बिहार का चुनाव कई मायने में अनोखा होता है।चुनावी विश्लेषक बिहार के चुनावी परिणामों की सटीक भविष्यवाणी करने में सामान्यतः असमर्थ साबित होते हैं। इतना पेचीदा है बिहार के वोटरों की मानसिकता और किसी समस्या को उसका पढ़ने समझने का तरीका कि ये चुनावी भविष्यवक्ता उसे समझ कर भी अपने सर्वेक्षण में पूर्णतः समेट नहीं पाते हैं। परिणाम यह होता है कि हम परसेप्शन से चलते हैं कि कौन सी पार्टी चुनावी गणितीय समीकरण का समाधान निकालने में सफल होगी।
बिहार में जाति आधार पर अधिकांश लोग मतदान करते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि एक जाति वाले दूसरी जाति वाले नेता को वोट नहीं करते। हमने यहां बिहार के इसी परिदृश्य को खासकर चित्रित किया है।
चुनावी विश्लेषक विधानसभा-वार जाति- वार सैंपल न ले तो उसकी चुनावी भविष्यवाणी का चुनावी सर्वेक्षण कभी भी सटीक नहीं बैठेगा। जातिगत आधार पर वोटों का बंटवारा ऐसा पहलू है कि प्रशांत किशोर के प्रभावशाली नेतृत्व के प्रदर्शन के बावजूद आप नहीं सोच सकते कि उन्हें कुछ सीटें मिल पाएंगी। जाति आधारित वोटिंग ऐसी स्थिति पैदा करती है कि बहुमत के लिए और सरकार बनाने के लिए जातियों का अथवा पार्टियों का गठबंधन अपरिहार्य है।इसके बिना सरकार बनाने की कोई पार्टी सोच भी नहीं सकती। और यही कारण है कि जातिगत विद्वेष होने के बावजूद पार्टियों के गठबंधन से जाति गत सौहार्द्र और सामंजस्य बिहार में बना रहता है।
उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक आदि राज्यों जैसी यहां भी चुनावी राजनीति पर पारिवारिक पार्टियों का कब्जा है। लेकिन अन्य अधिकांश राज्यों के प्रतिकूल पारिवारिक पार्टी यहां जातियों की पार्टी है। पारिवारिक पार्टी अपनी जाति को प्रतिनिधित्व देती है। यहां यादव, कुर्मी, कोयरी, कुशवाहा, मल्लाह, दुसाध, मुसहर,राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण आदि जाति के कुछ मुख्य नेता हैं और जाति के आधार पर उनकी पार्टी भी है तथा इन नेताओं के लिए उनकी जाति वाले वोट करते हैं चाहे वो नेता जिस भी पार्टी में हों । इससे बीजेपी को अलग रख सकते हैं क्योंकि ये न तो पारिवारिक पार्टी है और न किसी एक जाति विशेष की पार्टी।
मुसलमानों का बिहार में एक सर्वमान्य नेता नहीं है लेकिन इससे बढ़कर एक मुश्त और एक होकर रणनीतिक तौर पर कोई जाति या समुदाय वोट नहीं करता। ये एंटी बीजेपी रहेंगे सिर्फ ये तय होता है।
बिहार में अच्छी खासी संख्या फ्लोटिंग वोटरों की भी है।ये ऐसे वोटर हैं जो जाति के फैक्टर को ज्यादे प्रश्रय नहीं देते हैं।ये खुलेआम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समस्याओं पर अपनी पैनी नजर रखते हैं और विकास, राष्ट्रवाद, मंहगाई, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था आदि मुद्दों को प्रमुखता देते हैं और वोट में पार्टिसिपेट करते हैं। इसमें सभी जातियों और समुदाय के वोटर होते हैं। कहीं कहीं किसी नेता की उनकी व्यक्तिगत योग्यता भी उनको ऐसे लोगों के द्वारा वोट दिलाती है। ऐसे में आप जन सुराज पार्टी को कुछ वोट मिलने का अनुमान लगा सकते हैं। हिंदू मुस्लिम विभेद के कारण, घुसपैठियों के मुद्दे पर वोटों के ध्रुवीकरण का मुद्दा कभी नहीं दरकिनार किया जा सकता है। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में इस वजह से बीजेपी को हिन्दू वोट के जाति सीमा को लांघकर मिलने के आसार बहुत बढ़ जाते हैं।
बिहार में अधिकांश वोट जातीय समीकरण के हिसाब से डाले जाते हैं। यह तो तय है। हर जाति का अपना मान्य नेता होता है यह भी तय है। लोग अपनी जाति के नेता को वोट देते हैं। ये चीजें ऊपर आपके समक्ष हम रख चुके हैं। पार्टी इस वजह से कोई मायने नहीं रखती है।इसलिए यह समझना अत्यन्त आवश्यक होगा कि कौन सी जाति किस पार्टी को समर्थन देती है या देने जा रही है। और यह भी कोई निश्चित नहीं कि इस बार के चुनाव में अमुक जाति अमुक पार्टी को ही वोट देगी।यह देश, काल , पात्र के हिसाब से बदलते रहता है। और हां, जब यह कहते हैं कि अमुक जाति वाले अपनी जाति के नेता के हिसाब से चलते हैं तो इसका मतलब शत प्रतिशत नहीं लिया जाना चाहिए़।इसका मतलब अधिकांश से होता है।अब समस्या है यहां इस अधिकांश प्रतिशत को समझना।यह अधिकांश प्रतिशत 50 से लेकर 80-90 तक कुछ भी हो सकता है लेकिन 100% कभी नहीं। हर जाति में स्वतंत्र विचारधारा वाले, क्रांतिकारी विचारधारा वाले लोग भी होते हैं या कुछ ऐसे लोग होते हैं जो अपने व्यक्तिगत कारण से ये नेता के विरुद्ध चलते हैं। कहीं कहीं कुछ जातियों में अपनी महत्त्वाकांक्षा की वजह से अनेक नेता हो गए हैं जो अच्छी खासी संख्या में अपनी जाति के समर्थक पर प्रभाव रखते हैं।ऐसी स्थिति में जाति आधारित वोटिंग होने के बाद भी आप अनुमान नहीं लगा सकते हैं कि उस जाति विशेष के वोट कहां कहां बंट रहे हैं।
बिहार की चुनावी गणित को समझने के लिए उन जातियों की कुल जनसंख्या को जानना अत्यन्त जरूरी है। इस वजह से नीचे जाति-वार प्रतिशत ब्यौरा भी हम दे रहे हैं जो पिछली जाति आधारित सरकारी जनगणना के आंकड़े पर आधारित है, जो सही है। इस तथ्य को भी जानना जरूरी है कि किसी भी जाति के सभी मतदाता अपनी जाति के अमुक लीडर को हर समय सारा मत नहीं देते हैं।यह निर्भर करता है कि नेता कितना दबंग, धनशाली और तेज तर्रार है। जातिगत खानदानी विरासत भी बहुत ही मायने रखता है। जैसे लालू को मिलने वाला वोट अब तेजस्वी को मिलेगा, रामविलास पासवान को मिलने वाला वोट अब चिराग को मिलेगा। पिछले चुनाव के समय के वादों को किस नेता ने कितना निभाया, उनके यहां की शादी में आया या नहीं, मौत में संवेदना व्यक्त करने आया या नहीं, अथवा और किसी संकट के समय अपनी जाति वालों के साथ खड़े हुआ या नहीं आदि आदि बातें भी वोटों के बंटवारे को तय करता है।
भ्रष्टाचार बिहार में मुद्दा होता है लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह मुद्दा जाति के फैक्टर को कभी दरकिनार नहीं कर सकता। इसी तरह बेरोजगारी, कानून व्यवस्था , मंहगाई , विकास आदि के मुद्दे भी कभी भी जाति के फैक्टर को पीछे नहीं छोड़ सकता। इस वजह से आप पाएंगे कि हत्या, अपहरण, बलात्कार, लूटपाट, दंगा फसाद आदि में सजायाफ्ता नेता जाति की वजह से अपना प्रभाव व प्रभुत्व बनाए रखने में कामयाब रहते हैं। अनन्त सिंह, सूरजभान, आनन्द मोहन, लालू यादव आदि जैसे नेता या उनके परिवार के लोग भारी संख्या में अपने समर्थक को अपने से जोड़ने में कामयाब रहते हैं।
कुछ नेताओं के प्रभाव का जिक्र न करें तो बिहार के चुनावी कुरुक्षेत्र की चर्चा अधूरी मानी जाएगी। यह अधिकांश बिहारियों की राय है कि नरेन्द्र मोदी के बराबर का ईमानदार, राष्ट्रवादी नेता और विकास पुरुष स्वातंत्र्योत्तर भारत में कम हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी ख्याति, हाल के ऑपरेशन सिंदूर आदि जैसी घटनाएं उनके व्यक्तित्व को ऊंचाई देती है और बीजेपी और NDA को अधिकांश वोट उनके नाम पर ही आएंगे।
नीतीश कुमार कुर्मी जाति से आते हैं और अधिकांश कुर्मी उनको वोट देंगे। लेकिन उसके अलावा नीतीश की छवि एक ईमानदार नेता की रही है, अभी तक उनपर भ्रष्टाचार का कोई भी आरोप नहीं लगा है।जंगल राज से बिहार को मुक्त करने में एवं विकास की तरफ अग्रसर करने में जो कुछ भी अल्प काम हुआ है उसका श्रेय नीतीश कुमार को ही जाता है।महिलाओं के लिए चलाए गए अनेक योजनाओं ने महिलाओं में उन्हें लोकप्रियता प्रदान किया है। पलटूबाज की छवि से उनकी बदनामी हुई है राष्ट्रीय स्तर पर तथा पार्टियों के बीच में, लेकिन बिहार में यह ऐसा फैक्टर नहीं है कि उनका वोट कम हो।बिहार में जाति और धर्म के बंधन को लांघकर यदि कोई नेता वोट पाता है तो वह एकमात्र नेता नीतीश कुमार हैं। उनकी लोकप्रियता की सानी का नेता स्वास्थ्य आदि के बारे में फैलाए दुष्प्रचार के बावजूद और कोइ भी नेता बिहार में किसी भी पार्टी में नहीं है।अतः बीजेपी नीतीश को छोड़ नहीं सकती। NDA का भविष्य नरेन्द्र मोदी और नीतीश के बिना बिहार में अकल्पनीय है।
यादवों के नेता निर्विवाद रूप से लालू प्रसाद हैं जबकि पूरे बिहार के स्वातंत्र्योत्तर इतिहास में इतना बड़ा भ्रष्ट नेता आज तक नहीं हुआ।अपहरण और जंगलराज के ये बिहार में प्रणेता रहे हैं। मुस्लिमों को छोड़कर यादव समाज बिहार का सबसे बड़ा समुदाय है जो बिहार की आबादी का 14.26% है और अधिकांश यादवों के ये मान्य नेता हैं।MY समीकरण का ईजाद इन्होंने किया था और अपने नाना प्रकार के कारनामों से ये मुस्लिमों के भी निर्विवाद नेता हैं।मुस्लिम एक मुश्त वोट करने के लिए जाने जाते हैं। मुस्लिमों की आबादी का प्रतिशत 17.70% है। इस तरह यादवों से भी ज्यादे ये मुस्लिम वोट पाते हैं और इस तरह करीब 32% के वोटों में से अधिकांश का हिसाब इनकी झोली में जाता है।ये चुनाव नहीं लड़ सकते न्यायालय द्वारा अयोग्य ठहराए जाने के बाद, लेकिन इन्होंने अपनी विरासत अपने पुत्र तेजस्वी यादव को सौंपी है और यादवों और मुस्लिमों के निर्विवाद नेता के रूप में तेजस्वी को प्रसिद्धि मिलती जानी जा रही है। यह पिछले चुनाव से भी साबित हो चुका है।
जब मुस्लिम वोटों की चर्चा हो तो फिर असदुद्दीन ओवैसी की चर्चा के बिना यह बात अधूरी रहेगी।ओवैसी राष्ट्रीय स्तर के मुस्लिमों के नेता के रूप में मुस्लिमों को प्रभावित करने वाले विषयों पर अपनी कट्टर राय रख कर एक महत्वपूर्ण स्थान बनाने में सफल हुए हैं। बिहार के पिछले चुनाव में इन्होंने मुस्लिम वोटों को खूब बांटा था। वैसे ये बंगाल में सफल नहीं हो पाए थे लेकिन बिहार की अनूठी छवि है। राजद के तेजस्वी यादव को मुस्लिम वोटों का इनकी वजह से बहुत नुकसान होगा। एंटी हिन्दू छवि से राहुल गांधी ने कांग्रेस के लिए अच्छे मुस्लिम वोट उत्तर प्रदेश में कमाए थे लेकिन उनकी छवि इतनी नहीं बनती लग रही है कि महागठबंधन को ओवैसी द्वारा पहुंचाए जाने वाले मुस्लिम वोटों के नुकसान की क्षतिपूर्ति पूर्ण रूप से कर सके। इसका फायदा NDA को सीधा मिलता मालूम पड़ता है क्योंकि ऐसे क्षेत्रों में हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण के फायदे से उसे वंचित नहीं किया जाता मालूम पड़ता है।
यादवों में पप्पू यादव हो या नित्यानंद राय हों या राम कृपाल यादव हों या बिजेंद्र यादव हों, यादवों के वोट आंशिक रूप से अपने अपने क्षेत्रों में समेटने में ये सफल होते हैं। लेकिन जमींदारी प्रथा के लाइन पर लालू परिवार ही अधिकांश यादव वोटों का विरासत थामे हुए है।
चिराग पासवान वैसे तो दलितों में दुसाध जाति से आते हैं लेकिन उनकी छवि जाति की परिधि को लांघती नजर आती है और उनके युवा और ईमानदार नेता की छवि से उनकी स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है। मांझी मुसहर जाति के नेता हैं और अपनी इस दलित जाति में उनकी पैठ जरूर है। उपेन्द्र कुशवाहा कोयरी/कुशवाहा जाति से हैं और अच्छी खासी पैठ उनकी अपनी जाति में है।बीजेपी में भी इन जातियों के कुछ बड़े नेता हैं जिसकी वजह से इन जातियों के वोट बंटने की संभावना कम हो जाएगी क्योंकि ये सब NDA में ही हैं। अगड़ी और संभ्रांत जातियों के झुकाव बीजेपी और नीतीश की छवि की वजह से नीतीश कुमार की तरफ रही है जिसका एडवांटेज NDA को मिलेगा।
मुकेश सहनी को कुछ ज्यादे ही अखबारों के मुख पृष्ठ पर स्थान मिल रहे हैं जबकि इनकी जाति मल्लाह है, जिनकी आबादी बहुत खास उल्लेखनीय नहीं है।लेकिन, जो भी हो महागठबंधन को उसका फायदा जरूर मिलेगा।
मुस्लिमों की निष्ठा राजद में होने की वजह से उनकी आकांक्षा उपमुख्यमंत्री आदि के रूप में पूरी नहीं होने से उसका थोड़ा नुकसान तो महागठबंधन को जरूर होगा। । मुस्लिमों को प्रतिनिधित्व न मिलने की बात को ओवैसी बार बार प्रचारित कर मुस्लिमों में अपनी पैठ बना रहे हैं। इसकी चर्चा ऊपर तो कर ही चुके हैं।
कन्हैया कुमार की कोई खास छवि बिहार में है नहीं अतः उनसे महागठबंधन ग्रुप को कोई विशेष लाभ मिलने की संभावना नजर नहीं आते है। NDA से विक्षुब्ध और खानदानी कांग्रेसी अभी भी नेहरू, इंदिरा आदि की छवि से वोट बटोरेंगे।ऐसे ही कांग्रेसी राहुल गांधी के पीछे पीछे नजर आते हैं।लेकिन एंटी हिन्दू छवि बनाकर अच्छी खासी मुस्लिम वोट महागठबंधन को ये दिलाएंगे। कांग्रेस और तेजस्वी के एक साथ होने से मुस्लिम वोटों के बिखराव और बंटान की आशंका कम हो गई है।लेकिन ओवैसी फैक्टर बहुत ही प्रभावकारी होगा जिसे नकारा नहीं जा सकता।
अगड़ी जाति में भूमिहार ब्राह्मणों में और राजपूतों में एकमुश्त वोट करने की मानसिकता रही है।गिरिराज सिंह और लल्लन सिंह के NDA में होने की वजह से ये वोट ज्यादे न बंटे,ऐसी संभावना है।ब्राह्मणों का कांग्रेसी झुकाव बिहार में कब का बिखर चुका है और उनका झुकाव बीजेपी, मोदी और नीतीश के प्रति अनुमानित है। नीतीश मिश्र या संजय झा ने ब्राह्मण वोटरों खासकर मैथिल वोटरों में पैठ बनाई है लेकिन उल्लेखनीय नहीं कही जा सकती। कुछ और जातियां अच्छी खासी संख्या में बिहार में है किन्तु उनमें अभी तक कोई बड़ा नेता सामने उभर कर नहीं आया है। ये संभवतः अन्य जातियों से नजदीकी और उनके नेताओं द्वारा फायदा पहुंचाने के विशेष आश्वासन पर अपने वोट देंगे ।
कर्पूरी ठाकुर नाई थे लेकिन पिछड़ों के बड़े नेता थे।भारत रत्न देकर नाइयों का और पिछड़ों के प्रति सहानुभूति रखनेवाले कर्पूरी समर्थक वोटरों को बीजेपी ने साधने की कोशिश की है। यह अन्य पिछड़ों के वोट NDA की तरफ लाने में मदद करेगा।
बीजेपी की छवि अभी भी मुस्लिम विरोधी की है लेकिन शाहनवाज हुसैन जैसे नेता को इसे दरकिनार नहीं करना चाहिए।अपनी साफ सुथरी छवि से ये गैर मुस्लिम मतदाताओं में भी लोकप्रियता रखता है।भविष्य की सोचकर और कुछ बिखरे अपने समुदाय से असंतुष्ट मुस्लिम वोटरों को समेटने में इस तरह के नेता उपयोगी होते हैं। लेकिन यह तो साफ है कि बिहार बीजेपी में नीतीश या तेजस्वी यादव या चिराग पासवान या प्रशांत किशोर जैसे नेता का सर्वथा अभाव है। रूडी या रविशंकर प्रसाद में या गिरिराज सिंह में कुछ कमी तो झलकती है जिस वजह से ये सर्वमान्य नेता नहीं बन पा रहे हैं। बिहार में अन्य राज्यों जैसे बीजेपी के सर्वमान्य नेता जैसे हेमंत विश्वशर्मा , योगी, दिग्विजय सिंह, पुष्कर धामी, देवेंद्र फडणवीस आदि जैसे नेता नहीं है।
बिहार में किसी भी पार्टी में सर्वमान्य महिला नेता का भी अभाव है।
तेजस्वी के मुख्यमंत्री के रूप में उद्घोषणा से यादव और मुस्लिम गुट एक साथ जहां आएंगे वहीं एंटी यादव और एंटी मुस्लिम गुट को एकत्रित होने में मदद मिलेगी और इसका फायदा NDA को जरूर मिलेगा। कुछ पिछड़ी जातियां यादवों के एकाधिकार वाले शासन से ईर्ष्या रखती है।
महिलाओं को ऋण, 125 यूनिट फ्री बिजली, वृद्धों का पेंशन 500 से बढ़ाकर 1100 रुपए, मुफ्त के अनाज आदि जैसे उपाय से एंटी इनकंबेंसी की क्षति को पूरा करने का NDA का उपाय बहुत कारगर साबित हो रहा है। इसी तरह तेजस्वी का हर घर नौकरी वाले स्कीम की घोषणा से कुछ लोग उनकी तरफ जरूर आकर्षित होंगे, भले ही यह योजना फिजिबल नहीं हो। जाति फैक्टर से इतर वोट करने वाले,फ्लोटिंग वोटर जो अंत में निर्णय करते हैं कि किसे वोट करें, वैसे वोटर नीतीश एवं तेजस्वी की इन घोषणाओं से अलग अलग आकर्षित होंगे और वोट के आंकड़े को प्रभावित करेंगें। हमें नहीं लगता कि राहुल गांधी के वोट चोरी और SIR पर चलाए अभियान ने मतदाताओं पर कोई महत्वपूर्ण छाप छोड़ी है ।
बिहार के चुनाव का एक और महत्वपूर्ण पहलू है जो यहां के चुनाव परिणाम को प्रभावित करता है।कश्मीर को छोड़कर शायद सबसे कम वोट टर्नओवर वाले राज्यों में बिहार का नाम आता है, 55% भी नहीं आते वोट देने के लिए।यह भी तय है कि संभ्रांत लोग, अगड़ी जाति वाले लोग वोट देने कम निकलते हैं। दलित समुदाय, यादव और मुसलमान बड़ी संख्या में वोट देने निकलते हैं।इससे चुनाव परिणाम को ये बहुत ही ज्यादे प्रभावित करते हैं। इसका फायदा महागठबंधन को मिलेगा । बिहारी मजदूर दूसरे राज्यों में होने की वजह से वोट में भाग नहीं ले सकते हैं।बंगाल में पार्टी के वोटर बड़े डेडीकेटेड होते हैं वो तो दूसरे राज्यों से, दूसरे जिलों से वोट देने अपने नेटिव जिले में आ जाते हैं।मुस्लिम वोटर ऐसा तो निश्चित ही करते हैं। बिहार में इसका प्रतिशत बहुत कम होता होगा अतः ये चुनावी आंकड़े को प्रभावित करने में उतना हिस्सेदारी न रखता हो।
14 नवंबर का इंतजार करते हैं जब परिणाम सामने होगा जब हम अपना भी मूल्यांकन कर पाएंगे कि NDA को हमारा बढ़त देने का अनुमान कितना सटीक बैठता है।
बिहार जाति-वार जनसंख्या प्रतिशत (2023 रिपोर्ट के सार्वजनिक आँकड़ों पर आधारित) :
| क्रमांक |
जाति / समुदाय |
जनसंख्या प्रतिशत (%) |
टिप्पणी / स्रोत |
| 1 |
यादव |
14.26 |
प्रमुख OBC |
| 2 |
कुशवाहा / कोइरी |
4.21 |
OBC |
| 3 |
कुर्मी |
2.87 |
OBC |
| 4 |
तेली |
2.81 |
OBC |
| 5 |
धानुक |
2.13 |
EBC |
| 6 |
नोनिया |
1.91 |
EBC |
| 7 |
नाई (हजाम) |
1.59 |
EBC |
| 8 |
कहार / चंद्रवंशी |
1.64 |
EBC |
| 9 |
बढ़ई |
1.45 |
EBC |
| 10 |
प्रजापति / कुम्हार |
1.40 |
EBC |
| 11 |
बिन्द |
0.98 |
EBC |
| 12 |
पासी |
0.98 |
SC |
| 13 |
कोरी / कोरैया |
0.013 |
SC |
| 14 |
धोबी |
0.84 |
SC |
| 15 |
लोहार |
0.15 |
EBC |
| 16 |
सुनार (सोना-कारीगर) |
0.68 |
EBC |
| 17 |
भुईहर (भूमिहार) |
2.87 |
सवर्ण |
| 18 |
ब्राह्मण |
3.65 |
सवर्ण |
| 19 |
राजपूत |
3.45 |
सवर्ण |
| 20 |
कायस्थ |
0.60 |
सवर्ण |
| 21 |
बनिया (वैश्य समूह) |
2.31 |
सवर्ण / व्यापारी वर्ग |
| 22 |
दुसाध (पासवान) |
5.31 |
SC |
| 23 |
चमार / रवीदास / मोची |
5.25 |
SC |
| 24 |
मुसहर |
3.08 |
SC
|
| 25 |
मेहतर / भंगी |
0.19 |
SC |
| 26 |
गंगौता / गंगा-पार समूह |
0.40 |
EBC |
| 27 |
मल्लाह / निषाद / केवट |
2.60 |
EBC |
| 28 |
कानू |
2.21 |
EBC |
| 29 |
तेली-सोनार मिश्रित उपजातियाँ |
0.20 |
EBC |
| 30 |
बनारसी / हलवाई |
0.84 |
EBC |
| 31 |
मुस्लिम (कुल) |
17.70 |
धर्मवार अनुपात |
| 32 |
शेख (Muslim) |
3.82 |
सबसे बड़ी मुस्लिम जाति |
| 33 |
मोमिन / अंसारी / जुलाहा |
3.55 |
मुस्लिम OBC |
| 34 |
सुरजापुरी (Muslim) |
1.87 |
पूर्वोत्तर बिहार |
| 35 |
पठान / खान |
0.75 (अनुमानित) |
मुस्लिम उच्चवर्ग |
| 36 |
सैयद / सय्यद |
0.27 |
मुस्लिम उच्चवर्ग |
| 37 |
मुगल (Muslim) |
0.11 |
मुस्लिम उच्चवर्ग |
| 38 |
शेखरा / मलिक |
0.42 |
मुस्लिम मध्यवर्ग |
| 39 |
नदाफ / धुनिया |
0.34 |
मुस्लिम बुनकर समुदाय |
| 40 |
रहीमी / फकीर / मियां / बेग |
0.23 |
मुस्लिम सामान्य वर्ग (सूफ़ी पृष्ठभूमि) |
| 41 |
पान (पानरी / सावसी) |
1.70 |
EBC |
| 42 |
राजभर |
0.50 |
EBC |
| 43 |
कोल / खरवार (आदिवासी) |
0.15 |
ST |
| 44 |
संथाल |
0.11 |
ST |
| 45 |
ओरांव |
0.08 |
ST |
समग्र समूह-वार प्रतिशत जनसंख्या:
| समूह |
कुल प्रतिशत |
| अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) |
36.01% |
| पिछड़ा वर्ग (OBC) |
27.12% |
| अनुसूचित जाति (SC) |
19.65% |
| अनुसूचित जनजाति (ST) |
1.68% |
| सवर्ण / सामान्य वर्ग |
15.52% |
| मुस्लिम (धर्मवार) |
17.70% (इनमें शेख, अंसारी, सुरजापुरी आदि सम्मिलित) |
अमर नाथ ठाकुर, 25 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।