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Sunday, 24 July 2016

दोस्ती की बुनियाद

मुझे शंका है
मैं आश्वस्त नहीं हूँ
आखिर हमारी दोस्ती की बुनियाद क्या होगी ?
अभी तक आपने अपनी जाति नहीं बतायी -
अगड़ी , पिछड़ी या दलित ?
किस राज्य के हैं  आप -
उत्तर के , दक्षिण के  या हैं  फिर पूर्वोत्तर के ?
किस धर्म के मानने वाले हैं आप ?
मुस्लिम हैं या सिख , जैन या ईसाई
बौद्ध या फिर हैं हिन्दू सनातनी ?
कौन सी भाषा में हम बतियायेंगे-
अंग्रेज़ी , हिंदी ,गुजराती , पंजाबी , मणिपुरी में
या बंगला , तमिल तेलगू अथवा मलयालम में ?
आप शाकाहारी हैं या माँसाहारी ?
आप गो- मांस का भक्षण करते हैं
बकरे का या सूअर के मांस का ?
आप धोती , लूँगी या पतलून पहनते हैं
जालीदार टोपी , पगड़ी , पाग या पटका बाँधते हैं ?
आप आर एस एस की विचार धारा से प्रभावित हैं
या आई एस आई एस की निन्दा से घबराते हैं ?
आप मोदी भक्त हैं या केज़रीवाल के अनुचर
या हैं कट्टर काँग्रेसी या और कोई दल - बदलू सच्चर ?
क्या ये ही होंगी हमारी दोस्ती की बुनियाद ?

क्या होगी हमारी दोस्ती की बुनियाद !

 भाई एक हमारा देश है और एक हमारी राष्ट्रीयता ,
क्यों न एक हमारी सोच हो क्योंकि एक जैसी हमारी विवशता ।
जब हम सब पीड़ित हैं आतंकवाद से
भ्रष्टाचार  और भाई - भतीजावाद से
गरीबी , बीमारी और अशिक्षा के अवसाद से ;
शंका मिटा दें समान दुश्मनी की बुनियाद पर
 और दोस्त बन जायें इस इक फ़रियाद पर ।


अमर नाथ ठाकुर , 21 जुलाई , 2016 , कोलकाता ।

Tuesday, 31 May 2016

खड़-खड़ ट्राम चले

खड़-खड़ खड़-खड़ ट्राम चले ।

नहीं कोई धुआँ नहीं कोई कूड़ा छोड़ती
ठन-ठन ठन-ठन की घंटी से रास्ता बनाती
यातायात के नियमों का भी पालन करती
मोड़-मोड़ पर , बत्ती-बत्ती पर जब यह रुकती
लोग उतरे और लोग चढ़े ।

खिदिरपुर से जब खुलती
मोमिनपुर को जोड़ती
अलीपुर से भी गुजरती
कालीघाट दिखाती बढ़ती
पर ममता के घर को छोड़ चले ।

बेहाला अब नहीं जाती
हावड़ा भी अब नहीं दिखाती
बड़ा बाजार से अब दूर ही रहती
एस्प्लेनेड का किन्तु चक्कर अब भी मारती
कहीं भी जाओ पांच-छह-सात के बदले ।

बाजार में भी जब बंदी होती
दुकानें भी जब नहीं खुलती
सडकों पर बसें भी नहीं चलती
कलकत्ते की शान ट्राम तब भी चले ।

खड़-खड़ खड़-खड़ ट्राम चले ।

अमर नाथ ठाकुर , 31 मई , 2016 , कोलकाता ।

Sunday, 29 May 2016

भीड़ में सब तत्क्षण है



ये भीड़ थमती नहीं
क्योंकि ये भीड़ थकती नहीं ।

ये भीड़ कमती भी नहीं
इसमें किसी की चलती नहीं ।

 यहाँ न कोई भ्रम है
चाहे न कोई क्रम है ।

जहाँ हर कोई बोलेगा
जहाँ न कोई सुनेगा ।

लोग नहीं यहाँ बिछुड़ते हैं
क्योंकि यहाँ तो लोग जुड़ते हैं ।

यहाँ लोग अनजान मिलेंगे
लोग पहचान के भी मिलेंगे ।

 यहाँ नहीं कोई खून-खराबा होता
तो भी यहाँ शोर-शराबा होता ।
यहाँ होता है कुतूहल पूर्ण कोलाहल
और उत्तेजना पूर्ण बरबस हलचल ।

यहाँ भीड़ में जेब कतरे होते हैं
इसमें लोग साफ़ सुथरे भी होते हैं ।

भीड़ में कौन किसकी सुनता है
जब कोई खुद की नहीं गुनता है ।

यहाँ लोग बहकते हैं
किन्तु लोग नहीं दहकते हैं ।

यहाँ भीड़ भी सहमती है
क्योंकि भीड़ में सहमति है ।

लोग जब साथ में होते हैं
लोग तब ठाट में रहते हैं ।

यहाँ की भीड़ मुझे हमेशा  भाती है
नहीं यहाँ कोई भेद-भाव सताती है ।

यहाँ न जान का खतरा होता है
क्योंकि यहाँ न मान का बखरा होता है ।

लोग यहाँ भीड़ में नहीं झगड़ते
क्योंकि यहाँ बातों पर नहीं भड़कते ।

भीड़ की  नहीं कोई जाति है
भीड़ का नहीं कोई धर्म ।
क्षण कुछ भीड़ में बिताओ
जान लोगे  भीड़ का मर्म ।

भीड़ में सब तत्क्षण है
इसलिये नहीं कोई आरक्षण है ।

क्या गाऊं यहाँ के भीड़ की महिमा
क्या दूँ यहाँ की भीड़ को उपमा ।

(हावड़ा और सियालदह स्टेशन की भीड़ से प्रेरणा पाकर)

अमर नाथ ठाकुर , 7 नवम्बर  , 2015 , कोलकाता ।





Friday, 27 May 2016

दो खूँटियाँ


             --1--

मेरे कमरे की दीवार पर गड़ी है दो खूँटियाँ
बरबस ध्यान जाता है इन पर
उखाड़ फेंकने के ख्याल से इन पर पत्थर चलाया
फिर हथौड़ा चलाया
कुछ हिला पर उखड़ा नहीं
उखाड़ सकता हूँ पर प्लास्टर का एक हिस्सा निकल आएगा
और दीवार बदरंग दीखने लगेगा ।
चाहे कुर्सी पर बैठे हुए में
या बेड पर सोते समय हर-हमेशा यह ध्यान खींचता है
मेरे दिमाग की किरकिरी बन गयी ये दो खूँटियाँ ।
एक ख्याल आया --
एक में मैंने गणेश जी की प्रतिमा
और एक में घड़ी लटका दिया ।
एक के सामने सिर झुका कर खड़ा होता हूँ ,
और दूसरे के सामने सिर उठा कर देखता हूँ ।
इन दो खूँटियों ने मुझे बताया
सिर झुकाने से सिर उठाने के बीच का दर्शन ।

                          --2--

ऑफिस में भी समय की दो खूँटियाँ हैं
दश बजे पहुँचने के लिये और साढ़े पाँच तक रुकने के लिये ।
सभी कर्मचारी और अधिकारी गण इन दो खूँटियों से परेशान रहते हैं ।
अक्सर दश बजे के पास ऑफिस पहुँच जाता हूँ
उस समय करीब- करीब अकेला ही होता हूँ
कमरा खोलता हूँ , रोशनी के लिए बल्ब जलाता हूँ
ए सी ऑन करता हूँ
टेबुल पर से फाइलों को सरकाकर
लैप टॉप रखने का जगह बनाता हूँ ।
सफाई वाले का इंतज़ार किये बिना फाइलों में डूब जाता हूँ ।
घंटे भर बाद गहमा- गहमी शुरू हो जाती है
ऑफिस लोगों से भर जाता है
गप्पों और फोन कॉल की आवाज से एक खुशनुमा माहौल बनता है ।
ऑफिस टाइम खत्म होने के घंटा भर  पहले
 यह गहमा- गहमी खत्म - सी हो जाती है ।
साढ़े पाँच की खूंटी के पहले मैं अटका रहता हूँ
साढ़े पाँच बजे जब निकलता हूँ हॉल लगभग सुनसान - सा हो जाता है
इक्का-दुक्का कर्मचारी कोई अपना बैग बाँध रहा होता है
कोई अपने फाइल समेट रहा होता है ।
मैं ऑफिस की एक -सी स्थिति देखता हूँ
जैसा आते समय वैसा ही जाते समय ।
कर्मचारी गण इन खूँटियों के बीच ही रहते हैं--
पहली खूँटी के बाद आना और दूसरी खूँटी के पहले चला जाना ।
मैं भी इन खूँटियों को मानता हूँ --
पहली खूँटी पर आना और दूसरी पर जाना ।
ऑफिस का जीवन
इन दो खूँटियों के बीच का दर्शन ।


                      --3--

हर किसी के जीवन में दो खूँटियाँ होती हैं
हर किसी का जीवन इन्हीं दो खूँटियों के बीच उपलाता रहता है
एक खूँटी से दूसरी खूँटी तक ।
किसी को ये खूँटियाँ चुभती हैं
किसी को नहीं चुभती है ।
इन खूँटियों के पहले या
 इन खूँटियों के बाद का कोई मतलब नहीं होता ।
जन्म - मरण रूपी दो खूँटियाँ ।
जन्म के बाद से मरण के पहले तक ।
सुख और दुःख की दो खूँटियाँ
दिन और रात की दो खूँटियाँ
सूर्योदय और  सूर्यास्त की दो खूँटियाँ
धरती और आकाश की दो खूँटियाँ
होने और नहीं होने की खूँटियाँ ।
शुरू और अन्त की खूँटियाँ ।
सब कुछ इन्हीं दो खूँटियों के बीच समायी होती है ।
यही है इन दो खूँटियों का दर्शन ।


अमर नाथ ठाकुर , 26 मई , 2016 , कोलकाता ।








Monday, 23 May 2016

रोज होली है



कभी रोकर , कभी रुलाकर
कभी हँस कर , कभी हँसा कर
कभी तोड़ कर कभी जोड़ कर
रंग-बिरंगी बोल कर टरकाना


कभी रंग-बिरंगी बातें
कभी रंग - बिरंगी करामातें
फिर कभी रंग-बिरंगी कातिलाना फँसाना

कभी सच बोलकर
कभी झूठ बोलकर
कभी निभाना फिर कभी बरगलाना

कभी रंग-बिरंगी पोशाक में
कभी रंग-बिरंगी मुखाकृति में
कभी रंग-बिरंगी चाल चलना
फिर कभी दौड़ना फिर कभी रुक जाना

कभी साथ चलकर
कभी दूर-दूर हंट कर
कभी पुचकारना कभी दुत्कारना
कभी अपनाना फिर कभी छोड़ जाना

कभी रोग देना कभी दवा देना
कभी सजा देना कभी बिखरा देना
दिन होना फिर कभी रंग-बिरंगी रात हो जाना

कभी क्रमबद्ध कभी असम्बद्ध होना
कभी प्रतिबद्ध कभी पथ भ्रष्ट होना
कभी रंग का बदरंग होना
कभी बिना रंग का सब रंग होना

इस रंग-बिरंगी दुनियाँ में
लोगों की रंग-बिरंगी जिन्दगी
यहाँ तो रोज होली है
रंगों में सराबोर लोगों की बानगी ।


अमर नाथ ठाकुर , 14 मई , 2016 , कोलकाता ।

Friday, 25 March 2016

लघु कविताएँ



1॰ प्रजातंत्र

अपना बाज़ार
अपनी दुकान ,
अपने ग्राहक
फिर भी नुकसान !

2. जातिवाद 

अपना कुनबा  
अपनी जाति ,  
अपनी ही संतति
फिर भी नहीं सदगति !

3॰ परिवारवाद / क्षेत्रवाद
  
अपना क्षेत्र
अपनी पार्टी
अपनी सरकार
अन्य की क्या सरोकार ।

4. माल्या और बैंक

अपनी टीमें
अपने कप्तान
अपने सब खिलाड़ी ,
तो फिर किसका गोल
और किसकी बाज़ी ?

5॰ कन्हैया की आज़ादी

न जाति  अर्जित
न गरीबी उपार्जित
तो क्यों बोले उत्पीड़न पोषित ?
न अपनी धरती
न अपना आकाश  
न अपना कोई जहान
फिर भी उन्मुक्त उड़ान ।

6॰ राहुल गांधी

खुद ही डॉक्टर
खुद ही बीमार
किसकी दवाई
से हो अब उपचार ?

7. अराजकता

अपना कोर्ट
अपने जज से भरा ,
तिस पर अपने वकील की बहस
तो फिर किस बात की सज़ा ?

8. लालू की सरकार

अपनी गाड़ी
अपना ड्राइवर
अपने यात्री
न अन्य  किसी को चढ़ाना
न किसी को उतारना
गाड़ी चले न चले
अपना पेट पले ।


 अमर नाथ ठाकुर , मार्च 2016 , कोलकाता । 

Monday, 28 December 2015

प्रकृति हमारा पालक हो /नव वर्ष की मंगल कामना


जाड़े में दिन में तेज़ धूप वाला सूरज हो
रात में सामने दहकती आग का शोला न्यारा
गर्मी में दिन में शीतल पवन हो
और रात में श्वेत धवल चन्दा प्यारा ।
वर्षा में उमड़ते-घुमड़ते बादलों के बीच बूँदा-बाँदी हो
और चमकती  कड़कती बिजली का इशारा
बसन्त में पौधों-फसलों की हरी-हरी  चादर हो
और रंग-बिरंग मुखरित मंजरित पुष्पों का नज़ारा ।
न कोई बर्फीली शीतलहरी हो न कंप-कंपाती ठिठुराती ठंढ
सुबह सबेरे न कोई कुहरे की मार हो रात में न कोई धुंध ।
ग्रीष्म में न कोई सनसनाती लू हो न ऊमष की  चिट चिट करती मार हो
न उफनती नदी हो न टूटता बाँध और न कोई बाढ़ की ही हुँकार हो ।

तो क्यों हम जंगल बिगाड़ें क्यों करें प्रकृति से खिलवाड़
क्यों पर्यावरण प्रदुषण का खेल हो क्यों कोई उजाड़ ।
पर्वत हमें सुशोभित करते रहें नदियाँ बहती रहे लगातार ,
जंगल में  मँगल होता रहे क्यों चले इन पर कोई कटार ।

झरनों का कल-कल मधुर गान हो
कोयल की कूक और पपीहे की तान हो ।
मंदिर में मंगल आरती हो  मस्जिद में अजान हो
गिरिजा में घंटा बजे द्वारे में गुरु ग्रन्थ की शान हो ।

प्रकृति संग शान्ति से रहें तो क्यों कोई प्रकृति प्रकोप हो
प्रकृति कल्याणकारी बने क्यों कोई प्रकृति विक्षोभ हो ।
न हो विनाशकारी वृष्टि न आए मर्मांतकारी तूफ़ान
क्यों भूकम्प- भूस्खलन भी करे धरा को वीरान ।

वृक्ष पिता   समान हो नदियाँ हों माँ समान
पर्वत हमारा बंधु हो झील-झरने में भी मानो प्राण ।
बदहवास हो न बाँधें नदी न तोड़ें निर्दयता पूर्वक पहाड़
न जलाएँ वृक्ष और न करें प्रकृति पर कोई अत्याचार ,
तो क्यों हो असमय वर्षा क्यों हो असमय तूफ़ान
क्यों स्खलित होगा पहाड़ क्यों बनेगा कहीं रेगिस्तान ।


प्रकृति और मानव का रिश्ता है युगों-युगों का , इसे निभाना है ।
मानव-जीवन खुशहाल बनाना है , तो प्रकृति को बचाना है ।



आएँ  संकल्प करें , और यह हमारा नव वर्ष का विधान हो
सभी निरोग रहें , सभी सुखी हों , सर्वत्र शान्ति का गान हो
प्रकृति हमारा पालक रहे हमें  प्रकृति का इतना भान हो
नव वर्ष की हमारी शुभकामना कि मानवता महान हो !

अमर नाथ ठाकुर , 27 दिसम्बर , 2015 , कोलकाता ।

धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन...