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Tuesday, 21 July 2026

धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य


मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन, संस्कृति, पारिवारिक संस्कार, शिक्षा और सामाजिक अनुभवों से निर्मित होते हैं। यही विचार आगे चलकर समाज के चरित्र, उसकी नैतिकता, न्यायबोध, सहिष्णुता, वैज्ञानिक दृष्टि और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। इसलिए यदि हमें किसी सभ्यता को समझना हो, तो उसके धार्मिक और दार्शनिक आधारों को समझना आवश्यक है।


इतिहास बताता है कि कोई भी सभ्यता केवल आर्थिक समृद्धि से महान नहीं बनती। उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में निहित होती है कि वह सत्य की खोज, आत्मालोचना और परिवर्तन को कितना स्थान देती है। जहाँ प्रश्न पूछना सम्मान का विषय होता है, वहाँ ज्ञान का विस्तार होता है; जहाँ प्रश्न पूछना अपराध बन जाता है, वहाँ विचार धीरे-धीरे जड़ होने लगते हैं।


इसी संदर्भ में विश्व के प्रमुख धर्मों और उनके ग्रंथों पर विचार करना स्वाभाविक है। भारतीय परंपरा में वेदों को श्रुति माना गया है और उनका संरक्षण अत्यंत अनुशासित मौखिक परंपरा से हुआ। अनेक विद्वान मानते हैं कि इस कारण उनका मूल पाठ उल्लेखनीय रूप से सुरक्षित रहा। दूसरी ओर मनुस्मृति, रामायण, महाभारत तथा अनेक स्मृति-ग्रंथों की विभिन्न पांडुलिपियों में पाठभेद पाए गए हैं, जिनका अध्ययन आधुनिक पाठालोचना का विषय है।


कुरान के संबंध में इस्लामी परंपरा का विश्वास है कि वह ईश्वर का अंतिम और अक्षुण्ण वचन है। ऐतिहासिक अध्ययन यह भी बताते हैं कि उसका संकलन पैग़म्बर मुहम्मद के जीवनकाल के बाद प्रारंभिक इस्लामी काल में हुआ और बाद में उसका मानक पाठ स्थापित किया गया। ये संकलन पैगम्बर ने नहीं किया या उनके जीवन काल में भी नहीं हुआ। अधिकांश इतिहासकार वर्तमान कुरान को अत्यंत स्थिर पाठ मानते हैं, जबकि कुछ प्रारंभिक पांडुलिपियों और पाठभेदों पर अकादमिक शोध भी चलता रहा है। इस विषय में धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक अध्ययन की अपनी-अपनी सीमाएँ हैं। कुछ अत्यन्त आपत्तिजनक आयतों पर इस्लामिक विद्वानों की एक राय भी कभी नहीं हो पाई क्योंकि यहां स्वतंत्र विमर्श की व्यवस्था का अभाव ही शायद क्या इसका एक मुख्य कारण तो नहीं ?


ईसाई परंपरा का इतिहास भी परिवर्तन का उदाहरण प्रस्तुत करता है। एक समय चर्च और विज्ञान के बीच गंभीर मतभेद रहे; गैलीलियो का प्रसंग इसका प्रतीक माना जाता है। बाद के काल में यूरोप में पुनर्जागरण, सुधार आंदोलन और प्रबोधन के प्रभाव से धार्मिक व्याख्याओं में परिवर्तन आया तथा विज्ञान और स्वतंत्र चिंतन को व्यापक स्थान मिला। इससे यह संकेत मिलता है कि धार्मिक परंपराएँ समय के साथ अपने भीतर परिवर्तन की क्षमता भी विकसित कर सकती हैं।


भारतीय दार्शनिक परंपरा की एक उल्लेखनीय विशेषता उसकी बहुलता रही है। वेदांत, सांख्य, योग, न्याय, मीमांसा, बौद्ध, जैन और चार्वाक जैसे भिन्न-भिन्न मत एक ही बौद्धिक वातावरण में विकसित हुए। शास्त्रार्थ की परंपरा ने असहमति को भी विचार-विमर्श का विषय बनाया। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उसकी बौद्धिक उदारता रही है। भारत में विचारों का संघर्ष तलवार से नहीं, तर्क से हुआ। "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" और "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" जैसे सूत्र इस खुले बौद्धिक वातावरण का परिचय देते हैं।यह भारतीय सभ्यता की एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक धरोहर है। और इस तरह यह भारतीय परम्परा बहुत ही प्रशंसा के योग्य बन जाती है।


इसके साथ ही यह भी स्वीकार करना होगा कि आधुनिक विश्व में धार्मिक कट्टरता और उसके सामाजिक परिणामों को लेकर गंभीर प्रश्न उठे हैं। अल-कायदा, आईएसआईएस, बोको हराम, लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों ने इस्लाम की अपनी व्याख्या के आधार पर हिंसा को उचित ठहराने का प्रयास किया। दूसरी ओर अनेक मुस्लिम विद्वानों और संगठनों ने भी इन व्याख्याओं का विरोध किया और उन्हें इस्लाम की मूल भावना के विरुद्ध बताया, लेकिन ये विरोध क्या उस स्तर तक दर्ज हुआ जिस स्तर तक होना चाहिए था? वैसे ही यह आवश्यक है कि कट्टरपंथी विचारधारा और पूरे धार्मिक समुदाय के बीच अंतर किया जाए।


यह भी एक तथ्य है कि कुछ मुस्लिम-बहुल देशों में महिलाओं के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म परिवर्तन तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बहस होती रही है। वहीं दूसरी ओर अनेक ऐसे देश भी हैं जहाँ सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ अलग हैं। इसी प्रकार किसी भी धर्म या सभ्यता का मूल्यांकन करते समय केवल उसकी आदर्श शिक्षाओं से नहीं, बल्कि उसके अनुयायियों के वास्तविक सामाजिक व्यवहार से भी सीखने की आवश्यकता होती है।


किसी समाज में अपराध, हिंसा, स्त्रियों की स्थिति, अल्पसंख्यकों के अधिकार, शिक्षा का स्तर और वैज्ञानिक प्रगति—ये सभी उस समाज के चरित्र के महत्वपूर्ण संकेतक हैं। परंतु इनका कारण केवल धर्म नहीं होता, लेकिन मानना होगा कि धर्म का इसमें रोल कमतर नहीं आंका जा सकता। शासन व्यवस्था, कानून का राज, शिक्षा, आर्थिक अवसर, इतिहास, युद्ध, औपनिवेशिक अनुभव और सामाजिक संस्थाएँ भी बहुत प्रभाव डालती हैं। इसलिए किसी भी जटिल सामाजिक समस्या का उत्तर केवल एक कारण में ढूँढ़ना उचित नहीं होगा।


धर्म का मूल्यांकन अंततः इस आधार पर होना चाहिए कि वह अपने अनुयायियों में कौन-से गुण विकसित करता है—करुणा या क्रूरता, सहिष्णुता या असहिष्णुता, जिज्ञासा या अंधानुकरण, संवाद या हिंसा, आत्मालोचना या जड़ता। यदि किसी धार्मिक व्याख्या का उपयोग आतंकवाद, घृणा या अन्याय को उचित ठहराने के लिए किया जाता है, तो उसकी आलोचना आवश्यक है। उसी प्रकार यदि किसी धर्म में सुधारवादी विचार, खुला विमर्श और पुनर्व्याख्या की परंपरा विकसित होती है, तो उसे भी स्वीकार ही नहीं करना चाहिए, बढ़ावा भी देना चाहिए।


अंततः किसी सभ्यता का भविष्य केवल उसके धार्मिक ग्रंथों से निर्धारित नहीं होता, बल्कि इस बात से निर्धारित होता है कि वह अपने ग्रंथों को कैसे समझती है, उनकी व्याख्या कैसे करती है और बदलते समय के साथ सत्य, न्याय और मानव गरिमा के प्रश्नों का उत्तर किस प्रकार देती है। इतिहास का अनुभव यही बताता है कि वे सभ्यताएँ अधिक स्थायी और सृजनशील सिद्ध हुई हैं जिन्होंने श्रद्धा और विवेक, परंपरा और परिवर्तन, आस्था और तर्क—इन सबके बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया।


अमर नाथ ठाकुर, 21 जुलाई, 2026, कोलकाता।

Tuesday, 30 June 2026

राम मंदिर की चोरी नहीं, यह पूरे तंत्र का आईना है


राम मंदिर की चोरी नहीं, यह पूरे तंत्र का आईना है



जहाँ धन होगा, वहाँ आकर्षण होगा; जहाँ आकर्षण होगा, वहाँ लालच भी जन्म लेगा। और जहाँ लालच होगा, वहाँ भ्रष्टाचार की संभावना भी बनी रहेगी। यही मानव स्वभाव है। इसलिए जब अयोध्या के राम जन्मभूमि मंदिर में दान-दक्षिणा से जुड़ी कथित चोरी की खबर सामने आई, तो मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। हाँ, दुःख अवश्य हुआ। दुःख इसलिए कि भगवान राम के नाम पर समर्पित श्रद्धा भी भ्रष्टाचार की इस महामारी से अछूती नहीं रह सकी।

वास्तविकता यह है कि भ्रष्टाचार आज भारतीय समाज की सबसे भयावह बीमारी बन चुका है। देश का शायद ही कोई कोना, कोई संस्था या कोई व्यवस्था इससे पूरी तरह मुक्त हो। हमारा तंत्र भीतर तक खोखला हो चुका है। इसे सुधारने में वर्षों नहीं, दशकों लगेंगे।

जब व्यवस्था के हर स्तर पर बेईमानी का विष फैल चुका हो, तब चोर ही चोर को पकड़ेगा, वही उसकी जाँच करेगा, वही आरोप-पत्र तैयार करेगा और वही उसे दंडित भी करेगा। ऐसी स्थिति में चोरी समाप्त नहीं होती, केवल चोर बदलते रहते हैं। तब समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह रह जाती है कि हम चोरों की तुलना करके यह तय करने लगते हैं कि उनमें सबसे छोटा चोर कौन है। वही हमें सबसे ईमानदार दिखाई देने लगता है।

समाचारों से ज्ञात हुआ कि राम मंदिर में दान-दक्षिणा के प्रबंधन का दायित्व ऐसे कर्मचारियों को सौंपा गया था, जिनका मासिक वेतन लगभग 12 से 20 हजार रुपये था। क्या आज के समय में इतनी आय पर कोई व्यक्ति अपने परिवार का सम्मानपूर्वक पालन-पोषण किसी शहर में कर सकता है? उत्तर सहज ही 'नहीं' में मिलेगा।

उनका दायित्व केवल रुपये गिनना और बैंक में जमा कराना नहीं था। वे करोड़ों रुपये की ईमानदारी के भी प्रहरी थे। उनसे अपेक्षा थी कि वे प्रतिदिन अपार धनराशि के बीच रहकर भी उसके प्रति तनिक भी आकर्षित न हों। प्रश्न यह है कि क्या हम उनकी इस ईमानदारी का मूल्य चुकाते हैं? उनके वेतन में उनके श्रम का मूल्य तो था, पर उस असाधारण चरित्र और आत्मसंयम का मूल्य कहाँ था, जिसकी हम उनसे अपेक्षा करते हैं?

यह तर्क चोरी का समर्थन नहीं है। चोरी किसी भी परिस्थिति में अपराध है। लेकिन यदि व्यवस्था ऐसे लोगों से असाधारण ईमानदारी की अपेक्षा करे, जिनका अपना जीवन आर्थिक संघर्षों से घिरा हो, तो यह व्यवस्था की कमजोरी अवश्य कही जाएगी। सार्वजनिक जीवन में तीन दशक से अधिक समय बिताने के बाद इतना अनुभव तो हो ही जाता है कि केवल नैतिक उपदेशों से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होता; उसके लिए ऐसी व्यवस्थाएँ भी बनानी पड़ती हैं, जिनसे प्रलोभन की संभावना न्यूनतम हो जाए।

इसीलिए मेरा मानना है कि यदि आज की व्यवस्था यथावत बनी रही, तो केवल अधिकारियों के चेहरे बदल देने से कुछ नहीं बदलेगा। चाहे पूरे प्रबंधन में वरिष्ठ IAS, IPS अथवा अन्य उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को ही क्यों न बैठा दिया जाए, भ्रष्टाचार की संभावना समाप्त नहीं होगी।

आप हजारों सीसीटीवी कैमरे लगा दीजिए, खुफिया कैमरों से हर कोना ढक दीजिए, निगरानी की हर आधुनिक व्यवस्था स्थापित कर दीजिए—फिर भी बेईमानी अपना नया रास्ता खोज लेगी। तकनीक अपराध को कठिन बना सकती है, असंभव नहीं।

कारण स्पष्ट है। समस्या व्यक्ति नहीं, व्यवस्था है। यदि राजनीति, प्रशासन, पुलिस और अन्य न्यायिक संस्थाओं में नैतिकता लगातार कमजोर होती जाए, तो किसी एक संस्था से पूर्ण पवित्रता की अपेक्षा करना यथार्थवादी नहीं होगा।

हाँ, भ्रष्टाचार को काफी हद तक कम अवश्य किया जा सकता है। दान-पेटियाँ पूरी तरह आधुनिक तकनीक से युक्त हों। उनमें लगे सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर प्रत्येक दान का तत्काल रिकॉर्ड तैयार करें। मशीन द्वारा दर्ज आँकड़ों का सप्ताह या पंद्रह दिन में एक बार भौतिक सत्यापन किया जाए।

गिनती करने वाले कर्मचारी बिना जेब वाले वस्त्र पहनकर ही प्रवेश करें। पूरी प्रक्रिया की लाइव रिकॉर्डिंग हो। बाहर निकलते समय उनकी अनिवार्य सुरक्षा जाँच हो। सीसीटीवी का रिकॉर्ड स्थायी रूप से सुरक्षित रखा जाए। श्रद्धालुओं को नकद के स्थान पर QR कोड, UPI, बैंक ट्रांसफर अथवा चेक के माध्यम से दान देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। सोना, चाँदी और अन्य बहुमूल्य दान का तत्काल डिजिटल पंजीकरण हो।

यदि संभव हो तो ऐसे प्रबंधन में त्याग और वैराग्य का जीवन जीने वाले संन्यासियों अथवा प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थाओं के सेवाभावी व्यक्तियों की भी भागीदारी हो सकती है। इससे चोरी पूरी तरह समाप्त भले न हो, पर उसकी संभावना अवश्य घट सकती है।

लेकिन यह मान लेना कि अयोध्या में राम मंदिर में भ्रष्टाचार का पूर्ण उन्मूलन हो जाएगा, शायद यथार्थ नहीं है। यदि किसी के पास ऐसा कोई विभाग, संस्था या कार्यालय का उदाहरण हो जहाँ कभी भ्रष्टाचार न होता हो, तो वह हमें अवश्य बतायें।

मीडिया में जब ऐसे मामलों पर भारी शोर मचता है, तो कभी-कभी ऐसा लगता है मानो यह देश की पहली चोरी हो। बहसें होती हैं, विश्लेषण होते हैं, नैतिक प्रवचन दिए जाते हैं। पर क्या कोई पूरे विश्वास के साथ यह कह सकता है कि इस व्यवस्था का प्रत्येक प्रहरी स्वयं हर प्रकार की बेईमानी से पूर्णतः मुक्त है?

अंततः मेरी दृष्टि में यह किसी एक मंदिर की चोरी की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था का दर्पण है जिसमें चोर ही चोर को देखता है, चोर ही शोर मचाता है, चोर ही जाँच करता है, चोर ही आरोप-पत्र लिखता है, चोर ही बहस करता है, चोर ही निर्णय सुनाता है और अंततः चोर ही चोर को जेल भेज देता है। चोर फिर कोई व्यवस्था कर चोरी से जेल से बाहर आ जाता है। मतलब वही चक्र फिर प्रारंभ हो जाता है। और यह चक्र चलता रहता है ... अनवरत।

हम क्षणिक आक्रोश व्यक्त करते हैं, कुछ देर संतोष कर लेते हैं कि हमसे बड़ा चोर पकड़ा गया। फिर जीवन अपनी पुरानी गति से चल पड़ता है।

बस, समझने का फेर केवल इतना ही है।


अमर नाथ ठाकुर, 30 जून, 2026, कोलकाता।

Monday, 29 June 2026

गंभीर का दंभ: भारतीय क्रिकेट का दुर्भाग्य

गंभीर का दंभ: भारतीय क्रिकेट का दुर्भाग्य



मुख्य कोच की भूमिका खिलाड़ियों की प्रतिभा को तराशने की होती है, उन्हें कुंद करने की नहीं। कोई भी खिलाड़ी अपनी योग्यता और निरंतर प्रदर्शन के बल पर ही टीम में जगह बनाता है। वैभव सूर्यवंशी को भी बीसीसीआई और चयनकर्ताओं ने पिछले कई महीनों के उनके असाधारण खेल, आईपीएल के चमत्कारी प्रदर्शन और उनकी अद्वितीय प्रतिभा को देखकर ही भारतीय टी-20 टीम में शामिल किया था। आईपीएल के फॉर्मेट को देखते हुए, एक ओपनर और आक्रामक बल्लेबाज के तौर पर वर्तमान में पूरे भारत का कोई भी बल्लेबाज वैभव के आसपास भी नहीं ठहरता। ऐसे में आयरलैंड और इंग्लैंड के इस टी-20 दौरे पर उन्हें लगातार बाहर रखना मुख्य कोच गौतम गंभीर की किस मानसिकता और रणनीति को दर्शाता है, यह समझना बिल्कुल भी कठिन नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि गंभीर अपने पुराने झगड़ालू स्वभाव और भेदभावपूर्ण रवैये के वशीभूत होकर देश की एक उभरती हुई महान प्रतिभा को नष्ट करने पर तुले हैं। यदि वे इस समय भारत में होते, तो खेलप्रेमी ऐसे फैसलों का स्वागत सड़े टमाटर और अंडों से नहीं, बल्कि ताजे टमाटरों और अंडों से करते, ताकि उन्हें जनता के आक्रोश की चोट का अहसास हो पाता।

जब भारतीय टीम आयरलैंड जैसी फिसड्डी टीम से हार गई, तो पूरा देश गहरे अफसोस और गुस्से में डूब गया। कोच और कप्तान की गलत नीतियों के कारण जो डर था, वही हुआ—संजू सैमसन, अभिषेक शर्मा, ईशान किशन और स्वयं कप्तान श्रेयस अय्यर जैसे स्थापित खिलाड़ी बुरी तरह फ्लॉप साबित हुए। गंभीर के पास एक मौका यह भी था कि वे वैभव को खिलाते और यदि टीम असफल होती, तो हार का ठीकरा उन पर फोड़ देते। लेकिन गंभीर अपने अहंकार, गुमान और दंभ में इतने सराबोर रहे कि उन्होंने अपने कर्तव्य की ही बलि दे दी, जिसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय टीम अपने लगातार 16 सीरीज की जीत के शानदार सिलसिले को एक बेहद साधारण टीम के हाथों गंवा बैठी।

अब जब इंग्लैंड के खिलाफ बेहद कठिन मुकाबला सामने है, और सलामी बल्लेबाज के तौर पर संजू और अभिषेक दोनों ही पूरी तरह नाकाम हो चुके हैं, तब गंभीर के पास वैभव सूर्यवंशी को मौका देकर अपनी भूल सुधारने का आखिरी अवसर है। यदि अब भी वे अपनी जिद पर अड़े रहे, तो भारत वापसी पर उनकी भारी फजीहत तय है। अब देखना यह है कि क्या यह चमत्कारी बालक अंतिम एकादश में मौका पा पाता है या नहीं। भारतीय क्रिकेट को मुंबई और दिल्ली की लॉबी के वर्चस्व से मुक्त होना ही होगा; खेल में राजनीति, जिद और दंभ के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। गंभीर ने टीम चयन में जिस बौद्धिक भ्रष्टाचार का परिचय देश के सामने रखा है, उसका ध्वस्त होना अनिवार्य है। आने वाले मैच यह तय करेंगे कि अंतिम ग्यारह में चयन योग्यता, प्रतिभा और प्रदर्शन के आधार पर होता है या फिर कोच की सड़ांध मारती जिद के आधार पर। भारतीय टीम से फिर से किसी अच्छे प्रदर्शन की अपेक्षा तभी की जा सकती है, जब टीम में न्याय हो।

हम तो यही चाहते हैं कि इस अद्भुत बालक का 'वैभवपूर्ण' प्रदर्शन अन्य वरिष्ठ खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बने, न कि ईर्ष्या का जरिया। ऐसा इसलिए, क्योंकि वैभव जैसी प्रतिभाएं साधारण नहीं होतीं, वे ईश्वरीय देन और अद्वितीय वरदान से युक्त होती हैं, जिनका सम्मान होना ही चाहिए।


अमर नाथ ठाकुर, 29 जून, 2026, कोलकाता।


Sunday, 28 June 2026

क्रिकेट में प्रतिभा बनाम राजनीति: वैभव सूर्यवंशी का संघर्ष

 क्रिकेट में प्रतिभा बनाम राजनीति: वैभव सूर्यवंशी का संघर्ष

वैभव सूर्यवंशी की असाधारण प्रतिभा और आईपीएल में उनके शानदार प्रदर्शन ने बीसीसीआई को सोचने पर मजबूर कर दिया। इसी का परिणाम था कि उन्हें आयरलैंड और इंग्लैंड के आगामी टी-20 दौरे के लिए भारतीय टीम में शामिल करना पड़ा। देश के कई दिग्गज और रिटायर्ड क्रिकेटरों का भी यही मानना था कि वैभव जैसी उभरती हुई प्रतिभा को तराशने के लिए आयरलैंड जैसी अपेक्षाकृत कमजोर टीम के खिलाफ पदार्पण (डेब्यू) का मौका देना एक बेहतरीन रणनीति होगी। मात्र 15 वर्ष की आयु में अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव मिलने से न केवल उनका आत्मविश्वास बढ़ता, बल्कि भविष्य में इंग्लैंड जैसी मजबूत टीम के खिलाफ खेलने के लिए वे मानसिक रूप से तैयार भी हो पाते। 15 वर्ष के इस बच्चे में अगले 20-25 वर्षों तक देश के लिए खेलने की अद्भुत क्षमता है।

लेकिन दुर्भाग्यवश, भारतीय क्रिकेट के गलियारों में गुटबाजी और अंदरूनी राजनीति की जड़ें बहुत गहरी हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्य कोच गौतम गंभीर एक विशेष समूह या दल को ही प्राथमिकता दे रहे हैं। वैभव जैसी अद्वितीय क्षमता वाले खिलाड़ी का इतनी कम उम्र में टीम में आना और अंतिम एकादश (प्लेइंग इलेवन) में अपनी जगह पक्की कर लेना, कहीं न कहीं स्थापित और सीनियर खिलाड़ियों के लिए एक अनजाना डर बन गया है। अभिषेक शर्मा, संजू सैमसन, ईशान किशन, तिलक वर्मा या श्रेयस अय्यर जैसे खिलाड़ियों ने हाल के वर्षों में ही अपने पैर जमाए हैं। ऐसे में एक अत्यंत युवा खिलाड़ी का टीम में प्रवेश सीनियरों के करियर के लिए खतरे की घंटी माना जाने लगता है।

आरोप लग रहे हैं कि मुख्य कोच गौतम गंभीर वैभव जैसी नई प्रतिभा को फलने-फूलने का उचित माहौल नहीं देना चाहते। पहले मैच में भारतीय टीम को हार का सामना करना पड़ा था, जिससे कोच गंभीर पर एक बड़ा असमंजस और भारी दबाव था। उम्मीद थी कि इस हार के बाद टीम प्रबंधन अपनी गलती सुधारेगा, लेकिन दूसरे मैच में भी वैभव को अंतिम एकादश से बाहर रखकर बेंच पर ही बैठाए रखा गया। यह फैसला साफ तौर पर इस रणनीति को दर्शाता है कि सीनियर खिलाड़ियों को अपने खराब प्रदर्शन को सुधारने के लिए अतिरिक्त मौके दिए जाएं, ताकि वैभव को टीम में शामिल करने की नौबत ही न आए। यदि ये सीनियर खिलाड़ी जैसे-तैसे अच्छा स्कोर कर देते हैं, तो वैभव को आगे के मैचों, विशेषकर इंग्लैंड के खिलाफ, टीम से बाहर रखने का एक ठोस बहाना मिल जाएगा कि 'अच्छा प्रदर्शन करने वाले सीनियर को कैसे हटाया जाए'। हालांकि, टीम में चयन होना एक बात है और अंतिम ग्यारह में जगह मिलना दूसरी बात, जो वर्तमान परिस्थितियों में बेहद कठिन कर दी गई है।

जब वैभव का चयन आईपीएल के उनके सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के आधार पर हुआ है, तो लगातार दूसरे मैच में भी उन्हें अंतिम एकादश से बाहर रखने का कोई तार्किक कारण नहीं बनता। यह निर्णय एक संकीर्ण, असुरक्षित और कुत्सित मानसिकता को दर्शाता है, जो नई प्रतिभाओं को बढ़ावा देने के बजाय उन्हें दबाने का प्रयास करती है। अतीत में भी गौतम गंभीर का स्वभाव मैदान पर आक्रामक और विवादों से घिरा रहा है। ऐसे में, खेल के मैदान से परे राजनीतिक रसूख के बल पर कोच जैसे गरिमामयी पद पर उनका आसीन होना और इस तरह के फैसले लेना, भारतीय क्रिकेट के भविष्य को अंधकार में धकेलता हुआ प्रतीत होता है।


अमर नाथ ठाकुर, 28 जून, 2026, कोलकाता।


Sunday, 17 May 2026

बंगाल में नया विहान: भय के अवसान और विडंबनाओं के उदय की दास्तान


बंगाल में नया विहान: भय के अवसान और विडंबनाओं के उदय की दास्तान

चार मई के बाद से बंगाल में रोज़ एक नया सवेरा मालूम पड़ता है। नई दोपहर और नई शाम भी। प्रति दिन कुछ न कुछ ऐसा नया सुनने को मिल रहा है कि सहसा विश्वास ही नहीं होता। जो व्यवस्था पूरी तरह पलट चुकी थी, वह अब धीरे-धीरे सीधी हो रही है। बरसों से जिस घुटन को हमने अपनी नियति और जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा मान लिया था, उसकी जगह अब इतना खुलापन आ गया है कि खुद की आज़ादी पर ही अविश्वास होने लगा है।


यह वही बंगाल है जहां किसी शुक्रवार को लोकल ट्रेनें एक विशेष स्टेशन पर आकर ठिठक जाती थीं, क्योंकि पटरियों पर सैकड़ों लोग नमाज़ के लिए आ जाते थे। ट्रेन की मजबूरी थी कि वह थमी रहे। न्यू मार्केट हो, राजा बाजार हो या मटिया बुर्ज का इलाका—सड़कें और गलियां बंद हो जाती थीं। आगे जाने के लिए या खाली फुटपाथ ढूंढने के लिए आपको अपनी नागरिकता और समय को बंधक बनाकर इंतज़ार करना होता था। अज़ान की गूंज से पूरा परिवेश ऐसा गुंजायमान रहता था कि सुबह आप चाहकर भी सो नहीं सकते थे। दोपहर और शाम को आप अपने कॉर्पोरेट दफ्तरों या एक्सचेंज बिल्डिंग में कोई ज़रूरी मीटिंग नहीं रख सकते थे, क्योंकि बगल की मस्जिद से आती आवाज़ें पूरे ऑफिस में गूंजती थीं। इस इस्लामिक वातावरण से अब आप तंग नहीं होते थे, क्योंकि इसे आपके जीवन का अभिन्न हिस्सा बना दिया गया था। आप इसे पसंद करें या न करें, चारा ही क्या था? यहाँ तो नामी-गिरामी मुस्लिम डॉक्टर भी ऐन वक़्त पर मरीज़ को छोड़कर नमाज़ की रस्में पूरी करने चले जाते थे; और यह सिर्फ जुम्मे की बात नहीं थी, हर दिन का यही दस्तूर था। टेंगरा, तपसिया और मटिया बुर्ज जैसे इलाकों में जाकर तो भ्रम होता था कि आप भारत में हैं या किसी पाकिस्तानी-बांग्लादेशी क्षेत्र में! कहते हैं पूरे बंगाल का यही हाल था।


मदरसों में मौलानाओं को सरकारी खजाने से बकायदा तनख्वाह मिलती थी ताकि वे पवित्र कुरान की शिक्षा दे सकें, जहां खुलेआम गैर-मुस्लिमों को 'काफिर' कहा जाता था। शुरू-शुरू में यह शब्द किसी गाली की तरह चुभता था, पर धीरे-धीरे सुनते-सुनते यह किसी पदवी जैसा लगने लगा था।


मगर चार मई के बाद से अब अचानक कुछ अजूबा होने लगा है। अखबारों, टीवी और फेसबुक रील पर खबरें हैं कि सड़कों पर नमाज़ पढ़ना बंद हो रहा है, अज़ान की कानफाड़ू आवाजें अब वैसी नहीं रहीं। इस भगवा पार्टी ने चुनाव में नारा दिया था—"फियर आउट, भरोसा इन, बीजेपी के भोट दिन।" क्या यह वाकई उसी का प्रभाव है? क्या अब सभी समवेत स्वर में 'भारत माता की जय' बोलेंगे? क्या स्कूलों में बच्चे एक सुर में 'वंदे मातरम' गाएंगे? कल तक जिन मदरसों में राष्ट्रीय अवसरों पर तिरंगा फहराना एक असाधारण राष्ट्रीय समाचार और सुर्खियां बनता था, क्या वह अब एक सामान्य सी बात लगेगी? डर है कि यह सामान्य स्थिति कहीं हमें असामान्य न लगने लगे!


यहाँ कोलकाता में एक 'सोहरावर्दी पथ' भी है। क्यों है? क्योंकि इसी सोहरावर्दी ने रमजान के पवित्र महीने में वह खूनी मारकाट फैलाई थी जिसमें हिंदू गाजर-मूली की तरह काटे गए थे। वहीं कालीघाट और अलीपुर के बीच एक 'गोपाल नगर' भी है। कहते हैं यह गोपाल पाठा के नाम पर है—वह बहादुर हिंदू जिसने आत्मरक्षार्थ और हिंदू अस्मिता के लिए तलवार उठाई थी और करारा जवाब दिया था। ममता के राज में ये सारे पुराने इतिहास और प्रतिक्रियाएं खूब याद आने लगी थीं। हावड़ा की सड़कों पर जब नमाज़ के विरोध में लोगों ने हनुमान चालीसा का पाठ शुरू किया, तो तत्कालीन 'ममता की पुलिस' नमाज़ियों की हिफ़ाज़त में खड़ी होकर हनुमान पाठ करने वाली मंडलियों पर लाठियां भांजने आ जाती थी। वैसे नमाज़ियों ने अपना वर्चस्व इस कदर फैला लिया था कि उन्हें पुलिस की पहरेदारी की ज़रूरत ही कहाँ थी, सबने इसे अपनी दिनचर्या मान लिया था। मुर्शिदाबाद का 'भगवान गोला' मोहल्ला तो बोलचाल में 'अल्ला गोला' हो चुका था। सुना है कि यूपी के गोरखपुर में योगी जी ने उर्दू बाजार को हिंदी बाजार में बदल दिया था; वहां उनकी चलती थी, यहाँ इनकी चलने लगी है। मुस्लिम समाज रेडिकलाइज हो रहा था, तो जवाब में हिंदुओं के भीतर भी एक असहाय उबाल और प्रतिक्रियावादी समूह तैयार हो रहा था। लेकिन जब सरकार ही वैसी हो, तो कोई क्या कर लेता? झड़पें होतीं और फिर शांत हो जातीं। फिर वही ढर्रे पर पांचों वक्त की अज़ान, सड़कों पर नमाज़ और दफ्तरों से नमाज़ के नाम पर गायब होने का खेल शुरू हो जाता था। ऊपर से जातियों के नाम पर मुस्लिम समुदाय में खूब जाति प्रमाणपत्र बांटे गए और नौकरियां आरक्षण के तहत जाने लगीं।


अब नई सरकार ने इन जाति प्रमाणपत्रों की समीक्षा का आदेश दे दिया है। इसे सुनकर हिंदुओं में एक अजीब सुकून है। मुसलमान यकीनन दुखी हो रहे होंगे। लेकिन जो भी हो, हिंदू हो या मुसलमान, सबके लिए संविधान तो सर्वोपरि होना ही चाहिए—यह बात तो खुद मुसलमान भाई भी चिल्ला-चिल्ला कर कहते ही हैं!


बरसों से खेल चल रहा था कि घुसपैठिए आते, उनके आधार कार्ड, वोटर कार्ड और राशन कार्ड रातों-रात बन जाते। फिर दीदी की सरकार उन्हें 'लक्खी भंडार', 'कन्याश्री' और 'स्वास्थ्य साथी' जैसी तमाम योजनाओं से नवाज़ देती। राशन तो मिलता ही था। भाषा एक थी, तो मुस्लिम भाईचारा देशहित से ऊपर भारी पड़ता था। बिना किसी परिश्रम के सड़क किनारे या सरकारी जमीन पर ठिकाना और मुफ्त अनाज पाकर वे मानो सरकार को ही उपकृत करते थे, बदले में तत्कालीन पार्टी को उनके वोटों की पक्की गारंटी मिल जाती थी।


लेकिन यह क्या! जैसे ही वोटरों की शुद्धता के लिए 'SIR' की तलवार लटकी, भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर (माफ़ कीजिएगा, बांग्लादेश-भारत बॉर्डर कहना ही उचित होगा) अचानक भागने वाले घुसपैठियों की हज़ारों की भीड़ लग गई। उन्हें भनक लग गई कि अब मुश्किल वक्त आने वाला है। अब खबर है कि बांग्लादेशियों के न तो आधार बन रहे हैं, न राशन कार्ड। अब देखना यह है कि शुभेंदु अधिकारी कब यह घोषणा करते हैं कि इस जनसांख्यिकीय सफाई के बाद सरकारी खजाने से हर महीने होने वाली निकासी कितनी कम हुई है।


अजूबों की एक श्रृंखला है। सुना है कि ४ मई को परिणाम आया और ५ मई को ही आसनसोल के दुर्गा मंदिर का ताला खोलने का इंतज़ार किए बिना, उसे निर्ममतापूर्वक तोड़कर पूरी तरह खोल दिया गया। विरोध स्वरूप? लोगो ने बदले की कार्रवाई में उस मंदिर में रात को ताला लगाना ही बंद कर दिया है? यह तो मैंने बस ज़रा मज़ाक में कहा भाई, बुरा मत मानना! असल में पार्टी के लोगों ने अल्लाह के बंदों को मंदिर के भजनों, घंटों और बुतों के दर्शन से होने वाली 'दिक्कतों' के मद्देनज़र ही तो उस मंदिर में ताला लटकाया था! फिर उन बंदों की असीम उदारता थी कि दुर्गा पूजा के समय सिर्फ एक दिन के लिए मंदिर खोलने की इजाज़त देकर इस इलाके के बुतपरस्त काफिरों पर भारी एहसान जताया था। ऐसी खबरें अब बंगाल के कई कोनों से आ रही हैं। कई जगह तो भक्तों ने अभी से होली और दिवाली एक साथ मना ली है। बड़ा बाजार में भगवा रंग के गुलाल की रिकॉर्ड बिक्री हो रही है। कुछ चतुर पत्रकारों ने तो आखिरी दौर के मतदान से पहले ही इस भगवा गुलाल की बिक्री देखकर बीजेपी की जीत की भविष्यवाणी कर दी थी, और हम लोग इस डेटा पर बड़ा भरोसा भी करते थे। इस बार तो कम्बख्त सट्टा बाजार भी अंत तक बंगाल का सही ट्रेंड नहीं पकड़ पाया!


अंतिम चरण के मतदान से एक दिन पहले मेरे एक परम मित्र रहमत ने बड़े आत्मविश्वास से कहा था—"देखिएगा, दीदी भवानीपुर से भी जीतेंगी और तृणमूल दो सौ से ज्यादा सीटें लाएगी।" मैंने ठीक उलट दावा किया। एक-एक किलो रसगुल्ले की बाज़ी लग गई। चार मई को जब परिणाम आए, तो रहमत शर्त के मुताबिक रसगुल्ला लाने को तैयार था, लेकिन मैंने ही मना कर दिया। मैंने कहा—"रहमत भाई, तुम उम्र में मुझसे छोटे हो। दीदी सत्ता में रहें या जाएं, दोनों ही सूरतों में तुम्हें रसगुल्ला खिलाना मेरा ही दायित्व बनता है, और हम ज़रूर मिलेंगे और खाएंगे।"


अब हवा में एक नई गूंज है कि यूपी से बुलडोज़र मंगाए जा रहे हैं। पूरे भारतवर्ष में योगी जी के ही बुलडोज़र सफल और शुभ शकुन के द्योतक माने जाते हैं, इसलिए शायद उन्हें ही तकलीफ दी जा रही है। वैसे मैं तो यह सोचकर परेशान था कि क्या खैरात की रेवड़ियां बांटकर बंगाल का खजाना इतना खाली हो गया है कि हम सीधे बुलडोज़र कंपनियों से न खरीदकर योगी जी से उधार मांग रहे हैं? खैर, अब सरकारी जमीनों से बेदखलीकरण और ध्वस्तीकरण की खबरें रोज़ आ रही हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि एक विशेष समुदाय के ही ठिकाने ज्यादा टूट रहे हैं, क्योंकि वे खुद को विशेष अधिकार प्राप्त मानकर ऐसी हरकतों को अंजाम दे चुके थे। ये खबरें इस तेजी से आ रही हैं कि लगता है पूरा बंगाल ही न खाली हो जाय या ध्वस्त हो जाय । "भई , मैं तो अतिशयोक्ति का सहारा लेकर अपने भीतर की वेदना और भड़ास को न्यूट्रलाइज कर रहा हूँ।" लोगों का कहना है।


किसी परम भक्त ने जैसा कहा, मैं वैसा ही बयां कर देता हूँ—सियालदह स्टेशन फांका हो गया, न्यू मार्केट  के बाहर खाली हो गया, तमाम बाजार की सड़कें खाली-खाली दिख रही हैं। अब सड़क पर चलते हुए जब तक एक-दूसरे से कंधे न टकराएं, तब तक कलकत्ते के बाजारों का मज़ा ही क्या दादा? इतना फ्री चलना तो कभी हमारे नसीब में नहीं हुआ; अब इतना सीधा चलने में हमारा बैलेंस ही बिगड़ जाता है, 'की बोलबो!'


पार्किंग का पैसा अब हम किसे देंगे? हमारी गाड़ी की जिम्मेदारी अब कौन लेगा? रोड इतने चौड़े और खुले लग रहे हैं कि कुछ विचित्र सा अहसास हो रहा है। क्या सरकारी अस्पतालों से बिचौलिए और दलाल सचमुच गायब हो गए हैं? तब तो बड़ी मुसीबत होने वाली है भई! अब अस्पताल में बेड कैसे मिलेगा, ऑपरेशन का नंबर कैसे आएगा और मुफ्त वाली दवाएं कौन दिलाएगा? हम जैसे साधारण गरीब मरीजों का इलाज अब कैसे होगा? लोग कहते हैं कि अब 'पहले आओ, पहले पाओ' का नियम चलेगा। भाई, अगर अस्पताल का बेड टूटा मिला या ऑपरेशन की तारीख महीनों बाद की मिली, तो हमारी मदद कौन करेगा? ये पार्टी वाले सम्मानित और भद्र दलाल अगर चले गए, तो अस्पताल का पूरा सिस्टम ही न बैठ जाए! जो भी हो, इसी बीच एक सुकून वाली खबर भी आई कि आर.जी. कर मामले के तीन-तीन पुलिस अधिकारी सस्पेंड कर दिए गए हैं। कुछ अजूबा लगता है न? ये बेचारे तो तत्कालीन सरकार की सुन और मानकर काम कर रहे थे, फिर ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि सरकार अब 'पलटी' हो गई है और कोई नया 'अधिकारी' आ चुका है—मेरा मतलब, शुभेंदु अधिकारी!


इतिहास गवाह है कि जब सीपीएम की सरकार गई, तो टीएमसी वालों ने उनके दफ्तरों पर कब्ज़ा कर लिया था। फिर कांग्रेसियों के पार्टी दफ्तरों को भी निगल गए। २०२१ के बाद तो बीजेपी वालों का भी इन्होंने बुरा हाल किया था। इस बार चार मई के बाद सीपीएम, कांग्रेस और बीजेपी—सब झूम रहे हैं, क्योंकि दादा, अब दादागीरी का अंत हो गया है। बंगाल की परंपरानुसार, सीपीएम के गुंडे जैसे टीएमसी में आ गए थे, मेरा अनुमान था कि टीएमसी वाले भी अब बीजेपी में 'मास ट्रांसफर' पा जाएंगे। कई मोहल्लों में लोग भगवा गमछा डालकर और गुलाल लगाकर पार्टी स्विच करने भी लगे थे ताकि अपनी पुरानी विरासत पर कब्ज़ा बनाए रख सकें। लेकिन यह क्या? बीजेपी नेतृत्व ने उनके इस 'लेटरल एंट्री' और ट्रांसफर पर कड़ा ब्रेक लगा दिया! अब टीएमसी वाले छिपे-छिपे और भागे-भागे फिर रहे हैं; कुछ के पुराने केस खुल रहे हैं और एफआईआर दर्ज हो रही हैं। पर पब्लिक इतनी भोली है कि उसे अब भी भरोसा नहीं हो रहा कि क्या वाकई टीएमसी कार्यकर्ताओं की इस पोस्टिंग और एंट्री को रोक दिया गया है?


टॉलीगंज के एक पेट्रोल पंप पर बरसों से  पार्टी के लोग कुछ कमरों पर कब्ज़ा जमाए बैठे थे। चार मई की रात को ही वे सब धर लिए गए और लॉकअप में डाल दिए गए; जबकि वे सभी भगवा गमछे और गुलाल में खुद का 'स्वघोषित ट्रांसफर' कर चुके थे। गजब खेल है भाई! उधर एक महिला अलग ही खुशी मना रही है, क्योंकि पुरानी पार्टी के जिस छुटभैये नेता ने उसकी दुकान हड़प रखी थी, वह चार मई की रात को उसे स्वेच्छा से छोड़कर रफूचक्कर हो गया। एक मुसलमान चाचा तो भगवा गुलाल लगाए खुशी के आंसू बहा रहे हैं, क्योंकि हाईवे किनारे की उनकी आठ एकड़ की कीमती ज़मीन को पुरानी पार्टी के नेताओं ने 'स्वतः मुक्त' घोषित कर दिया है। हालांकि इस आज़ादी की कीमत उस पीड़ित चाचा को अपने बेटे और भाई को खोकर चुकानी पड़ी, जिसका अफ़सोस कभी कम नहीं होगा।


यूट्यूब और रील्स पर इस समय मुक्ति, बंधन टूटने और आत्मसम्मान की वापसी के अनगिनत वीडियो वायरल हो रहे हैं। कोई मिठाई खिला रहा है, कोई रो रहा है—एक भयावह खौफ से आज़ादी मिली है भाई! गांवों और मोहल्लों के क्लब सूने पड़े हैं, कैरम बोर्ड शांत हैं, अड्डेबाज़ी का स्वरूप बदल गया है। अब 'चा खाबो होच्छे ना' (चाय पीना नहीं हो रहा), बल्कि 'जय श्री राम' या 'राम-राम' के संबोधन आम हो गए हैं। इतनी जल्दी यह सब साक्षात होगा, यह तो सोच से परे था।


पुरानी पार्टी के गुंडों और नेताओं ने राज्य की सीमाओं पर जो अवैध टोल बूथ बना रखे थे, जहां से बंगाल आने वाली हर छोटी-बड़ी गाड़ी से दीदी की सरकार और पुलिस की मिलीभगत से टैक्स वसूला जाता था—वे सब के सब रातों-रात बंद हो गए। क्या वाकई सब के सब? हां भाई, सब के सब! अविश्वसनीय! यह तो कई सौ करोड़ का सालाना धंधा था जो मिट्टी में मिल गया।


कुछ लोगों ने तो मौका देखकर अपने घरों की रंगाई-पुताई भी शुरू कर दी है, क्योंकि अब उन्हें पार्टी वालों को कोई 'रंगदारी टैक्स' नहीं देना पड़ेगा। कुछ ने मकान का कंस्ट्रक्शन इस भरोसे के साथ शुरू कर दिया है कि अब वे अपनी मर्जी के ब्रांड और दुकान से सीमेंट-सरिया खरीद सकते हैं। बालू और गिट्टी भी मनचाहे सप्लायर से आएगी। क्या सचमुच सिंडिकेट राज चला गया? लग तो रहा है, पर भरोसा नहीं होता।


लेकिन मन में एक बड़ी शंका और व्यंग्यात्मक कौतूहल उठता है कि यह सिंडिकेट राज इतनी आसानी से ध्वस्त कैसे हो सकता है? और कब तक ऐसा रहेगा? तोलाबाजी कैसे खत्म हो सकती है? अगर यह सब खत्म हो गया, तो क्या बंगाल में वाकई कोई सरकार बची है? सरकार होने का औचित्य ही क्या रह जाता है यदि वहां कट-मनी सिस्टम न हो, तोलाबाजी न हो, सिंडिकेट न हो? आखिर सरकार के अस्तित्व में होने का अहसास हमें कैसे होगा दादा? हम कैसे भरोसा कर लें?


अब आप कहीं भी दुकान खोल सकते हैं, कोई भी बिजनेस शुरू कर सकते हैं। अपनी टैक्सी, ऑटो, टोटो या रिक्शा चला सकते हैं। लॉरी से ट्रांसपोर्ट का धंधा कर सकते हैं। किराने या चाय-समोसे की दुकान खोल सकते हैं—वह भी बिना किसी पार्टी ऑफिस के चक्कर काटे, बिना मेंबर बने और बिना कोई कमीशन दिए! सब कुछ संभव दिख रहा है। अब आपके परिवार के झगड़े पार्टी ऑफिस के गुंडे नहीं सुलझाएंगे, पुलिस वाले पार्टी की संस्तुति का इंतज़ार नहीं करेंगे, अस्पतालों में भर्ती के लिए पार्टी की पैरवी नहीं लगेगी, और वैक्सीन की वेटिंग लिस्ट भी पार्टी के आका तय नहीं करेंगे। 'लक्खी भंडार' या 'स्वास्थ्य साथी' के लिए अब किसी पार्टी का ठप्पा होना ज़रूरी नहीं रहा। हम पूरे बंगाल में अपनी ज़मीन बेच पाएंगे और घर खरीद पाएंगे। हां, कहीं भी! पार्टी के लोग हमें अपनी ही संपत्ति औने-पौने दाम में बेचने को विवश नहीं कर पाएंगे। लेकिन जब यह सब खत्म हो जाएगा, तो हमें पता कैसे चलेगा कि यहाँ किसी पार्टी की सरकार है? यह अराजकता की स्थिति से कैसे बेहतर होगी दादा?


सुनते हैं कि अब हम कार्टून भी बना पाएंगे और चुटकुलों को ट्विटर पर ट्वीट भी कर पाएंगे—वह भी खुलेआम सरकारी अधिकारियों और शुभेंदु अधिकारी की आलोचना करते हुए! बलात्कारी अब धर-पकड़ लिए जाएंगे, बच नहीं पाएंगे। थानों में शिकायत करने पर पुलिस अब पार्टी से पूछे बिना सीधे आपके घर आ जाएगी।


यकीनन, पीड़ित जनता की आशाएं नई सरकार और शुभेंदु अधिकारी से बहुत ज्यादा हैं, जिन पर बरसों अत्याचार हुए और फर्जी केस लादे गए। उनके ये केस कैसे हटेंगे? जो लोग टीएमसी के मेंबर नहीं थे और बरसों तक लक्खी भंडार, राशन और स्वास्थ्य साथी के लाभ से वंचित रहे, उन्हें नए मुख्यमंत्री कैसे मुआवजा देंगे? इन्हें शीघ्र संतुष्ट करना होगा, अन्यथा विक्षुब्धों का एक नया और विशाल वर्ग तैयार होने में देर नहीं लगेगी। सबसे बड़ी चुनौती इस नई सरकार के सामने यही होगी कि गुंडों, दलालों, तोलाबाजों और सिंडिकेट को किसी भी सूरत में बीजेपी में एंट्री करने से रोकना होगा, क्योंकि यह पब्लिक है, सब जानती है और बड़ी चौकन्नी होकर देख रही है।


यह एक नया विहान तो है, लेकिन मन फिर भी आशंकित है। यदि समाज में कोई भय ही न हो, तो कानून पर भरोसा कैसे होगा? शासन को अब कानून का भय पैदा करना होगा, गुंडों का नहीं। हम तो अब भी आशंकित हैं दादा, भला यह भी कोई सरकार है? हमें तो व्यवस्था पर भरोसा करने के लिए कोई न कोई भय चाहिए ही चाहिए, तभी तो यकीन होगा कि हुकूमत चल रही है!


अमर नाथ ठाकुर, 17 नई, 2026, कोलकाता।

Wednesday, 6 May 2026

बंगाल: एक व्यवस्था का अवसान और अनिश्चित भविष्य की दहलीज

बंगाल: एक व्यवस्था का अवसान और अनिश्चित भविष्य की दहलीज

पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव परिणाम केवल एक राजनीतिक दल की हार और दूसरे की जीत नहीं हैं, बल्कि यह एक सड़ी-गली व्यवस्था के विरुद्ध जनता के संचित आक्रोश का परिणाम है। पिछले पंद्रह वर्षों से बंगाल जिस घुटन भरे वातावरण में जी रहा था, वहां बदलाव की छटपटाहट तो थी, लेकिन उस अभिव्यक्ति पर 'भय' का कड़ा पहरा था। इस बार का 5% का वोट अंतर और निर्णायक जनादेश यह साबित करता है कि जब भय का तंत्र टूटता है, तो लोकतंत्र अपनी पूरी शक्ति के साथ पुनर्जीवित होता है।

बंगाल के इस महापरिवर्तन का सबसे बड़ा और अदृश्य कारण रहा—'फर्जी वोटिंग' और 'छप्पा वोट' का पूर्णतः समाप्त होना , साथ ही भय और धमकी के वातावरण से मुक्त हो बंगाल की जनता का निर्बाध वोट के लिए आक्रोशित हो बाहर आना। दशकों से बंगाल की चुनावी राजनीति में गुंडागर्दी और छप्पा वोटिंग एक दस्तावेजी सच भले न बन पाए हों, लेकिन वहां रहने वाला हर नागरिक इस सच्चाई का भुक्तभोगी रहा है। इस बार चुनाव आयोग ने ढाई लाख केंद्रीय बलों के माध्यम से उस 'भय के वातावरण' को सोख लिया। जब बंगाल पुलिस को निष्क्रिय कर संवेदनशील क्षेत्रों से हटाया गया और टीएमसी के दबंगों पर त्वरित कार्रवाई हुई, तब जाकर वह मतदाता घर से बाहर निकल सका, जिसे बरसों से वोट देने से रोका जा रहा था।

परिवर्तन की इस पटकथा के केंद्र में बंगाल का 'भद्रलोक' और उसकी अस्मिता रही। संदेशखाली की अमानवीय घटनाओं ने बंगाल के अंतर्मन को झकझोर दिया था, तो आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की नृशंस घटना ने शहरी समाज को विचलित कर दिया। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का मुद्दा सरकार की 'लक्खी भंडार' जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर भारी पड़ गया। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि विकास और सहायता तब तक बेमानी हैं जब तक सुरक्षा का अभाव है।

समाज में बढ़ता अविश्वास और ध्रुवीकरण भी इस परिणाम की एक बड़ी वजह बना। पिछले पंद्रह वर्षों के 'मुस्लिम तुष्टीकरण' ने हिंदू समाज में असुरक्षा की भावना भर दी थी। मुस्लिम समुदाय का रणनीतिक रूप से एकमुश्त वोट करना और सनातनी परंपराओं—जैसे पूजा-पाठ और विसर्जन—में प्रशासनिक अड़चनें पैदा करना, अंततः हिंदुओं के एकत्रीकरण का कारण बना। मौलवियों को सरकारी भत्ते और मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में हिंदुओं का लक्षित उत्पीड़न ऐसे मुद्दे थे, जिन्होंने शांत रहने वाले बंगाली समाज को भी वैचारिक रूप से उद्वेलित कर दिया।

शासन के हर स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार ने इस आग में घी का काम किया। शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, कोयला और मवेशी तस्करी ने सरकार की नैतिक साख को खत्म कर दिया था। बंगाल में स्थिति ऐसी थी कि बिना 'तोलाबाजी' (जबरन वसूली) के एक ईंट भी नहीं रखी जा सकती थी। चाहे घर बनाना हो या छोटा-मोटा व्यापार करना हो, सिंडिकेट को पैसा देना अनिवार्य था। यहां तक कि महामारी के दौरान वैक्सीन लगवाने जैसे बुनियादी हक के लिए भी टीएमसी की सूचियों पर निर्भर रहना पड़ता था। व्यवस्था की यह सड़ांध इतनी गहरी थी कि व्यक्ति के पास दो ही विकल्प थे—या तो अपनी विचारधारा की तिलांजलि देकर सत्ता के आगे आत्मसमर्पण कर दो या फिर हर कदम पर प्रताड़ित होते रहो।

आज टीएमसी का सफाया हो चुका है और बंगाल की जनता जेल से छूटे किसी कैदी की तरह 'राहत' महसूस कर रही है। लेकिन इस राहत के साथ एक गहरा संदेह और भय भी जुड़ा है। बंगाल का इतिहास रहा है कि जब भी सत्ता बदलती है, तो पुराने दल के गुंडे, तोलाबाज और सिंडिकेट रातों-रात नए झंडे थाम लेते हैं। जो कल तक टीएमसी के झंडे ढो रहे थे, वे आज कमल का झंडा लेकर बदलाव के सिपाही बन रहे हैं।

यही बंगाल की सबसे बड़ी विडंबना है। क्या यह परिवर्तन केवल झंडे का है या व्यवस्था का? क्या रामकृष्ण, विवेकानंद और सुभाष चंद्र बोस की यह पावन धरती अपने 'प्रारब्ध' के कुचक्र से निकल पाएगी? डर है कि कहीं कुछ महीनों के बाद बंगाल फिर उसी पुराने ढर्रे पर न लौट आए, जहां केवल चेहरा नया हो और अत्याचार वही पुराना। बंगाल को आज 'स्वच्छंद' होने के साथ-साथ 'स्वच्छ' होने की भी उतनी ही आवश्यकता है।

अमर नाथ ठाकुर, 6 मई, 2026, कोलकाता।


Friday, 31 October 2025

बिहार की शराबबंदी: एक संकट/ भ्रष्टाचार का एक नया अध्याय?

बिहार की शराबबंदी: एक संकट/ भ्रष्टाचार का एक नया अध्याय?

बिहार में वर्षों से शराबबंदी लागू है। इस निर्णय के कारण बिहार सरकार को शराब उद्योग और शराब बिक्री से मिलने वाले टैक्स की सैकड़ों करोड़ की आमदनी से हाथ धोना पड़ा। सरकार ने यह कदम इस उद्देश्य से उठाया था कि समाज में शराब से फैल रही बुराइयों को दूर किया जा सके और बिहारी जनमानस का नैतिक स्तर ऊँचा उठे। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हुआ? आइए, इसका यथार्थ मूल्यांकन करें।

वास्तविकता यह है कि यह उद्देश्य लगभग विफल रहा। बिहार एक लैंडलॉक्ड राज्य है, जो नेपाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल से घिरा हुआ है — और इन सभी जगहों पर शराब की खुली बिक्री है। भारत के किसी राज्य से दूसरे राज्य में जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, और नेपाल के साथ भी आवाजाही लगभग बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के होती है। ऐसे में बिहार के लोग आसानी से इन सीमावर्ती क्षेत्रों या नेपाल जाकर शराब का सेवन कर लेते हैं।

सीमा के पास रहने वालों को तो कोई कठिनाई नहीं होती, वे पास के प्रदेशों में जाकर पीकर लौट आते हैं। शुरुआत में जो लोग बिहार के भीतर दूरवर्ती इलाकों में रहते थे, उन्हें थोड़ी दिक्कत हुई। रोज-रोज यात्रा करना संभव नहीं था, तो वे सप्ताह में एक या दो बार जाकर यह “जरूरत” पूरी करने लगे। लेकिन गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लोगों के लिए यह स्थिति बड़ी कठिन बन गई। उनके सामने तो जैसे संकट खड़ा हो गया — करें तो क्या करें?

जैसा कि कहा गया है — “आवश्यकता आविष्कार की जननी है।” लोगों ने जल्दी ही इसका समाधान भी खोज लिया। उपकरण का नहीं, बल्कि उपाय का आविष्कार हुआ। गाँवों में स्थानीय तौर पर शराब बननी शुरू हो गई। चावल को सड़ाकर, संथाल आदिवासियों के पारंपरिक तरीकों से देशी शराब तैयार की जाने लगी। आज स्थिति यह है कि बिहार के लगभग हर गाँव और हर शहर में यह लोकल शराब चोरी-छिपे बन रही है, बिक रही है और सेवन की जा रही है।

इतना ही नहीं, विदेशी और ब्रांडेड शराब की भी कोई कमी नहीं है। काला धंधा फल-फूल रहा है। दूसरे राज्यों और नेपाल से अवैध सप्लाई चेन हर गली-मोहल्ले तक फैली है। बोतलें और पाउच प्लास्टिक थैलियों में छिपाकर पहुँचाई जाती हैं। घर घर व्यक्ति व्यक्ति के पास मोबाइल फोन की उपलब्धता ने इस मांग और पूर्ति की प्रक्रिया को काफी आसान कर दिया है। निश्चित रूप से इनके दाम ज़्यादा हैं, क्योंकि “कानून से बचकर” मिलने की कीमत भी इनमें शामिल है। वर्षों में यह अवैध कारोबार बिहार में एक प्रकार के कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है।

हजारों युवा इस धंधे में जुड़ चुके हैं। बेरोजगारी की पीड़ा भुलाकर वे इस “नए रोजगार” से आमदनी कमा रहे हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सरकार के मंत्री, विपक्ष के नेता, अधिकारी और पुलिस — सबको इन गतिविधियों की पूरी जानकारी है। ये सारे कार्य पुलिस के संरक्षण में हो रहे हैं, क्योंकि यही अब भ्रष्टाचार से आमदनी का सबसे बड़ा स्रोत बन गया है।

नीतीश कुमार ने शराबबंदी को निश्चय ही एक अच्छी और नैतिक सोच के साथ लागू किया था, परंतु उसका उद्देश्य पूरा नहीं हो सका। उल्टे, इसने बिहार के युवाओं को काला बाज़ारी, अवैध धंधे और भ्रष्टाचार के नए गुर सिखा दिए।

वास्तव में शराबबंदी किसी भी राज्य में व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। राज्यों के बीच खुली आवाजाही को बंद नहीं किया जा सकता। ऐसे में शराबबंदी जैसे कानून सिर्फ भ्रष्टाचार और अवैध कमाई के नए रास्ते खोल देते हैं। इससे पुलिस और प्रशासन की “अतिरिक्त आमदनी” के अवसर बढ़ते हैं, पर समाज के नैतिक स्तर में गिरावट आती है।

बिहार में इस नीति ने युवाओं के नैतिक पतन को और तेज किया है। सामाजिक ताने-बाने को कमजोर किया है। संस्कृति को दूषित किया है। असभ्यता और अपराध को बढ़ाया है। समाजशास्त्रियों के लिए यह अध्ययन का विषय हो सकता है कि शराबबंदी के बाद बिहार में अपराध की दर में किस प्रकार की वृद्धि हुई। शराब की बिक्री, तस्करी और सेवन से जुड़े अपराधों की संख्या में तो उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई ही है।

दुखद यह भी है कि शराबबंदी से निम्न और निम्न-मध्यम वर्ग की महिलाओं की पीड़ा कम नहीं हुई। पियक्कड़ों की घरेलू हिंसा, कलह और उत्पीड़न की समस्या पहले जैसी ही बनी हुई है।

अब जबकि बिहार फिर चुनाव की दहलीज पर है, यदि नीतीश सरकार पुनः सत्ता में आती है, तो उसे चाहिए कि इस शराबबंदी नीति पर गंभीर पुनर्विचार करे। जन सुराज जैसे दलों का मत इस पर स्पष्ट है, और महागठबंधन के दलों को भी इस ज्वलंत सामाजिक समस्या पर शीघ्र सोचकर ठोस कदम उठाने चाहिए — इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।

अमर नाथ ठाकुर, 31 अक्तूबर, 2025, कोलकाता।

धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन...