Search This Blog

Thursday, 19 August 2021

बौका

  आज बौकी की बड़ी फजीहत हो रही  थी . लोग उसके ऊपर थू - थू  कर रहे थे लेकिन वह चुप - चाप हाथ  में लाठी लिए अपने भैया के घायल शरीर के पास खड़ा था . एक झोला छाप डाकटर उसके बड़े भाई शुकदेव के सिर में पट्टी बाँध रहा था. बीस - पच्चीस लोग आस - पास में खड़े झाँव  - झाँव कर रहे थे . मैं बगल से गुजर रहा था . भीड़ देखकर रुक गया था . बौकी से जैसे ही नजर मिली वह कुछ लज्जित - सा किंकर्तव्यविमूढ़ - सा महसूस करने लगा . जब तक मैं  लोगों से पूछूँ और कारण जानूँ कि ऐसा क्यों हुआ मैं स्वयं  बौकी के इतिहास में झाँकने लगा .  

मुझे कई वर्षों बाद  पता चला था  कि उसका असली नाम वासुदेव है . यदि इस नाम से उसके पड़ोसी को भी पूछें तो न पता चले . लोग उसे बौका नाम से ही जानते थे . बौका मतलब गूंगा . लेकिन वह बोलता था . नाम और उसकी शारीरिक  विशेषता को आप मिलाकर  सामान्यतया कोई समीकरण नहीं बना सकते . लेकिन बौका के मामले में ऐसा एक समय था . बौका की माँ ऐसा बताती थी . जन्म के ५-७ वर्षों बाद  उसने बोलना प्रारम्भ  किया  था , लोगों ने जन्म के डेढ़ - दो साल बाद ही भगवान की माया समझ सोच लिया कि यह बालक अब नहीं बोलेगा और  सबने इसे बौका नाम से पुकारना शुरू कर दिया था . लेकिन फिर भगवान् की कृपा रही कि नाम के प्रतिकूल इसने कालान्तर में बोलना शुरू कर  दिया . लेकिन वह पूरे गड़रिया ( गाँव का असली नाम गुड़धरिया है ) में इसी बौका नाम से जाना जाता था . जब मुझे पता चला कि यह हमसे चार - पाँच साल उमर में बड़ा है तो फिर हम इसे आदर से बौकी बुलाने लगे , बौका शब्द आकारान्त होने से अपने में अनादर जो समेटे रहता है . 

बौकी  के तीन भाई और थे . यह दूसरे नम्बर  का भाई था . अपनी माँ - बाप के साथ मिल - जुल कर सब एक साथ ही रहते थे . बौकी  की   जाति का उल्लेख करना जरुरी नहीं है . लेकिन ये सब करीब - करीब निर्भूमि ही होते हैं . 10-15 धुर या कट्ठा भर से  भी कम जमीन  में इनके परिवार का घर था और बाड़ी - झाड़ी भी उसी में . दूसरे की खेतों में मजदूरी करना , बँटाईदारी करना  , हरवाही करके निर्वाह करना बस यही इनके रोजगार थे . आकांक्षाएं कम थीं इसलिए दुःख भी कम थे .

बौकी   को जब हमने पहली बार देखा  था , वह जवान था , बलिष्ठ था  और बहुत ताकतवर हुआ करता था . हाथ से  किसी को पकड़ लेता था तो क्या मजाल कि कोई उसकी गिरफ्त से छूट जाय ! सुना था कुश्ती में अपने से ड्योढ़े - दूने  जवान को पटखनी दे देता था . लोग उसे मतिसुन्न और शुद्ध मन वाले  समझते थे . वह मानव शरीर में गाय था , निहायत ही शरीफ और सीधा . लोग उसे आसानी से ठग लेते थे . लेकिन जो इसे जान रहे होते वो इनके साथ कोई बदतमीजी नहीं करते . कारण इसका सीधापन हो सकता  हो जो उसे दयावान बनाता हो , अथवा  लोग इसकी ताकत से भी घबराते थे  , लेकिन कभी सुना नहीं कि किसी से यह उलझा हो या किसी को अपनी ताकत के बल कुछ बुरा - भला कहा हो . अपने काम से काम रखता था . वह किसी के काम में कोई दखलंदाजी न करता था . एक समय में यह एक ही काम करता था लेकिन  भूत  की तरह काम करता था .

जब जिताय ने काम छोड़ दिया था तो मेरे पिता जी ने बौकी  को हरवाही में बहाल किया  और फिर हमारे घर की सारी खेती की जिम्मेवारी बौकी के ऊपर आ  गयी थी . जैसा कि कह चुके हैं बौकी निहायत ही सीधा था इसलिए पूरा इमानदार था . लेकिन वह अपने मन से कुछ नहीं करता था , उसे तो जैसा एक बार कह दिया बस वही वो करता रहेगा . बैलों को सानी लगाकर खिलाना , पानी पिलाना , कमौनी , रोपनी के लिए जन बुलाना सब बौकी का काम था . भोरे-  सकाले बौकी दस्तक देता  और दो - अढ़ाई  कट्ठा खेत चासकर  समारकर आ जाता . अपनी क्षमता के मुताबिक़ नहीं बल्कि बैलों की क्षमता के मुताबिक़ खेत जुताई करता था . इसलिए उसके खेत जुताई का रकबा बराबर नहीं होता . बैल जैसे ही थकता वह हल पालो से खोलकर , फाल वाले हिस्से को पालो में बांधकर घर की तरफ रवाना हो जाता . नाश्ता वह करके ही जाता था . बसिया भात , नमक और हरी मिर्च उसका सर्व प्रिय नाश्ता होता  था . उसे रोटी एकदम पसंद नहीं था चाहे गरम - गरम ही क्यों न मिले  .  बौकी के पास ही सुना था , वह भन्नाता रहता था , नौकरी - चाकरी  जन - मजदूरी भी करेंगे और रोटी खाएँगे ? यदि भात खाने को न मिले तो  नौकरी - चाकरी  क्यों  करना ! उसी समय जाना था कि रोटी खाना गरीबी वाली बात है , भात खाना ऊँचे दर्जे की बात होती  थी . यह इस बात से भी सिद्ध होती थी कि मेरी भी माँ दोनों टाइम घर में भात ही बनाती थी . हमलोग भी दोनों टाइम भात ही खाना  पसन्द करते थे . आज से ४0-४५ साल पहले स्वास्थ्य और शहरी चाल - ढाल के मुताबिक़ लोग रात में रोटी खाने लग लगे थे लेकिन रोटी के साथ जो एक सामाजिक मान्यता जुड़ी हुई थी वह इतनी आसानी से कैसे बिखरती . आधुनिकता में ढलकर सामान्य गृहस्थ लोग रात में रोटी अब खाने लगे थे .  मजदूर तबके के भी गरीब लोग रात में रोटी तो खाते थे लेकिन वो गरीबी की वजह से इसे अपनी मज़बूरी समझते थे .  गर्मी की छुट्टी में या  दुर्गा पूजा में जब लम्बे अन्तराल पर गाँव आते थे तो माँ रात के भोजन में भी चावल ही बनाती थी यह कहते हुए कि बेटा इतने दिनों बाद गाँव आया है कैसे रोटी खिलाएंगे . पाहुन , अतिथि आ जाएँ तो रोटी बन ही नहीं सकती .  इससे समझ सकते हैं बौकी कैसे  हरवाही करते हुए रोटी खाता . उसे भात खिला दीजिये और  अधिक भी काम करा लीजिये  वह उत्साह से करता था  , खुशी - खुशी करता था . 

बौकी की एक और खासियत थी वह न बीड़ी पीता था और न खैनी खाता था .  हाँ , उसे पान पसंद था और कहीं से मिल जाय तो वह इसे बड़े चाव से चबाकर अपना मुँह लाल किये रहता था . उस समय  शायद ही ऐसा कोई जन मजदूर मिले जो दो चीजों खैनी  और बीड़ी का सेवन न करता हो . खेतों में कमाई निकौनी के समय सारे गृहस्थ अपने जन मजदूरों को खुश रखने के लिए  ये दो नशे की चीजें खैनी , बीड़ी जरुर ही खरीद कर देते  थे . 

बौकी का व्यवहार कभी - कभी बड़ा अजीब लगता था .एक दिन जेठ की दुपहरी में वह हल जोतकर आ रहा था ,आगे - आगे थके बैल , बैलों के गरदन पर पालो और पालो से बंधा लटका  हुआ हरीश और  हरीश से जुड़ा  पालो के ऊपर से निकला हुआ सूरज की धूप में  चमकता फार और पीछे स्वयं . और तड़ाक से उसने छाँव में बैठे हांफ रहे कुत्ते को एक जुआली मारा , कुत्ता किकीयाते हुए गुर्राते हुए भागा . बौकी के द्वारा  निर्दोष कुत्ते को मारना मुझे उसके स्वभाव के एकदम प्रतिकूल लगा  और मैं  ने पूछ दिया , बौकी भाय ऐसा क्यों ..... बौकी झट से बोला , देखिये न ...बहे बरद और हकमे  कुकुर ....इसीलिये कुत्ते को  जुआली से मारा उसे बताने के लिए  कि तुम आराम से बैठे हांफ रहे हो जबकि ये बेजुबान थका - हारा बैल चुपचाप चला जा रहा है बिना कोई दिखाबे के  बिना पानी भी पीये . उसे उस दिन कुत्ते पर बहुत गुस्सा था . बौकी की समझदारी के स्तर पर मैं कुछ हँसी मिश्रित आश्चर्य में आ  कुछ नहीं बोला . लेकिन अक्सर न्यायपूर्ण बातें वो करता रहता था और उसकी बातों में दया और करुणा भी हुआ करता था . लेकिन इस तरह की बौकी की बातों पर कोई गम्भीरतापूर्वक गौर नहीं करता था . मैं ने कई बार देखा हुआ था जब लोग 10 पैसे भी भिखारियों को देने से कतराते थे उस दौर में बौकी आठ आना भी उनको  थमा देता था . एक हरवाहे से इस  दान की  लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे , क्योंकि वो तो दो - अढ़ाई रूपये दैनिक मजदूरी का दौर था . 

जब कभी हम मोटी किताबों के पीछे अपना माथा खपाए चौकी पर बैठे रहते  थे तो वो कभी - कभी हमारे पास आकर चौकी के किनारे नीचे बैठ जाता था और अनायास प्रश्न कर बैठता था जो बड़ी गूढ़ भरी बातें होती थीं  उस समय हम गीता , रामायण और वेद की बातों से काफी कम वाकिफ थे और उसके प्रश्नों की सही व्याख्या नहीं कर पाते थे . हम कहते बौकी भाय, हमको तो सड़क , मकान , नहर आदि के बारे में पूछो तो बतावें . वो पूछता कि किताब में देखकर यह बताइये कि अच्छे और बुरे काम का फल कब मिलता है ? स्वर्ग सही में होता है ? रामचन्द्र जी जब भगवान थे तो जैसे ही रावण सीता जी को जबरदस्ती उठा कर ले गया तो उनको तुरन्त क्यों न पता लगा और जब पता लगा तो तुरन्त ही क्यों न मार दिया  ? इत्यादि इत्यादि . मैं बौकी की इस तरह की बातों को मजाकपूर्ण हँसी हँसकर टाल जाता था . 

बौकी भाय समय कितना हुआ पूछता नहीं था , समय  बता कर पूछता था . कहता , देखिये तो दस  बज गया है और कमाल , पौने दस या सवा दस के आसपास बज रहा होता . दिन में सूरज की ढाल , रात में चन्द्रमा , तीन तरिया या सत भईयाँ (सप्त ऋषि ) तारे समूह को देख कर सटीक समय का अनुमान लगा लेता और तभी तो वह गिरहथ के कहे अनुसार समय पर आता . कभी लेट नहीं करता .

गाँव में या आस - पास जब भी आल्हा - रुदल ( उदल को गाँव में लोग रुदल ही कहते हैं ) का नाट्य - मंचन होता बौकी जरुर देखने जाता . इसी तरह छक्कड़ बाजी नाच ( एक प्रकार का गानों और मजाक , चुटकुलों का एक लड़का और लड़की के वेश में दूसरे लड़के के द्वारा मंचित क्या जाने वाला ग्रामीण नाच ) या कई दिनों तक चलने वाला रामलीला भी बौकी का अन्य सामान्य लोगों के जैसा ही बड़ा प्रिय हुआ करता था और जरुर  इन मनोरंजन कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता था .  आल्हा - रुदल का गीत वह गाता  या गुनगुनाता नहीं था क्योंकि वह गाने में  प्रवीण  नहीं था , लेकिन आल्हा - रुदल की बहादुरी की एवं न्याय प्रियता की वह  चर्चा जरुर करता था .  वह कुछ भी पढ़ा - लिखा नहीं था , निरा मूर्ख था , लेकिन उसकी सोच अनेक पारखी और पंडित जनों से भी बहुत आगे की थी . वह बड़ी गूढ़ बातें करता था जिसे लोग एक मूर्ख की - सी बात कह  फूहड़तापूर्ण  हँसी में टाल जाते थे .

लेकिन आज जो बात घटित हुई थी वह  बौकी की नजर में क्या थी आप ही समझें . पड़ोसी मनसी लाल की बकरी ने बौकी के बाड़ी में बैगन , कोबी , मिर्च के पौधों को खा कर ठूँठ कर दिया था . महीने भर की शुकदेव की मेहनत बेकार हो गयी थी , गुस्से में  शुकदेव ने बकरी पर लाठी को झटहा बनाकर फेंका . बकरी की टांग टूट गयी और मेमियाते हुए बकरी भागी . मनसी लाल बकरी की मेमियाहट को सुनकर बाहर आ गया था. बकरी बार - बार आकर सब्जी के पौधों को खाकर नष्ट कर जाती थी . शुकदेव कई बार उलाहना देकर थक गया था . इस बार इसने गुस्से में बकरी को सबक सिखा दिया था . लेकिन इससे ज्यादे गुस्सा तो मनसी लाल को था . उसने शुकदेव को टोका और बात बढ़ती चली गयी . गाली - गलौज तक होने लगी . मनसी लाल ने आवाज दी उसके सभी भाई लाठी लेकर आ गये . शुकदेव के भी सभी भाई लाठी में मौजूद थे . शुकदेव का ही छोटा भाई बौकी याने वासुदेव था . यह भी लाठी लेकर वहां ही मौजूद था . बौकी को देखकर मनसी लाल और उसके भाई  सहम  गये थे क्योंकि वो बौकी के बलिष्ठ शरीर और उसकी ताकत से परिचित थे . लेकिन ये लड़ाई तो इज्जत की आन पड़ी थी , सो बिना ज्यादे सोचे उन लोगों ने शुकदेव की खूब पिटाई की , सिर फोड़ दिया था और लोहू से उसका वदन लथपथ हो गया . वो नीचे गिर गया था और बाप-बाप करके कराह रहा था . लेकिन लड़ाई इतनी  बढ़ने के बाद भी बौकी ने एक भी लाठी नहीं चलाई . और उसके चेहरे पर भी कोई सिकन तक नहीं  आयी . वह वहां खड़ा रहा मूक बनकर नाम के अनुरूप बौका बनकर और अपने बड़े भाई को और अन्य भाइयों को पिटता देखता रहा . शुकदेव को नीचे गिरते देखकर और खून से लथपथ देखकर और यह कि बौकी अब न अब लाठी चलाना शुरू का दे  मनसी लाल और उसके भाई तुरन्त भाग गये . शुकदेव की तरफ से आवाज देने वाले लोग , ललकारने वाले लोग बौकी को जोश भरते रहे लेकिन ये क्या बौकी की लाठी नहीं उठी . यह निर्विकार वहाँ खड़ा रहा . लोगों ने इसे डरपोक कहा , कुछ ने मूर्ख कहा , कुछ ने वेवकूफ कहा , कुछ ने इसे कमीना कहा , कुछ ने इसे बेकार का आदमी और  घटिया तक कहा , कुछ ने इसे गालियाँ  भी दी और एक ने तो इसके मुँह पर थूक भी दिया . किसी ने कहा अपना यह शरीर किस दिन के लिए रखे हो , किस दिन के काम के लिए , क्या अपने परिवार के लोगों के प्राण लेने के लिए या श्राद्ध करने के लिए . इसी समय जब मैं  आया तो मैं ने देखा बौकी के मुँह पर  थूक अब भी पड़ा हुआ है और बिना पोंछे वह अभी भी अविच्छिन्न निर्विकार शान्त खड़ा है और कुछ नहीं बोल रहा है . मैं ने भी सोचा , पूछूँ कि क्या बौकी भाय आप  डर गये थे ? आप एक बार लाठी भांजना भी शुरू कर देते क्या मजाल वो आगे बढ़ पाते , कम से कम आपके भैया की पिटाई तो नहीं होती . आपकी ताकत को देखकर ही वो लड़ाई नहीं करते . मुझे देखकर बौकी थोड़ा सहम गया था , बोला अमर भाय, "मुझे डर नहीं लगा था , बहुत कोशिश की असल में मुझे गुस्सा ही नहीं आया . गलती तो बकरी की थी , मनसी लाल की गलती नहीं थी इसलिए ."  सच, आत्म - संयम की यह पराकाष्ठा थी . संवेदनाओं पर इतना बड़ा आत्म - नियंत्रण . क्रोध  , दुःख , विषाद से इतना दूर होना तो बड़े - बड़े साधुओं से भी नहीं सुना . लोग इतने धर्म -ग्रन्थ पढ़ते हैं लेकिन उस पर मंथन कौन करता है ?  यह तो बौकी ही कर सकता है जो  बौकी कि निरा मूर्ख है  , जिसे वर्णमाला का  अ , आ ... क , ख .....भी नहीं मालूम . आज मुझे पता चला था कि वह नाम से ही बौका नहीं था वस्तुतः  अपने कर्म से भी था कि क्रोध, दुःख और विषाद की वाणी उसके कंठ , हृदय और मस्तिष्क को कभी छू तक नहीं  गयी और न निकल पायी  . उसका असली नाम वासुदेव भी तो था . 

बौकी भाय को गुजरे बीस से ज्यादे वर्ष हो चुके हैं . इस तरह के निर्विकार लोग ज्यादा नहीं जीते . 


अमर नाथ ठाकुर , १९ अगस्त , २०२१ , कोलकाता .


 






Tuesday, 10 August 2021

टुनटुन काका

 इस बार गाँव जब गया बहुत कुछ बदला हुआ - सा पाया  . हमेशा की तरह सुबह चार बजे मैं जग गया . लेकिन कुछ अजीब - सा लगा . राम चरित मानस के दोहे, चौपाइयों  की गूँज सुनाई नहीं दी . सोए हुए में ही कानों में 'मंगल भवन अमंगल हारी , द्रवहु  सुदसरथ अजिर बिहारी ... राम सिया राम जय जय राम  ........ जैसे  कर्ण प्रिय दोहे चौपाइयाँ इत्यादि का जैसे अभाव - सा लगा . फिर भी जैसे अहसास - सा हुआ कि हम ये दोहे सुन पा रहे  हैं .यह वहम था . कुछ ही देर में दिन की चहल-पहल शरू हो गयी थी  और पता चला कि टुन टुन काका को गुजरे हुए कई महीने हो गये हैं . दुःख हुआ सोचकर कि अब टुनटुन काका के दर्शन कभी नहीं होंगे . भोरे - भोर मानस के दोहे और चौपाइयाँ का आस्वादन अब नहीं  मिलेगा . घर - घर की खबरों से अवगत कौन कराएंगे . ५0-५५  सालों की स्मृतियों का रेला नजरों के सामने से गुजरने लगा . 

पूरे गाँव की खबर रखते थे टुनटुनका . लोग उनको हँसी-मजाक  में बीबीसी कहते थे . सदरपुरिये , ब्रह्मपुरिये , मिश्रान , सोनरटोली , कायस्थ टोली , बाजार आदि हर जगह की सारी ख़बरों का उनके पास अपडेट होता था . यहाँ तक कि अगल - बगल के गाँव ठाढ़ा, गड़रिया, लछमिनियाँ, विसनपुर , चैनपुर आदि दस -बीस कोस तक के गाँवों तक की मुख्य - मुख्य ख़बरों का हिसाब - किताब उनके पास होता था  . मिश्रान में  तो सभी बड़े और कुलीन लोग थे और उनके यहाँ  की कोई खबर रिस -रिस कर भी नहीं आती थी क्योंकि मिश्रान और शेष गाँव के बीच एक काल्पनिक  किन्तु अभेद्य दीवार - सी होती थी जिससे उनके परिवार में घटित किसी घटना का कुछ पता ही नहीं चलता था . लेकिन टुनटुनका  इस दीवार के उस पार की बोरिया - तर की भी खबर ले आते थे और लोग उत्सुक हो  बड़े चाव से उसका स्वाद लेते थे . 

टुनटुन काका  हमारे यहाँ रोज आते थे दो बार तीन बार . पीछे ही तो उनकी झोंपड़ी थी बमुश्किल सौ लग्गा भी नहीं होगा . जब भी इधर से गुजरते थे दस बीस तीस मिनट रुकते थे सिर्फ पान खाने तक . इतने में ही सारी विस्फोटक खबर बाँटकर चले जाते . मेरे बुढ़वा काका याने मेरे दादा जी उनसे कभी - कभी काफी नाराज हो जाते थे . वो कोई भी बात पूरे  विस्तार से सुनना चाहते थे और  टुनटुनका को इतना समय नहीं होता कि वो मेरे बुढ़वा काका के दर्जनों क्यों, कैसे और कहाँ का जबाव दें  . उन्हें तो पूरे गाँव को कवर करना होता था . इसलिए बुढ़वा काका अपनी नाखुशी उन्हें  नारद कहकर चुकाते थे और कहते थे टुनटुन तुम्हारे पैर में शनि का वास है तुम ज्यादे देर नहीं रुकोगे मुझे मालूम है . नारद मुनि भी दो घड़ी से ज्यादे कहाँ रुकते थे एक जगह और तीनों लोक सहित पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाते थे . और  बुढ़वा काका की बात पर टुनटुन काका हँसते हुए पान अपने गलफर में ठूंसते हुए तलहत्ती पर जर्दा लेकर फाँकते हुए गायब हो जाते थे . शाम में लौटते समय फिर कुछ मिनट के लिए अपना पड़ाव रखते थे . जब तक उनको पान या खैनी मिलता तब तक पूरे गाँव की दिन भर की राजनीति से सबको अवगत करा देते . आस - पास के गाँवों की भी विशेष खबर से अवगत करा देते . ये सब खबरें अखबारों में नहीं मिल सकती . किनके बेटे की कथा - कुटमैती की बात चल रही है , कितना दहेज उनको चाहिये , किनकी बेटी का कथा तय हो गया है , होने वाला लड़का क्या करता है , किनके घर में आज लड़ाई हुई , सभी भाइयों में भिन्न - बखरा हो गया कि नहीं , हौद में किनकी जमीन बिक रही है , कौन खरीदना चाहता है , नहर में पानी आ गया कि नहीं , दुर्गा पूजा में प्रति परिवार कितना कर के चन्दा लगा है , दुर्गा पूजा में नाटक इस बार खेला जाएगा कि नहीं , डाकटर साहेब पूजा में इस बार गाँव आएँगे कि नहीं , दरबार में किस बात पर आज चर्चा चल रही थी , ठंढा बाबू की चौकड़ी ने बीडीओ को प्रमोसन देकर डीसीएलार बना दिया , चैनल के पानी को बाँधकर धस्सा लगाकर मछली पकड़ने का काम इस बार जल्दी क्यों बंद हो गया , थाने में नया दारोगा कब ज्वाइन करेगा और कौन - सी जाति का है , मुसहरी टोले में किसकी बेटी भाग गयी और किसके साथ भाग गयी , कोशी कॉलोनी में कौन नया ओवरसियर आया है , पुराने एसडीओ के ट्रांसफर के बाद कौन आया है , हेहया धार में और गेंडा धार में क्यों इतना पानी बढ़ गया है , इस बार कोशी के कौन से तटबंध के टूटने की सम्भावना है , किसके बेटे का उपनयन है , कैसा भोज करेगा , कौन मर गया , कौन बीमार है , कौन शराब पीकर किसको गाली दे रहा था , किसने अपने बेटे को घड़ी खरीद कर दी है , किसके यहाँ रेडियो खरीदा गया है , इस बार गाँव में सबसे ज्यादे पटुआ किसको हुआ , मडुआ किसके यहाँ सबसे ज्यादे हुआ , किसके बेटे को मास्टर रोल में नौकरी मिल गयी , किसके यहाँ रेले सायकिल खरीदी गयी है , दूध में सबसे ज्यादे पानी कौन मिलाकर बेचता है , सबसे ज्यादे सूद पर कर्जा कौन देता है इत्यादि इत्यादि . ऐसी कौन सी खबर नहीं होती जिसकी  जानकारी टुन टुन काका को न होती . बिलकुल सटीक खबर सिर्फ  काका जी ही देते थे . इसलिए तो वो ऑल  इण्डिया रेडियो नहीं बल्कि बीबीसी थे . जैसे ही वो सुबह दोपहर या शाम में आते कुर्सी पर बैठ जाते या खाली चौकी पर टांग लटका कर एक तकिया लेकर करवट लेट जाते और बुढ़वा काका की हर जिज्ञासा को शांत करने की कोशिश करते और खैनी या पान मिलने तक या न भी कुछ मिले तो भी कुछ मिनटों में पूरा बखान कर चल उड़ते . चाय तो वो पीते नहीं थे . खैनी की चुनौटी या पान के लिए पनबट्टी तो वो रखते नहीं थे . लेकिन जब चाहत होती तो फिर कहीं न कहीं किसी न किसी के यहाँ उन्हें मिल ही जाता क्योंकि उनका उठना - बैठना पूरे गाँव में जो था . यही उनकी दिन - चर्या होती थी . कभी उनको बीमार होते नहीं  सुना .

क्या खुश मिजाज थे टुनटुन काका . पांच - सात  कट्ठे  से ज्यादे जमीन नहीं थी उनके हिस्से में जिसकी पैदावार उनके पारिवार के गुजर - बसर के लिए पर्याप्त नहीं था फिर भी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं . अपनी गरीबी को वो बोल - बोल कर बाँटते नहीं  थे . एक कीर्त्तन मंडली के सदस्य बन गये थे और पूरे गाँव में जहां भी मानस पाठ हो ,  अष्टयाम कीर्त्तन हो उसमें टुनटुन काका जरुर मिलेंगे . जो दान दक्षिणा उनको मिलता था उसमें उनके परिवार का गुजारा - बसारा हो जाता होगा , हम ऐसा सोचते थे .  अब वो माथे पर एक टीका भी लगाने लग गये थे . शायद वो अब सबेरे - सबेरे स्नान पूजा भी कर लेने लगे थे . बदन पर एक गंजी और ठेहुने से थोड़ा ही नीचे तक की अति साधारण जालीदार धोती उनका  पहनावा होती थी . जोर से ठहाके  लगाकर हंसना और शुद्ध हृदय से सारी बातें प्रकट कर देना उनकी विशेषता थी . इसलिए अधिकाँश लोग उनको नापसंद नहीं करते थे . इसका यह  भी मतलब नहीं कि लोग उन्हें खूब पसंद करते थे . कुछ लोग उनसे सावधानी बरतते थे और अपने परिवार की बात  या अन्तरंग बातें उनके सामने प्रकट नहीं करते थे , इस डर से कि ये बीबीसी के छद्म नाम से जो जाने जाते थे . कुछ लोग उन्हें नारद मुनि नाम ( बुढ़वा काका तो पहले से ही उन्हें नारद सम्बोधन दे चुके थे) से सम्बोधित कर  उनका उपहास  भी कर देते  थे , लेकिन वो लोग काका जी से उम्र में बहुत  बड़े होते थे  या समवयस्क होते थे इसलिए उनकी ऐसी बातों का काका जी जरा भी बुरा  नहीं मानते थे और एक मुस्की  से इस बात को पचा जाते थे . शादी , उपनयन , श्राद्ध आदि अवसरों में दूसरे गाँवों में अपने  सम्बन्धियों को निमंत्रित करने के लिए किसी को भेजना हो या पास के शहर से कोई सामान मंगवाना हो या गाँव के  बाजार से भी कोई सामान आकस्मिकता में मंगवाना हो तो काका जी से ज्यादे विश्वसनीय और कौन हो सकता था और उनकी उपलब्धता की भी गारंटी होती थी . २००९ में मेरे पिताजी का देहांत  हुआ . अग्नि - संस्कार के बाद गंगा में उनके  अस्थि प्रवाह के लिए जब कोई नहीं तैयार हो रहा था तो टुनटुन काका को यह जिम्मेवारी दी गयी थी और आश्चर्य यह कि  जनवरी की  उस कंपकंपाती ठंढ में कितनी सहजता से उन्होंने सिमरिया जाकर अस्थि प्रवाह करने की  जिम्मेवारी स्वीकार कर ली थी . अगस्त २००८ में कोशी मैया ने बिहार के सुपौल , सहरसा , मधेपुरा के भूगोल को बदल दिया था . कोशी जो १५-२० किलोमीटर पश्चिम से तटबंधों के बीच बहती थी अब बिना तटबंध मेरे गाँव के पूरब से बहने लगी थी . सारी सडकें क्षत -विक्षत हो गयी थी . गाँव से बाहर निकलने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता था . लेकिन जब काका जी ने यह जिम्मेवारी ली तो फिर पूरी श्रद्धा पूर्वक कठिनाइयों को झेलते हुए इस कार्य  का निष्पादन भी किया . 

काका जी  बुरे लोगों में कभी नहीं गिने जाते थे लेकिन साथ ही उनको एक विचारशील व्यक्ति के रूप में भी कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी जाती थी .  लेकिन इन सब से अविच्छिन्न  टुनटुन काका ज़रा भी असहज नहीं होते थे . बेगारी  का काम करने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता था . उनके मन में उपकार की भावना होती होगी या कभी कुसमय में किसी प्राप्ति के लालच से ऐसा करने में कोई कभी आनाकानी नहीं करते होंगे . इतने जमीनी आदमी थे कि अपनी प्रतिष्ठा या अपने आत्म - सम्मान की उन्होंने कभी चिन्ता ही नहीं की . मन मौजी थे .जब से मानस मण्डली में शामिल हुए थे खुश रहने लगे थे .शायद परिवार के खर्चे के लिए अब ज्यादे जद्दो - जहद नहीं करनी होती थी . किसी भी तरह की अभिलाषा महत्त्वाकांक्षा से दूर आज कल ऐसा प्राणी शायद ही आपको देखने को मिले . 

सतत अभ्यास से मानस की अनेक चौपाइयाँ , दोहे  काका जी को कंठाग्र थे  . मानस के प्रसंगों से अपनी बात को बल देकर अब वो लोगों  के बीच रखने लगे थे . जब तब उच्च स्वर में  मानस के दोहे चौपाइयाँ उनके मुख से  निकलते रहते थे. सुबह चार बजे  जब उठकर मानस गान करने  लगते तो उस समय के शान्त वातावरण में दूर - दूर तक उनकी आवाज जाती , बहुत लोग इसे  पसंद करते थे , कुछ लोग इसे अपनी नींद में खलल समझते  और उनके बारे में पीठ पीछे बुरा - भला कह  जाते . मैं तो ब्रह्म - मुहूर्त्त में उठने वाला आदमी सुबह - सुबह मानस  की सुमधुर  और भावपूर्ण चौपाइयाँ सुनकर प्रफुल्लित हो जाता . कॉलेज की पढ़ाई और बाद में नौकरी में आने के बाद साल में एक या दो बार गाँव आता था . और जब भी आता था रात में पहुंचता था क्योंकि ट्रेन और बस का समय ही ऐसा होता था एवं भोरे - भोर ब्रह्म - मुहूर्त्त की  शान्त स्निग्ध वेला में मंगल भवन सुमंगल हारी .......जैसे मानस की चौपाइयों से नींद टूटती तो अनायास ही आनंद से  मेरा जी भर उठता था . 

 टुनटुनका पढ़े - लिखे ज्यादे थे नहीं , शायद पांच-सात क्लास तक गाँव के स्कूल में पढ़े होंगे . लेकिन सामान्य ज्ञान की समझ में  एक ग्रामीण की हैसियत से अद्वितीय तो नहीं किन्तु किसी से कम नहीं थे . बचपन में हमने उनको एक बलिष्ठ नौजवान के रूप में देखा था .मध्यम कद - काठी के थे . सफेद - सफेद  गुंथे हुए चमकते दांत उनकी पहचान होती थी . बाद में जब वो पान खाने लगे थे तो दांतों के बीच में खड़ी - खड़ी भूरी -काली  धारियां बन गयी थी . शरीर उनका  छरहरा था और कमाल की फुर्ती थी उनमें . दुखी हमने बहुत  कम मौकों पर उनको देखा . रोजगार के लिए काम वो कोई करते नहीं थे , लेकिन घर परिवार का गुजारा उनका चल जाता था .  विजया दशमी के दिन , दीवाली की रात में या क्लास में प्रथम आने पर अथवा कॉलेज से छुट्टी में आने पर अथवा नौकरी से गाँव में कोई शादी - ब्याह , उपनयन  में जब भी गाँव आते थे तो उनको पैर छू कर प्रणाम करता था और टुनटुनका हमें दिल खोल कर आशीर्वाद देते थे . उनको पैर छू कर प्रणाम करने में इसलिए खूब आनंद का आस्वाद मिलता था . उनसे कुशल - मंगल पूछने के उपरान्त फिर गाँव की सारी ताजी घटनाओं से वाकिफ हो जाते थे . अपने स्कूल के समय के दोस्तों के बारे में भी सभी खबर ले लेते थे . उस समय तो मोबाइल होते नहीं थे , फिक्स्ड फोन सबको नहीं होते थे , चिट्ठी - पत्री सबसे होती नहीं थी ऐसे में टुनटुन कक्का    का महत्त्व समझा जा सकता था . वो पुरे गाँव की ख़बरों का इनसाइक्लोपीडिया होते थे . 

व्यंग पूर्ण और हंसाने वाली बातों से भी हमलोगों का खूब मनोरंजन करते थे . तम्बाकू या खैनी के बारे में आज से पचास  साल पहले कही गयी बातें  तो अभी भी हमें गुदगुदाती है . जैसे खैनी को वो  बीबीसी कहते थे याने बुद्धि वर्धक चूर्ण इससे खैनी की उच्चता कुलीनता  और दिव्यता को दर्शाते थे और खैनी के महात्म्य को व्यक्त करने के लिए तो दो तीन दोहे तक सुना जाते थे .... कृष्ण चले बैकुण्ठ को राधा ने  पकड़ी बाँह , कहा यहाँ तमाकू खा  ले वहां तमाकू नाहि . इसे  आगे और बढ़ाते हुए वो पढ़ते .... .लाम-लाम पात है ठोर में समात है , कुल में कपूत जो खैनी नहीं खात है . हमलोग यह सुनकर तो  उस समय बावले  हो जाते थे . यदि हम बच्चे लोग उन्हें पढ़ते दीख जाते थे तो यह कहने से कभी नहीं चुकते थे..... जो भी पढ़तं सो भी मरतं जो नहीं पढ़तं सो भी मरतं तो दांत कटाकट काहे करतं ..यह सुनकर हमलोग उनको इसे फिर से दुहराने को कहते और बड़े चाव से वो इसे दुहराते . और याद है उसी समय हमने इसे याद कर लिया था और काकाजी को देखकर हम लोग भी इसे यदा - कदा दुहराते . हम जानते हैं यह फकड़े सुनाकर उनका हमलोगों को पढ़ने से हतोत्साहित करने का कतई मतलब नहीं होता था . जरा सोचिये हँसी - मजाक , व्यंग , चुटकुला आदि न हो जीवन में तो ये जीवन कितना नीरस हो जाय . वो चार्वाक के दर्शन के प्रसंशक थे . जब भी उनकी आर्थिक स्थिति की चर्चा होती उनकी जिह्वा पर ही यह श्लोक होता ... यावत् जीवेत सुखं जीवेत , ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् . यह सुनाकर अपनी गरीबी का कचोट कहाँ छुपा जाते आप ढूँढ़ नहीं सकते  . आठ भाइयों में सबसे बड़े थे लेकिन शादी के कुछ ही वर्षों बाद ये अन्य भाइयों से तथा अपने पिताजी से अलग रहने लगे थे . इससे इनकी आर्थिक स्थिति का अन्दाजा ऐसे ही लगाया जा सकता है . 

मिथिला में डाक के वचन खूब प्रचलन में हैं , काका जी बहुत सारे डाक वचन कंठाग्र रखते थे और समय पर उसे तुरंत सुनाते भी थे . कुछ तो हमलोग भी याद कर गये थे .......काक द्वार मे आवे जाय , कहथि डाक जे पाहून पाय .....सोमे शुक्रे बुधे उखा , छारह  पंडित लेखा जोखा ....पूरब छींका मृत्यु हकार , अग्नि कोण मे दुखद भार ....नाटा  बरद, बहुरिया जोय, नहि घर बसै न खेती होई .... ई जुनि बूझब डाक निर्बुद्धि , नाशहि काल विनाशे बुद्धि .....इत्यादि इत्यादि . 

मेरी मँझली बहन का देहांत हो गया था तो अगस्त २०१९ में गाँव गया था . ब्रह्म मुहूर्त्त की वेला में उनका  दूर से ही मानस गान सुना . बहुत शांति मिली किन्तु उनकी वाणी में वो ओज नहीं सुनाई दिया , भोर में मेरा नाम सुनते ही टुनटुनका मेरे यहाँ आ गये थे मैं ने पैर छूकर उनको प्रणाम किया वही पुराने हिसाब से खूब सारा आशीर्वाद दिया . लेकिन  उनका रुग्ण शरीर  कुछ और ही कहानी कह रहा था . वो चीनी  की बीमारी से जूझ रहे थे और मुझे लग गया था अब वो ज्यादे दिन के मेहमान नहीं हैं . इतना  दुबला तो मैं ने उनको कभी नहीं देखा था . अब वो फुर्त्ती भी उनमें नहीं थी. गाल पिचका हुआ था . मुँह में एक भी दांत नहीं . आवाज में जैसे निराशा के भाव थे. लेकिन जब बाल - बच्चे के बारे में पूछा  तो बड़े ही आश्वस्त होकर कहा दोनों बेटियों की शादी हो चुकी है , दोनों ससुराल में सुखी है. लड़के की भी शादी हो चुकी है. लड़का दिल्ली - पंजाब करता है किन्तु सुखी है. यह इस बात से भी पता चला कि उनका लड़का  पक्का घर बनवा रहा था. मुझे राहत की सांस मिली . मैं समझ रहा था उनकी हमारी ये मुलाक़ात शायद अंतिम ही हो . और हुआ भी ऐसा ही. मैं कोलकाता आया था और कुछ महीने के बाद ही वो प्रयाण कर चुके थे. पता नहीं चल पाया था मुझे . 

आज जब इस कोरोना काल में  टुनटुनका  की वाणी में मानस की चौपाइयों से मेरा साक्षात्कार नहीं हुआ है और अब कभी हो भी नहीं सकता , तो भी जैसे लग रहा है कोई मेरे कानों में गुन  गुना रहा है .......... होइहि सोई जो राम रचि राखा . को करि तर्क बढ़ावै साखा ........ ७५-७६ साल तो जी चुके थे  और कितना जीते ! पूरी जिन्दगी तो उन्होंने गरीबी को पटखनी दी  और अन्त में जो मैं देख रहा हूँ  वो  बीस - पच्चीस साल पहले की बात है .... जनवरी की कंपकंपाती ठंढ  है , कुहेस लगा हुआ है , सबेरे के वख्त उनके यहाँ कुछ मेहमान आ गये हैं , उनके घर में अनाज का अभाव है , काकाजी  श्री कृष्ण के बाल रूप के फ्रेम किये हुए फोटो को चादर के अन्दर छुपा कर सामने सड़क पर खड़े हैं और इशारे से मुझे बुला रहे हैं , मेरे जाते ही कह रहे हैं यह फोटो फ्रेम तुम सौ रूपये में ले लो , पूरी बातें सुनकर मैं रुआँसा हो जाता हूँ और मैं अनायास ही बोल उठता हूँ टुनटुनका यह मैं नहीं ले सकता ( और उनका चेहरा गिर गया था कि अब क्या करें ) आप श्री राम के साथ श्री कृष्ण की भक्ति के लिए अपने पास इन्हें रखिये और मैं ने तीन या चार सौ ( ठीक से याद नहीं) रूपये काका जी की मुट्ठी में देकर , जो वो मुफ्त में कतई नहीं लेना चाहते थे ,  उनकी मुट्ठी को दबा दिया . मैं दालान में  वापस आ गया हूँ और अनमने ढंग से काकाजी भी अपने घर चले जा रहे हैं . मैं देख रहा हूँ जैसे वो सही में चले जा रहे हों  हमेशा के लिए मानस की चौपाइयाँ गुनगुनाते हुए और मैं श्री कृष्ण से दूर यहाँ छूट गया हूँ  उनके ढेर सारे आशीर्वाद का बोझ लिए हुए  .


अमर नाथ ठाकुर , 10 अगस्त , २०२१, कोलकाता  .


 

Wednesday, 7 July 2021

दीप एक जला है

 शनैः शनैः दिन ढल रहा

पल-पल सूर्य मलिन हो रहा

घने काले बादलों में ओझल

नीचे शान्त नीरव भूतल

मन्द-मन्द शीतल-शीतल पवन

छुप-छुप गुदगुदाता तन-मन ।

 अँधियारी छाने लगी है

समझदारी जाने लगी है ।

हे ईश्वर ! कैसा ये विकट समय

गुनगुनाएँ तमसो मा ज्योतिर्गमय ।

एक अकेला निश्तेज चंद्र 

प्रकट हुआ है पहरेदारी में

मुस्करा-मुस्करा सहस्र तारे भी हैं

उसकी सेवादारी में ।


राह कँटीला है

जीवन पथरीला है

और दीप एक डटा है

तिल-तिल जो जला है

आशा और विश्वास में जो पला है

अकेले - अकेले यह लड़ा है

ठान लिया है इसने दृढ़ मन में

लड़ेगा सूरज निकलने तक इस जीवन में ।


अमर नाथ ठाकुर , 7 जुलाई, 2021,कोलकाता ।



Tuesday, 29 June 2021

अब जाना ही होगा

 

जब मोल-भाव हो चुका हो

गहने कपड़े खरीदे जा चुके हों

तब तो घर वापस जाना ही होगा।

 

सूरज जब ढल चुका हो

अंधियारी छाने लगी हो

पाखियों को घोंसलों में लौटना ही होगा ।

 

खेल जब खेला जा चुका  हो

हार-जीत का फैसला हो चुका हो

दर्शकों को स्टेडियम से जाना ही होगा।

 

जब  ट्रांसफर आर्डर आ गया हो

अधूरे फाइलों को निपटाना ही होगा

कुर्सी छोड़ अब नई जगह जाना ही होगा।

 

पहाड़ों से उतर उछलती-कूदती गंगा

मैदानों से गुजर शिथिल हो गयी होती गंगा

अब गंगा-सागर में एकाकार होना ही होगा ।


 

अब जबकि यात्रा पूरी हो गयी हो

'गट्ठर' ले ट्रेन से उतरना ही होगा

ब्रज की गोधूलि में लोट-पोट हो

श्री कृष्ण के चरणों में जाना ही होगा ।

उनका 'गट्ठर' उनको समर्पित कर

मैले-कुचैले-फटे वस्त्र त्याग कर  

नव वस्त्र धारण करना ही होगा ।

समय शेष नहीं,अब जाना ही होगा !

 

अमर नाथ ठाकुर , 29 जून, 2021, कोलकाता 

 

Friday, 25 September 2020

बिहार के आम चुनाव पर जाति एवं धर्म का प्रभाव

 

बिहार के आम चुनाव पर जाति एवं धर्म का प्रभाव

 

बिहार में आम चुनाव का बिगुल  फुंक चुका है. वहाँ तीन चरणों का चुनाव 28 अक्तूबर , 3 नवम्बर एवं 7 नवम्बर को होंगे एवं वोटों की गिनती 10 नवम्बर को होगी. विधान सभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा था अतः चुनाव तो होना ही था. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी. सभी पार्टियाँ इसकी तैयारी कर रही थी. वैसे तो पार्टियाँ चुनाव की तैयारी चुनाव घोषणा के समय ही नहीं करती, इसकी तैयारी सालों भर चलाती रहती हैं. चुनावी मुद्दे अब अखबार और टी वी पर छाये रहेंगे. पेड न्यूज एवं स्पोंसोर्ड न्यूज अपनी भूमिका निभाएगी. अब रेडियो की भूमिका बहुत कम हो गयी है. हाँ , कहीं-कहीं FM पर भी प्रचार और विज्ञापनों के माध्यम से सशक्त रूप से चुनावी मुद्दों पर चर्चा चलती है, लेकिन FM चैनल बिहार में कम हैं अतः यह उतना प्रभाव नहीं छोड़ेगा. व्हाट्सएप्प, फेसबुक एवं यूट्यूब बिहार के गाँवों में अपनी पैठ बना चुका है अतः इसकी अच्छी खासी भूमिका होगी बिहार के आम चुनाव पर अपना प्रभाव छोड़ने में. भ्रामक लेखों एवं विज्ञापनों के माध्यम से पार्टियाँ जनता को अपनी तरफ आकर्षित करेंगी. ट्विटर बिहार की सिर्फ सुशिक्षित और प्रबुद्ध्ह जनता तक ही पंहुच बनाये हुई है अतः इसका नाम मात्र प्रभाव ही पडेगा. चुनावी रैलियां और लाउड स्पीकरों द्वारा गानों से, नारे बाजी के द्वारा नेता गण और उनकी पार्टियों के लोग चुनाव प्रचार करते रहे हैं और उम्मीद के मुताबिक़ शायद यही तरीका इस बार सबसे प्रभावी हो. कोरोना की वजह से रैलियों पर कुछ पाबंदियां रहेंगी. अतः गाने-बजाने, पोस्टरों, बैनर आदि से चुनाव प्रचार होंगे. नेता गण कोरोना की वजह से शायद दो-चार की संख्या में घर-घर पंहुच बना कर मतदाताओं को प्रभावित करेंगे. डिजिटल एप्प पर भाषण देंगे. चुनाव आयोग और प्रशासन की सख्ती की वजह से इस बार गाड़ियों और  विभिन्न वाहनों की रैलियों एवं सभाओं पर आंशिक प्रतिबन्ध की सीमा कितनी प्रभावी रहेगी यह देखना है.

चुनावी मुद्दे किन्तु क्या होंगे – भारत-चीन सीमा पर तनाव, पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध, आतंकवाद, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 एवं 35A का हटना, गलवान घाटी में भारतीय एवं खासकर बिहारी सैनिकों का मारा जाना, कोरोना एवं कोरोना में किये गए बचाव में बिहार सरकार की सफलता अथवा विफलता, कोरोना में  बिहारी मजदूरों के भारत के विभिन्न राज्यों से वापस आने के मुद्दे, उत्तर बिहार में बाढ़ की विभीषिका, नेपाल से भारत के सम्बन्ध, सुशांत सिंह राजपूत की ह्त्या या आत्म हत्या, राम मंदिर का शिलान्यास , नागरिकता कानून, बिहार के समग्र विकास इत्यादि ऐसे मुद्दे रहेंगे जिस पर पार्टियाँ अपने पक्ष और विपक्ष में सरकार के किये अथवा नहीं किये  कामों पर जनता को वोटों के लिए अपने-अपने पक्ष में करेगी. इसके अलावा और बहुत से मुद्दे होंगे जिसका स्थानीय स्तर पर बहुत प्रभाव रहेगा और यह खासकर सरकार चला रही पार्टियों के लिए बहुत उल्टा पड़ेगी और स्थानीय स्तर पर बहुत से परिणामों को उलटा-पुल्टा भी करेगी.  इसमें कहीं वारिश की वजह से हुए जल-जमाव, नाले की सहाई, अस्पतालों एवं स्कूलों में अव्यस्था, सड़क आदि मरम्मती से सम्बंधित काम , सरकार की विभिन्न योजनाओं की सफलता-विफलता इत्यादि ढेर सारे मुद्दे होंगे जिन पर पुराने चुने प्रतिनिधियों को नए उम्मीदवार एवं जनता घेरेगी और जलील करेगी और डराने का एक सन्देश देगी. लेकिन पूरे भारतवर्ष में अधिकाँश राज्यों में चुनाव के परिणाम ऐसे ही नहीं पूरी तरह प्रभावित होते हैं. भारत वर्ष में अधिकाँश राज्यों में चुनाव के परिणाम जाति एवं धर्म से प्रभावित होते हैं. कुछ राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियाँ उभर कर आयी हैं किन्तु किसी न किसी रूप में इनके वोट बैंक का आधार भी  जाति या धर्म ही होता है या जाति-धर्म से परिभाषित होने वाले कोई कारक. यहाँ तक कि राष्ट्रीय स्तर की भी पार्टियाँ इन कारकों से प्रभावित रहती हैं और जाति एवं धर्म के आधार पर ही हर चुनाव क्षेत्र के लिए अपने उम्मीदवार खड़ा करती हैं. भारतीय मतदाता जाति एवं धर्म के आधार पर खूब ध्रुवीकृत होती हैं. सभी पार्टियाँ मतदाताओं के इस तरह ध्रुवीकरण में माहिर होती हैं. विकास के मुद्दे, राष्ट्रीय मुद्दे, आतंकवाद, भ्रष्टाचार एवं रोज़गार के मुद्दे, दुनिया में भारत का बढ़ता कद आदि मुद्दे खूब चर्चा में रहेंगे लेकिन मतदाता वोट के वक्त में बँटेंगे अंततः जाति और धर्म के आधार पर ही. कुछ इन्टेलेक्चुअल एवं प्रबुद्ध जनता नरेन्द्र मोदी की करिश्माई व्यक्तित्व से प्रभावित होंगी, कुछ उनकी तथाकथित डींग हांकने वाली प्रचारित छवि से प्रभावित होंगी, कुछ विचार धारा के आधार पर कम्युनिष्टों को वोट देंगे, कुछ पुश्त-दर-पुश्त कांग्रेस को वोट देते आये हैं इसलिए वे कांग्रेस की ही तरफ रहेंगे, कुछ सम्मिलित रूप से लुटियन गैंग , टुकड़े-टुकड़े गैंग एवं कुछ अर्बन नक्सलवाद के समर्थक हैं इसलिए ये उनके साथ अंत तक रहेंगे. लेकिन मिला जुलाकर आपको यह समझना पड़ेगा कि जाति और धर्म के इतर ज्यादतर राज्य में मतदाता इतने नहीं होते कि वो चुनाव परिणाम को बदल दे. आइये बिहार के इस चुनाव के परिप्रेक्ष्य में चुनाव के आगे चुनाव की जाति और धर्म वाली गणित को समझने की कोशिश करते हैं. पहले कुछ उदाहरणों से जाति और धर्म आधारित चुनावी समीकरणों को समझते हैं.

 

अपने देश में जाति और धर्म से इस कदर लोग जुड़े हुए हैं कि भ्रष्ट से भ्रष्ट , दुर्दांत क्रिमिनल , आतंकवादी और फसादी नेता भी पूरे दावे के साथ अपनी जाति और धर्म वाले के वोट हर हाल में प्राप्त कर लेते हैं. जाति और धर्म का वोट की राजनीति से अटूट बंधन है. अनेक उदाहरण मिल जाएंगे बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीति में. तो आइये बिहार और उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में ही इस बात की पहले खोज-बीन कर लेते हैं.

  बिहार के लालू प्रसाद यादव भ्रष्टाचार के अनेक मामले झेलते हुए भी यादवों के अधिकांश वोट पाते रहे हैं. उनके जेल जाने के बाद अब यह विरासत उनके बेटे ने ले ली है. लालू यादव ने लालकृष्ण आडवाणी का रथ रोककर मुस्लिमों में एक भरोसा बनाया, फिर अनेक तरह के तथा अनेक अवसरों पर उन्मादी बातें बोलकर मुस्लिमों का ऐसा विश्वास कब्जाया कि अभी तक वह और उनकी पारिवारिक पार्टी आरजेडी ने मुस्लिमों के वोट का भी लाइसेंस ले रखा है. बैकवर्ड-फॉरवर्ड (पिछड़ी-अगड़ी) की राजनीति करते-करते मंडल कमीशन के जन आन्दोलन से होते हुए यादवों के एकछत्र नेता बन गये. माय (MY) याने मुस्लिम-यादव समीकरण के प्रणेता लालू यादव जी ही हुआ करते हैं. फिर भुराबाल काटने ( भूमिहार, राजपूत, बाभन, लाला को समाज से अलग-थलग करने ) की बातों वाला जुमला भी लालू जी की ही देन है. कमोवेश उत्तर प्रदेश की समाज वादी पार्टी मुलायम सिंह यादव की पारिवारिक पार्टी है ( अब अखिलेश यादव ने मुलायम की यह विरासत थाम ली है ) और यह भी माय समीकरण पर ही काम करती है और मुस्लिम-यादव वोटों का लाइसेंस अपने पास रखे हुए है. अयोध्या में हिन्दुओं को मारने वाला बयान हो या मुस्लिमों को कोई विशेष सुविधा वाला क़ानून हो या मंदिरों में घंटा बजाने पर रोक की बात या हिन्दू पर्वों पर हिन्दुओं के जुलुस पर रोक की बात हो, इन सब बातों ने या घटना क्रम ने मुलायम की पारिवारिक पार्टी को मुस्लिम वोटों का भी मालिक बना दिया. यादवों को नौकरियों में अनैतिक रूप से फ़ायदा पहुंचा कर, सरकारी सहायता यादव जाति विशेष तक सुनिश्चित कर और अनेक तरह की जाति आधारित बयानों एवं कामों के आधार पर मुलायम सिंह यादव यादव नेता बने एवं यादव वोटों का भी एकछत्र अधिकार प्राप्त किया. इन सबके बावजूद लालू सिर्फ बिहार में और मुलायम सिर्फ उत्तर प्रदेश के नेता के रूप में ही उभरे हैं. दूसरे राज्यों में कुछ शहरों में इन प्रदेशों के इन जाति और धर्म वालों के लोगों का कुछ तबका जो अपने व्यवसाय और रोजगार के लिए बसे हुए हैं वो इन्हें कुछ समर्थन देते हैं. लेकिन ये दोनों राष्ट्रीय स्तर के नेता के रूप में स्थान नहीं हासिल कर सके हैं.

उत्तर प्रदेश के अनुसूचित जाति के मतदाता मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी को वोट करते हैं. कांशीराम हरिजनों के नेता के रूप में प्रतिष्ठापित हो गये थे. मायावती कांशी राम की उत्तराधिकारिणी के रूप में अपने को प्रतिष्ठापित करने में सफल रही. ऊँची जातियों के बारे में विष वमन करके, धार्मिक ग्रंथों की वर्ण सम्बंधित सन्दर्भों का अतार्किक और गलत अर्थ प्रतिपादित कर, हरिजनों की भावनाओं को भड़का कर बाबा साहेब अम्बेडकर को अपना आदर्श बनाकर वह हरिजनों की नेता बन गयी हैं. जमीनी स्तर तक निरक्षर लोगों तक भी मायावती ने अपनी पहुँच बना ली है. आंशिक तौर पर दूसरे राज्यों में भी उनका प्रभाव फैला है और अनुसूचित जाति के कुछ प्रतिशत वोट बसपा को दूसरे राज्यों में भी मिलते हैं. मायावती लालू और मुलायम से ज्यादे राष्ट्रीय फैलाव वाली नेत्री है. वैसे चंद्रशेखर जैसे दलित नेताओं का उदय कुछ हद तक मायावती के लिए खतरा हो सकते हैं और वोटों के बंटवारे में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाकर मायावती की दलितों की एक छत्र नेत्री के रुतबे को चुनौती दे सकते हैं.

चौधरी चरण सिंह किसानों और जाटों के नेता थे. उनकी विरासत को उनके बेटे अजीत सिंह ने हथियाया और कभी किसानी न करने के बाद भी किसानों के और जाट होने की वजह से जाटों के नेता बने. लेकिन अब वह सिर्फ जाटों के नेता रह गये हैं. अब तो सभी जाटों पर अपना प्रभुत्व भी नहीं रखते. पश्चिम उत्तर प्रदेश में कई जिले अच्छी खासी संख्या जाटों वाली है और कई जाट नेता उन वोटों पर अपने हिसाब से कब्जा करते हैं.

मुलायम, लालू, मायावती ऐसे नेता हैं जो दूसरी जाति और धर्म के नेता को भी अपना वोट बैंक ट्रान्सफर करने में समर्थ हैं. यही वह बात है जो इनको अन्य नेताओं से विशेष तौर पर अलग करता है. पिछले बिहार चुनाव में जब लालू और नीतीश ने साथ चुनाव लड़े तो वोटों का यह ट्रान्सफर कम्पूटर की गणना की शुद्धता से हुआ.

उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह लोधों के, अनुप्रिया पटेल कुर्मियों की, राजा भैया क्षत्रियों के, आजम खान मुस्लिमों के नेता के रूप में जाने जाते हैं. बिहार में शहाबुद्दीन मुस्लिमों के, नीतीश कुमार कुर्मियों के, उपेन्द्र कुशवाहा कुशवाहा/कोइरी  जाति के, राम विलास पासवान अनुसूचित जातियों के ख़ास कर दुसाध जाति के , जीतन राम मांझी भी हरिजनों / अनुसूचित जाति  में खासकर मुसहर जाति के लोगों के नेता के रूप में प्रतिस्थापित हुए हैं. आजकल मुकेश साहनी मछुआरों के नेता के रूप में उभरे हैं और अपनी जाति के बहुत वोटों को अपनी तरफ खींचने की ताकत रखते हैं. भूमिहारों के, ब्राह्मणों के, कायस्थों के, बनियों के भी नेता इसी तरह की भूमिका में होते हैं. राजपूतों एवं भूमिहार ब्राह्मणों के बारे में भी ऐसा पर्सेप्सन है कि पढ़े लिखे लोग भी अपनी जाति के प्रभावशाली नेता के लिए पार्टी लाइन से बाहर जाकर वोट करते हैं क्योंकि इनके अन्दर आतंरिक एकता बहुत ज्यादे होती है. इस बार सुशान्त सिंह राजपूत के मुद्दे पर बाजी नीतीश कुमार और बीजेपी ने जीती है बिहार में एफ़आईआर लिखने के बाद सीबीआई को केस ट्रांसफर करने की वजह से अधिसंख्य राजपूत वोट इनकी तरफ खिसकेंगे.

 

हर जाति के नेता होते हैं बिहार में और किसी न किसी स्तर पर चाहे यह स्थानीय स्तर गाँव या मुहल्लों तक ही सीमित क्यों न हो. यह कोई विशिष्ट बात नहीं क्योंकि हर आदमी किसी न किसी जाति के तो होते ही हैं. लेकिन यह तय है कि यदि कोई आदमी नेता है तो अपनी जाति के वोटों का कुछ न कुछ स्वामित्व तो रखता ही है. किसी भी जाति में जन्म लेना उस नेता की प्राथमिक , नैसर्गिक एवं ईश्वर प्रदत्त योग्यता है जिसे वह चुनाव के वक्त भंजाते हैं और भरपूर भंजाते हैं किन्तु अन्य अवसरों पर जन्म के आधार पर जाति वर्गीकरण और सामाजिक व्यवस्था का घोर विरोध करते और उस पर राजनीति करते पाए जाते हैं.

किसी जाति विशेष के नेता होने या किसी धर्म विशेष के नेता हो जाने से ही उन नेताओं की बहुत सारी अयोग्यता अथवा दुर्गुण भी उनके सामने गौण हो जाती हैं. आप देख सकते हैं लालू प्रसाद के ऊपर भ्रष्टाचार के दर्जनों मामले हैं, कुछ चल रहे हैं, कुछ में अपराधी साबित हो चुके हैं, बिना किसी धंधे अथवा व्यवसाय के करोड़ों की संपत्ति बन गयी हैं उनके पास, फिर भी बिहार में यादवों और मुस्लिमों के निर्विवाद नेता बने हुए हैं. मुलायम सिंह यादव का कुनबा भी कुछ इसी तरह सैकड़ों करोड़ों के संपत्ति का मालिक बना हुआ है और उत्तर प्रदेश के यादवों और मुस्लिमों के नेता हैं.

 

कुख्यात क्रिमिनल होने के बावजूद शहाबुद्दीन जेल में होते हुए भी मुस्लिम वोटों में अच्छी खासी पैठ रखते हैं और इनकी इन्हीं योग्यता को संरक्षण देकर लालू प्रसाद यादव इन्हें अपने साथ रखते थे. पिछले चुनाव में ओवैसी बिहार में मुस्लिमों की आवाज के रूप में आये और मुस्लिम बाहुल्य किसनगंज जैसे क्षेत्रों से खूब वोट बटोरे. विभेदकारी, खरी-खोटी और सम्प्रदायवादी बातें करने वाले ओवैसी इस बार भी बहुत-कुछ मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ खींचने में कामयाब होंगे. राम मंदिर, तीन तलाक, नागरिकता कानून , धारा 370 एवं 35 A इत्यादि मुद्दों पर ये मुस्लिमों को डराने में कामयाब रहते हैं.

 इन नेताओं ने यदि विकास के काम अपने क्षेत्र में या अन्य किसी जगह न भी किये हों तो भी उनके वोटों में कोई ख़ास कमी नहीं दीखती. करना ये होता है कि चुनाव के समय ये अपनी जाति या धर्म पर किसी भावी खतरों की बात दुहराते हैं, दुष्प्रचार करते हैं, जातिगत और धार्मिक भावनाओं को कुरेदते हैं. ये सब ऐसे मुद्दे हैं जिससे  पढ़े-लिखे और समझदार लोग भी,  हमने देखा है,  उनकी जद में होते हैं.

नीतीश कुमार कुर्मियों के एक विशेष प्रकार के नेता हैं. इन्होंने अपनी विशिष्ट छवि बनायी है. इन्होंने बिहार में विकास के बहुत काम किये हैं, इनकी छवि इमानदार नेता की है, इनके ऊपर भ्रष्टाचार के कोई गंभीर आरोप नहीं हैं, इन्होने पारिवारिक राजनीति को बढ़ावा नहीं दिया है, इनकी छवि मुस्लिम समर्थक की भी है. इस तरह इन्होंने अपनी छवि कुर्मी जाति और हिन्दू धर्म की सीमा से आगे जाकर भी बना ली है और निष्पक्ष और समझदार मतदाताओं में भी इनकी पैठ बन गयी है.  नीतीश कुमार को जातिगत और धार्मिक उन्मादी बातें उठाने की जरुरत नहीं पड़ती. लेकिन फिर भी जातिगत बंधन का सामीप्य उनको कुर्मियों का निर्विवाद नेता बनाता है और नैसर्गिक रूप से कुर्मियों के अधिकाँश वोट बिहार में उनको ही जाना होता है. जदयू (जनता दल यूनाइटेड) के निर्विवाद नेता के रूप में वह प्रतिस्थापित हैं. शरद यादव जैसे राष्ट्रीय नेता नीतीश कुमार से सैद्धांतिक मतभेद होने के बाद टिक नहीं पाए और उन्हें पार्टी छोड़नी पडी. एनडीए के साथ होने पर भी, जिसकी छवि मुस्लिम विरोधी है, जदयू को मुस्लिम वोट मिलते हैं.

बिहार के एक और नेता पप्पू यादव की चर्चा करना लाजिमी होगा क्योंकि जिस तर्क के लिए बातचीत कर रहे हैं उसको यह मजबूत करेगा. पप्पू यादव आपराधिक छवि के रहे हैं और अच्छा खासा वोट पा जाते हैं जब भी मधेपुरा, जो यादव बाहुल्य चुनाव क्षेत्र है और जो उनका गृह क्षेत्र भी है, से चुनाव लड़ते हैं, यादवों के वोट पर कब्जा जमाते हैं. मज़ा तो तब आता है जब ऐसे यादव बाहुल्य क्षेत्रों से तीन-तीन महारथी नेता एक ही जाति विशेष के वोटों के भरोसे खड़े हो जाते हैं और निरीह यादव जनता किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाती है कि अपने वोट से वह किसे कृतार्थ करे. यह बात अन्य जातियों पर भी ऐसे ही लागू होती है क्योंकि नेताओं का चयन सभी पार्टियां किसी चुनाव क्षेत्र विशेष में जाति बाहुल्य को ध्यान में रखकर ही करती है. तो बात पप्पू यादव की चल रही थी, पप्पू यादव एक बार यहाँ से विजयी भी हो चुके हैं. सिर्फ यादव होना ही उनकी योग्यता है क्योंकि और उनकी कोई योग्यता नहीं, न समाज सेवा का कोई बैकग्राउंड और न कोई सिद्धांतवादी पार्टी से कोई जुड़ाव. यादव कुल में जन्म लेकर यादव वोटों के अधिकारी ही तो हैं.

 

बनियों और व्यवसायियों के ऐसे कोई राज्य व्यापी नेता  सामान्यतया नहीं हैं जो सिर्फ जाति के आधार पर ही अपने लिए वोट लेते हों. जो प्रतिस्थापित तथ्य हैं उस आधार पर बनिए, व्यवसायी, जैन इत्यादि परम्परागत ढंग से बीजेपी को ही वोट देते आये हैं. इस तरह कह सकते हैं कि ये समुदाय निष्पक्ष और समझदार की श्रेणी में हो सकते थे किन्तु परम्परागत ढंग से इनका बीजेपी से जुड़े रहना उन्हीं अनुसूचित जातियों, यादवों, कुर्मियों, राजपूतों, भूमिहारों, ब्राह्मणों , मुस्लिमों इत्यादि की तरह के जाति तथा धर्म के आधार पर वोट देने जैसी इनकी सोच को भी दर्शाता है और हमारी जनरल परसेप्शन वाले सिद्धांत के अनुसार ही उनका वोटिंग पैटर्न बनता है.

 

बिहार जैसे राज्य में अब कांग्रेस का कोई आधार रहा नहीं. इनका वोट बैंक सवर्ण, हरिजन और मुस्लिम वर्ग माने जाते थे , जिनको धीरे – धीरे बिहार की अन्य पार्टियों ने हथिया लिया. ज्यादतर सवर्ण बीजेपी के साथ, हरिजन रामविलास पासवान या जीतन राम मांझी या सहनी के साथ और अधिकाँश मुस्लिम आरजेडी के साथ खिसक गए.

 

राज्य स्तर की पार्टियां, क्षेत्रीय पार्टियां बिहार और उत्तर प्रदेश तथा भारतवर्ष के अधिकाँश राज्यों में इसी तरह के आधारों पर वोट पाती हैं. अलग तेलंगाना की मांग को एक आन्दोलन के रूप में प्रस्थिपापित करने वाले नेता चंद्रशेखर अलग किस्म के नेता के रूप में आते हैं जो जाति और धर्म की संकीर्णता से दूर होते हैं. इसलिए वोटों का उनके हिस्से में जाना चलता रहेगा जब तक कि कोई और नेता जाति और धर्म के आधार पर जनता की भावनाओं को दूषित नहीं कर देते. बांकी सभी उत्तर एवं पश्चिम  भारत में लगभग सभी राज्यों में एक जैसा ही जाति और धर्म का फार्मूला चलता है. दक्षिण भारत में भी मिला जुला कर कुछ ऐसे ही समीकरण बनते हैं. बंगाल, असम एवं ओड़ीसा में जाति आधारित चुनाव न होते हों किन्तु धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ चलता ही रहता है.

 

अपनी जाति में ही शादी-ब्याह की विवशता, एक जाति में एक तरह की सांस्कृतिक परम्परा, एक तरह की पूजा की परम्पराएं, एक ही तरह का जाति आधारित व्यवसाय इत्यादि कुछ ऐसी बातें है जिससे लोग अपनी जाति से जुड़ाव तोड़ नहीं पाते. ईश्वर में आस्था, एक जैसी पूजा पद्धति, एक ही पूजा स्थल, एक जैसी सांस्कृतिक विरासत आदि ऐसे कारक हैं जो एक धर्म के लोगों को उस धर्म के लोगों से जोड़े रखता है. दूसरे धर्म वालों के ये सब एक दम अलग हैं और इसलिए वे अलग-अलग हो जाते हैं. एक जाति वालों का निवास स्थल एक जगह होना और उसी तरह एक धर्म वालों का एक जगह सैकड़ों वर्षों से रहते आना उनको अपनी जाति या अपने धर्म वालों से भी जोड़े रखता है. पूर्व में एक जाति वालों का दूसरी जाति वालों पर अत्याचार, उसी तरह एक धर्म वालों पर दूसरे धर्म वालों का प्रहार इत्यादि ऐसे कारक हैं जिससे लोग अपनी जाति के बीच या अपने धर्म वालों के बीच अपने को सुरक्षित मानने लगे हैं. ये सब ऐसी बातें हैं जिससे लोगों ने शायद जाति के आधार पर या धर्म के आधार पर वोट करना शुरू कर दिया यह समझ कर कि सत्ता के पास रहकर सत्ता की ताकत से अपने को अभेद्य महसूस कर सकें.

 

बड़े-बड़े नेताओं के जुड़ाव और भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका की वजह से बिहार, उत्तर प्रदेश के ज्यादतर लोग जो ऊँची जातियों से होते थे तथा जो पढ़े-लिखे होते थे कांग्रेस को वोट देते थे. पहले बहुत सारी पिछड़ी जातियों वाले, अनुसूचित जाति एवं जन जाति के लोग वोट देने भी नहीं जाते थे या जोर-जबरदस्ती वोट देने से वंचित भी किये जाते थे. विकास के काम भी ऊँची जातियों के इलाकों तक या शहरों तक ही सीमित रहे. यही कारण है कि अगड़ी जातियों में जाति के आधार पर वोट बांटने की या वोट देने जैसी बात पहले कम थी और अभी भी कम ही है. लेकिन जैसे ही जागरूकता आयी, शिक्षा का प्रसार हुआ, उपेक्षित लोगों ने अपने अधिकारों को समझा और उसी समय जातियों से प्रेरित नेताओं का प्रादुर्भाव हुआ जबकि कुछ चतुर तथा पढ़े-लिखे लोगों ने चुनाव और वोट की असीम शक्ति को समझ अपनी जाति के लोगों के वोटों को भुनाना शुरू किया उनको वोट गिराने के अधिकार का प्रयोग करवाकर.  पिछड़ी और अनुसूचित जातियों तथा जन जातियों में आरक्षण और राजनीतिक सत्ता-शक्ति के पिछड़ी और अनुसूचित जातियों और जन जातियों में धीरे-धीरे हस्तांतरण से अगड़ी जातियां अपने को शक्तिहीन समझने लगी. अपने को सुशिक्षित और योग्य होने के बाद भी सत्ता से दूर रहना उन्हें गंवारा नहीं लगा. यह उनके लिए अवसाद की सी स्थिति थी. फिर अगड़ी जातियां भी लामबंद होकर वोट करने लगी. एक दशक पहले पहली बार मायावती ने ब्राह्मणों को लोलीपॉप का वादा किया और शायद ब्राह्मणों का एकमुश्त वोट उनको मिला और वह सरकार बनाने में सफल भी हुई. पिछले कुछ चुनावों से अधिसंख्य ब्राह्मणों का झुकाव बीजेपी की तरफ रहा. उत्तर प्रदेश के चुनाव में ब्राह्मणों की भूमिका बहुत निर्णायक होती है, इसलिए आप देख रहे हैं कि विभिन्न पार्टियों के नेता ब्राह्मण क्रिमिनल के मारे जाने पर भी किस तरह ब्राह्मणों को भड़काकर उसे उत्तर प्रदेश बीजेपी सरकार के विरुद्ध करना चाह रही है.  वैसे भी पहले अगड़ी जातियां भी इस जाति और धर्म आधारित वोटिंग से पूर्णतः मुक्त नहीं थी. उत्तर प्रदेश में कमलापति त्रिपाठी ब्राह्मणों के नेता थे और उनको ब्राह्मण वोट मुश्त में मिलते थे. ललित नारायण मिश्र तथा बाद में डा. जगन्नाथ मिश्र बिहार में मैथिल ब्राह्मणों में अच्छी पैठ के लिए बिहार में जाने जाते थे.

 

धर्म के आधार पर भेद-भाव की बात तो देश के बंटवारे से भी जुडी हुई है क्योंकि धर्म के आधार पर देश को बांटा गया तो लोगों में यह भावना तो आजादी के समय से ही घर कर गयी कि मुसलमान यहाँ नहीं होना चाहिए था. फिर दंगे-फसाद से मुसलामानों में ऐसा भय व्याप्त हुआ कि वो अभी तक है और जब भी वो अपने लिए सुरक्षा का वादा किसी पार्टी वाले से पाता है उसे वोट दे देता है. इस तरह मुसलमानों के वोट कई-कई चुनाव में निर्णायक सिद्ध होने लगे और मुसलामानों के चहेते नेता जीतने लगे और उसकी चहेती पार्टियां भी अच्छी सीटें पाने लगीं. सत्ता से वो करीब होने लगे हालांकि वो अभी पिछड़े हुए हैं, जिनका कारण कुछ और है. मुसलमानों का लाम बंद होकर वोट करने के तौर-तरीकों ने हिन्दुओं को डराया और बीजेपी जैसी पार्टी ने इसको भुनाया और हिंदुत्व को भड़का कर हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण करवाने में सफलता प्राप्त की. बिहार और उत्तर प्रदेश तथा कई राज्यों में बीजेपी का यह प्रयोग काम आया हुआ है. सभी हिन्दू सिर्फ बीजेपी को ही वोट नहीं देते तथा लामबंद होकर एक साथ मुसलामानों के नेतृत्व के विरुद्ध सब के सब वोट नहीं देते हैं, किन्तु इस तरह वोट करने वाले हिन्दुओं के प्रतिशत में बड़ा उछाल आया हैं. ऐसे मतदाता जो जातिगत संकीर्णता से दूर रहना चाहते थे उनके लिए एक विकल्प हिंदुत्ववाद का बन गया था. इस तरह भारतीय जनता पार्टी पहली बार जोर शोर से  आडवाणी जी की रथ यात्रा तथा विवादित मस्जिद के गिराने के पहले तथा बाद में अयोध्या विवाद को भुनाने में सफल हुई. पढ़े-लिखे लोगों में अटल बिहारी वाजपेयी जी के विशाल व्यक्तित्व के प्रति भी आदर भाव था जिसे उनके लिए वोटों में तबदील होते देखा गया. अगड़ी जाति वाले जो निष्पक्ष राय रखते थे उन्होंने बीजेपी को खूब अपनाया. एक जनरल परसेप्शन है कि अभी भी बहुत संख्या में सुशिक्षित लोग बीजेपी के साथ हैं जो पहले कांग्रेस के साथ हुआ करते थे. आतंकवाद, देश की सुरक्षा के मामले, हिंदुत्व, भ्रष्टाचार एवं काले धन और विकास के मुद्दे पर निष्पक्ष राय वाले अधिसंख्य लोग बीजेपी के साथ हैं. इस बार तो राम मंदिर का भी शिलान्यास हुआ है, और जिस तरह मुस्लिम समुदाय के कुछ नेता और कुछ और तथाकथित सेकुलर पार्टियों के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर, बाबरी मस्जिद के पक्ष में तल्ख टिप्पणी की यह बहुत सारे हिन्दू वोटों को बीजेपी की तरफ ध्रुवीकृत करेगी एवं मुस्लिम वोट बिहार में आरजेडी या ओवैसी की तरफ ध्रुवीकृत होंगे. तीन तलाक के मुद्दे , शिया-सुन्नी के भेद एवं नागरिकता क़ानून आदि को ख्याल में रखकर कुछ मुस्लिम महिला, शिया मुस्लिम एवं कुछ बुद्धिजीवी मुस्लिम बीजेपी की तरफ भी खिसकते से बताये जाते हैं. छद्म धर्म निरपेक्षता की वजह से भी हिन्दू वोटों का बीजेपी की तरफ सरकाव माना जाता है.

 

जाति और धर्म के समीकरण का खेल ऐसा है कि पूरे भारत वर्ष में कोई भी पार्टी इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकती और जब भी उम्मीदवारों का चयन होता है इन्हीं तथ्यों और जातिगत तथा धर्म आधारित जनसँख्या के आंकड़े को ध्यान में रखकर ही किया जाता है. जनरल परसेप्शन तो ऐसा है कि सिर्फ राष्ट्र हित के मुद्दे पर, विकास के मुद्दे तथा वैयक्तिक योग्यता के आधार पर हिंदुस्तान का कोई भी नेता किसी भी क्षेत्र से चुनाव में जीतने का माद्दा नहीं रखता, यहाँ तक कि वर्त्तमान में देश का सर्व श्रेष्ठ एवं करिश्माई नेता नरेंद्र मोदी भी नहीं.

 

अब कुछ जातिगत और धर्म आधारित वोटों के प्रतिशत पर नज़र डालें. पिछली जनगणना के समय बिहार में हिन्दुओं की आबादी 82.69% एवं मुस्लिमों की आबादी 16.87% थी. इस बार के चुनाव में 3.45  करोड़ महिला एवं 3.8 करोड़ पुरुष मतदाता मिलाकर कुल 7.25  करोड़ मतदाता हैं. यदि इसे हिन्दू और मुस्लिम मतदाताओं में बाँटें तो 6.0 करोड़ हिन्दू और 1.25 करोड़ मुस्लिम मतदाता हैं , बांकी धर्मावलम्बी लगभग नगण्य हैं और धर्म के नाम पर वोट बंटने पर भी एक-आध चुनाव क्षेत्र को छोड़ कर शायद ही कोई प्रभाव दिखा पाएंगे. हिन्दुओं में विभिन्न जाति के मतदाताओं का अनुमानित प्रतिशत इस प्रकार होगा :

 

यादव : 15 % ; ब्राह्मण : 6 % ; भूमिहार ब्राह्मण : 5 % ; राजपूत : 5.5 % ; कायस्थ : 1.5 % ; कुशवाहा : 6.5  % ; बनिया : 6 % ; तेली : 3 % ; कुर्मी : 4 % ; दलित : 16 %( दुसाध : 4%, मुसहर : 3 %; चमार : 5%) .( जाति नाम से आंकड़े लिखने का हमें खेद है ).

 

  मुस्लिम कुल मतदाताओं का करीब 17 % है.

 

बिहार के सम्बन्ध में यदि यह मान लिया जाय कि एनडीए की बीजेपी, जेडीयूए नीतीश कुमार के नेतृत्व में, लोजपा राम विलास पासवान के नेतृत्व में एवं हम जीतन राम मांझी की पार्टी मिलकर लडती है तो ये पार्टियाँ करीब 40-50 % वोटों का प्रतिनिधित्व करेगी. महागठबंधन जिसमें आरजेडी , कांग्रेस, एवं उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी शामिल होगी और साथ में चुनाव लडेगी तो इसका प्रतिनिधित्व करीब 28-32% वोटों के लिए होगा , मुसलमानों का कुछ प्रतिशत वोट ओवैसी भी बांटेंगे. आज की खबर के मुताबिक़ यदि राम विलास पासवान के बेटे चिराग पासवान एनडीए से अलग चुनाव लड़ते हैं और यदि महागठबंधन में शामिल नहीं होते हैं , जिसकी संभावना अत्यंत ही सीमित है , तो भी इस जाति एवं धर्म आधारित चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सत्ता पर काबिज होएगी. बीजेपी अकेले चुनाव लड़ने का साहस नहीं कर सकती क्योंकि मुस्लिम वोटों के एक मुस्त वोट में भाग लेने की संभावना रहती है , ऐसे में अधिकाँश यादव वोटों पर कब्जा जमाने वाली आरजेडी के साथ  MY समीकरण के  सहयोगी मुस्लिम मतदाता लामबंद हो सकते हैं क्योंकि वे बीजेपी को सत्ता से किसी कीमत पर दूर रखना चाहेंगे. कुछ प्रतिशत वोट कांग्रेस का भी तो महागठबंधन को मिलेगा ही. ऐसे में मुकाबला कांटे का भी होगा. इस तरह की परिस्थिति में तब नीतीश कुमार के भी पाले बदलने की संभावना हो सकती है. 

 

एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कोरोना की वजय से बहुत सारे बिहारी मजदूर इस बार चुनाव में बिहार में उपस्थित रहेंगे ,यदि ये कोरोना में भी वोट देने निकल सके तो परिणाम पर बहुत बड़ा प्रभाव डालेगा क्योंकि सामान्यतया बिहार में मतदान का प्रतिशत कम होता है. एक बात और जो कि बहुत ही महत्त्वपूर्ण है पिछले लगभग तीन दशकों से बिहार जैसा निष्पक्ष मतदान बहुत कम राज्यों में होता है. छोटे तबके के लोग खुलकर निर्भीक होकर मतदान में भाग लेते हैं. किसी जाति या किसी  समुदाय विशेष  के लोगों को वोट देने से रोकने की कोई घटना बिहार में शायद ही सुनने को मिलती है. बंगाल में जहां जाति आधारित वोट नहीं होते लोग निर्भीकता से वोट डाल नहीं सकते, यहाँ यदि पता हो कि कोई समूह विशेष किसी पार्टी विशेष को वोट देंगे तो अन्य मजबूत समूह उसे वोट देने से रोकते भी हैं और इससे यहाँ चुनाव में हिंसा बहुत होती है.

 

अंत में बात समाप्त करते हुए यह कहना चाहेंगे कि यदि चीन के साथ सीमा पर कोई असामान्य नहीं घटित होता है , यदि घटित होता है तो संदेह नहीं एनडीए देशभक्ति एवं राष्ट्रीयता के नाम पर बाज़ी मार ले जाएगी, बिहार पूरी तरह जाति एवं धर्म आधारित चुनावी नमूना पेश करेगा क्योंकि देश के सर्वश्रेष्ठ एवं एकमात्र करिश्माई नेता नरेंद्र मोदी को कोरोना की वजह से बिहारी जनता के बीच में जाकर चुनावी भाषण का मौक़ा नहीं मिलेगा.

 

अमर नाथ ठाकुर , पनाश, महीशबथान, साल्ट लेक कोलकाता -700102 thakuran@rediffmail.com ; thakuran.blogspot.com

 

 

 

 

धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन...