतिशत नहीं लिया जाना चाहिए़।इसका मतलब अधिकांश से होता है।अब समस्या है यहां इस अधिकांश प्रतिशत को समझना।यह अधिकांश प्रतिशत 50 से लेकर 80-90 तक कुछ भी हो सकता है लेकिन 100% कभी नहीं। हर जाति में स्वतंत्र विचारधारा वाले, क्रांतिकारी विचारधारा वाले लोग भी होते हैं या कुछ ऐसे लोग होते हैं जो अपने व्यक्तिगत कारण से ये नेता के विरुद्ध चलते हैं। कहीं कहीं कुछ जातियों में  अपनी  महत्त्वाकांक्षा की वजह से अनेक नेता हो गए हैं जो अच्छी खासी संख्या में अपनी जाति के समर्थक पर प्रभाव रखते हैं।ऐसी स्थिति में जाति आधारित वोटिंग होने के बाद भी आप अनुमान नहीं लगा सकते हैं कि उस जाति विशेष के वोट कहां कहां बंट रहे हैं।

बिहार की चुनावी गणित को समझने के लिए उन जातियों की कुल जनसंख्या को जानना अत्यन्त जरूरी है। इस वजह से नीचे जाति-वार प्रतिशत ब्यौरा भी हम दे रहे हैं जो पिछली जाति आधारित सरकारी जनगणना के आंकड़े पर आधारित है, जो सही है। इस तथ्य को भी जानना जरूरी है कि किसी भी जाति के सभी मतदाता अपनी जाति के अमुक लीडर को हर समय सारा मत नहीं देते हैं।यह निर्भर करता है कि नेता कितना दबंग, धनशाली और तेज तर्रार है। जातिगत खानदानी विरासत भी बहुत ही मायने रखता है। जैसे लालू को मिलने वाला वोट अब तेजस्वी को मिलेगा, रामविलास पासवान को मिलने वाला वोट अब चिराग को मिलेगा। पिछले चुनाव के समय के वादों को किस नेता ने कितना निभाया, उनके यहां की शादी में आया या नहीं, मौत में संवेदना व्यक्त करने आया या नहीं, अथवा और किसी संकट के समय अपनी जाति वालों के साथ खड़े हुआ या नहीं आदि आदि बातें भी वोटों के बंटवारे को तय करता है। 

भ्रष्टाचार बिहार में मुद्दा होता है लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह मुद्दा जाति के फैक्टर को कभी दरकिनार नहीं कर सकता। इसी तरह बेरोजगारी, कानून व्यवस्था , मंहगाई , विकास आदि के मुद्दे भी कभी भी जाति के फैक्टर को पीछे नहीं छोड़ सकता। इस वजह से आप पाएंगे कि हत्या, अपहरण, बलात्कार, लूटपाट, दंगा फसाद आदि में सजायाफ्ता नेता जाति की वजह से अपना प्रभाव व प्रभुत्व बनाए रखने में कामयाब रहते हैं। अनन्त सिंह, सूरजभान, आनन्द मोहन, लालू यादव आदि जैसे नेता या उनके परिवार के लोग भारी संख्या में अपने समर्थक को अपने से जोड़ने में कामयाब रहते हैं।

कुछ नेताओं के प्रभाव का जिक्र न करें तो बिहार के चुनावी कुरुक्षेत्र की चर्चा अधूरी मानी जाएगी। यह अधिकांश बिहारियों की राय है कि नरेन्द्र मोदी के बराबर का ईमानदार, राष्ट्रवादी नेता और विकास पुरुष स्वातंत्र्योत्तर भारत में कम हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी ख्याति, हाल के ऑपरेशन सिंदूर आदि जैसी घटनाएं उनके व्यक्तित्व को ऊंचाई देती है और बीजेपी और NDA को अधिकांश वोट उनके नाम पर ही आएंगे।

नीतीश कुमार कुर्मी जाति से आते हैं और अधिकांश कुर्मी उनको वोट देंगे। लेकिन उसके अलावा नीतीश की छवि एक ईमानदार नेता की रही है, अभी तक उनपर भ्रष्टाचार का कोई भी आरोप नहीं लगा है।जंगल राज से बिहार को मुक्त करने में एवं विकास की तरफ अग्रसर करने में जो कुछ भी अल्प काम हुआ है उसका श्रेय नीतीश कुमार को ही जाता है।महिलाओं के लिए चलाए गए अनेक योजनाओं ने महिलाओं में उन्हें लोकप्रियता प्रदान किया है। पलटूबाज की छवि से उनकी बदनामी हुई है राष्ट्रीय स्तर पर तथा पार्टियों के बीच में, लेकिन बिहार में यह ऐसा फैक्टर नहीं है कि उनका वोट कम हो।बिहार में जाति और धर्म के बंधन को लांघकर यदि कोई नेता वोट पाता है तो वह एकमात्र नेता नीतीश कुमार हैं। उनकी लोकप्रियता की सानी का नेता स्वास्थ्य आदि के बारे में फैलाए दुष्प्रचार के बावजूद और कोइ भी नेता बिहार में किसी भी पार्टी में नहीं है।अतः बीजेपी नीतीश को छोड़ नहीं सकती। NDA का भविष्य नरेन्द्र मोदी और नीतीश के बिना बिहार में अकल्पनीय है।

यादवों के नेता निर्विवाद रूप से लालू प्रसाद हैं जबकि पूरे बिहार के स्वातंत्र्योत्तर इतिहास में इतना बड़ा भ्रष्ट नेता आज तक नहीं हुआ।अपहरण और जंगलराज के ये बिहार में प्रणेता रहे हैं।  मुस्लिमों को छोड़कर यादव समाज बिहार का सबसे बड़ा समुदाय है जो बिहार की आबादी का 14.26% है और अधिकांश यादवों के ये मान्य नेता हैं।MY समीकरण का ईजाद इन्होंने किया था और अपने नाना प्रकार के कारनामों से ये मुस्लिमों के भी निर्विवाद नेता हैं।मुस्लिम एक मुश्त वोट करने के लिए जाने जाते हैं। मुस्लिमों की आबादी का प्रतिशत 17.70% है। इस तरह यादवों से भी ज्यादे ये मुस्लिम वोट पाते हैं और इस तरह करीब 32% के वोटों में से अधिकांश का हिसाब इनकी झोली में जाता है।ये चुनाव नहीं लड़ सकते न्यायालय द्वारा अयोग्य ठहराए जाने के बाद, लेकिन इन्होंने अपनी विरासत अपने पुत्र तेजस्वी यादव को सौंपी है और यादवों और मुस्लिमों के निर्विवाद नेता के रूप में तेजस्वी को प्रसिद्धि मिलती जानी जा रही है। यह पिछले चुनाव से भी साबित हो चुका है। 

जब मुस्लिम वोटों की चर्चा हो तो फिर असदुद्दीन ओवैसी की चर्चा के बिना यह बात अधूरी रहेगी।ओवैसी राष्ट्रीय स्तर के मुस्लिमों के नेता के रूप में मुस्लिमों को प्रभावित करने वाले विषयों पर अपनी कट्टर राय रख कर एक महत्वपूर्ण स्थान बनाने में सफल हुए हैं। बिहार के पिछले चुनाव में इन्होंने मुस्लिम वोटों को खूब बांटा था। वैसे ये बंगाल में सफल नहीं हो पाए थे लेकिन बिहार की अनूठी छवि है। राजद के तेजस्वी यादव को मुस्लिम वोटों का इनकी वजह से बहुत नुकसान होगा। एंटी हिन्दू छवि से राहुल गांधी ने कांग्रेस के लिए अच्छे मुस्लिम वोट उत्तर प्रदेश में कमाए थे लेकिन उनकी छवि इतनी नहीं बनती लग रही है कि महागठबंधन को ओवैसी द्वारा पहुंचाए जाने वाले मुस्लिम वोटों के नुकसान की क्षतिपूर्ति पूर्ण रूप से कर सके। इसका फायदा NDA को सीधा मिलता मालूम पड़ता है क्योंकि ऐसे क्षेत्रों में हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण के फायदे से उसे वंचित नहीं किया जाता मालूम पड़ता है।

यादवों में पप्पू यादव हो या नित्यानंद राय हों या राम कृपाल यादव हों या बिजेंद्र यादव हों, यादवों के वोट आंशिक रूप से अपने अपने क्षेत्रों में समेटने में ये सफल होते हैं। लेकिन जमींदारी प्रथा के लाइन पर लालू परिवार ही अधिकांश यादव वोटों का विरासत थामे हुए है।

 चिराग पासवान वैसे तो दलितों में दुसाध जाति से आते हैं लेकिन उनकी छवि जाति की परिधि को लांघती नजर आती है और उनके युवा और ईमानदार नेता की छवि से उनकी स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है। मांझी मुसहर जाति के नेता हैं और अपनी इस दलित जाति में उनकी पैठ जरूर है। उपेन्द्र कुशवाहा कोयरी/कुशवाहा जाति से हैं और अच्छी खासी पैठ उनकी अपनी जाति में है।बीजेपी में भी इन जातियों के कुछ बड़े नेता हैं जिसकी वजह से इन जातियों के वोट बंटने की संभावना कम हो जाएगी क्योंकि ये सब NDA में ही हैं। अगड़ी और संभ्रांत जातियों के झुकाव बीजेपी और नीतीश की छवि की वजह से नीतीश कुमार की तरफ रही है जिसका एडवांटेज NDA को मिलेगा। 

मुकेश सहनी को कुछ ज्यादे ही अखबारों के मुख पृष्ठ पर स्थान मिल रहे हैं जबकि इनकी जाति मल्लाह है, जिनकी आबादी बहुत खास उल्लेखनीय नहीं है।लेकिन, जो भी हो महागठबंधन को उसका फायदा जरूर मिलेगा। 

मुस्लिमों की निष्ठा राजद में होने की वजह से उनकी आकांक्षा उपमुख्यमंत्री आदि के रूप में पूरी नहीं होने से उसका थोड़ा नुकसान तो महागठबंधन को जरूर होगा। । मुस्लिमों को प्रतिनिधित्व  न मिलने की बात को ओवैसी बार बार प्रचारित कर मुस्लिमों में अपनी पैठ बना रहे हैं। इसकी चर्चा ऊपर तो कर ही चुके हैं।

 कन्हैया कुमार की कोई खास छवि बिहार में है नहीं अतः उनसे महागठबंधन ग्रुप को कोई विशेष लाभ मिलने की संभावना नजर नहीं आते है। NDA से विक्षुब्ध और खानदानी कांग्रेसी अभी भी नेहरू, इंदिरा आदि की छवि से वोट बटोरेंगे।ऐसे ही कांग्रेसी राहुल गांधी के पीछे पीछे नजर आते हैं।लेकिन एंटी हिन्दू छवि बनाकर अच्छी खासी मुस्लिम वोट महागठबंधन को ये दिलाएंगे। कांग्रेस और तेजस्वी के एक साथ होने से मुस्लिम वोटों के बिखराव और बंटान की आशंका कम हो गई है।लेकिन ओवैसी फैक्टर बहुत ही प्रभावकारी होगा जिसे नकारा नहीं जा सकता।

अगड़ी जाति में भूमिहार ब्राह्मणों में और राजपूतों में एकमुश्त वोट करने की मानसिकता रही है।गिरिराज सिंह और लल्लन सिंह के NDA में होने की वजह से ये वोट ज्यादे न बंटे,ऐसी संभावना है।ब्राह्मणों का कांग्रेसी झुकाव बिहार में कब का बिखर चुका है और उनका झुकाव बीजेपी, मोदी और नीतीश के प्रति अनुमानित है। नीतीश मिश्र या संजय झा ने ब्राह्मण वोटरों खासकर मैथिल वोटरों में पैठ बनाई है लेकिन उल्लेखनीय नहीं कही जा सकती। कुछ और जातियां अच्छी खासी संख्या में बिहार में है किन्तु उनमें अभी तक कोई बड़ा नेता सामने उभर कर नहीं आया है। ये संभवतः अन्य जातियों से नजदीकी और उनके नेताओं द्वारा फायदा पहुंचाने के  विशेष आश्वासन पर अपने वोट देंगे ।

कर्पूरी ठाकुर नाई थे लेकिन पिछड़ों के बड़े नेता थे।भारत रत्न देकर नाइयों का और पिछड़ों के प्रति सहानुभूति रखनेवाले कर्पूरी समर्थक  वोटरों को बीजेपी ने साधने की कोशिश की है। यह अन्य पिछड़ों के वोट NDA की तरफ लाने में मदद करेगा।

बीजेपी की छवि अभी भी मुस्लिम विरोधी की है लेकिन शाहनवाज हुसैन जैसे नेता को इसे दरकिनार नहीं करना चाहिए।अपनी साफ सुथरी छवि से ये गैर मुस्लिम मतदाताओं में भी लोकप्रियता रखता है।भविष्य की सोचकर और कुछ बिखरे अपने समुदाय से असंतुष्ट मुस्लिम वोटरों को समेटने में इस तरह के नेता उपयोगी होते हैं। लेकिन यह तो साफ है कि बिहार बीजेपी में नीतीश या तेजस्वी यादव या चिराग पासवान या प्रशांत किशोर जैसे नेता का सर्वथा अभाव है। रूडी या रविशंकर प्रसाद में या गिरिराज सिंह में कुछ कमी तो झलकती है जिस वजह से ये सर्वमान्य नेता नहीं बन पा रहे हैं। बिहार में अन्य राज्यों जैसे बीजेपी के सर्वमान्य नेता जैसे हेमंत विश्वशर्मा , योगी, दिग्विजय सिंह, पुष्कर धामी, देवेंद्र फडणवीस आदि जैसे नेता नहीं है।

 बिहार में किसी भी पार्टी में सर्वमान्य महिला नेता का भी अभाव है।

तेजस्वी के मुख्यमंत्री के रूप में उद्घोषणा से यादव और मुस्लिम गुट एक साथ जहां आएंगे वहीं एंटी यादव और एंटी मुस्लिम गुट को एकत्रित होने में मदद मिलेगी और इसका फायदा NDA को जरूर मिलेगा। कुछ पिछड़ी जातियां यादवों के एकाधिकार वाले शासन से ईर्ष्या रखती है।

महिलाओं को ऋण, 125 यूनिट फ्री बिजली, वृद्धों का पेंशन 500 से बढ़ाकर 1100 रुपए, मुफ्त के अनाज आदि जैसे उपाय से एंटी इनकंबेंसी की क्षति को पूरा करने का NDA का उपाय बहुत कारगर साबित हो रहा है। इसी तरह तेजस्वी का हर घर नौकरी वाले स्कीम की घोषणा से कुछ लोग उनकी तरफ जरूर आकर्षित होंगे, भले ही यह योजना फिजिबल नहीं हो। जाति फैक्टर से इतर वोट करने वाले,फ्लोटिंग वोटर जो अंत में निर्णय करते हैं कि किसे वोट करें, वैसे वोटर नीतीश एवं तेजस्वी की इन घोषणाओं से अलग अलग आकर्षित होंगे और वोट के आंकड़े को प्रभावित करेंगें। हमें नहीं लगता कि राहुल गांधी के वोट चोरी और SIR पर चलाए अभियान ने मतदाताओं पर कोई महत्वपूर्ण छाप छोड़ी है ।

बिहार के चुनाव का एक और महत्वपूर्ण पहलू है जो यहां के चुनाव परिणाम को प्रभावित करता है।कश्मीर को छोड़कर शायद सबसे कम वोट टर्नओवर वाले राज्यों में बिहार का नाम आता है, 55% भी नहीं आते वोट देने के लिए।यह भी तय है कि संभ्रांत लोग, अगड़ी जाति वाले लोग वोट देने कम निकलते हैं। दलित समुदाय, यादव और मुसलमान बड़ी संख्या में वोट देने निकलते हैं।इससे चुनाव परिणाम को ये बहुत ही ज्यादे प्रभावित करते हैं। इसका फायदा महागठबंधन को मिलेगा । बिहारी मजदूर दूसरे राज्यों में होने की वजह से वोट में भाग नहीं ले सकते हैं।बंगाल में पार्टी के वोटर बड़े डेडीकेटेड होते हैं वो तो दूसरे राज्यों से, दूसरे जिलों से वोट देने अपने नेटिव जिले में आ जाते हैं।मुस्लिम वोटर ऐसा तो निश्चित ही करते हैं। बिहार में इसका प्रतिशत बहुत कम होता होगा अतः ये चुनावी आंकड़े को प्रभावित करने में उतना हिस्सेदारी न रखता हो।

14 नवंबर का इंतजार करते हैं जब परिणाम सामने होगा जब हम अपना भी मूल्यांकन कर पाएंगे कि NDA को हमारा बढ़त देने का अनुमान कितना सटीक बैठता है।

 बिहार जाति-वार जनसंख्या प्रतिशत (2023 रिपोर्ट के सार्वजनिक आँकड़ों पर आधारित) :

क्रमांक जाति / समुदाय जनसंख्या प्रतिशत (%) टिप्पणी / स्रोत
1 यादव 14.26 प्रमुख OBC
2 कुशवाहा / कोइरी 4.21 OBC
3 कुर्मी 2.87 OBC
4 तेली 2.81 OBC
5 धानुक 2.13 EBC
6 नोनिया 1.91 EBC
7 नाई (हजाम) 1.59 EBC
8 कहार / चंद्रवंशी 1.64 EBC
9 बढ़ई 1.45 EBC
10 प्रजापति / कुम्हार 1.40 EBC
11 बिन्द 0.98 EBC
12 पासी 0.98 SC
13 कोरी / कोरैया 0.013 SC
14 धोबी 0.84 SC
15 लोहार 0.15 EBC
16 सुनार (सोना-कारीगर) 0.68 EBC
17 भुईहर (भूमिहार) 2.87 सवर्ण
18 ब्राह्मण 3.65 सवर्ण
19 राजपूत 3.45 सवर्ण
20 कायस्थ 0.60 सवर्ण
21 बनिया (वैश्य समूह) 2.31 सवर्ण / व्यापारी वर्ग
22 दुसाध (पासवान) 5.31 SC
23 चमार / रवीदास / मोची 5.25 SC
24 मुसहर 3.08 SC

25 मेहतर / भंगी 0.19 SC
26 गंगौता / गंगा-पार समूह 0.40 EBC
27 मल्लाह / निषाद / केवट 2.60 EBC
28 कानू 2.21 EBC
29 तेली-सोनार मिश्रित उपजातियाँ 0.20 EBC
30 बनारसी / हलवाई 0.84 EBC
31 मुस्लिम (कुल) 17.70 धर्मवार अनुपात
32 शेख (Muslim) 3.82 सबसे बड़ी मुस्लिम जाति
33 मोमिन / अंसारी / जुलाहा 3.55 मुस्लिम OBC
34 सुरजापुरी (Muslim) 1.87 पूर्वोत्तर बिहार
35 पठान / खान 0.75 (अनुमानित) मुस्लिम उच्चवर्ग
36 सैयद / सय्यद 0.27 मुस्लिम उच्चवर्ग
37 मुगल (Muslim) 0.11 मुस्लिम उच्चवर्ग
38 शेखरा / मलिक 0.42 मुस्लिम मध्यवर्ग
39 नदाफ / धुनिया 0.34 मुस्लिम बुनकर समुदाय
40 रहीमी / फकीर / मियां / बेग 0.23 मुस्लिम सामान्य वर्ग (सूफ़ी पृष्ठभूमि)
41 पान (पानरी / सावसी) 1.70 EBC
42 राजभर 0.50 EBC
43 कोल / खरवार (आदिवासी) 0.15 ST
44 संथाल 0.11 ST
45 ओरांव 0.08 ST

समग्र समूह-वार प्रतिशत जनसंख्या:

समूह कुल प्रतिशत
अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) 36.01%
पिछड़ा वर्ग (OBC) 27.12%
अनुसूचित जाति (SC) 19.65%
अनुसूचित जनजाति (ST) 1.68%
सवर्ण / सामान्य वर्ग 15.52%
मुस्लिम (धर्मवार) 17.70% (इनमें शेख, अंसारी, सुरजापुरी आदि सम्मिलित)


अमर नाथ ठाकुर, 25 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।





Thursday, 23 October 2025

धर्म निरपेक्षता बनाम सर्व धर्म समभाव

 धर्म निरपेक्षता बनाम सर्वधर्म समभाव 


(एक भारतीय दृष्टिकोण से विचार)


हमें “सेकुलर” शब्द से स्वाभाविक असहजता होती है। यह शब्द हमें कृत्रिम और अस्वाभाविक प्रतीत होता है। यह शब्द, जिसे हिंदी में “धर्मनिरपेक्ष” कहा जाता है, वस्तुतः बड़ा धोखे वाला और भ्रामक शब्द है। व्यवहार में यह लगभग असंभव है कि कोई मनुष्य पूर्ण रूप से धर्मनिरपेक्ष हो सके। मनुष्य का स्वभाव, उसकी भावनाएँ, संस्कार, और आस्था किसी न किसी रूप में धार्मिक आधार से जुड़ी होती हैं। इस दृष्टि से, “सेकुलर होना” एक ऐसी स्थिति है जो व्यवहारतः अप्राकृतिक और असंभव है।

यदि कोई प्राणी सेकुलर हो सकता है तो वह मनुष्य नहीं, बल्कि वे जीव हैं जो सोचने, तर्क करने या विश्वास करने की क्षमता नहीं रखते — जैसे पशु और पक्षी। एक गाय मंदिर, मस्जिद या चर्च के सामने से बिना किसी विचार के गुजर जाती है; पक्षी निश्चिंत भाव से किसी मंदिर के शिखर या मस्जिद के गुम्बद पर बैठकर गा उठता है। उनमें श्रद्धा या नफरत का भाव नहीं होता। वे न तो धार्मिक हैं, न अधार्मिक। अतः यदि कोई वास्तव में सेकुलर हो सकता है, तो वह केवल पशु या पक्षी ही हो सकते हैं — मनुष्य नहीं।

यह कैसे कल्पना की जा सकती है कि कोई हिन्दू अपने हिंदुत्व को त्यागकर व्यवहार करे?इसी प्रकार किसी मुस्लिम या ईसाई या अन्य से यह कैसे अपेक्षा की जाय कि धर्म के स्केल पर वह शून्य की स्थिति में आ जाए और अपना सरकारी कार्यों का निर्वहन करे?


संविधान में धर्मनिरपेक्षता का प्रवेश

हमारे संविधान की प्रस्तावना में “धर्मनिरपेक्ष” शब्द 42वें संविधान संशोधन (1976) के माध्यम से जोड़ा गया। यह काल आपातकाल का था, जब देश में अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता पर नियंत्रण था। इस संशोधन का औचित्य और समय, दोनों ही संदेहास्पद रहे हैं। परंतु आज चूँकि यह संविधान का अंग है, इसलिए शासन-प्रशासन के कर्मियों और राजनेताओं को व्यवहारतः “धर्मनिरपेक्ष” होने का नाटक करना पड़ता है, ताकि वे संविधान के अनुरूप दिखें।


पश्चिमी “सेकुलरिज़्म” बनाम भारतीय दर्शन

पश्चिमी समाजों में नास्तिकता बढ़ रही है — विशेषकर यूरोप और चीन जैसे देशों में। इसलिए वहाँ के समाज अपेक्षाकृत सेकुलर प्रतीत होते हैं। परंतु भारतीय दर्शन के अनुसार, नास्तिक होना ही असंभव है। सनातन दृष्टि कहती है कि “ईश्वर ही आनन्द का स्रोत है, और आनन्द ही ईश्वर है।” प्रत्येक मानव उस आनन्द की तलाश में ही जीवन व्यतीत करता है — चाहे वह ईश्वर को माने या न माने। अतः जो आनन्द चाहता है, वह वस्तुतः ईश्वर की खोज में है। इस अर्थ में, प्रत्येक व्यक्ति आस्तिक है।

जब हर व्यक्ति आस्तिक है, तो वह स्वभावतः धार्मिक है। धर्म वही पथ है जो हमें ईश्वर तक पहुँचाता है। अतः धार्मिक व्यक्ति का धर्मनिरपेक्ष होना विरोधाभासी है। यदि कोई स्वयं को “सेकुलर” कहता है, तो वह एक नाटक ही कर रहा है — और नाटक के आधार पर कोई समाज स्थायी रूप से संगठित नहीं रह सकता।


सर्वधर्म समभाव : भारतीय विकल्प

इसलिए भारतीय समाज के लिए “सर्वधर्म समभाव” ही सच्चा मार्ग है। यह सिद्धांत कहता है कि सभी धर्म समान हैं, सभी मार्ग एक ही ईश्वर तक ले जाते हैं। बचपन में हम सबने वह प्रार्थना गाई है —

“ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान।” यह प्रार्थना केवल बच्चों के मुख की कविता नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का स्वर है।

यह कोई नाटक नहीं, बल्कि भारत के आध्यात्मिक सत्य की सहज अभिव्यक्ति है।

सनातन परंपरा में समावेश का भाव इतना व्यापक है कि उसमें विरोध की कोई संभावना नहीं बचती। बौद्ध, जैन, सिख जैसे धर्म इसी सनातन विचारधारा से उपजे हैं। एकेश्वरवाद भी सनातन की जड़ में है — इसलिए इस्लाम या ईसाई धर्म से कोई टकराव स्वाभाविक नहीं।


असहिष्णुता की जड़ : धर्म की गलत व्याख्या

समस्या वहाँ उत्पन्न होती है जहाँ लोग धर्म के ग्रंथों को पढ़कर संकीर्ण अर्थ निकालते हैं। ऐसे लोग अपने धर्म को श्रेष्ठ बताकर दूसरों को नीचा दिखाने लगते हैं। यही प्रवृत्ति समाज के लिए घातक है। जबकि इतिहास गवाह है कि सूफी संतों ने मंदिरों में जाकर भक्ति से कव्वालियाँ गाई हैं, और हिंदू मजारों पर सिर नवाते आए हैं। यह भारत की धरती का स्वभाव है — समावेश, न कि विभाजन।

यदि मुसलमान हिंदुओं की “बुतपरस्ती” से नफरत न करें, और यदि हिंदू अपने देवताओं की भिन्न रूपों में पूजा करते हुए दूसरों को नीचा न दिखाएँ — तो प्रेम, सहिष्णुता और भाईचारे का वातावरण सहज ही स्थापित हो जाएगा।

धर्म का सार प्रेम है, किंतु जब वही धर्म अहंकार का विषय बन जाता है, तो उसका स्वरूप विकृत हो जाता है।


व्यवहार में धर्मनिरपेक्षता का असंभव होना

भारत में हर व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में अपने ईश्वर को स्मरण करता है। यहां हर भारतीय के आचरण और उसके कतरे कतरे में धर्म सन्निहित है चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी या यहूदी।

हिंदू “राम-राम”, “जय श्रीकृष्ण”, “हे भगवान” कहते हैं; ये जब मिलते हैं तो स्वागत में, बिछुड़ते हैं तो विदा लेते समय, श्मशान जाते समय शोक की अभिव्यक्ति में, घृणा व्यक्त करते समय या खुशियां प्रकट करते समय ... राम राम इत्यादि के संबोधन से अपने भाव व्यक्त करते हैं; 

मुसलमान “अल्लाह”, “बिस्मिल्लाह”, “इंशाअल्लाह” कहते हैं;

ईसाई “ओ माई गॉड”, “प्रे टू गॉड” कहते हैं।

ऐसे समाज से यह अपेक्षा करना कि वह सरकारी या राजनीतिक कार्य में पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष व्यवहार करेगा — यह असंभव और कृत्रिम है। वह नाटक के सिवा और क्या हो सकता है ?

इसलिए, सेकुलरिज़्म एक छद्म अवधारणा है, जबकि सर्वधर्म समभाव एक जीवंत और व्यवहार्य सिद्धांत है।


निष्कर्ष

भारतीय समाज का आधार सर्वधर्म समभाव होना चाहिए, न कि दिखावटी धर्मनिरपेक्षता। यही विचार मानवोचित है, यही संविधान की आत्मा के अधिक अनुरूप है। इससे समाज में वैमनस्य मिटेगा, सहिष्णुता बढ़ेगी, और प्रेम, करुणा तथा परोपकार की भावना सशक्त होगी।

धर्मनिरपेक्षता एक कृत्रिम आदर्श है —और इसलिए हम सेकुलर नहीं हो सकते।यदि हम सेकुलर हो जाएं तो हम अपनी महान सांस्कृतिक धार्मिक विरासत को खो देंगे, हम अराजक जो जाएंगे , हम अनुशासनहीन हो जाएंगे, हमारी दिनचर्या बिगड़ जाएगी और हमारे भारतीय समाज का तानाबाना बिखर जाएगा। और हम दावे के साथ कह सकते हैं कि हम अधिकांश भारतीय सेकुलर नहीं हैं और हो भी नहीं सकते।

जबकि सर्वधर्म समभाव, भारतीय आत्मा का स्वाभाविक सत्य है। अधिकांश भारतीय सर्व धर्म समभाव की भावना और चेतना से ओतप्रोत है और हमारा समाज सांप्रदायिक धार्मिक विभाजन के बावजूद एकत्रित है और संगठित है। 

यह आसान भी है कि हम हिन्दू रहें और सम भाव से मुस्लिमों और ईसाइयों के प्रति व्यवहार करें।और ऐसी ही अपेक्षा किसी मुस्लिम या ईसाई या किसी और धर्मावलंबी से भी आसानी से की जा सकती है।


अमर नाथ ठाकुर, 23 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।


Sunday, 12 October 2025

क्योंकि हम दलित हैं इसलिए....

क्योंकि हम दलित हैं इसलिए?


सर से उतार देते हो  साफ़ा,

फिर उतारते हो घोड़े से।

नाच-गाना जब हम करते हैं,

 तो फिर पीट देते हो कोड़े से।

उत्पात मचा उत्सव रोक हमें भगाते,

और हम भागते भगोड़े-से।

क्योंकि तुम्हारी नज़रों में हम दलित हैं — 

क्या बस इसी कारण थोड़े से?

शताब्दियों से जीते आए हैं झूझते 

हम इन तानों, ठोकरों और थपेड़ों से,

फिर भी टिका है हमारा अस्तित्व 

इन दुखों के पहाड़ों से, झंझावातों से।


पर कुंभ के संगम तट पर, साथ ही तो स्नान करते 

भंडारे में संग बैठकर तुम साथ ही तो प्रसाद पाते

अखाड़े के साधु तुम्हें आशीष देते हैं,

तो उनके हाथ हमारे सिर पर भी तो होते हैं।

सत्संग के पंडालों में, रामकथा, भागवत, 

गीता की स्वर लहरियाँ हमारे कानों में निर्बाध उतरती हैं।

सूरज और चाँद की किरणें  हमारे आँगन में भी पसरती है।

गंगा हो या गोदावरी हमें देखकर भी 

कल कल बहती ही रहती है।

आग की ज्वाला हमें ठंडी नहीं मिलती।

वर्षा की बूँदें हमारे मोहल्ले में भी पड़ती हैं। 

हवा की शीतलता तुम्हारे लिए अलग तो नहीं होती होगी?

कचड़े नालों की सड़ांध तुम्हें भी तो आती होगी ?

पुष्प की महक तो हमें भी महसूस होती है।

मिठाई हमें भी मीठी ही लगती है,

और नमक लगता उतना ही नमकीन।

मिर्च तुम्हें भी तो जलाती होगी,

और मृत्यु करता होगा गमगीन !

बैजू का राग हो या तानसेन की तान,

 हमारे परदादा के परदादा के कानों में भी गूँजी थी।

तुम्हारी बांसुरी की धुन हमारे दिल को अभी भी छूती है,

हमें देख यह बेसुरा नहीं हो जाती।

क्या हम शहनाई नहीं बजाते?

क्या उसकी गूँज राह भूल जाती है,

तुम्हारे कानों तक तो पहुँचती होगी?


क्या तुम्हारी माँ ने तुम्हें बिना प्रसव पीड़ा के जन्म दिया?

हमारी माएँ भी प्रसव पीड़ा में कराहती हैं।

तुम मौत पर रोते हो, 

हमारी आत्माएँ भी मृत्यु पर बिलखती हैं।

मेरे जन्म पर मेरी मां ने खुशियां बांटी थीं,

क्या तुम्हारे जन्म पर तुम्हारी मां रोयी थी ?



कभी सुना नहीं कि चारों धामों में,

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में, बावन शक्तिपीठों 

या वैष्णोदेवी के प्रांगण में, 

बालाजी, बद्री विशाल या रामेश्वरम में,

हमारे हाथों से चढ़ाए फूलों ने रास्ता बदला हो।

हमारे भी हाथों से दुर्बा, बिल्वपत्र, 

जौ और अक्षत शिवलिंगों पर,

वैसे ही चढ़ते हैं जैसे तुम्हारे।


फिर तुम हमारा रास्ता क्यों रोकते हो ?

हमें अपने समाज से विमुख क्यों करते हो? 

हमारा साफ़ा उतारकर,

 घोड़े से नीचे क्यों गिराते हो?

क्या सिर्फ इसलिए… क्योंकि हम दलित हैं?


अमर नाथ ठाकुर, 12 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।

Saturday, 11 October 2025

रमता योगी


रमता योगी 

चार पैसों की है ज़िंदगी,
चाहे तुम खरीद लो,
चाहे वह बेच दे।

सुबह से शाम तक खटा लो,
या कोड़े की मार लगा दो,
कोल्हू के बैल-सी घुमा लो—
हमारी कराह भीतर ही सिसकती रहेगी,
हमारी वेदना भीतर ही भटकती रहेगी।
हमारी आँखें नहीं डबडबाएंगी,
चार पैसों की है हमारी ज़िंदगी,
चाहे तुम पीट लो,
चाहे वह पीट ले।

धरती की हरियाली मेरा बिछौना,
मेघ है मेरा झरना,                                                              झीलें और सागर हैं मेरे तरणताल।

सूरज  मेरा दीपक,
चाँद करता रखवाली,
और तारों से सजा मुक्त आकाश
बनता मेरी मच्छरदानी ।


मैं खुश हूँ—मस्ती में डूबी है मेरी जिंदगानी,
मुझे नहीं कोई देनदारी।
चार पैसों की है मेरी ज़िंदगी,
चाहे तुम छोड़ दो,
चाहे वह छेड़ दे।

न कोई चाह धन-संचय की,
न कोई जीने की लालसा।
पंचभूतों का है यह बर्तन,
पर न पंच इंद्रियों का क्रंदन,
न पंच कोषों का कोई बंधन।
मैं हूँ रमता योगी,
मैं हूँ बहता पानी।
चार पैसों की है मेरी ज़िंदगी,
फिर क्यों फटके पास मेरे गंदगी?

न कोई प्रारब्ध शेष,
न कोई कर्म का बंधन।
न जन्म-मृत्यु से मैं सीमित,
न सुख-दुःख मुझे करते भ्रमित।
अतः चार पैसों की है मेरी ज़िंदगी,
चाहे तुम खरीद लो,
चाहे वह बेच दे।
मैं हूँ रमता योगी,
मैं हूँ बहता पानी।

अमर नाथ ठाकुर
11 अक्टूबर 2025, कोलकाता


रमता योगी

 रमता योगी



चार पैसों की है जिंदगी

चाहे तुम खरीद लो

चाहे वह बेच दे।


सुबह से शाम तक खटा लो

चाहे कोड़े की मार लगा दो

कोल्हू के बैल की तरह फेर लो

हमारी कराह हमारे अंदर ही सिसकती रह जाएगी

हमारी वेदना अंदर ही भटकती रह जाएगी

हमारी आँखें नहीं डबडबाएंगी 

चार पैसों की है हमारी जिंदगी 

चाहे तुम पीट लो

 चाहे वह पीट ले।


धरती की हरियाली जिसका बिछौना हो

मेघ जिसका झरना हो

झील और सागर हों जिसके तरण ताल

सूरज हो जिसका दीपक

चंदा जिसकी रखवाली करता

और तारों से सजा

मुक्त आकाश हो जिसकी मच्छरदानी

खुश हूं मस्ती भरी है मेरी जिंदगानी

मुझे नहीं कोई देनदारी

चार पैसों की मेरी जिंदगी

चाहे तो तुम छोड़ दो

चाहे वह छेड़ दे।


न कोई चाह धन संचय की 

न कोई जीने की लालसा

पंच भूतों का है यह बर्तन

पर न पंच इंद्रियों का क्रंदन

न पंच कोषों का कोई बंधन

मैं हूं रमता योगी

मैं हूं बहता पानी

चार पैसों की है मेरी जिंदगी

फिर क्यों फटके पास मेरे गंदगी


न कोई प्रारब्ध शेष

न कोई कर्म का बंधन

न जन्म मृत्यु से मैं सीमित

सुख दुःख नहीं करते भ्रमित

अतः चार पैसे की मेरी जिंदगी 

चाहे तुम खरीद लो

चाहे वह बेच दे।

मैं हूं रमता योगी

मैं हूं बहता पानी।


अमर नाथ ठाकुर, 11 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।

Thursday, 2 October 2025

विजयादशमी: असत्य पर सत्य की जय



विजयादशमी : असत्य पर सत्य की जय

आज दशहरा है। आज विजयादशमी भी है। कहने में कोई हिचक नहीं कि आज अंधकार परास्त हो गया है। पाप ने पुण्य के समक्ष समर्पण कर दिया है। असत सत्य के सामने असहाय हो गया है। यह हमारी केवल मानसिक कल्पना नहीं, बल्कि राम और माँ दुर्गा में हमारी निष्ठा की पराकाष्ठा है, जो हमारे विश्वास को दृढ़ता और हमारी आत्मा को ऊर्जा प्रदान करती है।

आज रावण धू-धू कर जल उठेगा, राम के तरकश से निकले वाण की ज्वाला में। और उस अग्नि की आभा में हमारा मन निर्मल हो जाएगा। आज ही रामलीला का समापन होगा।

इधर, माँ दुर्गा ने महिषासुर का संहार कर दिया है। चण्ड-मुण्ड, शुम्भ-निशुम्भ, रक्त बीज पहले ही उनके पैरों तले कुचले जा चुके हैं। विजयी मुद्रा में, विजय-घोष के बीच, आज माँ अपनी सवारी पर सवार होकर प्रस्थान करेंगी। हम विजय की इस बेला में भी अश्रुपूरित हैं। ये आँसू हार के नहीं, बल्कि जीत और आनंद के आँसू हैं।

उल्लूक ध्वनि और शंख नाद से गूँजते वातावरण में, सिंदूर खेला के बीच जब माँ विदा लेंगी, पीछे मुड़कर हमें निहारेंगी, तो हर चौराहे पर, हर पंडाल में उनकी स्मृति बस जाएगी। कोलकाता की गलियाँ, मोहल्ले, चौक-चौराहे आज माँ को आँखों में भरकर विदा करेंगे। जनता के नेत्रों से उमड़ते आँसुओं में प्रेम और आस्था की गंगा बह निकलेगी।

आज से  पंडाल से रोशनियों के झाड़-फनूस, सजावट की लकड़ियाँ, कपड़ों के पर्दे सब उतारे जाने लगेंगे। पर यह उत्सव की समाप्ति नहीं, बल्कि अगले आगमन की तैयारी का संकेत है। माँ के लौटते ही अगले वर्ष के पंडाल, उनकी थीम और साज-सज्जा पर चर्चा शुरू हो जाएगी।

यह आना-जाना जन्म-मृत्यु के शाश्वत चक्र जैसा है। हर वर्ष माँ आती हैं, और फिर चली जाती हैं, ताकि प्रतीक्षा और पुनर्मिलन का आनंद जीवित रहे। युगों-युगों से यह परंपरा चली आ रही है और न जाने कब तक चलती रहेगी। शायद तब तक, जब तक सारी आत्माएँ परम तत्व में विलीन न हो जाएँ।

उस अंतिम क्षण में, जब सृष्टि का पटाक्षेप होगा, ब्रह्मांड मौन हो जाएगा। फिर केवल एक उद्घोष गूँजेगा—"एकोऽहम् बहुस्यामः"। और उसी से एक नई सृष्टि का आविर्भाव होगा। एक नया चक्र, एक नया खेल, एक नया उत्सव।

इसलिए आज विजयादशमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह जीवन का दर्शन है—कि असत्य कितना भी शक्तिशाली क्यों न लगे, अंततः सत्य ही विजयी होता है।

जय श्रीराम
जय माँ दुर्गे

अमर नाथ ठाकुर, 2 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।


बिहार की शराबबंदी: एक संकट/ भ्रष्टाचार का एक नया अध्याय?

बिहार की शराबबंदी: एक संकट/ भ्रष्टाचार का एक नया अध्याय? बिहार में वर्षों से शराबबंदी लागू है। इस निर्णय के कारण बिहार सरकार को शराब उद्योग...