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Wednesday, 6 May 2026

बंगाल: एक व्यवस्था का अवसान और अनिश्चित भविष्य की दहलीज

बंगाल: एक व्यवस्था का अवसान और अनिश्चित भविष्य की दहलीज

पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव परिणाम केवल एक राजनीतिक दल की हार और दूसरे की जीत नहीं हैं, बल्कि यह एक सड़ी-गली व्यवस्था के विरुद्ध जनता के संचित आक्रोश का परिणाम है। पिछले पंद्रह वर्षों से बंगाल जिस घुटन भरे वातावरण में जी रहा था, वहां बदलाव की छटपटाहट तो थी, लेकिन उस अभिव्यक्ति पर 'भय' का कड़ा पहरा था। इस बार का 5% का वोट अंतर और निर्णायक जनादेश यह साबित करता है कि जब भय का तंत्र टूटता है, तो लोकतंत्र अपनी पूरी शक्ति के साथ पुनर्जीवित होता है।

बंगाल के इस महापरिवर्तन का सबसे बड़ा और अदृश्य कारण रहा—'फर्जी वोटिंग' और 'छप्पा वोट' का पूर्णतः समाप्त होना , साथ ही भय और धमकी के वातावरण से मुक्त हो बंगाल की जनता का निर्बाध वोट के लिए आक्रोशित हो बाहर आना। दशकों से बंगाल की चुनावी राजनीति में गुंडागर्दी और छप्पा वोटिंग एक दस्तावेजी सच भले न बन पाए हों, लेकिन वहां रहने वाला हर नागरिक इस सच्चाई का भुक्तभोगी रहा है। इस बार चुनाव आयोग ने ढाई लाख केंद्रीय बलों के माध्यम से उस 'भय के वातावरण' को सोख लिया। जब बंगाल पुलिस को निष्क्रिय कर संवेदनशील क्षेत्रों से हटाया गया और टीएमसी के दबंगों पर त्वरित कार्रवाई हुई, तब जाकर वह मतदाता घर से बाहर निकल सका, जिसे बरसों से वोट देने से रोका जा रहा था।

परिवर्तन की इस पटकथा के केंद्र में बंगाल का 'भद्रलोक' और उसकी अस्मिता रही। संदेशखाली की अमानवीय घटनाओं ने बंगाल के अंतर्मन को झकझोर दिया था, तो आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की नृशंस घटना ने शहरी समाज को विचलित कर दिया। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का मुद्दा सरकार की 'लक्खी भंडार' जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर भारी पड़ गया। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि विकास और सहायता तब तक बेमानी हैं जब तक सुरक्षा का अभाव है।

समाज में बढ़ता अविश्वास और ध्रुवीकरण भी इस परिणाम की एक बड़ी वजह बना। पिछले पंद्रह वर्षों के 'मुस्लिम तुष्टीकरण' ने हिंदू समाज में असुरक्षा की भावना भर दी थी। मुस्लिम समुदाय का रणनीतिक रूप से एकमुश्त वोट करना और सनातनी परंपराओं—जैसे पूजा-पाठ और विसर्जन—में प्रशासनिक अड़चनें पैदा करना, अंततः हिंदुओं के एकत्रीकरण का कारण बना। मौलवियों को सरकारी भत्ते और मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में हिंदुओं का लक्षित उत्पीड़न ऐसे मुद्दे थे, जिन्होंने शांत रहने वाले बंगाली समाज को भी वैचारिक रूप से उद्वेलित कर दिया।

शासन के हर स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार ने इस आग में घी का काम किया। शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, कोयला और मवेशी तस्करी ने सरकार की नैतिक साख को खत्म कर दिया था। बंगाल में स्थिति ऐसी थी कि बिना 'तोलाबाजी' (जबरन वसूली) के एक ईंट भी नहीं रखी जा सकती थी। चाहे घर बनाना हो या छोटा-मोटा व्यापार करना हो, सिंडिकेट को पैसा देना अनिवार्य था। यहां तक कि महामारी के दौरान वैक्सीन लगवाने जैसे बुनियादी हक के लिए भी टीएमसी की सूचियों पर निर्भर रहना पड़ता था। व्यवस्था की यह सड़ांध इतनी गहरी थी कि व्यक्ति के पास दो ही विकल्प थे—या तो अपनी विचारधारा की तिलांजलि देकर सत्ता के आगे आत्मसमर्पण कर दो या फिर हर कदम पर प्रताड़ित होते रहो।

आज टीएमसी का सफाया हो चुका है और बंगाल की जनता जेल से छूटे किसी पक्षी की तरह 'राहत' महसूस कर रही है। लेकिन इस राहत के साथ एक गहरा संदेह और भय भी जुड़ा है। बंगाल का इतिहास रहा है कि जब भी सत्ता बदलती है, तो पुराने दल के गुंडे, तोलाबाज और सिंडिकेट रातों-रात नए झंडे थाम लेते हैं। जो कल तक टीएमसी के झंडे ढो रहे थे, वे आज कमल का झंडा लेकर बदलाव के सिपाही बन रहे हैं।

यही बंगाल की सबसे बड़ी विडंबना है। क्या यह परिवर्तन केवल झंडे का है या व्यवस्था का? क्या रामकृष्ण, विवेकानंद और सुभाष चंद्र बोस की यह पावन धरती अपने 'प्रारब्ध' के कुचक्र से निकल पाएगी? डर है कि कहीं कुछ महीनों के बाद बंगाल फिर उसी पुराने ढर्रे पर न लौट आए, जहां केवल चेहरा नया हो और अत्याचार वही पुराना। बंगाल को आज 'स्वच्छंद' होने के साथ-साथ 'स्वच्छ' होने की भी उतनी ही आवश्यकता है।

अमर नाथ ठाकुर, 6 मई, 2026, कोलकाता।


1 comment:

  1. बंगाल की राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था का बेहद सटीक विश्लेषण।

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