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Saturday, 6 July 2013

कितनी-कितनी नींदें सजाए

मेहनत,थकावट और पसीने 
उमर भर चलने-फिरने 
दौड़ने के सपने 
न जाने कितनी-कितनी  नींदें सजाए
और हम चलते जाएँ  ---

हर क्षण काम के साए 
काम का बोझ तो भी नहीं सताए 
ये तो मन को भाए 
और हम गाते गाएँ  ---

धमकियां इज्ज़त लूटने की 
चमकियां हंगामा मचाने की 
हुमकियां धैर्य के चरमराने की 
क्या-क्या नहीं दुःख पाए
और हम गिरते डगमगाएँ ---

कटाक्ष और फजीहत 
फिर बासी सड़ी गालियाँ 
व्यंग्य -भरी तालियाँ 
छद्म प्रेम-दान  की चालाकियाँ 
बार-बार सताए 
और हम जार-जार रोएँ ---


अमर नाथ ठाकुर , ५ जुलाई २०१३ , कोलकाता.

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