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Tuesday, 1 November 2016

मैं कुत्ता बनना चाहता हूँ


मैं ने देखा एक हकलाता कुत्ता
मालिक के साथ वाक करते हुए
मालिक के साथ समानान्तर चलते हुए
मालिक खड़ा होता है
वह भी खड़ा हो जाता है
मालिक किसी से बात करता है
वह सुनता रहता है
मालिक दौड़ता है
वह भी दौड़ता है
चहलकदमी करते मालिक के साथ
वह कुत्ता भी जमीन सूँघते चलता रहता है
मैं रोज़ देखता हूँ एक हकलाता कुत्ता ....

मालिक के साथ
मालिक की छाया की तरह
मालिक की रक्षा में
मालिक की ढाल बनकर
हर संदिग्ध पर भौंकता है
वह वफादार कुत्ता ...
पूँछ हिलाता जमीन नोंचता
वह नुकीले दाँतों वाला नंगा कुत्ता ....
मैं रोज़ देखता हूँ एक हकलाता कुत्ता .....
मैं रोज देखता हूँ एक वफादार कुत्ता ......

मालिक जब पुकारता है
मालिक जब सहलाता है
कूद पड़ता है पूँछ हिलाते हुए
मालिक के कन्धे पर दोनों पैरों को डालकर
मालिक के होंठों को चूमते हुए
हकलाता हुआ वह समझदार कुत्ता ....


वह मालिक के बच्चे को पहचानता है
वह मालकिन को पहचानता है
और हर अनजाने पर भौंकता है वह सावधान कुत्ता
खुद जागकर मालिक को चैन की नीन्द सुलाता है
वह दमदार पहरेदार कुत्ता ....

क्या पाता है बदले में वह कुत्ता
थाली का जूठन और हाड़-माँस का अवशेष
न कोई सैलरी न कोई बोनस
और न रहता कभी कोई प्रोमोसन का भूखा
फिर भी होता है वह कर्मठ और ईमानदार कुत्ता
वह तंदुरुस्त हँसता मुस्कराता कुत्ता ...
मैं रोज़ देखता  हूँ एक वफादार कुत्ता .....



मैं कुत्ते की कर्त्तव्य निष्ठा , ईमानदारी , वफादारी का कायल हूँ
क्योंकि चोर , उचक्के और डाकू डरते हैं कुत्ते से
आज तक कोई कुत्ता नमक हराम  नहीं हुआ
आज तक किसी कुत्ते पर भ्रष्टाचार
 या विश्वासघात का कोई आरोप नहीं लगा
इसलिये कोई कुत्ता कभी बर्खास्त नहीं हुआ
इतिहास में नहीं कोई ऐसा दस्तावेज़
कि किसी कुत्ते पर कोई चार्जशीट हुआ

आज तक नहीं बनाया किसी कुत्ते ने कोई यूनियन !
अकेला कुत्ता अपना कर्त्तव्य करता रहा
मालिक का खाया नमक चुकाता रहा ।
आज तक नहीं मिला किसी कुत्ते को कोई पद्म पुरस्कार
न कोई सर्टिफिकेट अथवा वीरता का कोई चक्र
जब भी मालिक पर कोई आक्रमण हुआ
पहली गोली कुत्ते ने खायी

इसलिये कुत्ते की मौत पर हर मालिक रोया है ।



आप में से कितने कुत्ता बनना चाहते हैं
छिः मैं यह क्या बोल गया !
यह तो परले दरजे की गाली है
लेकिन इस तिरस्कारी विचार से
कुत्ते को कितना दुःख होता होगा
क्या आपने सोचा है ?
लेकिन मैं ने सोच लिया है
अपनी बात बताना चाहता हूँ
मैं तो कुत्ता बनना चाहता हूँ
अपनी कम्पनी का कुत्ता
क्योंकि मैं कम्पनी के टुकड़ों पर ही तो पल रहा हूँ
फिर क्यों न बनूँ अपनी कम्पनी का कुत्ता
वफादार , कर्त्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदार कुत्ता !
फिर मैं भ्रष्टाचारियों पर भौंक पाऊँगा
इसे लूटने वालों को काट खा पाउँगा
जिस दिन हम सब कुत्ते बन जाएँगे
कंपनी रफ़्तार में चलने लगेगा और
तभी हमें हाड़- माँस का लाभांस मिलता रहेगा !!!


अमर नाथ ठाकुर
30 अक्टूबर , 2016 , मेरठ ।






Wednesday, 12 October 2016

अभी क्या परवाह है



-1-

माँ ने अपना कटार नहीं चलाया
माँ आयी और चली गयी
चण्ड-मुण्ड और शुम्भ-निशुम्भ को पुचकार कर
महिषासुर और रक्त-बीज को आशीर्वाद देकर ।
माँ आखिर माँ होती है
दया और करूणा की मूर्त्ति ।
माँ से उम्मीद नहीँ कि अपने कुपुत्रों का तिरस्कार करे
माता कुमाता नहीं हो सकती ।
माँ को आशा है कि उनका पुत्र सुधरेगा ।
और हर बार की तरह इस बार भी विजया दशमी के बाद चांस देकर चली गयी है माँ दुर्गा....

-2-

राम के अग्नि वाण से रावण का पुतला इस बार भी धू-धू कर जला
किन्तु रावण अट्टहास करता फिर बाहर आ गया
शूर्पणखा , कुम्भ - कर्ण और मेघनाद सब धूम-चौकड़ी करते ही रहे
मर्यादा पुरुषोत्तम राम से आशा नहीं कि मर्यादा का उल्लंघन करें
और बात-बात पर तरकश से संहारक वाण निकालें
वह इन्हें  सुधरने का भरपूर मौका दे रहे हैं हर बार की तरह इस बार भी  ।
दशहरे के बाद मर्यादा में रहकर भरपूर चांस देकर विदा लेकर चले गये हैं मर्यादा पुरुषोत्तम राम .....

माँ चण्डी की दया और करुणा और
पुरुषोत्तम राम की मर्यादा
के अधीन ही सब आतंक और लूट-मार है ,
अभी क्या परवाह है ।

अमर नाथ ठाकुर
12 अक्टूबर 2016
कोलकाता / मेरठ ।


Wednesday, 5 October 2016

मैं खुद बॉस बन जाता हूँ



मेरा सीधापन और मेरी दो टूक बातें 
मेरा देहातीपन और मेरा सादा वस्त्र 
तिस पर मेरा साधारण केश विन्यास 
बिना विशेष प्रतिरोध मेरा हाँ में हाँ मिलाना 
मेरा बॉस प्रथम मिलन में ही प्रभावित हो जाता है
मेरी समझ - बूझ या किसी नियोजित ढंग से ऐसा नहीं होता 
मैं तो ऐसा ही हूँ 
मेरा बॉस इसे मेरी कमजोरी समझ 
मुझे गलत आकलित कर लेता है 
और मुझे अपने वाग्जाल में फंसाने की कोशिश करता है 
मैं बॉस के जाल में फँस नहीं पाता हूँ
बॉस मुझे लगाम नहीं पहना पाता है 
क्योंकि मेरा सीधा रास्ता बिना गड्ढे वाला होता है 
मेरा रास्ता शुरू से अन्त तक ले जाने वाला होता है 
 नियमों और ईमानदारी के सपाट मुक्त बंधनों वाला
फिर मेरा बॉस मुझसे नफ़रत करने लगता है 
और शीघ्र अन्तिम मिलन होता है 
 बॉस शुभकामनाओं सहित मुझे गुड बाय बोल देता है 
खबर दूर तक फैल जाती है 
मेरे भावी बॉस से भी मिलन का सारा प्रोग्राम रद्द हो जाता है 
मिलने के पहले ही गुड बाय हो जाता है 
फिर मुझे अरसे तक कोई बॉस ही नहीं मिलता है 
मैं शत-प्रतिशत जन सेवा में नहीं दे पाता हूँ 
क्योंकि मैं इम्प्रैक्टिकल जो हूँ ,
और मेरी कोशिश होती है फिर अकेले चलने की ।
मैं गुनगुनाने लगता हूँ ...
एकला चलो रे 
डाक दिये जदि ना कियो आसे
एकला चलो रे 
और एक दिन मैं खुद बॉस बन जाता हूँ 
मेरा किन्तु फिर कोई सबऑर्डिनेट नहीं होता ।।

अमर नाथ ठाकुर
मेरठ , 2 अक्टूबर , 2016 ।

Tuesday, 20 September 2016

मैं सनातनी हिन्दू हूँ

मैं सनातनी हिन्दू हूँ ।

मैं अद्वैतवादी , द्वैतवादी या विशिष्टाद्वैतवादी में से कुछ भी हो सकता हूँ । इसके लिये मेरे ऊपर कोई भी बन्दिश नहीं है ।

मैं शैव हो सकता हूँ , शाक्त या वैष्णव । मैं कबीर पंथी , नानक पंथी इत्यादि में से कुछ भी हो सकता हूँ । मैं मूर्त्ति पूजक हो सकता हूँ या नहीं भी । मैं मन्दिर पूजा के लिये जा सकता हूँ  या नहीं भी ।  मैं नाना प्रकार के पेड़ों , पक्षियों , जानवरों , नदियों , पहाड़ों की पूजा कर सकता हूँ  या नहीं भी । मैं  व्रत रख सकता हूँ या नहीं भी । मैं मन्त्रों का जाप कर सकता हूँ , नहीं भी ।

मैं शाकाहारी हो सकता हूँ या माँसाहारी भी । मैं नाना प्रकार के जानवरों का माँस खा सकता हूँ  ।  मैं नाना प्रकार की मछलियाँ भी खा सकता हूँ । मुझे समाज वालों ने या धर्म के ठेकेदारों ने समाज या धर्म से निष्कासित या बहिष्कृत नहीं किया या इसकी कोई धमकी भी नहीं  दी ।

मैं मन्दिर जा सकता हूँ , मज़ार , मस्ज़िद , गुरुद्वारे में या चर्च में जाकर ईश्वर की वन्दना कर सकता हूँ । मुझे माथे पर रुमाल या जाली दार टोपी लगाने में ज़रा भी हिचक नहीं होती । मैं धोती या लूँगी या पतलून बेहिचक धारण कर लेता हूँ । इन धार्मिक स्थलों में , इन अजीबोगरीब पोशाकों में मुझे ईश्वर के प्रति निष्ठा या श्रद्धा दर्शाने में कोई संकोच नहीं हुआ । मेरा धर्म कभी इसमें बाधक नहीं हुआ । मुझे सिख , जैन , बौद्ध , मुस्लिम , पारसी , यहूदी या ईसाई धर्मावलंबियों से कोई परहेज़ नहीं । इन सबों से हमारी सनातनी परम्परा ने कभी घृणा या द्वेष नहीं सिखाया । मैं रामकृष्ण , साईं बाबा को सामान दृष्टि से पूजता हूँ  । मैं कई चर्च में जाकर क्राइस्ट के सामने सर नवा कर आया हूँ । मैं अपनी अनेक दिनों की इच्छा पूर्ति के लिये अजमेर शरीफ भी शीघ्र जाना चाहता हूँ । हमारी परम्परा , हमारा धर्म , हमारी संस्कृति हमें ऐसा करने को हमें प्रेरित करते हैं ।

हमारा धर्म घृणा या हिंसा का कभी महिमा - मण्डन नहीं करता । जाति - प्रथा या स्त्रियों के सम्बन्ध में आपत्ति जनक बातों के उल्लेख वाले धार्मिक ग्रंथों के हिस्सों को सनातनी हिन्दूओं ने तहे दिल से नकारा है , तिरस्कृत किया है । इन भागों की खुले आम निन्दा होती है । ऐसी निन्दा या आलोचना पर कभी कोई रोक या धमकी का अहसास नहीं हुआ ।

हमारी सीमित जानकारी में हमारे सनातन धर्म में जिहाद , फतवा या काफ़िर जैसे शब्दों का समतुल्य शब्द नहीं । यदि ऐसा हो तो उसे नकारने या त्यागने में कोई भी प्रतिरोध नहीं । जो सबका है वह सनातन धर्म है । जो सबको स्वीकारता है वह सनातन धर्म है । जो आज़ादी देता है , जहाँ बंधन नहीं , भेद-भाव नहीं ,घृणा या द्वेष नहीं जो सिर्फ प्रेम और विश्वास का पाठ फैलाता है वह सनातन धर्म है । हम यह कहना पसंद करते हैं कि जहाँ प्रेम और करुणा , विश्वास , आज़ादी , श्रद्धा और निष्ठा इत्यादि का वास हो वहीं सनातन धर्म है ।


सिर्फ सनातन हिन्दू धर्म ही सार्वभौमिकता की कसौटी पर खरा उतरता दीखता है । सनातन हिन्दू धर्म में दुनियाँ की अन्य सारी धार्मिक मान्यताओं को आत्मसात करने की क्षमता है ।

अमर नाथ ठाकुर , 23 जुलाई , 2016 , कोलकाता ।

Sunday, 24 July 2016

दोस्ती की बुनियाद

मुझे शंका है
मैं आश्वस्त नहीं हूँ
आखिर हमारी दोस्ती की बुनियाद क्या होगी ?
अभी तक आपने अपनी जाति नहीं बतायी -
अगड़ी , पिछड़ी या दलित ?
किस राज्य के हैं  आप -
उत्तर के , दक्षिण के  या हैं  फिर पूर्वोत्तर के ?
किस धर्म के मानने वाले हैं आप ?
मुस्लिम हैं या सिख , जैन या ईसाई
बौद्ध या फिर हैं हिन्दू सनातनी ?
कौन सी भाषा में हम बतियायेंगे-
अंग्रेज़ी , हिंदी ,गुजराती , पंजाबी , मणिपुरी में
या बंगला , तमिल तेलगू अथवा मलयालम में ?
आप शाकाहारी हैं या माँसाहारी ?
आप गो- मांस का भक्षण करते हैं
बकरे का या सूअर के मांस का ?
आप धोती , लूँगी या पतलून पहनते हैं
जालीदार टोपी , पगड़ी , पाग या पटका बाँधते हैं ?
आप आर एस एस की विचार धारा से प्रभावित हैं
या आई एस आई एस की निन्दा से घबराते हैं ?
आप मोदी भक्त हैं या केज़रीवाल के अनुचर
या हैं कट्टर काँग्रेसी या और कोई दल - बदलू सच्चर ?
क्या ये ही होंगी हमारी दोस्ती की बुनियाद ?

क्या होगी हमारी दोस्ती की बुनियाद !

 भाई एक हमारा देश है और एक हमारी राष्ट्रीयता ,
क्यों न एक हमारी सोच हो क्योंकि एक जैसी हमारी विवशता ।
जब हम सब पीड़ित हैं आतंकवाद से
भ्रष्टाचार  और भाई - भतीजावाद से
गरीबी , बीमारी और अशिक्षा के अवसाद से ;
शंका मिटा दें समान दुश्मनी की बुनियाद पर
 और दोस्त बन जायें इस इक फ़रियाद पर ।


अमर नाथ ठाकुर , 21 जुलाई , 2016 , कोलकाता ।

Tuesday, 31 May 2016

खड़-खड़ ट्राम चले

खड़-खड़ खड़-खड़ ट्राम चले ।

नहीं कोई धुआँ नहीं कोई कूड़ा छोड़ती
ठन-ठन ठन-ठन की घंटी से रास्ता बनाती
यातायात के नियमों का भी पालन करती
मोड़-मोड़ पर , बत्ती-बत्ती पर जब यह रुकती
लोग उतरे और लोग चढ़े ।

खिदिरपुर से जब खुलती
मोमिनपुर को जोड़ती
अलीपुर से भी गुजरती
कालीघाट दिखाती बढ़ती
पर ममता के घर को छोड़ चले ।

बेहाला अब नहीं जाती
हावड़ा भी अब नहीं दिखाती
बड़ा बाजार से अब दूर ही रहती
एस्प्लेनेड का किन्तु चक्कर अब भी मारती
कहीं भी जाओ पांच-छह-सात के बदले ।

बाजार में भी जब बंदी होती
दुकानें भी जब नहीं खुलती
सडकों पर बसें भी नहीं चलती
कलकत्ते की शान ट्राम तब भी चले ।

खड़-खड़ खड़-खड़ ट्राम चले ।

अमर नाथ ठाकुर , 31 मई , 2016 , कोलकाता ।

Sunday, 29 May 2016

भीड़ में सब तत्क्षण है



ये भीड़ थमती नहीं
क्योंकि ये भीड़ थकती नहीं ।

ये भीड़ कमती भी नहीं
इसमें किसी की चलती नहीं ।

 यहाँ न कोई भ्रम है
चाहे न कोई क्रम है ।

जहाँ हर कोई बोलेगा
जहाँ न कोई सुनेगा ।

लोग नहीं यहाँ बिछुड़ते हैं
क्योंकि यहाँ तो लोग जुड़ते हैं ।

यहाँ लोग अनजान मिलेंगे
लोग पहचान के भी मिलेंगे ।

 यहाँ नहीं कोई खून-खराबा होता
तो भी यहाँ शोर-शराबा होता ।
यहाँ होता है कुतूहल पूर्ण कोलाहल
और उत्तेजना पूर्ण बरबस हलचल ।

यहाँ भीड़ में जेब कतरे होते हैं
इसमें लोग साफ़ सुथरे भी होते हैं ।

भीड़ में कौन किसकी सुनता है
जब कोई खुद की नहीं गुनता है ।

यहाँ लोग बहकते हैं
किन्तु लोग नहीं दहकते हैं ।

यहाँ भीड़ भी सहमती है
क्योंकि भीड़ में सहमति है ।

लोग जब साथ में होते हैं
लोग तब ठाट में रहते हैं ।

यहाँ की भीड़ मुझे हमेशा  भाती है
नहीं यहाँ कोई भेद-भाव सताती है ।

यहाँ न जान का खतरा होता है
क्योंकि यहाँ न मान का बखरा होता है ।

लोग यहाँ भीड़ में नहीं झगड़ते
क्योंकि यहाँ बातों पर नहीं भड़कते ।

भीड़ की  नहीं कोई जाति है
भीड़ का नहीं कोई धर्म ।
क्षण कुछ भीड़ में बिताओ
जान लोगे  भीड़ का मर्म ।

भीड़ में सब तत्क्षण है
इसलिये नहीं कोई आरक्षण है ।

क्या गाऊं यहाँ के भीड़ की महिमा
क्या दूँ यहाँ की भीड़ को उपमा ।

(हावड़ा और सियालदह स्टेशन की भीड़ से प्रेरणा पाकर)

अमर नाथ ठाकुर , 7 नवम्बर  , 2015 , कोलकाता ।





धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन...