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Monday, 29 September 2025

हम तुम्हें अपना समझते रहेंगे

 

 हम तुम्हें अपना समझते रहेंगे

तुम मानो या ना मानो,
हम तुम्हें मना कर रहेंगे।
थाली चाहे कितनी बार उड़ेल दो,
हम तुम्हें खिला कर रहेंगे।

दुनिया बड़ी बेवफा है,
हम तुम्हें अपना बना कर रहेंगे।
एक देश है हमारा,
हम इसे विभिन्न रंगों से सजा कर रहेंगे।

रिश्तों की डोर न टूटे कभी,
हम इसे विश्वास से जोड़ते रहेंगे।
आंधी आए या तूफ़ान बड़ा,
हम दीपक की तरह जलते रहेंगे।

मिट्टी की खुशबू, गंगा की धार,
यही है हमारी पहचान अपार।
आओ मिलकर प्रण ये करें,
भारत को स्वर्ग सा बना कर रहेंगे।

विविधता में एकता की छवि,
हर दिल में बसाएंगे।
तुम मानो या ना मानो,
हम तुम्हें अपना समझते रहेंगे।

अमर नाथ ठाकुर, 29 सितंबर, 2025, कोलकाता।

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