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Saturday, 6 June 2015

अपनों ने मुझे अपना समझ बाँटा



साधुओं ने मुझे अपना समझ लूटा
जबकि डाकूओं में ये दम था ।

अपने  चुपके-चुपके काँटे चुभा जाते थे
कोलाहल जबकि दुश्मनों का नहीं इतना नग्न था ।
गोलियाँ मुझे विच्छिन्न कर सकती थीं
गालियाँ मुझे विचलित कर सकती थीं
पर रंग-बिरंगी पुष्प – मालाओं में मैं तो मग्न था ।
मधुर वचन - जाल में मैं कितना  भग्न था ।
अपनों ने मुझे अपना समझ बाँटा
जबकि गैरों में कितना ज्यादा  भ्रम था ।
मित्रों ने मुझे प्यार-प्यार  में रौंदा
शत्रुओं के द्वेष में शेष फिर भी धर्म था ।

पाताल से गहरा अपनों का  रहस्य था
आकाश से ऊँचा मेरा विश्वास
मुँह में राम-राम नाम  था
बगल में छूरी का नहीं दिया एहसास ।
अपनों ने मेरे मस्तक को कुचला
पर गैरों का  हिम्मत बार-बार फिसला ।
रोम-रोम से विमुख हुआ कहाँ मैं अकेला हूँ ?
अपने तो छूट चले फिर भी शत्रु – मध्य पड़ा भला हूँ ।

विजय-पथ पर सीना ताने बिना ढाल चल पड़ा हूँ ।
काल से भी दो-दो हाथ करने ताल अब ठोक चुका हूँ ।



अमर नाथ ठाकुर , 01 जून , 2015 , कोलकाता । 

1 comment:

  1. संवेदना से परिपूर्ण

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