धर्म निरपेक्षता बनाम सर्वधर्म समभाव
(एक भारतीय दृष्टिकोण से विचार)
हमें “सेकुलर” शब्द से स्वाभाविक असहजता होती है। यह शब्द हमें कृत्रिम और अस्वाभाविक प्रतीत होता है। यह शब्द, जिसे हिंदी में “धर्मनिरपेक्ष” कहा जाता है, वस्तुतः बड़ा धोखे वाला और भ्रामक शब्द है। व्यवहार में यह लगभग असंभव है कि कोई मनुष्य पूर्ण रूप से धर्मनिरपेक्ष हो सके। मनुष्य का स्वभाव, उसकी भावनाएँ, संस्कार, और आस्था किसी न किसी रूप में धार्मिक आधार से जुड़ी होती हैं। इस दृष्टि से, “सेकुलर होना” एक ऐसी स्थिति है जो व्यवहारतः अप्राकृतिक और असंभव है।
यदि कोई प्राणी सेकुलर हो सकता है तो वह मनुष्य नहीं, बल्कि वे जीव हैं जो सोचने, तर्क करने या विश्वास करने की क्षमता नहीं रखते — जैसे पशु और पक्षी। एक गाय मंदिर, मस्जिद या चर्च के सामने से बिना किसी विचार के गुजर जाती है; पक्षी निश्चिंत भाव से किसी मंदिर के शिखर या मस्जिद के गुम्बद पर बैठकर गा उठता है। उनमें श्रद्धा या नफरत का भाव नहीं होता। वे न तो धार्मिक हैं, न अधार्मिक। अतः यदि कोई वास्तव में सेकुलर हो सकता है, तो वह केवल पशु या पक्षी ही हो सकते हैं — मनुष्य नहीं।
यह कैसे कल्पना की जा सकती है कि कोई हिन्दू अपने हिंदुत्व को त्यागकर व्यवहार करे?इसी प्रकार किसी मुस्लिम या ईसाई या अन्य से यह कैसे अपेक्षा की जाय कि धर्म के स्केल पर वह शून्य की स्थिति में आ जाए और अपना सरकारी कार्यों का निर्वहन करे?
संविधान में धर्मनिरपेक्षता का प्रवेश
हमारे संविधान की प्रस्तावना में “धर्मनिरपेक्ष” शब्द 42वें संविधान संशोधन (1976) के माध्यम से जोड़ा गया। यह काल आपातकाल का था, जब देश में अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता पर नियंत्रण था। इस संशोधन का औचित्य और समय, दोनों ही संदेहास्पद रहे हैं। परंतु आज चूँकि यह संविधान का अंग है, इसलिए शासन-प्रशासन के कर्मियों और राजनेताओं को व्यवहारतः “धर्मनिरपेक्ष” होने का नाटक करना पड़ता है, ताकि वे संविधान के अनुरूप दिखें।
पश्चिमी “सेकुलरिज़्म” बनाम भारतीय दर्शन
पश्चिमी समाजों में नास्तिकता बढ़ रही है — विशेषकर यूरोप और चीन जैसे देशों में। इसलिए वहाँ के समाज अपेक्षाकृत सेकुलर प्रतीत होते हैं। परंतु भारतीय दर्शन के अनुसार, नास्तिक होना ही असंभव है। सनातन दृष्टि कहती है कि “ईश्वर ही आनन्द का स्रोत है, और आनन्द ही ईश्वर है।” प्रत्येक मानव उस आनन्द की तलाश में ही जीवन व्यतीत करता है — चाहे वह ईश्वर को माने या न माने। अतः जो आनन्द चाहता है, वह वस्तुतः ईश्वर की खोज में है। इस अर्थ में, प्रत्येक व्यक्ति आस्तिक है।
जब हर व्यक्ति आस्तिक है, तो वह स्वभावतः धार्मिक है। धर्म वही पथ है जो हमें ईश्वर तक पहुँचाता है। अतः धार्मिक व्यक्ति का धर्मनिरपेक्ष होना विरोधाभासी है। यदि कोई स्वयं को “सेकुलर” कहता है, तो वह एक नाटक ही कर रहा है — और नाटक के आधार पर कोई समाज स्थायी रूप से संगठित नहीं रह सकता।
सर्वधर्म समभाव : भारतीय विकल्प
इसलिए भारतीय समाज के लिए “सर्वधर्म समभाव” ही सच्चा मार्ग है। यह सिद्धांत कहता है कि सभी धर्म समान हैं, सभी मार्ग एक ही ईश्वर तक ले जाते हैं। बचपन में हम सबने वह प्रार्थना गाई है —
“ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान।” यह प्रार्थना केवल बच्चों के मुख की कविता नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का स्वर है।
यह कोई नाटक नहीं, बल्कि भारत के आध्यात्मिक सत्य की सहज अभिव्यक्ति है।
सनातन परंपरा में समावेश का भाव इतना व्यापक है कि उसमें विरोध की कोई संभावना नहीं बचती। बौद्ध, जैन, सिख जैसे धर्म इसी सनातन विचारधारा से उपजे हैं। एकेश्वरवाद भी सनातन की जड़ में है — इसलिए इस्लाम या ईसाई धर्म से कोई टकराव स्वाभाविक नहीं।
असहिष्णुता की जड़ : धर्म की गलत व्याख्या
समस्या वहाँ उत्पन्न होती है जहाँ लोग धर्म के ग्रंथों को पढ़कर संकीर्ण अर्थ निकालते हैं। ऐसे लोग अपने धर्म को श्रेष्ठ बताकर दूसरों को नीचा दिखाने लगते हैं। यही प्रवृत्ति समाज के लिए घातक है। जबकि इतिहास गवाह है कि सूफी संतों ने मंदिरों में जाकर भक्ति से कव्वालियाँ गाई हैं, और हिंदू मजारों पर सिर नवाते आए हैं। यह भारत की धरती का स्वभाव है — समावेश, न कि विभाजन।
यदि मुसलमान हिंदुओं की “बुतपरस्ती” से नफरत न करें, और यदि हिंदू अपने देवताओं की भिन्न रूपों में पूजा करते हुए दूसरों को नीचा न दिखाएँ — तो प्रेम, सहिष्णुता और भाईचारे का वातावरण सहज ही स्थापित हो जाएगा।
धर्म का सार प्रेम है, किंतु जब वही धर्म अहंकार का विषय बन जाता है, तो उसका स्वरूप विकृत हो जाता है।
व्यवहार में धर्मनिरपेक्षता का असंभव होना
भारत में हर व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में अपने ईश्वर को स्मरण करता है। यहां हर भारतीय के आचरण और उसके कतरे कतरे में धर्म सन्निहित है चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी या यहूदी।
हिंदू “राम-राम”, “जय श्रीकृष्ण”, “हे भगवान” कहते हैं; ये जब मिलते हैं तो स्वागत में, बिछुड़ते हैं तो विदा लेते समय, श्मशान जाते समय शोक की अभिव्यक्ति में, घृणा व्यक्त करते समय या खुशियां प्रकट करते समय ... राम राम इत्यादि के संबोधन से अपने भाव व्यक्त करते हैं;
मुसलमान “अल्लाह”, “बिस्मिल्लाह”, “इंशाअल्लाह” कहते हैं;
ईसाई “ओ माई गॉड”, “प्रे टू गॉड” कहते हैं।
ऐसे समाज से यह अपेक्षा करना कि वह सरकारी या राजनीतिक कार्य में पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष व्यवहार करेगा — यह असंभव और कृत्रिम है। वह नाटक के सिवा और क्या हो सकता है ?
इसलिए, सेकुलरिज़्म एक छद्म अवधारणा है, जबकि सर्वधर्म समभाव एक जीवंत और व्यवहार्य सिद्धांत है।
निष्कर्ष
भारतीय समाज का आधार सर्वधर्म समभाव होना चाहिए, न कि दिखावटी धर्मनिरपेक्षता। यही विचार मानवोचित है, यही संविधान की आत्मा के अधिक अनुरूप है। इससे समाज में वैमनस्य मिटेगा, सहिष्णुता बढ़ेगी, और प्रेम, करुणा तथा परोपकार की भावना सशक्त होगी।
धर्मनिरपेक्षता एक कृत्रिम आदर्श है —और इसलिए हम सेकुलर नहीं हो सकते।यदि हम सेकुलर हो जाएं तो हम अपनी महान सांस्कृतिक धार्मिक विरासत को खो देंगे, हम अराजक जो जाएंगे , हम अनुशासनहीन हो जाएंगे, हमारी दिनचर्या बिगड़ जाएगी और हमारे भारतीय समाज का तानाबाना बिखर जाएगा। और हम दावे के साथ कह सकते हैं कि हम अधिकांश भारतीय सेकुलर नहीं हैं और हो भी नहीं सकते।
जबकि सर्वधर्म समभाव, भारतीय आत्मा का स्वाभाविक सत्य है। अधिकांश भारतीय सर्व धर्म समभाव की भावना और चेतना से ओतप्रोत है और हमारा समाज सांप्रदायिक धार्मिक विभाजन के बावजूद एकत्रित है और संगठित है।
यह आसान भी है कि हम हिन्दू रहें और सम भाव से मुस्लिमों और ईसाइयों के प्रति व्यवहार करें।और ऐसी ही अपेक्षा किसी मुस्लिम या ईसाई या किसी और धर्मावलंबी से भी आसानी से की जा सकती है।
अमर नाथ ठाकुर, 23 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।
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