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Saturday, 11 October 2025

रमता योगी

 रमता योगी



चार पैसों की है जिंदगी

चाहे तुम खरीद लो

चाहे वह बेच दे।


सुबह से शाम तक खटा लो

चाहे कोड़े की मार लगा दो

कोल्हू के बैल की तरह फेर लो

हमारी कराह हमारे अंदर ही सिसकती रह जाएगी

हमारी वेदना अंदर ही भटकती रह जाएगी

हमारी आँखें नहीं डबडबाएंगी 

चार पैसों की है हमारी जिंदगी 

चाहे तुम पीट लो

 चाहे वह पीट ले।


धरती की हरियाली जिसका बिछौना हो

मेघ जिसका झरना हो

झील और सागर हों जिसके तरण ताल

सूरज हो जिसका दीपक

चंदा जिसकी रखवाली करता

और तारों से सजा

मुक्त आकाश हो जिसकी मच्छरदानी

खुश हूं मस्ती भरी है मेरी जिंदगानी

मुझे नहीं कोई देनदारी

चार पैसों की मेरी जिंदगी

चाहे तो तुम छोड़ दो

चाहे वह छेड़ दे।


न कोई चाह धन संचय की 

न कोई जीने की लालसा

पंच भूतों का है यह बर्तन

पर न पंच इंद्रियों का क्रंदन

न पंच कोषों का कोई बंधन

मैं हूं रमता योगी

मैं हूं बहता पानी

चार पैसों की है मेरी जिंदगी

फिर क्यों फटके पास मेरे गंदगी


न कोई प्रारब्ध शेष

न कोई कर्म का बंधन

न जन्म मृत्यु से मैं सीमित

सुख दुःख नहीं करते भ्रमित

अतः चार पैसे की मेरी जिंदगी 

चाहे तुम खरीद लो

चाहे वह बेच दे।

मैं हूं रमता योगी

मैं हूं बहता पानी।


अमर नाथ ठाकुर, 11 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।

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