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Tuesday, 23 June 2015

ये कर्म देवता



जेठ दुपहरिया की गाथा

पत्तों की ओट में पत्ता छुप रहा होता 
छाया भी जब साया ढूँढता
तब ये  कर्म देवता
सिर के ऊपर सूरज ढोते हुए 
तलवे तले छाया को आश्रय देते हुए 
स्वयं के पसीने से पसीना धोता
ये कर्म देवता ।

खेत में निकौनी  करते हुए 
मेंड़ें बनाते  धरती  कोड़ते हुए 
ढेले से ढेला फोड़ते हुए 
सिर के ऊपर न कोई छत्तर रखता
धूप में पसीना सुखाता
चलता जाता चलता जाता 
ये कर्म देवता ।

ग्रीष्म की दहकती लहर
सिकुड़ता झील पोखर
संकरी नदी सूखता नहर ।
हवा भी जब सिहकती नहीं
चिड़िया भी चहचहाती नहीं
तब  भी अनवरत कर्म करता जाता 
ये कर्म देवता ।

सूखाड़ की ठूँठ से लड़ते हुए  
हरियाली से प्रकृति को सजाते हुए  
पत्थर तोड़-तोड़  पथ बनाते हुए 
ईंटें जोड़-जोड़  घर बनाते हुए 
प्रखर ग्रीष्म से लापरवाह 
विलासिता की न लिये कोई चाह 
हर पल आगे बढ़ता जाता 
ये कर्म देवता ।

अमर नाथ ठाकुर , 7 जून , 2015, कोलकाता ।


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