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Friday, 13 March 2015

माँ तूँ साकार तूँ ही निराकार



भवदारा  भयहारा  नाम सुना है तुम्हारा
तारो या न तारो तुम्हारे ऊपर है भार सारा
माँ तुम हो ब्रह्मांड व्यापक तुम ही ब्रह्मांड धारिणी सारा
न जाने तुम काली हो या हो राधा रानी
तुम घट-घट निवासिनी ओ जननी
मूलाधार कमल की कुंडलिनी
सुषुम्ना में ऊपर उठती स्वाधिष्ठान तक
फिर शनैः-शनैः चतुर्दल अधिष्ठान तक
चतुर्दल में निवासनेवाली कुलकुंडलिनी
षटदल वज्रासन में  वसनेवाली मानिनी
उससे ऊपर नाभिस्थान में मणिपुर चक्र धाम
वहाँ नीलवर्ण दशदल कमल सुनाम
सुषुम्ना पथ से आओ जननी
कमल कमल में रुको कमल रूपिणी
उसके ऊपर सुधा सरोवर
रक्त वर्ण द्वादश दल पद्म मंदिर
कर दो माँ पादपद्म से पद्म प्रकाश
हृदय में विभावरी तिमिर विनाश
और ऊपर जो है कंठस्थल
धूम्र वर्ण पद्म षोडशदल
इस पद्म के मध्य में अंबुज प्रकाश
यह आकाशरुद्ध सारा ही है आकाश
और ऊपर ललाट स्थान में द्विदल कमल
जिसे पाने को हर कोई  विह्वल 
जहां हो जाता मन सदा आबद्ध
आनंद में रहना चाहता मन वहाँ निबद्ध  
उससे भी ऊपर मस्तक में अति मनोहर
सहस्रदल पद्म है क्योंकि उनके  भीतर
परम शिव है स्थित तहाँ  
माँ आद्याशक्ति जितेंद्रिय जहाँ
ध्यावें योगींद्र मुनीन्द्र नगेन्द्र्कुमारी
वहाँ ही शिव की शक्ति माँ तुम सारी  
तुम आद्याशक्ति तुम पंचतत्व तुम तत्वातीत निर्विकार
माँ पार करा दो भवसागर नाश करो वासना अहंकार
हे माँ तूँ साकार तूँ ही है     निराकार !

कथामृत से साभार , रामकृष्ण परमहंस द्वारा गाये जाने वाले बांगला भजन का मेरे द्वारा हिन्दी रूपान्तरण ।

अमर नाथ ठाकुर , 13 मार्च , 2015 , कोलकाता । 

Wednesday, 18 February 2015

क्या विचित्र है मुस्कराना





चमचई
  
हम वही राग अलापते हैं  जो वह सुनना चाहता है
हम वही कार्य करते हैं  जो वह करवाना चाहता है
हम वही आलेख लिखते हैं जो वह लिखाना चाहता है ।
  
फिर वह हमेशा मुस्कराता रहता है
हम  भी सब समझ मुस्कराते रहते हैं ।

ईमानदारी

हम जो भी राग सुनाते हैं वह आनंद पूर्वक सुन लेता है
हम जो भी कार्य करते हैं वह अनुमोदन करता जाता है
हम जो भी टिप्पणियाँ लिखते हैं वह सहमति प्रदान करता है । 

फिर निश्चिंत हो वह मुस्कराता रहता है  
और हम भी क्यों सब समझ मुस्कराते रहते हैं ।

दादागिरी

हम कुछ भी सुनाएँ वह नहीं सुनता है
हम कुछ भी करें वह नहीं स्वीकारता है
हम कुछ भी लिखें वह नहीं पढ़ता है ।

और फिर वह हमें देख  मुस्कराता रहता है
हम भी अपनी कमजोरियों पर मुस्करा भर रह जाते हैं ।

भरोसा

हम जब तक नहीं सुनाते वह किसी की नहीं सुनता है
हम जब तक नहीं करते वह होने का इंतजार करता है
हम जब तक नहीं लिखते वह किसी की नहीं पढ़ता है ।

हमारी उपस्थिति से ही वह मुस्कराने लगता है
हम भी उसकी समीपता पर मुस्करा लेते हैं ।


अमर नाथ ठाकुर , 18 फरवरी , 2015 , कोलकाता ।  

Thursday, 29 January 2015

जितने लोग उतने धर्म


 -1-

क्या लोग वहाँ अपाहिज नहीं होते
क्या लोग वहाँ बीमार नहीं होते
क्या लोग वहाँ नहीं मरते
क्या लोग वहाँ नहीं रोते ?

क्या वहाँ ठगी नहीं होती
क्या वहाँ चोरी-डाका नहीं पड़ते
क्या वहाँ घूसख़ोरी नहीं चलती
क्या वहाँ लोग गरीब नहीं होते  ?

क्या वहाँ मित्रता निभायी जाती है
क्या वहाँ रिश्ते निभाये जाते हैं
दया-करूणा-सत्य की चलन होती है  
बच्चा खोने पर माँ का दिल पसीजता है ?

क्या वहाँ खेती होती है
क्या वहाँ फैक्टरियाँ चलती हैं
क्या वहाँ व्यापार चलता है
क्या वहाँ झोंपड़ियाँ नहीं होती हैं ?

क्या दुःख आने पर आँसू झरते हैं 
क्या खुश होने पर ठहाके चलते हैं ?

  -2-
   
जो वहाँ है वही तो यहाँ है भाई
इधर कुआं है तो उधर भी है खाई
हर जगह जहर का सागर है ,
सोचो तो हर जगह अमृत की अमराई
क्योंकि एक ने ही तो यह दुनिया रचायी ।


 -3-

क्यों छोड़े कोई अपना धर्म
यदि जान ले धर्म का ये मर्म
जितने लोग उतने धर्म
सारे धर्म एक धर्म ।
फिर क्यों समरसता का खेल बिगड़े
क्यों धर्म-अधर्म के हो बखड़े
हे मानव कुछ तो करो शर्म
निभाओ अपना- अपना धर्म !

शहीद दिवस –30 जनवरी के लिए , बापू से अभिप्रेरित ।
अमर नाथ ठाकुर , 28 जनवरी , 2015 , कोलकाता ।   


Tuesday, 20 January 2015

छप्पर फाड़ कर मत देना भगवन


छप्पर फाड़ कर मत देना भगवन ,
बरसात में हम कहाँ रहेंगे ।

खिड़कियाँ जब पट रहित हैं  
दरवाजे जब ताला रहित हैं
नो इंट्री का भी न कोई बोर्ड लगाया
बेरोक –टोक चलकर आना भगवन ,
बाट जोहते हम खड़े निराधार मिलेंगे ।

ईंट पत्थर जोड़कर यह दीवार बनाया
तिनका – तिनका बटोरकर यह छत बनाया
घास – फूस की चटिया बिछाकर
दिन रात तुम्हारा ही गुण गाया
इस छत पर नाहक क्या हाथ आजमाना भगवन ,
जब आत्म – समर्पित हम खुद ही तैयार मिलेंगे ।

घास गिरेंगे , कंकड़ पड़ेंगे
सिर फटेंगे , रक्त बहेंगे
हम हाहाकार चीत्कार करेंगे
छत पर क्यों हथौड़ा चलाना भगवन ,
जब स्वागत में हम खुद ही साकार रहेंगे ।

निर्मल मन है ओठों पर तू ही विट्ठल है
जल है पुष्प है तुलसी दल है
यहाँ न कोई शबरी का जूठा फल है
तो क्यों तोड़ –फाड़ कर देना भगवन ,
जब ग्रहण कराने हम खुद ही साभार रहेंगे ।

हमारे हृदय में पैठकर
गले से लगा कर 
सिर पर हाथ फेरकर देना भगवन ,
अश्रुपूरित नयनों से हम सब स्वीकार करेंगे ।
छप्पर फाड़ कर मत देना भगवन ,
बरसात में हम कहाँ रहेंगे ।


अमर नाथ ठाकुर , 18 जनवरी , 2015 , कोलकाता ।   

Wednesday, 14 January 2015

सिंहावलोकन


बचपन के दिन थे
जब समझ थोड़ी थी
ज्ञान की पहुँच सीमित थी
तो साफ पता था
कि आप अपने थे
यह भी अपने थे
वह भी अपने थे
दुनियाँ में बहुतेरे अपने थे ।
आदर्श वाक्य था वसुधैव कुटुम्बकम । 

वर्षों बाद युवावस्था के दिन में
बहुत कुछ ज्ञान अर्जित कर चुके
तो जानने लग गए थे कि
आप भी अपने नहीं
यह भी अपने नहीं
वह तो पड़ोसी थे
जो अपने  हो नहीं सकते ।

आज उमर की इस दहलीज़ पर
जब जानने को कुछ भी नहीं रह गया है
तो जानते हैं कि
स्वयं को भी नहीं जानते ।
मन क्या सोचता है
वाणी क्या निकलती है
कर्मेन्द्रियाँ क्या कर जाती हैं ।
यह ज्ञान है या अविश्वास !

अमर नाथ ठाकुर , 14 जनवरी , 2015 (20.07.2013) , कोलकाता ।


Tuesday, 13 January 2015

पग-पग राह दिखाता असीम अनंत ज्योति



जिसका रूप नहीं
वह है हर रूप में
जिसका रंग नहीं
वह है हर रंग में
जो इस जगह नहीं
वह है हर जगह में
जिसका कोई घर नहीं
किन्तु सब हैं उसके घर में 
जिससे कोई छोटा नहीं
किन्तु जिससे कोई बड़ा भी नहीं
जो सब में है
जिसमें सब है
उसकी कोई छाया नहीं
सब किन्तु हैं उसकी छाया में
स्वयं जो अदृश्य है
किन्तु जो सबको है देखता
जिसको हम नहीं सुनते
किन्तु जो सबको है सुनता
जिसकी आहट हम नहीं पाते
किन्तु जो सबकी आहट लेता
जिसे हम नहीं गिन सकते
किन्तु जो सबकी है गिनती रखता
सबका प्रसाद वह ग्रहण करता है
सब उसका ही प्रसाद है ग्रहण करता
वह राजा की चाह में है
वह दरिद्र की आह में है  
दुश्मनों की डाह में है वह
दोस्तों की वाह-वाह में है वह
उसे नहीं कोई मार सकता
वह सबको किन्तु है तारता
नहीं उसका कोई पालन करता
वह सबका है पालन करता
उसकी नहीं है कोई काया
किन्तु सत्य उसका साया  
कौन है वह
क्या है वह
कहाँ है वह
किस कण में है वह
कण-कण में है वह
वह अक्षय अक्षुण्ण आनंद स्रोत
पग-पग राह दिखाता असीम अनंत ज्योति

स्वामी विवेकानंद से अभिप्रेरित

अमर नाथ ठाकुर , 12 जनवरी , 2015 , कोलकाता । 

Wednesday, 31 December 2014

नव वर्ष का स्वागतम



नव वर्ष का शुभागमन
नव वर्ष का वंदन ।

नव कलिका नवल किसलय
नव - नवल मंजर का आभरण
नव - नवल निर्मल शीत कण
नव - नवल कुसुमित उपवन ।
नव वर्ष का शुभागमन ।

नव संगीत नवीन भजन
नव - नवीन वंशी धुन
नव ऊर्जा से सिंचित  हर्षित मन ।
नव वर्ष का शुभागमन ।  

शोक न दुःख न गत वर्ष का क्रंदन
नूतन आशा नवल स्फूर्ति का संचारण
नवल धवल सहस्र सूर्य - किरण
नव - नवल संकल्प से नव वर्ष का पदार्पण ।
नव वर्ष का शुभागमन ।

सत करे अब असत का अपहरण
अमृत पुत्र तू क्यों करे मृत्यु को वरण
तमस का बहिर्गमन अब ज्योति का आगमन ।
नव वर्ष का शुभागमन ।

नवल परिकल्पना से झूम-झूम, बन तू नवीन मन
तंद्रा तू त्याग तन , हे विस्फारित अकुलित नयन !
ये आहट नव वर्ष का शुभागमन ।
सब मिल करें नव वर्ष का अभिनंदन
नव वर्ष का वंदन
नव वर्ष का स्वागतम  !

नव वर्ष की शुभकामनाएँ सब को !!!!!!!!!!!!

अमर नाथ ठाकुर , 31 दिसंबर , 2014 / 1 जनवरी , 2015 , कोलकाता । 

धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन...