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Friday, 30 October 2026

कॉमन सेंस और सिविक सेंस

 कॉमन सेंस और सिविक सेंस


‘कॉमन सेंस’ (सामान्य समझ) और ‘सिविक सेंस’ (नागरिक बोध या सामाजिक बोध)—ये दोनों शब्द जितने सहज हैं, आज के सामाजिक आचरण में उतने ही दुर्लभ और असामान्य होते जा रहे हैं। हम जाने-अनजाने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच की विभाजन रेखा को निरंतर मिटाते चले जा रहे हैं।

वस्तुतः यह समझ हर साधारण से साधारण नागरिक में नैसर्गिक रूप से विद्यमान होती है, किंतु दुखद यह है कि लोग इसके प्रयोग से विमुख होते जा रहे हैं। जब तथाकथित पढ़े-लिखे और साधन-संपन्न लोग ही इस बुनियादी नागरिक कर्तव्य की अवहेलना करने लगें, तो वे समाज और पड़ोसियों के लिए गंभीर संकट खड़ा करते हैं। कई बार यह उपेक्षा किसी की जान पर भी भारी पड़ जाती है, फिर भी लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते।

जिस दिन व्यक्ति इस सामाजिक बोध को अपने आचरण में उतार ले, उस दिन नगर, राज्य और देश की आधी से अधिक समस्याओं का समाधान स्वतः हो जाए।

सड़कों और चौराहों पर कूड़े के ढेर न दिखें, नदियां और नाले मैला ढोने के साधन न बनें, और हवा में सड़ते कचरे की दुर्गंध न घुले। सार्वजनिक स्थलों, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर पान-मसाले की वीभत्स पीक दिखाई न दे। सड़कों के किनारे लघुशंका की बदबू से निजात मिल जाए, और पालतू गाय, बैल , भैंस लावारिसों की तरह सड़कों पर न भटकें। कागज़ के टुकड़ों से मुक्त होकर शहर सांस लेने योग्य बनें, और 'अनुशासन देश को महान बनाता है' केवल दीवारों पर लिखा नारा न रहकर हमारे जीवन की वास्तविकता बन जाए।

किंतु विडंबना यह है कि यह अनुशासनहीनता केवल सार्वजनिक सड़कों तक सीमित नहीं है; हमारी आधुनिक बहुमंजिला आवासीय सोसायटियों का यथार्थ इससे भी अधिक पीड़ादायक है।

रास्तों पर गुटखे की तीखी पिचकारियां और सीढ़ियों की दीवारों पर पान के अमिट दाग आम दृश्य हैं। सिगरेट के अधजले टुकड़े बिना बुझाए फेंक दिए जाते हैं। पचीस-तीस मंज़िल की गगनचुंबी इमारतों के नीचे से गुजरना किसी जोखिम भरे अभियान से कम नहीं लगता। ऊपर की बालकनियों और खिड़कियों से अचानक गंदा पानी, अंडों के छिलके या तरकारियों का कचरा सिर पर आ गिरता है। भारी वस्तुओं के गिरने से सिर फूटने या प्राण जाने की आशंका लगातार बनी रहती है। नीचे खड़ी गाड़ियों पर चम्मच, ग्लास या सीधे गमले गिरते हैं और लोग बाल-बाल बचते हैं। इतना ही नहीं, दूसरों के आरक्षित पार्किंग स्लॉट में बेधड़क अपनी गाड़ियां खड़ी कर घंटों गायब हो जाना और टोकने पर एक औपचारिक खेद तक प्रकट न करना—यह किस संवेदनहीनता का परिचायक है?

लोग अपने पालतू कुत्तों को आंतरिक मैदानों और टहलने के रास्तों पर शौच कराते हैं, लिफ्ट और सीढ़ियां पेशाब की दुर्गंध से भर जाती हैं। हद तो तब हो जाती है जब आप अपनी बालकनी में दो पल सुकून के बिता रहे हों और ऊपर से बिस्कुट के टुकड़े, जलती सिगरेट की राख या पौधों को सींचते समय बचा हुआ मैला पानी आपके सिर पर आ गिरे। आप ताजी हवा का आनंद ले रहे हों और ऊपर वाले सज्जन अपनी बालकनी में कालीन झाड़कर आपको धूल में नहला दें। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, हर रोज की असहनीय दिनचर्या है। बच्चे सुबह-सवेरे इस्तरी किए हुए साफ स्कूल यूनिफॉर्म में नीचे निकलें और ऊपर से गिरती पानी की धार उन्हें भिगो दे, जिससे गाड़ी छूटने के डर से वे बिलखने लगें। भवनों के एसी लेज पर ऐसे अवांछित कपड़े और वस्तुएं अटकी मिलती हैं, जिनका नाम लेना भी शिष्टता के विरुद्ध लगता है। इस तरह के सामान सोसाइटी की अंदर की सड़क और पगडंडी पर भी बिखरे होते हैं।

शांति और विश्राम का अधिकार भी सुरक्षित नहीं है। खिड़कियों के पास देर रात तक होने वाला भारी शोरगुल नींद उड़ा देता है। आधी रात को दो बजे सोसाइटी के भीतर बेपरवाह हॉर्न बजाकर पूरे परिसर की नींद में खलल डालना, अथवा जहां वृद्ध और बच्चे टहल रहे हों वहां तीस-चालीस की गति से कार और दोपहिया दौड़ाना—यह कैसी आधुनिकता है?

सवाल उठता है कि आखिर उच्च शिक्षा पाकर भी हम नागरिक बोध क्यों गंवाते जा रहे हैं? ‘कॉमन सेंस’ इतना 'अन-कॉमन' क्यों होता जा रहा है? हम अपनी नैतिकता, अनुशासन और सामाजिक संवेदनाओं का त्याग कर इस कदर आत्मकेंद्रित और असभ्य क्यों बनते जा रहे हैं?

क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था में कोई गहरा अभाव रह गया है, या फिर हम अपनी भावी पीढ़ी को सुसंस्कृत और संवेदनशील नागरिक बनाने में कहीं चूक रहे हैं?

यदि हम सब अपने भीतर केवल इस न्यूनतम 'सिविक सेंस' को जाग्रत कर लें, तो हमारा परिवेश स्वच्छ और सुरक्षित हो जाए, समाज के अधिकांश गतिरोध बिना किसी बाहरी प्रयास के सुलझ जाएं, और आने वाली पीढ़ी शालीन व अनुशासित बने। एक नागरिक के रूप में हम ही तो व्यवस्था और सरकार की बुनियादी इकाई हैं; जब हमारी व्यक्तिगत चेतना जागेगी, तभी एक गरिमापूर्ण समाज का निर्माण संभव होगा।

अमर नाथ ठाकुर, 30 अक्तूबर, 2026, कोलकाता।

Wednesday, 28 October 2026

अराजकता

 अराजकता



कौवे की 'कूक' जब सुहानी लगे,

और कोयल की 'कांव-कांव' से

मन विच्छिन्न हो जाए।


लोमड़ी की 'दहाड़' से

दिशाएँ जब दलमलित हो उठें,

और शेर की 'म्याऊँ-म्याऊँ' से

मन विह्वल हो जाए।


जब गजराज का झुंड

घास छीलने लगे,

और गिलहरी की दुलत्ती से

महल धराशायी हो जाए।

जब 'तिलचट्टे' स्वच्छता का प्रतीक बन जाए

और लोग इससे अपना घर सजाने लगें।


जब ये सारे व्यतिक्रम

स्वाभाविक लगने लगें,

जब उलट-पुलट ही

सही क्रम प्रतीत होने लगे—


तब समझना,

अराजकता है।


और तब

धृतराष्ट्र के दरबार में

प्रतिदिन होगा चीरहरण,


भीष्म, द्रोण और कृप के

ठहाकों का

सामूहिक संगीत गान।


और फिर चलता रहेगा

युवराज दुर्योधन का

द्रौपदियों को साड़ी वितरण का

 'न्यायिक महोत्सव'!


एक नया युग,

एक नया अराजक युग,

जहाँ बदल जाएगी

परिभाषा

सत्य की,

न्याय की

और नैतिकता की।

 भनक  सुनाई दे रही है!


अमर नाथ ठाकुर, 28 अक्तूबर, 2026, कोलकाता।

Saturday, 24 October 2026

भौजिया

 भौजिया

यह वह सूरज नहीं जो रोज़ ढलकर सुबह फिर लौट आता है। यह वह सूरज है जो कुछ हफ़्तों से हमेशा के लिए डूबने की तैयारी में है। अभी आँखों से ओझल नहीं हुआ, मगर दूरी हर पल बढ़ती जा रही है। उसकी आत्मा को ढोने वाले रथ का घोड़ा अब थक चुका है, गति मंद पड़ गई है—मानो उस परम नियामक का यही अंतिम निर्देश हो।

रथ भले ही जर्जर हो गया हो, पर चेहरे का तेज आज भी वैसा ही प्रखर है। स्मृतियाँ अभी भी भ्रम से परे और अडिग हैं। फिर भी, देह की विवशता देख हम अंदर ही अंदर जानने लगे हैं कि रथ को खींचने वाला यह अश्व थका होते हुए भी शीघ्र ही क्षितिज के उस पार चला जाएगा, जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता।

यह नश्वर काया तब अग्नि को समर्पित हो जाएगी और शेष रह जाएँगी बस स्मृतियाँ। दौर आधुनिक है, तो अनगिनत तस्वीरों में हम उन्हें ताउम्र जीवित रखने की कोशिश करेंगे।

पर क्या कभी कोई मातृ-ऋण से उऋण हो पाया है? कदाचित नहीं। हम सिसकते रह जाएँगे, अश्रु-सिक्त नयनों से उनके साथ बिताए पलों को समेटकर जीवन की बची हुई सीमाओं को पार करेंगे। वर्षों बाद भी स्मृतियाँ धूमिल नहीं पड़ेगी, क्योंकि तब ये पंक्तियाँ उस वात्सल्य को पुनः पुनः जीवंत करती रहेंगी —


देह रगड़-रगड़ जब नहलाती,

 मैं बन जाता था उच्छृंखल।

 वह मेरी यशोदा मैया होती थी, 

मैं होता उसका कन्हैया विट्ठल।


दुलारती थी, पुचकारती थी मुझे,

 वह करती थी प्यार अविरल। 

उसने मुझे करुणा-अमृत पिलाया, 

बड़ा हो गया चूस-चूस उसका  वक्षस्थल।


हम भले ही उम्र के किसी भी पड़ाव पर पहुँच जाएँ, बुढ़ापे की दहलीज़ लाँघ लें, पर माँ के सामने हम हमेशा अबोध नेना ही रहते हैं।

चरणों में अश्रुपूर्ण विदाई और अनंत प्रणाम। 🙏


अमर नाथ ठाकुर, 24 अक्तूबर, 2026, कोलकाता।

Sunday, 18 October 2026

कोलकाता में आंसुओं के बीच बहता आस्था का प्रवाह

 कोलकाता में आंसुओं के बीच बहता आस्था का प्रवाह

बारिश की अप्रत्याशित फुहारें और उसके बाद मची अफरा-तफरी ने कोलकाता के उत्सव की धड़कनों को एक पल के लिए थाम दिया। 19 जिंदगियों का असमय चले जाना और दर्जनों का घायल होना हर शहरवासी के सीने में एक गहरी टीस छोड़ गया है। चारों ओर एक गमगीन सन्नाटा है, एक ऐसा सन्नाटा जिसकी मिसाल पिछले तीन चार दशकों में शायद ही कभी हमने देखी सुनी हो।

कोलकाता की दुर्गा पूजा सिर्फ एक त्योहार नहीं, एक जीवंत नदी है। यहाँ सड़कें संकरी हैं, पंडालों में जगह सीमित है और सामने इंसानों का असीम समंदर। इसके बावजूद, इस शहर की पहचान रही है इसका अनुशासन, इसका सहज प्रवाह और एक अनकही तारतम्यता। लाखों की भीड़ में बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और पुरुष एक साथ एक ही लय में बहते हैं। कोई शाम की चकाचौंध और भीड़ से बचने के लिए देर रात निकलता है, तो कोई भोर के शांत अंधेरे में पंडालों की भव्यता निहारने पहुंचता है। दिन हो या रात, यहाँ कोई भी समय खाली नहीं रहता। पंचमी से लेकर दशमी तक हिंदू, मुस्लिम, ईसाई—हर धर्म, हर उम्र का इंसान सड़कों पर उतरकर इस शहर को एक बड़े उत्सव में तब्दील कर देता है।

पंडालों की कारीगरी, रोशनी का सम्मोहन और वातावरण में गूंजती वीरेंद्रकृष्ण भद्र की चिरपरिचित आवाज; चंडी पाठ के सुर हर हृदय की तंत्री को झंकृत कर देते हैं। इस शहर की ऊर्जा अद्वितीय है, जो किसी को भी अपने आगोश में ले लेती है।

कल की हृदय विदारक घटना ने निश्चय ही हम सभी को झकझोर दिया है। हर आंख नम है और हर मन भारी। जिन अपनों को माँ दुर्गा ने असमय अपने चरणों में समेट लिया, प्रार्थना है कि माँ उनकी आत्मा को शांति और सद्गति प्रदान करें और उनके परिजनों को यह असह्य पीड़ा सहने का संबल दें।

कोलकाता सिसक रहा है, मगर यह शहर ठहरना नहीं जानता। शोक की गहरी उदासी के बावजूद, यह आस्था, संगीत और आत्मीयता की भूमि है। गम के आंसुओं को पोंछते हुए कोलकाता आज शाम फिर माँ के जयकारों और ढाक की थाप के साथ धीरे-धीरे अपने उसी चिर-परिचित प्रवाह में बहने को तैयार होगा—क्योंकि आस्था यहाँ का विश्वास है, और आगे बढ़ते रहना इस शहर का मिजाज।


अमर नाथ ठाकुर, 18 अक्टूबर, 2026, कोलकाता

Saturday, 17 October 2026

 बिहार की शराबबंदी: सुधार की नीति नहीं संगठित अपराध और ड्रग्स के नये संकट का द्वार

तीन-चार दिनों के बिहार प्रवास से लौटने के बाद मन में जो पीड़ा और बेचैनी उपजी है, उसे साझा करना और सत्ता प्रतिष्ठान के कानों तक पहुँचाना बेहद आवश्यक जान पड़ता है।

वर्षों पहले जब बिहार में शराबबंदी लागू हुई थी, तब नीतीश कुमार जी की मंशा शायद समाज सुधार और नैतिक उत्थान की रही होगी। किंतु आज का जमीनी यथार्थ यह है कि यह नीति पूरी तरह औंधे मुंह गिर चुकी है। शराब की दुकानों के शटर जरूर गिरे, लेकिन समानांतर रूप से एक ऐसा अवैध कुटीर उद्योग खड़ा हो गया जो अब बिहार के सामाजिक ताने-बाने को भीतर से खोखला कर रहा है।

सच्चाई यह है कि शराब बंद नहीं हुई, केवल उसकी उपलब्धता का स्वरूप बदल गया। चारों तरफ से अन्य राज्यों और नेपाल से घिरे बिहार में शराब की कोई कमी नहीं है। मोबाइल पर एक कॉल या संदेश के जरिए गली-मोहल्लों और घर-घर तक डिलीवरी हो रही है—चाहे वह गांवों में बनने वाली कच्ची महुआ-देशी शराब हो या महंगी ब्रांडेड बोतलें।

इस नीतिगत विफलता का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इसने अपराध का 'लोकतंत्रीकरण' कर दिया है। हजारों बेरोजगार किशोर और युवा आज शराब की तस्करी और ढुलाई को अपना रोजगार मान चुके हैं। जिन हाथों में किताबें, हुनर या तकनीकी औजार होने चाहिए थे, वे अवैध धंधों के जरिए आसान कमाई और अपराध की दुनिया में धकेल दिए गए हैं।

और अब, इस संकट ने एक और भयानक रूप ले लिया है—ड्रग्स का फैलता जाल। शराबबंदी की आड़ में बिहार के सीमावर्ती इलाकों और कस्बों में स्मैक, हेरोइन और नशीली दवाओं का कारोबार तेजी से पैर पसार रहा है। युवा वर्ग इस जानलेवा लत की गिरफ्त में आ रहा है, जिसके चलते राहजनी, मोबाइल छिनतई और चोरी जैसी घटनाएं रोजमर्रा का हिस्सा बन चुकी हैं। यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो बिहार को 'उड़ता पंजाब' बनने में देर नहीं लगेगी।

बिहार सरकार ने शराब उद्योग और बिक्री से मिलने वाले हजारों करोड़ रुपये के वैध राजस्व को तो खो दिया, लेकिन यह पूरा पैसा पुलिस और माफिया तंत्र के गठजोड़ की जेबों में भ्रष्टाचार बनकर जमा हो रहा है। अदालतों और जेलों में छोटे-मोटे गरीब और मजदूर बंद होते होंगे, जबकि असली सिंडिकेट बेखौफ फल-फूल रहा है।

अब जबकि बिहार में सत्ता के समीकरण नए दौर में हैं और सरकार का नेतृत्व सम्राट चौधरी जी के हाथों में है, तो क्या इस हठधर्मिता को त्यागने का समय नहीं आ गया है? किसी भी सरकार की परिपक्वता इसमें होती है कि वह जमीनी यथार्थ को स्वीकार करे, न कि कागजी आंकड़ों और उपदेशों की आड़ में पूरी पीढ़ी को अपराध और नशे की गर्त में धकेले।

बिहार को खोखले नारों की नहीं, एक व्यावहारिक, पारदर्शी और सख्त नियमन वाली आबकारी नीति की जरूरत है। सरकार को अपनी आंखें खोलनी ही होंगी—इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।

अमर नाथ ठाकुर, 17 अक्तूबर, 2026, कोलकाता।


Friday, 16 October 2026

डिजिटल इंडिया' में भारतीय रेल: क्या GPS सिर्फ कागज़ों पर है या डेटा में हेरफेर सिस्टम की मजबूरी है


'डिजिटल इंडिया' में भारतीय रेल: क्या GPS सिर्फ कागज़ों पर है या डेटा में हेरफेर सिस्टम की मजबूरी है?

हाल ही में ट्रेन संख्या 03185/03186 (मधुबनी-कोलकाता स्पेशल) से यात्रा के दौरान एक ऐसा अनुभव हुआ, जिसने रेलवे के आधुनिकीकरण, RTIS (GPS ट्रैकिंग) और यात्री सेवा तंत्र के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

यह केवल कुछ घंटों की देरी का मामला नहीं है, बल्कि सिस्टम की पारदर्शिता, झूठी सूचनाओं और बुनियादी सुविधाओं के अभाव का एक स्पष्ट केस स्टडी है।

GPS और RTIS के दौर में 'मैनुअल टाइम-टैंपरिंग' का खेल होता है क्या ?

रेलवे का दावा है कि ट्रेनों को इसरो समर्थित RTIS (Real-Time Train Information System) और GPS डिवाइसेस से ट्रैक किया जा रहा है। यदि ऐसा है, तो 139 और रेल इन्क्वायरी पोर्टल पर ट्रेनों की स्थिति में सेकंड-दर-सेकंड अंतर क्यों आता है?

केस स्टडी का वास्तविक डेटा:

  • 139 इन्क्वायरी का पहला अपडेट: ट्रेन संख्या 03185 दोपहर 12:53 बजे बरौनी से रवाना हुई और 13:35 बजे समस्तीपुर पहुंचेगी।
  • 14:15 बजे की स्थिति: जब ट्रेन का दोबारा स्टेटस देखा गया, तो सिस्टम ने बताया कि ट्रेन 13:58 बजे बरौनी से खुली है।
  • 139 इंक्वायरी का अगला एक और अपडेट: ट्रेन संख्या 03186 मधुबनी से 18.55 बजे रवाना होगी और सकरी 19.06 बजे पहुंचेगी।
  • फिर 139 इंक्वायरी का अगला अपडेट: ट्रेन 03186 मधुबनी से खुल चुकी है और सकरी 19.14 बजे पहुंचेगी।
  • बाद में सिर्फ 17 किलोमीटर दूर सकरी पहुंचती है यह ट्रेन 20.45 बजे, लेकिन इंक्वायरी 139 और विभिन्न लाइव पोर्टल सुनाता रहा/दिखाता रहा कम से कम 20.15 तक कि ट्रेन 03186 19.03 बजे मधुबनी से खुल चुकी है और सकरी में 19.14 बजे पहुंचने की संभावना है।

एक ट्रेन स्टेशन से 12:53 बजे भी खुलती है और बाद में उसी स्टेशन से खुलने का समय 13:58 दिखा दिया जाता है। दूसरी ट्रेन जो संभवतः 20.15 मधुबनी से खुलती है ,पहले भी 19.03 बजे कैसे खुल गई हो सकती है । वजह साफ है कि सिस्टम में डेटा ऑटोमैटिक GPS से नहीं, बल्कि लेटलतीफी और डिविजनल नाकामी को छुपाने के लिए मैनुअली अपडेट और टेंपर किया जा रहा है। जब डेटा ही मनगढ़ंत दर्ज होगा, तो आम यात्री किस आधार पर अपनी यात्रा की योजना बनाए?

'स्पेशल ट्रेन' उपेक्षा की शिकार ट्रेन होती है ?

त्योहारों और भीड़ के समय चलने वाली स्पेशल ट्रेनों का किराया सामान्य से अधिक होता है, लेकिन सुविधाएं किसी साधारण पैसेंजर गाड़ी से भी बदतर:

  • डेढ़ गुना समय: सकरी से कोलकाता की जो दूरी सामान्य ट्रेनें 12–14 घंटे में तय करती हैं, 03186 के टाइम-टेबल और चाल के अनुसार उसे 19+ घंटे लग रहे हैं।
  • बंचिंग का बहाना: रेलवे का आधिकारिक जवाब आता है कि "ट्रेन पिछली डिविजन से लेट मिली और बंचिंग के कारण रुकी है।" सवाल यह है कि यदि आपके पास ट्रैक कैपेसिटी और ट्रैफिक मैनेजमेंट का ब्लूप्रिंट नहीं है, तो बिना तैयारी के स्पेशल ट्रेनें चलाकर यात्रियों का समय बर्बाद क्यों किया जा रहा है?

बुनियादी सुविधाओं का अभाव (ट्रेन 03186 का हाल)

  • AC की स्थिति: ट्रेन काकरघाटी स्टेशन पर एक घंटे से अधिक समय तक खड़ी रही, लेकिन कोच (B2) का AC पूरी तरह बंद रहा। यात्रियों को बताया गया कि जब तक ट्रेन चलेगी नहीं, AC काम नहीं करेगा। बंद खिड़की-दरवाजों वाले कोच में यात्री कैसे सफर करें?
  • पानी की किल्लत और लीकेज: कई स्टेशनों तक B2 कोच में पानी नहीं था। वहीं दूसरी ओर टॉयलेट लॉबी की छत से लगातार पानी टपक रहा था।

 'प्रक्रिया' के नाम पर शिकायत का भटकाव

सोशल मीडिया पर जब पूरे सिस्टम की नाकामी (ट्रेक जाम, लेट रनिंग, गलत डेटा) उजागर की जाती है, तो रेलवे का स्टैंडर्ड ऑटोमेटेड जवाब आता है: "कृपया PNR और मोबाइल नंबर साझा करें।"

  • सवाल: क्या ट्रेन के आउटर पर घंटों खड़े रहने, AC बंद होने या 139 पर गलत डेटा प्रसारित होने की समस्या को सुलझाने के लिए एक यात्री के PNR की ज़रूरत है? यह समस्या ट्रेन और रूट-मैनेजमेंट की है, जिसे PNR के नाम पर व्यक्तिगत शिकायत बनाकर बंद करने की कोशिश की जाती है।

नीति-निर्माताओं और रेल प्रशासन से सीधे सवाल:

  1. डेटा की सत्यता: क्या जनता के सामने पेश किए जा रहे ऑन-टाइम परफॉर्मेंस (OTP) के आंकड़े वास्तविक हैं या 139/NTES में समय बदलकर कागज़ी रिकॉर्ड दुरुस्त किए जाते हैं?
  2. GPS की भूमिका: यदि लोकोमोटिव में GPS लगे हैं, तो पब्लिक डोमेन में अनएडिटेड और बिना मानवीय हस्तक्षेप वाला रियल-टाइम डेटा क्यों उपलब्ध नहीं कराया जाता?
  3. स्पेशल ट्रेनों की जवाबदेही: स्पेशल ट्रेनों को 'अवांछित' मानकर मुख्य ट्रैक से घंटों किनारे क्यों खड़ा किया जाता है?

रेल मंत्री @AshwiniVaishnaw जी और @PMOIndia से आग्रह है कि केवल हाई-स्पीड और प्रीमियम ट्रेनों के प्रचार तक सीमित न रहकर, साधारण व मध्यम श्रेणी की ट्रेनों, इन्क्वायरी सिस्टम की पारदर्शिता और बुनियादी यात्री सुविधाओं की जमीनी हकीकत की भी समीक्षा करें। यात्रियों को ऊंची-ऊंची बातें , हाई टेक बातें करके बरगला नहीं सकते हैं।


हमारा दर्जनों बार का अनुभव ऊपर  शेयर किए गए केस स्टडी में समाहित है। 

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अमर नाथ ठाकुर, 16 अक्टूबर, 2026, कोलकाता।

Tuesday, 21 July 2026

धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य


मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन, संस्कृति, पारिवारिक संस्कार, शिक्षा और सामाजिक अनुभवों से निर्मित होते हैं। यही विचार आगे चलकर समाज के चरित्र, उसकी नैतिकता, न्यायबोध, सहिष्णुता, वैज्ञानिक दृष्टि और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। इसलिए यदि हमें किसी सभ्यता को समझना हो, तो उसके धार्मिक और दार्शनिक आधारों को समझना आवश्यक है।


इतिहास बताता है कि कोई भी सभ्यता केवल आर्थिक समृद्धि से महान नहीं बनती। उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में निहित होती है कि वह सत्य की खोज, आत्मालोचना और परिवर्तन को कितना स्थान देती है। जहाँ प्रश्न पूछना सम्मान का विषय होता है, वहाँ ज्ञान का विस्तार होता है; जहाँ प्रश्न पूछना अपराध बन जाता है, वहाँ विचार धीरे-धीरे जड़ होने लगते हैं।


इसी संदर्भ में विश्व के प्रमुख धर्मों और उनके ग्रंथों पर विचार करना स्वाभाविक है। भारतीय परंपरा में वेदों को श्रुति माना गया है और उनका संरक्षण अत्यंत अनुशासित मौखिक परंपरा से हुआ। अनेक विद्वान मानते हैं कि इस कारण उनका मूल पाठ उल्लेखनीय रूप से सुरक्षित रहा। दूसरी ओर मनुस्मृति, रामायण, महाभारत तथा अनेक स्मृति-ग्रंथों की विभिन्न पांडुलिपियों में पाठभेद पाए गए हैं, जिनका अध्ययन आधुनिक पाठालोचना का विषय है।


कुरान के संबंध में इस्लामी परंपरा का विश्वास है कि वह ईश्वर का अंतिम और अक्षुण्ण वचन है। ऐतिहासिक अध्ययन यह भी बताते हैं कि उसका संकलन पैग़म्बर मुहम्मद के जीवनकाल के बाद प्रारंभिक इस्लामी काल में हुआ और बाद में उसका मानक पाठ स्थापित किया गया। ये संकलन पैगम्बर ने नहीं किया या उनके जीवन काल में भी नहीं हुआ। अधिकांश इतिहासकार वर्तमान कुरान को अत्यंत स्थिर पाठ मानते हैं, जबकि कुछ प्रारंभिक पांडुलिपियों और पाठभेदों पर अकादमिक शोध भी चलता रहा है। इस विषय में धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक अध्ययन की अपनी-अपनी सीमाएँ हैं। कुछ अत्यन्त आपत्तिजनक आयतों पर इस्लामिक विद्वानों की एक राय भी कभी नहीं हो पाई क्योंकि यहां स्वतंत्र विमर्श की व्यवस्था का अभाव ही शायद क्या इसका एक मुख्य कारण तो नहीं ?


ईसाई परंपरा का इतिहास भी परिवर्तन का उदाहरण प्रस्तुत करता है। एक समय चर्च और विज्ञान के बीच गंभीर मतभेद रहे; गैलीलियो का प्रसंग इसका प्रतीक माना जाता है। बाद के काल में यूरोप में पुनर्जागरण, सुधार आंदोलन और प्रबोधन के प्रभाव से धार्मिक व्याख्याओं में परिवर्तन आया तथा विज्ञान और स्वतंत्र चिंतन को व्यापक स्थान मिला। इससे यह संकेत मिलता है कि धार्मिक परंपराएँ समय के साथ अपने भीतर परिवर्तन की क्षमता भी विकसित कर सकती हैं।


भारतीय दार्शनिक परंपरा की एक उल्लेखनीय विशेषता उसकी बहुलता रही है। वेदांत, सांख्य, योग, न्याय, मीमांसा, बौद्ध, जैन और चार्वाक जैसे भिन्न-भिन्न मत एक ही बौद्धिक वातावरण में विकसित हुए। शास्त्रार्थ की परंपरा ने असहमति को भी विचार-विमर्श का विषय बनाया। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उसकी बौद्धिक उदारता रही है। भारत में विचारों का संघर्ष तलवार से नहीं, तर्क से हुआ। "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" और "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" जैसे सूत्र इस खुले बौद्धिक वातावरण का परिचय देते हैं।यह भारतीय सभ्यता की एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक धरोहर है। और इस तरह यह भारतीय परम्परा बहुत ही प्रशंसा के योग्य बन जाती है।


इसके साथ ही यह भी स्वीकार करना होगा कि आधुनिक विश्व में धार्मिक कट्टरता और उसके सामाजिक परिणामों को लेकर गंभीर प्रश्न उठे हैं। अल-कायदा, आईएसआईएस, बोको हराम, लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों ने इस्लाम की अपनी व्याख्या के आधार पर हिंसा को उचित ठहराने का प्रयास किया। दूसरी ओर अनेक मुस्लिम विद्वानों और संगठनों ने भी इन व्याख्याओं का विरोध किया और उन्हें इस्लाम की मूल भावना के विरुद्ध बताया, लेकिन ये विरोध क्या उस स्तर तक दर्ज हुआ जिस स्तर तक होना चाहिए था? वैसे ही यह आवश्यक है कि कट्टरपंथी विचारधारा और पूरे धार्मिक समुदाय के बीच अंतर किया जाए।


यह भी एक तथ्य है कि कुछ मुस्लिम-बहुल देशों में महिलाओं के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म परिवर्तन तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बहस होती रही है। वहीं दूसरी ओर अनेक ऐसे देश भी हैं जहाँ सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ अलग हैं। इसी प्रकार किसी भी धर्म या सभ्यता का मूल्यांकन करते समय केवल उसकी आदर्श शिक्षाओं से नहीं, बल्कि उसके अनुयायियों के वास्तविक सामाजिक व्यवहार से भी सीखने की आवश्यकता होती है।


किसी समाज में अपराध, हिंसा, स्त्रियों की स्थिति, अल्पसंख्यकों के अधिकार, शिक्षा का स्तर और वैज्ञानिक प्रगति—ये सभी उस समाज के चरित्र के महत्वपूर्ण संकेतक हैं। परंतु इनका कारण केवल धर्म नहीं होता, लेकिन मानना होगा कि धर्म का इसमें रोल कमतर नहीं आंका जा सकता। शासन व्यवस्था, कानून का राज, शिक्षा, आर्थिक अवसर, इतिहास, युद्ध, औपनिवेशिक अनुभव और सामाजिक संस्थाएँ भी बहुत प्रभाव डालती हैं। इसलिए किसी भी जटिल सामाजिक समस्या का उत्तर केवल एक कारण में ढूँढ़ना उचित नहीं होगा।


धर्म का मूल्यांकन अंततः इस आधार पर होना चाहिए कि वह अपने अनुयायियों में कौन-से गुण विकसित करता है—करुणा या क्रूरता, सहिष्णुता या असहिष्णुता, जिज्ञासा या अंधानुकरण, संवाद या हिंसा, आत्मालोचना या जड़ता। यदि किसी धार्मिक व्याख्या का उपयोग आतंकवाद, घृणा या अन्याय को उचित ठहराने के लिए किया जाता है, तो उसकी आलोचना आवश्यक है। उसी प्रकार यदि किसी धर्म में सुधारवादी विचार, खुला विमर्श और पुनर्व्याख्या की परंपरा विकसित होती है, तो उसे भी स्वीकार ही नहीं करना चाहिए, बढ़ावा भी देना चाहिए।


अंततः किसी सभ्यता का भविष्य केवल उसके धार्मिक ग्रंथों से निर्धारित नहीं होता, बल्कि इस बात से निर्धारित होता है कि वह अपने ग्रंथों को कैसे समझती है, उनकी व्याख्या कैसे करती है और बदलते समय के साथ सत्य, न्याय और मानव गरिमा के प्रश्नों का उत्तर किस प्रकार देती है। इतिहास का अनुभव यही बताता है कि वे सभ्यताएँ अधिक स्थायी और सृजनशील सिद्ध हुई हैं जिन्होंने श्रद्धा और विवेक, परंपरा और परिवर्तन, आस्था और तर्क—इन सबके बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया।


अमर नाथ ठाकुर, 21 जुलाई, 2026, कोलकाता।

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