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Sunday, 6 November 2016

भगवान श्री रामकृष्णदेव ने यह निम्नलिखित रहस्य इतने स्पष्ट ढंग से सबका अनुशीलन करने के बाद बताया । आप दंग रह जाएंगे किन साधारण उदाहरणों से उन्होंने यह बात बतायी .................

"एक व्यक्ति जंगल से बाह्य से आकर बोला , वृक्ष के नीचे एक सुन्दर लाल जानवर देखकर आया हूँ । और एक बोला , मैं तुम्हारे से पहले उसी पेड़ के नीचे गया था – वह तो हरा है , मैं ने अपनी आँखों से देखा है । और एक व्यक्ति बोला , उसे मैं  खूब जानता हूँ  , तुम लोगों  से  पहले मैं गया था – वह नीला है । और दो जन थे । वे   बोले ,  पीला  और  खाकी – नाना रंग का । अन्त में खूब झगड़ा लग गया । सभी समझते हैं , मैं ने जो देखा है , वही ठीक है । उनका  झगड़ा  देखकर  एक व्यक्ति ने पूछा , बात क्या है भाई ? जब समस्त विवरण सुन लिया , तब बोला , मैं उसी वृक्ष के नीचे रहता हूँ ; और वह जानवर क्या है , मैं पहचानता हूँ । तुम प्रत्येक जन जो-जो कह रहे हो , वह समस्त सत्य है ; वह गिरगिट है – कभी हरा , कभी नीला इसी प्रकार नाना रंगों का होता है ! और कभी देखता हूँ , बिल्कुल भी कोई रंग नहीं होता । निर्गुण । ईश्वर साकार भी है निराकार भी । ”

“ तो फिर ईश्वर को केवल साकार कहने से क्या होगा ? वे श्रीकृष्ण की न्यायीं मनुष्य-देह धारण करके आते हैं , यह भी सत्य है ; नाना रूप लेकर भक्त को दर्शन देते हैं , यह भी सत्य है । और फिर वे निराकार , अखण्ड सच्चिदानन्द हैं , यह भी सत्य है । वेद  में उनको साकार , निराकार दोनों ही कहा है ; सगुण कहा है , निर्गुण भी कहा है । ”

अपने शिष्यों से ठाकुर श्री रामकृष्ण कहते थे :

“ मैं ने हिन्दू , मुसलमान , ईसाई सभी धर्मों का अनुशीलन किया है ,  हिन्दू धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों के भिन्न – भिन्न पथों का भी अनुसरण किया है ... मैं ने देखा है कि उसी एक भगवान की तरफ ही सबके कदम बढ़ रहे हैं , यद्यपि उनके पथ भिन्न – भिन्न हैं । तुम्हें भी एक बार प्रत्येक विश्वास की परीक्षा तथा भिन्न – भिन्न पथों पर पर्यटन करना चाहिये । मैं जिधर भी दृष्टि डालता हूँ  उधर ही हिन्दू , मुसलमान , ब्राह्म , वैष्णव व अन्य सभी संप्रदायवादियों को धर्म के नाम पर परस्पर लड़ते हुए देखता हूँ । परन्तु वे कभी इस बात पर विचार नहीं  करते कि जिसे हम कृष्ण के नाम से पुकारते हैं , वही शिव है , वही आद्याशक्ति है , वही ईसा है , वही अल्लाह है , सब उसी के नाम हैं –एक ही राम के सहस्रों नाम हैं । ”

Saturday, 5 November 2016

भ्रष्टाचार का रावण

-1-

भ्रष्टाचार का रावण बहुत गरजता है
यह फौलादी शरीर वाला है
लाल - लाल हैं इसकी आँखें
काली - काली और कड़ी- कड़ी मूंछें
अस्त्र - शस्त्र से  है सुसज्जित
इसके संहारक हथियारों की टंकार से
दिशाएँ थर्रा उठती हैं
जल थल और आकाश दलमलित हो उठते हैं
रुग्ण शरीर वाले विरोध का राम
पसीने से लथपथ भय से काँपता
भागते हुए छुप जाता है पहाड़ी की ओट में
कहता है वो आराम कर रहे हैं
या शक्ति संचय की तपस्या चल रही है
आश्वस्त हैं कि रावण रूपी भ्रष्टाचार का वध होगा , किन्तु समय आने पर ।
अभी तो भ्रष्टाचार सीमा के भीतर ही है
अभी क्या परवाह है !


-2-

भ्रष्टाचारी रावण के प्राण को कोई खतरा नहीं
नाना प्रकार के सुरक्षा कवच प्राप्त यह महादानव
अमृत कलश में सुरक्षित रख अपने प्राण
राज नेताओं तथा न्यायालयों की छाया में
जेड सुरक्षा प्रणाली की लक्ष्मण रेखा की परिधि में
निवास करता है
फलता - फूलता इस भ्रष्टाचारी रावण का साम्राज्य
हम सब को आकर्षित कर लेता है
अब हम लोग इसकी ही पूजा करते हैं

हम सब आकंठ भ्रष्टाचार में ही डूबे हुए उपला रहे हैं
हम लोग आनंद में हैं

तपस्या में लीन राम अभी तक ओझल हैं
वैसे भी भगवान को पाना कितना कठिन है
अब राम की क्या जरूरत है
और अभी क्या परवाह है !

अमर नाथ ठाकुर
मेरठ , 5 नवम्बर , 2016 ।









Wednesday, 2 November 2016

बिहार का चुनाव

बिहार का चुनाव !

वर्षों का कांग्रेसी शासन।कांग्रेसी करते रहे और करते ही रह गये।पूरा न कर पाये।कुछ भी नहीं हुआ और बिहार कराहता रहा ।

कर्पूरी जी भी कुछ करना चाह रहे थे शायद समय ज्यादा न मिला।
एक दशक से ज्यादा उसी समय जातीय संघर्ष का दौर चला - बैकवर्ड-फॉरवर्ड की लड़ाई।जनजागरण जरूर हुआ होगा किन्तु बिहार की शिक्षा व्यवस्था चरमरा गयी। क़ानून-व्यवस्था का गिरता स्तर और बढ़ता भ्रष्टाचार बिहार का पर्याय हो गया।

फिर लालू का युग आया। इन्होंने ने तो जैसे ठान रखा था, कुछ नहीं करना है। और इन्होंने कुछ नहीं किया। बिहार रसातल में चला गया। यही दौर था जब गाली और बिहारी एक दूसरे के समानार्थी होने लग गये। लालू के फूहड़ सस्ते मजाकिये अंदाज ने स्तर और गिरा दिया। अपहरण एक फलता-फूलता व्यवसाय बन गया।

फिर नीतीश का उदय होता है जब कि जनता ने काफी उम्मीदें पाली हुई थीं। कुछ काम बना। जनता ने साँसें लेनी शुरू कर दी थीं। क़ानून-व्यवस्था की हालत सुधरी ,अपहरण कम होने लगे । भ्रष्टाचार भी कम हुआ । सड़क और बिजली के क्षेत्र में भी काम होने  लगे। आंगनबाड़ी,शिक्षामित्र  आदि अनेक तरह की बहालियाँ हुईं। कुछ लाख शिक्षकों की भी बहाली हुई। गुणवत्ता में ये सब खरे नहीं थे । फिर भी इतने रोज़गार पाकर बिहार की जनता में नयी आशा का संचार हुआ। लोग जाति आधारित झगड़े फसाद को भूलने लग गये। किन्तु इन सबका सारा श्रेय नीतीश को ही नहीं दिया जा सकता है, उनके पीछे भारतीय जनता पार्टी का सशक्त समर्थन और सहयोग भी था ।

 किन्तु शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में तो जो भी हुआ उसे ऊँट के मुँह में जीरा समान कार्य ही कहा जा सकता है।
जो हो बिहारियों की घर वापसी शुरू नहीं हुई और न ही बिहारियों का पलायन रुका। लगता है अभी प्रवासी बिहारी कुछ और देखकर आश्वस्त हो लेना चाहते थे। लेकिन बिहार के नसीब में अच्छे दिन नहीं लिखे थे। नीतीश और भाजपा  झगड़ पड़े। बिहार की जनता के हित में ये लड़ाई रोक सकते थे। लड़ाई किन्तु रुकी नहीं। बिहार का दुर्भाग्य जो था ।

 किसकी गलती थी गहराई में अभी नहीं जाना, किन्तु नीतीश का अहंकार जरूर परिलक्षित हुआ।

बिहार के विकास की पटरी उखड़ गयी थी । बिहार तेजी से नीचे की तरफ जाने लगा। नीतीश अपने धुर विरोधी कांग्रेसी और लालू के नजदीक आकर अपनी सरकार के स्थायित्व के लिये ज्यादा मेहनत करने लग गये। बिहार के विकास का एजेंडा गौण हो गया। राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गयी।

नीतीश की गिरती लोकप्रियता का परिणाम यह हुआ कि अगले चुनाव में नीतीश पूरी तरह धराशायी हो चुके थे। नरेंद्र मोदी का भगवा झंडा आसमान में लहरा रहा था। नीतीश ने जनता की  नब्ज़ नहीं पहचानी । उसका अहंकारी मन पराजय को नहीं स्वीकार कर सका।

मांझी को मुख्यमंत्रीत्व सौंप कर एक अनूठा एवं आदर्श उदाहरण पेश करना चाहते थे, लेकिन उनके मन का मैल ऊपर आ गया। वह लालू और सोनिया स्टाइल में मांझी को हांकना चाहते थे। मांझी राबड़ी और मनमोहन से आगे निकले।फिर नीतीश ने अपना असली रंग दिखा ही दिया । नीतीश सत्ता पर फिर से कब्ज़ा कर बैठे। सत्ता का अतीव लालच नज़र आया जनता को नीतीश की कारगुज़ारियों में।

नीतीश के द्वारा लालू का समर्थन लेना सबसे बड़ा पहलू बनता है नीतीश के कमज़ोर राजनीतिक चारित्रिक व्यक्तित्व का। जनता  लालू के जंगल राज को अभी पूरी तरह भूली  भी नहीं थी।जनता के अध पके घाव को नीतीश ने फिर से खरोंच लगा दिया था। स्राव होने लगा।

चुनाव के इस अंतिम चरण में जनता क्या यह समझती है ----

1. कांग्रेसियों के समय में  15 पैसे सरकारी पैसे जनता तक रिस - रिस कर आते थे ।
2. लालू के समय में जनता तक पैसे रिसने बंद हो गए थे।
3. नीतीश के समय में 25-30 पैसे तक जनता तक रिस कर आने लगे थे ।

तो जनता उसको क्यों न मौका दे जो पूरा का पूरा सौ पैसे जनता तक रिस कर आने देने का वादा करे। वैसे भरोसा क्या है ? जो किन्तु फेल हो गये उस पर फिर क्यों का भरोसा।

जनता को यह समझना होगा कि

1. कांग्रेस काम करती रही , करती ही रह गयी और कर ही नहीं सकी।इसलिए कुछ हुआ ही नहीं।
2. लालू ने करना ही नहीं चाहा और इसलिए कुछ नहीं हुआ।
3. नीतीश करना चाह रहे थे लेकिन कर ही नहीं सके।

इसलिए मौका उसे मिले जो अब नया हो , करना चाहता हो। और कोई च्वाइस भी तो नहीं है। बार - बार किसी आज़माए हुए को फिर क्यों आज़माऍं।

जय बिहार !
जय हिन्द !

अमर नाथ ठाकुर
2 नवम्बर ,2015, कोलकाता ।

Tuesday, 1 November 2016

मैं कुत्ता बनना चाहता हूँ


मैं ने देखा एक हकलाता कुत्ता
मालिक के साथ वाक करते हुए
मालिक के साथ समानान्तर चलते हुए
मालिक खड़ा होता है
वह भी खड़ा हो जाता है
मालिक किसी से बात करता है
वह सुनता रहता है
मालिक दौड़ता है
वह भी दौड़ता है
चहलकदमी करते मालिक के साथ
वह कुत्ता भी जमीन सूँघते चलता रहता है
मैं रोज़ देखता हूँ एक हकलाता कुत्ता ....

मालिक के साथ
मालिक की छाया की तरह
मालिक की रक्षा में
मालिक की ढाल बनकर
हर संदिग्ध पर भौंकता है
वह वफादार कुत्ता ...
पूँछ हिलाता जमीन नोंचता
वह नुकीले दाँतों वाला नंगा कुत्ता ....
मैं रोज़ देखता हूँ एक हकलाता कुत्ता .....
मैं रोज देखता हूँ एक वफादार कुत्ता ......

मालिक जब पुकारता है
मालिक जब सहलाता है
कूद पड़ता है पूँछ हिलाते हुए
मालिक के कन्धे पर दोनों पैरों को डालकर
मालिक के होंठों को चूमते हुए
हकलाता हुआ वह समझदार कुत्ता ....


वह मालिक के बच्चे को पहचानता है
वह मालकिन को पहचानता है
और हर अनजाने पर भौंकता है वह सावधान कुत्ता
खुद जागकर मालिक को चैन की नीन्द सुलाता है
वह दमदार पहरेदार कुत्ता ....

क्या पाता है बदले में वह कुत्ता
थाली का जूठन और हाड़-माँस का अवशेष
न कोई सैलरी न कोई बोनस
और न रहता कभी कोई प्रोमोसन का भूखा
फिर भी होता है वह कर्मठ और ईमानदार कुत्ता
वह तंदुरुस्त हँसता मुस्कराता कुत्ता ...
मैं रोज़ देखता  हूँ एक वफादार कुत्ता .....



मैं कुत्ते की कर्त्तव्य निष्ठा , ईमानदारी , वफादारी का कायल हूँ
क्योंकि चोर , उचक्के और डाकू डरते हैं कुत्ते से
आज तक कोई कुत्ता नमक हराम  नहीं हुआ
आज तक किसी कुत्ते पर भ्रष्टाचार
 या विश्वासघात का कोई आरोप नहीं लगा
इसलिये कोई कुत्ता कभी बर्खास्त नहीं हुआ
इतिहास में नहीं कोई ऐसा दस्तावेज़
कि किसी कुत्ते पर कोई चार्जशीट हुआ

आज तक नहीं बनाया किसी कुत्ते ने कोई यूनियन !
अकेला कुत्ता अपना कर्त्तव्य करता रहा
मालिक का खाया नमक चुकाता रहा ।
आज तक नहीं मिला किसी कुत्ते को कोई पद्म पुरस्कार
न कोई सर्टिफिकेट अथवा वीरता का कोई चक्र
जब भी मालिक पर कोई आक्रमण हुआ
पहली गोली कुत्ते ने खायी

इसलिये कुत्ते की मौत पर हर मालिक रोया है ।



आप में से कितने कुत्ता बनना चाहते हैं
छिः मैं यह क्या बोल गया !
यह तो परले दरजे की गाली है
लेकिन इस तिरस्कारी विचार से
कुत्ते को कितना दुःख होता होगा
क्या आपने सोचा है ?
लेकिन मैं ने सोच लिया है
अपनी बात बताना चाहता हूँ
मैं तो कुत्ता बनना चाहता हूँ
अपनी कम्पनी का कुत्ता
क्योंकि मैं कम्पनी के टुकड़ों पर ही तो पल रहा हूँ
फिर क्यों न बनूँ अपनी कम्पनी का कुत्ता
वफादार , कर्त्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदार कुत्ता !
फिर मैं भ्रष्टाचारियों पर भौंक पाऊँगा
इसे लूटने वालों को काट खा पाउँगा
जिस दिन हम सब कुत्ते बन जाएँगे
कंपनी रफ़्तार में चलने लगेगा और
तभी हमें हाड़- माँस का लाभांस मिलता रहेगा !!!


अमर नाथ ठाकुर
30 अक्टूबर , 2016 , मेरठ ।






Wednesday, 12 October 2016

अभी क्या परवाह है



-1-

माँ ने अपना कटार नहीं चलाया
माँ आयी और चली गयी
चण्ड-मुण्ड और शुम्भ-निशुम्भ को पुचकार कर
महिषासुर और रक्त-बीज को आशीर्वाद देकर ।
माँ आखिर माँ होती है
दया और करूणा की मूर्त्ति ।
माँ से उम्मीद नहीँ कि अपने कुपुत्रों का तिरस्कार करे
माता कुमाता नहीं हो सकती ।
माँ को आशा है कि उनका पुत्र सुधरेगा ।
और हर बार की तरह इस बार भी विजया दशमी के बाद चांस देकर चली गयी है माँ दुर्गा....

-2-

राम के अग्नि वाण से रावण का पुतला इस बार भी धू-धू कर जला
किन्तु रावण अट्टहास करता फिर बाहर आ गया
शूर्पणखा , कुम्भ - कर्ण और मेघनाद सब धूम-चौकड़ी करते ही रहे
मर्यादा पुरुषोत्तम राम से आशा नहीं कि मर्यादा का उल्लंघन करें
और बात-बात पर तरकश से संहारक वाण निकालें
वह इन्हें  सुधरने का भरपूर मौका दे रहे हैं हर बार की तरह इस बार भी  ।
दशहरे के बाद मर्यादा में रहकर भरपूर चांस देकर विदा लेकर चले गये हैं मर्यादा पुरुषोत्तम राम .....

माँ चण्डी की दया और करुणा और
पुरुषोत्तम राम की मर्यादा
के अधीन ही सब आतंक और लूट-मार है ,
अभी क्या परवाह है ।

अमर नाथ ठाकुर
12 अक्टूबर 2016
कोलकाता / मेरठ ।


Wednesday, 5 October 2016

मैं खुद बॉस बन जाता हूँ



मेरा सीधापन और मेरी दो टूक बातें 
मेरा देहातीपन और मेरा सादा वस्त्र 
तिस पर मेरा साधारण केश विन्यास 
बिना विशेष प्रतिरोध मेरा हाँ में हाँ मिलाना 
मेरा बॉस प्रथम मिलन में ही प्रभावित हो जाता है
मेरी समझ - बूझ या किसी नियोजित ढंग से ऐसा नहीं होता 
मैं तो ऐसा ही हूँ 
मेरा बॉस इसे मेरी कमजोरी समझ 
मुझे गलत आकलित कर लेता है 
और मुझे अपने वाग्जाल में फंसाने की कोशिश करता है 
मैं बॉस के जाल में फँस नहीं पाता हूँ
बॉस मुझे लगाम नहीं पहना पाता है 
क्योंकि मेरा सीधा रास्ता बिना गड्ढे वाला होता है 
मेरा रास्ता शुरू से अन्त तक ले जाने वाला होता है 
 नियमों और ईमानदारी के सपाट मुक्त बंधनों वाला
फिर मेरा बॉस मुझसे नफ़रत करने लगता है 
और शीघ्र अन्तिम मिलन होता है 
 बॉस शुभकामनाओं सहित मुझे गुड बाय बोल देता है 
खबर दूर तक फैल जाती है 
मेरे भावी बॉस से भी मिलन का सारा प्रोग्राम रद्द हो जाता है 
मिलने के पहले ही गुड बाय हो जाता है 
फिर मुझे अरसे तक कोई बॉस ही नहीं मिलता है 
मैं शत-प्रतिशत जन सेवा में नहीं दे पाता हूँ 
क्योंकि मैं इम्प्रैक्टिकल जो हूँ ,
और मेरी कोशिश होती है फिर अकेले चलने की ।
मैं गुनगुनाने लगता हूँ ...
एकला चलो रे 
डाक दिये जदि ना कियो आसे
एकला चलो रे 
और एक दिन मैं खुद बॉस बन जाता हूँ 
मेरा किन्तु फिर कोई सबऑर्डिनेट नहीं होता ।।

अमर नाथ ठाकुर
मेरठ , 2 अक्टूबर , 2016 ।

Tuesday, 20 September 2016

मैं सनातनी हिन्दू हूँ

मैं सनातनी हिन्दू हूँ ।

मैं अद्वैतवादी , द्वैतवादी या विशिष्टाद्वैतवादी में से कुछ भी हो सकता हूँ । इसके लिये मेरे ऊपर कोई भी बन्दिश नहीं है ।

मैं शैव हो सकता हूँ , शाक्त या वैष्णव । मैं कबीर पंथी , नानक पंथी इत्यादि में से कुछ भी हो सकता हूँ । मैं मूर्त्ति पूजक हो सकता हूँ या नहीं भी । मैं मन्दिर पूजा के लिये जा सकता हूँ  या नहीं भी ।  मैं नाना प्रकार के पेड़ों , पक्षियों , जानवरों , नदियों , पहाड़ों की पूजा कर सकता हूँ  या नहीं भी । मैं  व्रत रख सकता हूँ या नहीं भी । मैं मन्त्रों का जाप कर सकता हूँ , नहीं भी ।

मैं शाकाहारी हो सकता हूँ या माँसाहारी भी । मैं नाना प्रकार के जानवरों का माँस खा सकता हूँ  ।  मैं नाना प्रकार की मछलियाँ भी खा सकता हूँ । मुझे समाज वालों ने या धर्म के ठेकेदारों ने समाज या धर्म से निष्कासित या बहिष्कृत नहीं किया या इसकी कोई धमकी भी नहीं  दी ।

मैं मन्दिर जा सकता हूँ , मज़ार , मस्ज़िद , गुरुद्वारे में या चर्च में जाकर ईश्वर की वन्दना कर सकता हूँ । मुझे माथे पर रुमाल या जाली दार टोपी लगाने में ज़रा भी हिचक नहीं होती । मैं धोती या लूँगी या पतलून बेहिचक धारण कर लेता हूँ । इन धार्मिक स्थलों में , इन अजीबोगरीब पोशाकों में मुझे ईश्वर के प्रति निष्ठा या श्रद्धा दर्शाने में कोई संकोच नहीं हुआ । मेरा धर्म कभी इसमें बाधक नहीं हुआ । मुझे सिख , जैन , बौद्ध , मुस्लिम , पारसी , यहूदी या ईसाई धर्मावलंबियों से कोई परहेज़ नहीं । इन सबों से हमारी सनातनी परम्परा ने कभी घृणा या द्वेष नहीं सिखाया । मैं रामकृष्ण , साईं बाबा को सामान दृष्टि से पूजता हूँ  । मैं कई चर्च में जाकर क्राइस्ट के सामने सर नवा कर आया हूँ । मैं अपनी अनेक दिनों की इच्छा पूर्ति के लिये अजमेर शरीफ भी शीघ्र जाना चाहता हूँ । हमारी परम्परा , हमारा धर्म , हमारी संस्कृति हमें ऐसा करने को हमें प्रेरित करते हैं ।

हमारा धर्म घृणा या हिंसा का कभी महिमा - मण्डन नहीं करता । जाति - प्रथा या स्त्रियों के सम्बन्ध में आपत्ति जनक बातों के उल्लेख वाले धार्मिक ग्रंथों के हिस्सों को सनातनी हिन्दूओं ने तहे दिल से नकारा है , तिरस्कृत किया है । इन भागों की खुले आम निन्दा होती है । ऐसी निन्दा या आलोचना पर कभी कोई रोक या धमकी का अहसास नहीं हुआ ।

हमारी सीमित जानकारी में हमारे सनातन धर्म में जिहाद , फतवा या काफ़िर जैसे शब्दों का समतुल्य शब्द नहीं । यदि ऐसा हो तो उसे नकारने या त्यागने में कोई भी प्रतिरोध नहीं । जो सबका है वह सनातन धर्म है । जो सबको स्वीकारता है वह सनातन धर्म है । जो आज़ादी देता है , जहाँ बंधन नहीं , भेद-भाव नहीं ,घृणा या द्वेष नहीं जो सिर्फ प्रेम और विश्वास का पाठ फैलाता है वह सनातन धर्म है । हम यह कहना पसंद करते हैं कि जहाँ प्रेम और करुणा , विश्वास , आज़ादी , श्रद्धा और निष्ठा इत्यादि का वास हो वहीं सनातन धर्म है ।


सिर्फ सनातन हिन्दू धर्म ही सार्वभौमिकता की कसौटी पर खरा उतरता दीखता है । सनातन हिन्दू धर्म में दुनियाँ की अन्य सारी धार्मिक मान्यताओं को आत्मसात करने की क्षमता है ।

अमर नाथ ठाकुर , 23 जुलाई , 2016 , कोलकाता ।

धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन...