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Sunday, 18 October 2026

कोलकाता में आंसुओं के बीच बहता आस्था का प्रवाह

 कोलकाता में आंसुओं के बीच बहता आस्था का प्रवाह

बारिश की अप्रत्याशित फुहारें और उसके बाद मची अफरा-तफरी ने कोलकाता के उत्सव की धड़कनों को एक पल के लिए थाम दिया। 19 जिंदगियों का असमय चले जाना और दर्जनों का घायल होना हर शहरवासी के सीने में एक गहरी टीस छोड़ गया है। चारों ओर एक गमगीन सन्नाटा है, एक ऐसा सन्नाटा जिसकी मिसाल पिछले तीन चार दशकों में शायद ही कभी हमने देखी सुनी हो।

कोलकाता की दुर्गा पूजा सिर्फ एक त्योहार नहीं, एक जीवंत नदी है। यहाँ सड़कें संकरी हैं, पंडालों में जगह सीमित है और सामने इंसानों का असीम समंदर। इसके बावजूद, इस शहर की पहचान रही है इसका अनुशासन, इसका सहज प्रवाह और एक अनकही तारतम्यता। लाखों की भीड़ में बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और पुरुष एक साथ एक ही लय में बहते हैं। कोई शाम की चकाचौंध और भीड़ से बचने के लिए देर रात निकलता है, तो कोई भोर के शांत अंधेरे में पंडालों की भव्यता निहारने पहुंचता है। दिन हो या रात, यहाँ कोई भी समय खाली नहीं रहता। पंचमी से लेकर दशमी तक हिंदू, मुस्लिम, ईसाई—हर धर्म, हर उम्र का इंसान सड़कों पर उतरकर इस शहर को एक बड़े उत्सव में तब्दील कर देता है।

पंडालों की कारीगरी, रोशनी का सम्मोहन और वातावरण में गूंजती वीरेंद्रकृष्ण भद्र की चिरपरिचित आवाज; चंडी पाठ के सुर हर हृदय की तंत्री को झंकृत कर देते हैं। इस शहर की ऊर्जा अद्वितीय है, जो किसी को भी अपने आगोश में ले लेती है।

कल की हृदय विदारक घटना ने निश्चय ही हम सभी को झकझोर दिया है। हर आंख नम है और हर मन भारी। जिन अपनों को माँ दुर्गा ने असमय अपने चरणों में समेट लिया, प्रार्थना है कि माँ उनकी आत्मा को शांति और सद्गति प्रदान करें और उनके परिजनों को यह असह्य पीड़ा सहने का संबल दें।

कोलकाता सिसक रहा है, मगर यह शहर ठहरना नहीं जानता। शोक की गहरी उदासी के बावजूद, यह आस्था, संगीत और आत्मीयता की भूमि है। गम के आंसुओं को पोंछते हुए कोलकाता आज शाम फिर माँ के जयकारों और ढाक की थाप के साथ धीरे-धीरे अपने उसी चिर-परिचित प्रवाह में बहने को तैयार होगा—क्योंकि आस्था यहाँ का विश्वास है, और आगे बढ़ते रहना इस शहर का मिजाज।


अमर नाथ ठाकुर, 18 अक्टूबर, 2026, कोलकाता

Saturday, 17 October 2026

 बिहार की शराबबंदी: सुधार की नीति नहीं संगठित अपराध और ड्रग्स के नये संकट का द्वार

तीन-चार दिनों के बिहार प्रवास से लौटने के बाद मन में जो पीड़ा और बेचैनी उपजी है, उसे साझा करना और सत्ता प्रतिष्ठान के कानों तक पहुँचाना बेहद आवश्यक जान पड़ता है।

वर्षों पहले जब बिहार में शराबबंदी लागू हुई थी, तब नीतीश कुमार जी की मंशा शायद समाज सुधार और नैतिक उत्थान की रही होगी। किंतु आज का जमीनी यथार्थ यह है कि यह नीति पूरी तरह औंधे मुंह गिर चुकी है। शराब की दुकानों के शटर जरूर गिरे, लेकिन समानांतर रूप से एक ऐसा अवैध कुटीर उद्योग खड़ा हो गया जो अब बिहार के सामाजिक ताने-बाने को भीतर से खोखला कर रहा है।

सच्चाई यह है कि शराब बंद नहीं हुई, केवल उसकी उपलब्धता का स्वरूप बदल गया। चारों तरफ से अन्य राज्यों और नेपाल से घिरे बिहार में शराब की कोई कमी नहीं है। मोबाइल पर एक कॉल या संदेश के जरिए गली-मोहल्लों और घर-घर तक डिलीवरी हो रही है—चाहे वह गांवों में बनने वाली कच्ची महुआ-देशी शराब हो या महंगी ब्रांडेड बोतलें।

इस नीतिगत विफलता का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इसने अपराध का 'लोकतंत्रीकरण' कर दिया है। हजारों बेरोजगार किशोर और युवा आज शराब की तस्करी और ढुलाई को अपना रोजगार मान चुके हैं। जिन हाथों में किताबें, हुनर या तकनीकी औजार होने चाहिए थे, वे अवैध धंधों के जरिए आसान कमाई और अपराध की दुनिया में धकेल दिए गए हैं।

और अब, इस संकट ने एक और भयानक रूप ले लिया है—ड्रग्स का फैलता जाल। शराबबंदी की आड़ में बिहार के सीमावर्ती इलाकों और कस्बों में स्मैक, हेरोइन और नशीली दवाओं का कारोबार तेजी से पैर पसार रहा है। युवा वर्ग इस जानलेवा लत की गिरफ्त में आ रहा है, जिसके चलते राहजनी, मोबाइल छिनतई और चोरी जैसी घटनाएं रोजमर्रा का हिस्सा बन चुकी हैं। यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो बिहार को 'उड़ता पंजाब' बनने में देर नहीं लगेगी।

बिहार सरकार ने शराब उद्योग और बिक्री से मिलने वाले हजारों करोड़ रुपये के वैध राजस्व को तो खो दिया, लेकिन यह पूरा पैसा पुलिस और माफिया तंत्र के गठजोड़ की जेबों में भ्रष्टाचार बनकर जमा हो रहा है। अदालतों और जेलों में छोटे-मोटे गरीब और मजदूर बंद होते होंगे, जबकि असली सिंडिकेट बेखौफ फल-फूल रहा है।

अब जबकि बिहार में सत्ता के समीकरण नए दौर में हैं और सरकार का नेतृत्व सम्राट चौधरी जी के हाथों में है, तो क्या इस हठधर्मिता को त्यागने का समय नहीं आ गया है? किसी भी सरकार की परिपक्वता इसमें होती है कि वह जमीनी यथार्थ को स्वीकार करे, न कि कागजी आंकड़ों और उपदेशों की आड़ में पूरी पीढ़ी को अपराध और नशे की गर्त में धकेले।

बिहार को खोखले नारों की नहीं, एक व्यावहारिक, पारदर्शी और सख्त नियमन वाली आबकारी नीति की जरूरत है। सरकार को अपनी आंखें खोलनी ही होंगी—इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।

अमर नाथ ठाकुर, 17 अक्तूबर, 2026, कोलकाता।


Friday, 16 October 2026

डिजिटल इंडिया' में भारतीय रेल: क्या GPS सिर्फ कागज़ों पर है या डेटा में हेरफेर सिस्टम की मजबूरी है


'डिजिटल इंडिया' में भारतीय रेल: क्या GPS सिर्फ कागज़ों पर है या डेटा में हेरफेर सिस्टम की मजबूरी है?

हाल ही में ट्रेन संख्या 03185/03186 (मधुबनी-कोलकाता स्पेशल) से यात्रा के दौरान एक ऐसा अनुभव हुआ, जिसने रेलवे के आधुनिकीकरण, RTIS (GPS ट्रैकिंग) और यात्री सेवा तंत्र के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

यह केवल कुछ घंटों की देरी का मामला नहीं है, बल्कि सिस्टम की पारदर्शिता, झूठी सूचनाओं और बुनियादी सुविधाओं के अभाव का एक स्पष्ट केस स्टडी है।

GPS और RTIS के दौर में 'मैनुअल टाइम-टैंपरिंग' का खेल होता है क्या ?

रेलवे का दावा है कि ट्रेनों को इसरो समर्थित RTIS (Real-Time Train Information System) और GPS डिवाइसेस से ट्रैक किया जा रहा है। यदि ऐसा है, तो 139 और रेल इन्क्वायरी पोर्टल पर ट्रेनों की स्थिति में सेकंड-दर-सेकंड अंतर क्यों आता है?

केस स्टडी का वास्तविक डेटा:

  • 139 इन्क्वायरी का पहला अपडेट: ट्रेन संख्या 03185 दोपहर 12:53 बजे बरौनी से रवाना हुई और 13:35 बजे समस्तीपुर पहुंचेगी।
  • 14:15 बजे की स्थिति: जब ट्रेन का दोबारा स्टेटस देखा गया, तो सिस्टम ने बताया कि ट्रेन 13:58 बजे बरौनी से खुली है।
  • 139 इंक्वायरी का अगला एक और अपडेट: ट्रेन संख्या 03186 मधुबनी से 18.55 बजे रवाना होगी और सकरी 19.06 बजे पहुंचेगी।
  • फिर 139 इंक्वायरी का अगला अपडेट: ट्रेन 03186 मधुबनी से खुल चुकी है और सकरी 19.14 बजे पहुंचेगी।
  • बाद में सिर्फ 17 किलोमीटर दूर सकरी पहुंचती है यह ट्रेन 20.45 बजे, लेकिन इंक्वायरी 139 और विभिन्न लाइव पोर्टल सुनाता रहा/दिखाता रहा कम से कम 20.15 तक कि ट्रेन 03186 19.03 बजे मधुबनी से खुल चुकी है और सकरी में 19.14 बजे पहुंचने की संभावना है।

एक ट्रेन स्टेशन से 12:53 बजे भी खुलती है और बाद में उसी स्टेशन से खुलने का समय 13:58 दिखा दिया जाता है। दूसरी ट्रेन जो संभवतः 20.15 मधुबनी से खुलती है ,पहले भी 19.03 बजे कैसे खुल गई हो सकती है । वजह साफ है कि सिस्टम में डेटा ऑटोमैटिक GPS से नहीं, बल्कि लेटलतीफी और डिविजनल नाकामी को छुपाने के लिए मैनुअली अपडेट और टेंपर किया जा रहा है। जब डेटा ही मनगढ़ंत दर्ज होगा, तो आम यात्री किस आधार पर अपनी यात्रा की योजना बनाए?

'स्पेशल ट्रेन' उपेक्षा की शिकार ट्रेन होती है ?

त्योहारों और भीड़ के समय चलने वाली स्पेशल ट्रेनों का किराया सामान्य से अधिक होता है, लेकिन सुविधाएं किसी साधारण पैसेंजर गाड़ी से भी बदतर:

  • डेढ़ गुना समय: सकरी से कोलकाता की जो दूरी सामान्य ट्रेनें 12–14 घंटे में तय करती हैं, 03186 के टाइम-टेबल और चाल के अनुसार उसे 19+ घंटे लग रहे हैं।
  • बंचिंग का बहाना: रेलवे का आधिकारिक जवाब आता है कि "ट्रेन पिछली डिविजन से लेट मिली और बंचिंग के कारण रुकी है।" सवाल यह है कि यदि आपके पास ट्रैक कैपेसिटी और ट्रैफिक मैनेजमेंट का ब्लूप्रिंट नहीं है, तो बिना तैयारी के स्पेशल ट्रेनें चलाकर यात्रियों का समय बर्बाद क्यों किया जा रहा है?

बुनियादी सुविधाओं का अभाव (ट्रेन 03186 का हाल)

  • AC की स्थिति: ट्रेन काकरघाटी स्टेशन पर एक घंटे से अधिक समय तक खड़ी रही, लेकिन कोच (B2) का AC पूरी तरह बंद रहा। यात्रियों को बताया गया कि जब तक ट्रेन चलेगी नहीं, AC काम नहीं करेगा। बंद खिड़की-दरवाजों वाले कोच में यात्री कैसे सफर करें?
  • पानी की किल्लत और लीकेज: कई स्टेशनों तक B2 कोच में पानी नहीं था। वहीं दूसरी ओर टॉयलेट लॉबी की छत से लगातार पानी टपक रहा था।

 'प्रक्रिया' के नाम पर शिकायत का भटकाव

सोशल मीडिया पर जब पूरे सिस्टम की नाकामी (ट्रेक जाम, लेट रनिंग, गलत डेटा) उजागर की जाती है, तो रेलवे का स्टैंडर्ड ऑटोमेटेड जवाब आता है: "कृपया PNR और मोबाइल नंबर साझा करें।"

  • सवाल: क्या ट्रेन के आउटर पर घंटों खड़े रहने, AC बंद होने या 139 पर गलत डेटा प्रसारित होने की समस्या को सुलझाने के लिए एक यात्री के PNR की ज़रूरत है? यह समस्या ट्रेन और रूट-मैनेजमेंट की है, जिसे PNR के नाम पर व्यक्तिगत शिकायत बनाकर बंद करने की कोशिश की जाती है।

नीति-निर्माताओं और रेल प्रशासन से सीधे सवाल:

  1. डेटा की सत्यता: क्या जनता के सामने पेश किए जा रहे ऑन-टाइम परफॉर्मेंस (OTP) के आंकड़े वास्तविक हैं या 139/NTES में समय बदलकर कागज़ी रिकॉर्ड दुरुस्त किए जाते हैं?
  2. GPS की भूमिका: यदि लोकोमोटिव में GPS लगे हैं, तो पब्लिक डोमेन में अनएडिटेड और बिना मानवीय हस्तक्षेप वाला रियल-टाइम डेटा क्यों उपलब्ध नहीं कराया जाता?
  3. स्पेशल ट्रेनों की जवाबदेही: स्पेशल ट्रेनों को 'अवांछित' मानकर मुख्य ट्रैक से घंटों किनारे क्यों खड़ा किया जाता है?

रेल मंत्री @AshwiniVaishnaw जी और @PMOIndia से आग्रह है कि केवल हाई-स्पीड और प्रीमियम ट्रेनों के प्रचार तक सीमित न रहकर, साधारण व मध्यम श्रेणी की ट्रेनों, इन्क्वायरी सिस्टम की पारदर्शिता और बुनियादी यात्री सुविधाओं की जमीनी हकीकत की भी समीक्षा करें। यात्रियों को ऊंची-ऊंची बातें , हाई टेक बातें करके बरगला नहीं सकते हैं।


हमारा दर्जनों बार का अनुभव ऊपर  शेयर किए गए केस स्टडी में समाहित है। 

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अमर नाथ ठाकुर, 16 अक्टूबर, 2026, कोलकाता।

Tuesday, 21 July 2026

धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य


मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन, संस्कृति, पारिवारिक संस्कार, शिक्षा और सामाजिक अनुभवों से निर्मित होते हैं। यही विचार आगे चलकर समाज के चरित्र, उसकी नैतिकता, न्यायबोध, सहिष्णुता, वैज्ञानिक दृष्टि और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। इसलिए यदि हमें किसी सभ्यता को समझना हो, तो उसके धार्मिक और दार्शनिक आधारों को समझना आवश्यक है।


इतिहास बताता है कि कोई भी सभ्यता केवल आर्थिक समृद्धि से महान नहीं बनती। उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में निहित होती है कि वह सत्य की खोज, आत्मालोचना और परिवर्तन को कितना स्थान देती है। जहाँ प्रश्न पूछना सम्मान का विषय होता है, वहाँ ज्ञान का विस्तार होता है; जहाँ प्रश्न पूछना अपराध बन जाता है, वहाँ विचार धीरे-धीरे जड़ होने लगते हैं।


इसी संदर्भ में विश्व के प्रमुख धर्मों और उनके ग्रंथों पर विचार करना स्वाभाविक है। भारतीय परंपरा में वेदों को श्रुति माना गया है और उनका संरक्षण अत्यंत अनुशासित मौखिक परंपरा से हुआ। अनेक विद्वान मानते हैं कि इस कारण उनका मूल पाठ उल्लेखनीय रूप से सुरक्षित रहा। दूसरी ओर मनुस्मृति, रामायण, महाभारत तथा अनेक स्मृति-ग्रंथों की विभिन्न पांडुलिपियों में पाठभेद पाए गए हैं, जिनका अध्ययन आधुनिक पाठालोचना का विषय है।


कुरान के संबंध में इस्लामी परंपरा का विश्वास है कि वह ईश्वर का अंतिम और अक्षुण्ण वचन है। ऐतिहासिक अध्ययन यह भी बताते हैं कि उसका संकलन पैग़म्बर मुहम्मद के जीवनकाल के बाद प्रारंभिक इस्लामी काल में हुआ और बाद में उसका मानक पाठ स्थापित किया गया। ये संकलन पैगम्बर ने नहीं किया या उनके जीवन काल में भी नहीं हुआ। अधिकांश इतिहासकार वर्तमान कुरान को अत्यंत स्थिर पाठ मानते हैं, जबकि कुछ प्रारंभिक पांडुलिपियों और पाठभेदों पर अकादमिक शोध भी चलता रहा है। इस विषय में धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक अध्ययन की अपनी-अपनी सीमाएँ हैं। कुछ अत्यन्त आपत्तिजनक आयतों पर इस्लामिक विद्वानों की एक राय भी कभी नहीं हो पाई क्योंकि यहां स्वतंत्र विमर्श की व्यवस्था का अभाव ही शायद क्या इसका एक मुख्य कारण तो नहीं ?


ईसाई परंपरा का इतिहास भी परिवर्तन का उदाहरण प्रस्तुत करता है। एक समय चर्च और विज्ञान के बीच गंभीर मतभेद रहे; गैलीलियो का प्रसंग इसका प्रतीक माना जाता है। बाद के काल में यूरोप में पुनर्जागरण, सुधार आंदोलन और प्रबोधन के प्रभाव से धार्मिक व्याख्याओं में परिवर्तन आया तथा विज्ञान और स्वतंत्र चिंतन को व्यापक स्थान मिला। इससे यह संकेत मिलता है कि धार्मिक परंपराएँ समय के साथ अपने भीतर परिवर्तन की क्षमता भी विकसित कर सकती हैं।


भारतीय दार्शनिक परंपरा की एक उल्लेखनीय विशेषता उसकी बहुलता रही है। वेदांत, सांख्य, योग, न्याय, मीमांसा, बौद्ध, जैन और चार्वाक जैसे भिन्न-भिन्न मत एक ही बौद्धिक वातावरण में विकसित हुए। शास्त्रार्थ की परंपरा ने असहमति को भी विचार-विमर्श का विषय बनाया। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उसकी बौद्धिक उदारता रही है। भारत में विचारों का संघर्ष तलवार से नहीं, तर्क से हुआ। "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" और "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" जैसे सूत्र इस खुले बौद्धिक वातावरण का परिचय देते हैं।यह भारतीय सभ्यता की एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक धरोहर है। और इस तरह यह भारतीय परम्परा बहुत ही प्रशंसा के योग्य बन जाती है।


इसके साथ ही यह भी स्वीकार करना होगा कि आधुनिक विश्व में धार्मिक कट्टरता और उसके सामाजिक परिणामों को लेकर गंभीर प्रश्न उठे हैं। अल-कायदा, आईएसआईएस, बोको हराम, लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों ने इस्लाम की अपनी व्याख्या के आधार पर हिंसा को उचित ठहराने का प्रयास किया। दूसरी ओर अनेक मुस्लिम विद्वानों और संगठनों ने भी इन व्याख्याओं का विरोध किया और उन्हें इस्लाम की मूल भावना के विरुद्ध बताया, लेकिन ये विरोध क्या उस स्तर तक दर्ज हुआ जिस स्तर तक होना चाहिए था? वैसे ही यह आवश्यक है कि कट्टरपंथी विचारधारा और पूरे धार्मिक समुदाय के बीच अंतर किया जाए।


यह भी एक तथ्य है कि कुछ मुस्लिम-बहुल देशों में महिलाओं के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म परिवर्तन तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बहस होती रही है। वहीं दूसरी ओर अनेक ऐसे देश भी हैं जहाँ सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ अलग हैं। इसी प्रकार किसी भी धर्म या सभ्यता का मूल्यांकन करते समय केवल उसकी आदर्श शिक्षाओं से नहीं, बल्कि उसके अनुयायियों के वास्तविक सामाजिक व्यवहार से भी सीखने की आवश्यकता होती है।


किसी समाज में अपराध, हिंसा, स्त्रियों की स्थिति, अल्पसंख्यकों के अधिकार, शिक्षा का स्तर और वैज्ञानिक प्रगति—ये सभी उस समाज के चरित्र के महत्वपूर्ण संकेतक हैं। परंतु इनका कारण केवल धर्म नहीं होता, लेकिन मानना होगा कि धर्म का इसमें रोल कमतर नहीं आंका जा सकता। शासन व्यवस्था, कानून का राज, शिक्षा, आर्थिक अवसर, इतिहास, युद्ध, औपनिवेशिक अनुभव और सामाजिक संस्थाएँ भी बहुत प्रभाव डालती हैं। इसलिए किसी भी जटिल सामाजिक समस्या का उत्तर केवल एक कारण में ढूँढ़ना उचित नहीं होगा।


धर्म का मूल्यांकन अंततः इस आधार पर होना चाहिए कि वह अपने अनुयायियों में कौन-से गुण विकसित करता है—करुणा या क्रूरता, सहिष्णुता या असहिष्णुता, जिज्ञासा या अंधानुकरण, संवाद या हिंसा, आत्मालोचना या जड़ता। यदि किसी धार्मिक व्याख्या का उपयोग आतंकवाद, घृणा या अन्याय को उचित ठहराने के लिए किया जाता है, तो उसकी आलोचना आवश्यक है। उसी प्रकार यदि किसी धर्म में सुधारवादी विचार, खुला विमर्श और पुनर्व्याख्या की परंपरा विकसित होती है, तो उसे भी स्वीकार ही नहीं करना चाहिए, बढ़ावा भी देना चाहिए।


अंततः किसी सभ्यता का भविष्य केवल उसके धार्मिक ग्रंथों से निर्धारित नहीं होता, बल्कि इस बात से निर्धारित होता है कि वह अपने ग्रंथों को कैसे समझती है, उनकी व्याख्या कैसे करती है और बदलते समय के साथ सत्य, न्याय और मानव गरिमा के प्रश्नों का उत्तर किस प्रकार देती है। इतिहास का अनुभव यही बताता है कि वे सभ्यताएँ अधिक स्थायी और सृजनशील सिद्ध हुई हैं जिन्होंने श्रद्धा और विवेक, परंपरा और परिवर्तन, आस्था और तर्क—इन सबके बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया।


अमर नाथ ठाकुर, 21 जुलाई, 2026, कोलकाता।

Tuesday, 30 June 2026

राम मंदिर की चोरी नहीं, यह पूरे तंत्र का आईना है


राम मंदिर की चोरी नहीं, यह पूरे तंत्र का आईना है



जहाँ धन होगा, वहाँ आकर्षण होगा; जहाँ आकर्षण होगा, वहाँ लालच भी जन्म लेगा। और जहाँ लालच होगा, वहाँ भ्रष्टाचार की संभावना भी बनी रहेगी। यही मानव स्वभाव है। इसलिए जब अयोध्या के राम जन्मभूमि मंदिर में दान-दक्षिणा से जुड़ी कथित चोरी की खबर सामने आई, तो मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। हाँ, दुःख अवश्य हुआ। दुःख इसलिए कि भगवान राम के नाम पर समर्पित श्रद्धा भी भ्रष्टाचार की इस महामारी से अछूती नहीं रह सकी।

वास्तविकता यह है कि भ्रष्टाचार आज भारतीय समाज की सबसे भयावह बीमारी बन चुका है। देश का शायद ही कोई कोना, कोई संस्था या कोई व्यवस्था इससे पूरी तरह मुक्त हो। हमारा तंत्र भीतर तक खोखला हो चुका है। इसे सुधारने में वर्षों नहीं, दशकों लगेंगे।

जब व्यवस्था के हर स्तर पर बेईमानी का विष फैल चुका हो, तब चोर ही चोर को पकड़ेगा, वही उसकी जाँच करेगा, वही आरोप-पत्र तैयार करेगा और वही उसे दंडित भी करेगा। ऐसी स्थिति में चोरी समाप्त नहीं होती, केवल चोर बदलते रहते हैं। तब समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह रह जाती है कि हम चोरों की तुलना करके यह तय करने लगते हैं कि उनमें सबसे छोटा चोर कौन है। वही हमें सबसे ईमानदार दिखाई देने लगता है।

समाचारों से ज्ञात हुआ कि राम मंदिर में दान-दक्षिणा के प्रबंधन का दायित्व ऐसे कर्मचारियों को सौंपा गया था, जिनका मासिक वेतन लगभग 12 से 20 हजार रुपये था। क्या आज के समय में इतनी आय पर कोई व्यक्ति अपने परिवार का सम्मानपूर्वक पालन-पोषण किसी शहर में कर सकता है? उत्तर सहज ही 'नहीं' में मिलेगा।

उनका दायित्व केवल रुपये गिनना और बैंक में जमा कराना नहीं था। वे करोड़ों रुपये की ईमानदारी के भी प्रहरी थे। उनसे अपेक्षा थी कि वे प्रतिदिन अपार धनराशि के बीच रहकर भी उसके प्रति तनिक भी आकर्षित न हों। प्रश्न यह है कि क्या हम उनकी इस ईमानदारी का मूल्य चुकाते हैं? उनके वेतन में उनके श्रम का मूल्य तो था, पर उस असाधारण चरित्र और आत्मसंयम का मूल्य कहाँ था, जिसकी हम उनसे अपेक्षा करते हैं?

यह तर्क चोरी का समर्थन नहीं है। चोरी किसी भी परिस्थिति में अपराध है। लेकिन यदि व्यवस्था ऐसे लोगों से असाधारण ईमानदारी की अपेक्षा करे, जिनका अपना जीवन आर्थिक संघर्षों से घिरा हो, तो यह व्यवस्था की कमजोरी अवश्य कही जाएगी। सार्वजनिक जीवन में तीन दशक से अधिक समय बिताने के बाद इतना अनुभव तो हो ही जाता है कि केवल नैतिक उपदेशों से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होता; उसके लिए ऐसी व्यवस्थाएँ भी बनानी पड़ती हैं, जिनसे प्रलोभन की संभावना न्यूनतम हो जाए।

इसीलिए मेरा मानना है कि यदि आज की व्यवस्था यथावत बनी रही, तो केवल अधिकारियों के चेहरे बदल देने से कुछ नहीं बदलेगा। चाहे पूरे प्रबंधन में वरिष्ठ IAS, IPS अथवा अन्य उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को ही क्यों न बैठा दिया जाए, भ्रष्टाचार की संभावना समाप्त नहीं होगी।

आप हजारों सीसीटीवी कैमरे लगा दीजिए, खुफिया कैमरों से हर कोना ढक दीजिए, निगरानी की हर आधुनिक व्यवस्था स्थापित कर दीजिए—फिर भी बेईमानी अपना नया रास्ता खोज लेगी। तकनीक अपराध को कठिन बना सकती है, असंभव नहीं।

कारण स्पष्ट है। समस्या व्यक्ति नहीं, व्यवस्था है। यदि राजनीति, प्रशासन, पुलिस और अन्य न्यायिक संस्थाओं में नैतिकता लगातार कमजोर होती जाए, तो किसी एक संस्था से पूर्ण पवित्रता की अपेक्षा करना यथार्थवादी नहीं होगा।

हाँ, भ्रष्टाचार को काफी हद तक कम अवश्य किया जा सकता है। दान-पेटियाँ पूरी तरह आधुनिक तकनीक से युक्त हों। उनमें लगे सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर प्रत्येक दान का तत्काल रिकॉर्ड तैयार करें। मशीन द्वारा दर्ज आँकड़ों का सप्ताह या पंद्रह दिन में एक बार भौतिक सत्यापन किया जाए।

गिनती करने वाले कर्मचारी बिना जेब वाले वस्त्र पहनकर ही प्रवेश करें। पूरी प्रक्रिया की लाइव रिकॉर्डिंग हो। बाहर निकलते समय उनकी अनिवार्य सुरक्षा जाँच हो। सीसीटीवी का रिकॉर्ड स्थायी रूप से सुरक्षित रखा जाए। श्रद्धालुओं को नकद के स्थान पर QR कोड, UPI, बैंक ट्रांसफर अथवा चेक के माध्यम से दान देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। सोना, चाँदी और अन्य बहुमूल्य दान का तत्काल डिजिटल पंजीकरण हो।

यदि संभव हो तो ऐसे प्रबंधन में त्याग और वैराग्य का जीवन जीने वाले संन्यासियों अथवा प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थाओं के सेवाभावी व्यक्तियों की भी भागीदारी हो सकती है। इससे चोरी पूरी तरह समाप्त भले न हो, पर उसकी संभावना अवश्य घट सकती है।

लेकिन यह मान लेना कि अयोध्या में राम मंदिर में भ्रष्टाचार का पूर्ण उन्मूलन हो जाएगा, शायद यथार्थ नहीं है। यदि किसी के पास ऐसा कोई विभाग, संस्था या कार्यालय का उदाहरण हो जहाँ कभी भ्रष्टाचार न होता हो, तो वह हमें अवश्य बतायें।

मीडिया में जब ऐसे मामलों पर भारी शोर मचता है, तो कभी-कभी ऐसा लगता है मानो यह देश की पहली चोरी हो। बहसें होती हैं, विश्लेषण होते हैं, नैतिक प्रवचन दिए जाते हैं। पर क्या कोई पूरे विश्वास के साथ यह कह सकता है कि इस व्यवस्था का प्रत्येक प्रहरी स्वयं हर प्रकार की बेईमानी से पूर्णतः मुक्त है?

अंततः मेरी दृष्टि में यह किसी एक मंदिर की चोरी की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था का दर्पण है जिसमें चोर ही चोर को देखता है, चोर ही शोर मचाता है, चोर ही जाँच करता है, चोर ही आरोप-पत्र लिखता है, चोर ही बहस करता है, चोर ही निर्णय सुनाता है और अंततः चोर ही चोर को जेल भेज देता है। चोर फिर कोई व्यवस्था कर चोरी से जेल से बाहर आ जाता है। मतलब वही चक्र फिर प्रारंभ हो जाता है। और यह चक्र चलता रहता है ... अनवरत।

हम क्षणिक आक्रोश व्यक्त करते हैं, कुछ देर संतोष कर लेते हैं कि हमसे बड़ा चोर पकड़ा गया। फिर जीवन अपनी पुरानी गति से चल पड़ता है।

बस, समझने का फेर केवल इतना ही है।


अमर नाथ ठाकुर, 30 जून, 2026, कोलकाता।

Monday, 29 June 2026

गंभीर का दंभ: भारतीय क्रिकेट का दुर्भाग्य

गंभीर का दंभ: भारतीय क्रिकेट का दुर्भाग्य



मुख्य कोच की भूमिका खिलाड़ियों की प्रतिभा को तराशने की होती है, उन्हें कुंद करने की नहीं। कोई भी खिलाड़ी अपनी योग्यता और निरंतर प्रदर्शन के बल पर ही टीम में जगह बनाता है। वैभव सूर्यवंशी को भी बीसीसीआई और चयनकर्ताओं ने पिछले कई महीनों के उनके असाधारण खेल, आईपीएल के चमत्कारी प्रदर्शन और उनकी अद्वितीय प्रतिभा को देखकर ही भारतीय टी-20 टीम में शामिल किया था। आईपीएल के फॉर्मेट को देखते हुए, एक ओपनर और आक्रामक बल्लेबाज के तौर पर वर्तमान में पूरे भारत का कोई भी बल्लेबाज वैभव के आसपास भी नहीं ठहरता। ऐसे में आयरलैंड और इंग्लैंड के इस टी-20 दौरे पर उन्हें लगातार बाहर रखना मुख्य कोच गौतम गंभीर की किस मानसिकता और रणनीति को दर्शाता है, यह समझना बिल्कुल भी कठिन नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि गंभीर अपने पुराने झगड़ालू स्वभाव और भेदभावपूर्ण रवैये के वशीभूत होकर देश की एक उभरती हुई महान प्रतिभा को नष्ट करने पर तुले हैं। यदि वे इस समय भारत में होते, तो खेलप्रेमी ऐसे फैसलों का स्वागत सड़े टमाटर और अंडों से नहीं, बल्कि ताजे टमाटरों और अंडों से करते, ताकि उन्हें जनता के आक्रोश की चोट का अहसास हो पाता।

जब भारतीय टीम आयरलैंड जैसी फिसड्डी टीम से हार गई, तो पूरा देश गहरे अफसोस और गुस्से में डूब गया। कोच और कप्तान की गलत नीतियों के कारण जो डर था, वही हुआ—संजू सैमसन, अभिषेक शर्मा, ईशान किशन और स्वयं कप्तान श्रेयस अय्यर जैसे स्थापित खिलाड़ी बुरी तरह फ्लॉप साबित हुए। गंभीर के पास एक मौका यह भी था कि वे वैभव को खिलाते और यदि टीम असफल होती, तो हार का ठीकरा उन पर फोड़ देते। लेकिन गंभीर अपने अहंकार, गुमान और दंभ में इतने सराबोर रहे कि उन्होंने अपने कर्तव्य की ही बलि दे दी, जिसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय टीम अपने लगातार 16 सीरीज की जीत के शानदार सिलसिले को एक बेहद साधारण टीम के हाथों गंवा बैठी।

अब जब इंग्लैंड के खिलाफ बेहद कठिन मुकाबला सामने है, और सलामी बल्लेबाज के तौर पर संजू और अभिषेक दोनों ही पूरी तरह नाकाम हो चुके हैं, तब गंभीर के पास वैभव सूर्यवंशी को मौका देकर अपनी भूल सुधारने का आखिरी अवसर है। यदि अब भी वे अपनी जिद पर अड़े रहे, तो भारत वापसी पर उनकी भारी फजीहत तय है। अब देखना यह है कि क्या यह चमत्कारी बालक अंतिम एकादश में मौका पा पाता है या नहीं। भारतीय क्रिकेट को मुंबई और दिल्ली की लॉबी के वर्चस्व से मुक्त होना ही होगा; खेल में राजनीति, जिद और दंभ के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। गंभीर ने टीम चयन में जिस बौद्धिक भ्रष्टाचार का परिचय देश के सामने रखा है, उसका ध्वस्त होना अनिवार्य है। आने वाले मैच यह तय करेंगे कि अंतिम ग्यारह में चयन योग्यता, प्रतिभा और प्रदर्शन के आधार पर होता है या फिर कोच की सड़ांध मारती जिद के आधार पर। भारतीय टीम से फिर से किसी अच्छे प्रदर्शन की अपेक्षा तभी की जा सकती है, जब टीम में न्याय हो।

हम तो यही चाहते हैं कि इस अद्भुत बालक का 'वैभवपूर्ण' प्रदर्शन अन्य वरिष्ठ खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बने, न कि ईर्ष्या का जरिया। ऐसा इसलिए, क्योंकि वैभव जैसी प्रतिभाएं साधारण नहीं होतीं, वे ईश्वरीय देन और अद्वितीय वरदान से युक्त होती हैं, जिनका सम्मान होना ही चाहिए।


अमर नाथ ठाकुर, 29 जून, 2026, कोलकाता।


Sunday, 28 June 2026

क्रिकेट में प्रतिभा बनाम राजनीति: वैभव सूर्यवंशी का संघर्ष

 क्रिकेट में प्रतिभा बनाम राजनीति: वैभव सूर्यवंशी का संघर्ष

वैभव सूर्यवंशी की असाधारण प्रतिभा और आईपीएल में उनके शानदार प्रदर्शन ने बीसीसीआई को सोचने पर मजबूर कर दिया। इसी का परिणाम था कि उन्हें आयरलैंड और इंग्लैंड के आगामी टी-20 दौरे के लिए भारतीय टीम में शामिल करना पड़ा। देश के कई दिग्गज और रिटायर्ड क्रिकेटरों का भी यही मानना था कि वैभव जैसी उभरती हुई प्रतिभा को तराशने के लिए आयरलैंड जैसी अपेक्षाकृत कमजोर टीम के खिलाफ पदार्पण (डेब्यू) का मौका देना एक बेहतरीन रणनीति होगी। मात्र 15 वर्ष की आयु में अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव मिलने से न केवल उनका आत्मविश्वास बढ़ता, बल्कि भविष्य में इंग्लैंड जैसी मजबूत टीम के खिलाफ खेलने के लिए वे मानसिक रूप से तैयार भी हो पाते। 15 वर्ष के इस बच्चे में अगले 20-25 वर्षों तक देश के लिए खेलने की अद्भुत क्षमता है।

लेकिन दुर्भाग्यवश, भारतीय क्रिकेट के गलियारों में गुटबाजी और अंदरूनी राजनीति की जड़ें बहुत गहरी हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्य कोच गौतम गंभीर एक विशेष समूह या दल को ही प्राथमिकता दे रहे हैं। वैभव जैसी अद्वितीय क्षमता वाले खिलाड़ी का इतनी कम उम्र में टीम में आना और अंतिम एकादश (प्लेइंग इलेवन) में अपनी जगह पक्की कर लेना, कहीं न कहीं स्थापित और सीनियर खिलाड़ियों के लिए एक अनजाना डर बन गया है। अभिषेक शर्मा, संजू सैमसन, ईशान किशन, तिलक वर्मा या श्रेयस अय्यर जैसे खिलाड़ियों ने हाल के वर्षों में ही अपने पैर जमाए हैं। ऐसे में एक अत्यंत युवा खिलाड़ी का टीम में प्रवेश सीनियरों के करियर के लिए खतरे की घंटी माना जाने लगता है।

आरोप लग रहे हैं कि मुख्य कोच गौतम गंभीर वैभव जैसी नई प्रतिभा को फलने-फूलने का उचित माहौल नहीं देना चाहते। पहले मैच में भारतीय टीम को हार का सामना करना पड़ा था, जिससे कोच गंभीर पर एक बड़ा असमंजस और भारी दबाव था। उम्मीद थी कि इस हार के बाद टीम प्रबंधन अपनी गलती सुधारेगा, लेकिन दूसरे मैच में भी वैभव को अंतिम एकादश से बाहर रखकर बेंच पर ही बैठाए रखा गया। यह फैसला साफ तौर पर इस रणनीति को दर्शाता है कि सीनियर खिलाड़ियों को अपने खराब प्रदर्शन को सुधारने के लिए अतिरिक्त मौके दिए जाएं, ताकि वैभव को टीम में शामिल करने की नौबत ही न आए। यदि ये सीनियर खिलाड़ी जैसे-तैसे अच्छा स्कोर कर देते हैं, तो वैभव को आगे के मैचों, विशेषकर इंग्लैंड के खिलाफ, टीम से बाहर रखने का एक ठोस बहाना मिल जाएगा कि 'अच्छा प्रदर्शन करने वाले सीनियर को कैसे हटाया जाए'। हालांकि, टीम में चयन होना एक बात है और अंतिम ग्यारह में जगह मिलना दूसरी बात, जो वर्तमान परिस्थितियों में बेहद कठिन कर दी गई है।

जब वैभव का चयन आईपीएल के उनके सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के आधार पर हुआ है, तो लगातार दूसरे मैच में भी उन्हें अंतिम एकादश से बाहर रखने का कोई तार्किक कारण नहीं बनता। यह निर्णय एक संकीर्ण, असुरक्षित और कुत्सित मानसिकता को दर्शाता है, जो नई प्रतिभाओं को बढ़ावा देने के बजाय उन्हें दबाने का प्रयास करती है। अतीत में भी गौतम गंभीर का स्वभाव मैदान पर आक्रामक और विवादों से घिरा रहा है। ऐसे में, खेल के मैदान से परे राजनीतिक रसूख के बल पर कोच जैसे गरिमामयी पद पर उनका आसीन होना और इस तरह के फैसले लेना, भारतीय क्रिकेट के भविष्य को अंधकार में धकेलता हुआ प्रतीत होता है।


अमर नाथ ठाकुर, 28 जून, 2026, कोलकाता।


कोलकाता में आंसुओं के बीच बहता आस्था का प्रवाह

 कोलकाता में  आंसुओं के बीच बहता आस्था का प्रवाह बारिश की अप्रत्याशित फुहारें और उसके बाद मची अफरा-तफरी ने कोलकाता के उत्सव की धड़कनों को ए...