Friday, 31 October 2025

बिहार की शराबबंदी: एक संकट/ भ्रष्टाचार का एक नया अध्याय?

बिहार की शराबबंदी: एक संकट/ भ्रष्टाचार का एक नया अध्याय?

बिहार में वर्षों से शराबबंदी लागू है। इस निर्णय के कारण बिहार सरकार को शराब उद्योग और शराब बिक्री से मिलने वाले टैक्स की सैकड़ों करोड़ की आमदनी से हाथ धोना पड़ा। सरकार ने यह कदम इस उद्देश्य से उठाया था कि समाज में शराब से फैल रही बुराइयों को दूर किया जा सके और बिहारी जनमानस का नैतिक स्तर ऊँचा उठे। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हुआ? आइए, इसका यथार्थ मूल्यांकन करें।

वास्तविकता यह है कि यह उद्देश्य लगभग विफल रहा। बिहार एक लैंडलॉक्ड राज्य है, जो नेपाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल से घिरा हुआ है — और इन सभी जगहों पर शराब की खुली बिक्री है। भारत के किसी राज्य से दूसरे राज्य में जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, और नेपाल के साथ भी आवाजाही लगभग बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के होती है। ऐसे में बिहार के लोग आसानी से इन सीमावर्ती क्षेत्रों या नेपाल जाकर शराब का सेवन कर लेते हैं।

सीमा के पास रहने वालों को तो कोई कठिनाई नहीं होती, वे पास के प्रदेशों में जाकर पीकर लौट आते हैं। शुरुआत में जो लोग बिहार के भीतर दूरवर्ती इलाकों में रहते थे, उन्हें थोड़ी दिक्कत हुई। रोज-रोज यात्रा करना संभव नहीं था, तो वे सप्ताह में एक या दो बार जाकर यह “जरूरत” पूरी करने लगे। लेकिन गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लोगों के लिए यह स्थिति बड़ी कठिन बन गई। उनके सामने तो जैसे संकट खड़ा हो गया — करें तो क्या करें?

जैसा कि कहा गया है — “आवश्यकता आविष्कार की जननी है।” लोगों ने जल्दी ही इसका समाधान भी खोज लिया। उपकरण का नहीं, बल्कि उपाय का आविष्कार हुआ। गाँवों में स्थानीय तौर पर शराब बननी शुरू हो गई। चावल को सड़ाकर, संथाल आदिवासियों के पारंपरिक तरीकों से देशी शराब तैयार की जाने लगी। आज स्थिति यह है कि बिहार के लगभग हर गाँव और हर शहर में यह लोकल शराब चोरी-छिपे बन रही है, बिक रही है और सेवन की जा रही है।

इतना ही नहीं, विदेशी और ब्रांडेड शराब की भी कोई कमी नहीं है। काला धंधा फल-फूल रहा है। दूसरे राज्यों और नेपाल से अवैध सप्लाई चेन हर गली-मोहल्ले तक फैली है। बोतलें और पाउच प्लास्टिक थैलियों में छिपाकर पहुँचाई जाती हैं। घर घर व्यक्ति व्यक्ति के पास मोबाइल फोन की उपलब्धता ने इस मांग और पूर्ति की प्रक्रिया को काफी आसान कर दिया है। निश्चित रूप से इनके दाम ज़्यादा हैं, क्योंकि “कानून से बचकर” मिलने की कीमत भी इनमें शामिल है। वर्षों में यह अवैध कारोबार बिहार में एक प्रकार के कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है।

हजारों युवा इस धंधे में जुड़ चुके हैं। बेरोजगारी की पीड़ा भुलाकर वे इस “नए रोजगार” से आमदनी कमा रहे हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सरकार के मंत्री, विपक्ष के नेता, अधिकारी और पुलिस — सबको इन गतिविधियों की पूरी जानकारी है। ये सारे कार्य पुलिस के संरक्षण में हो रहे हैं, क्योंकि यही अब भ्रष्टाचार से आमदनी का सबसे बड़ा स्रोत बन गया है।

नीतीश कुमार ने शराबबंदी को निश्चय ही एक अच्छी और नैतिक सोच के साथ लागू किया था, परंतु उसका उद्देश्य पूरा नहीं हो सका। उल्टे, इसने बिहार के युवाओं को काला बाज़ारी, अवैध धंधे और भ्रष्टाचार के नए गुर सिखा दिए।

वास्तव में शराबबंदी किसी भी राज्य में व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। राज्यों के बीच खुली आवाजाही को बंद नहीं किया जा सकता। ऐसे में शराबबंदी जैसे कानून सिर्फ भ्रष्टाचार और अवैध कमाई के नए रास्ते खोल देते हैं। इससे पुलिस और प्रशासन की “अतिरिक्त आमदनी” के अवसर बढ़ते हैं, पर समाज के नैतिक स्तर में गिरावट आती है।

बिहार में इस नीति ने युवाओं के नैतिक पतन को और तेज किया है। सामाजिक ताने-बाने को कमजोर किया है। संस्कृति को दूषित किया है। असभ्यता और अपराध को बढ़ाया है। समाजशास्त्रियों के लिए यह अध्ययन का विषय हो सकता है कि शराबबंदी के बाद बिहार में अपराध की दर में किस प्रकार की वृद्धि हुई। शराब की बिक्री, तस्करी और सेवन से जुड़े अपराधों की संख्या में तो उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई ही है।

दुखद यह भी है कि शराबबंदी से निम्न और निम्न-मध्यम वर्ग की महिलाओं की पीड़ा कम नहीं हुई। पियक्कड़ों की घरेलू हिंसा, कलह और उत्पीड़न की समस्या पहले जैसी ही बनी हुई है।

अब जबकि बिहार फिर चुनाव की दहलीज पर है, यदि नीतीश सरकार पुनः सत्ता में आती है, तो उसे चाहिए कि इस शराबबंदी नीति पर गंभीर पुनर्विचार करे। जन सुराज जैसे दलों का मत इस पर स्पष्ट है, और महागठबंधन के दलों को भी इस ज्वलंत सामाजिक समस्या पर शीघ्र सोचकर ठोस कदम उठाने चाहिए — इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।

अमर नाथ ठाकुर, 31 अक्तूबर, 2025, कोलकाता।

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