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Saturday, 13 September 2014

निम्न विचार



सूखे छिद्रदार पत्ते
लोटते-पोटते
उड़ते-तैरते
खड़खड़ाते
अपने पेड़ से भी दूर चले जाते
और न जाने कहाँ खो जाते   !

ये आभा हीन
खोखले और रस हीन
चौंकाने वाले  
खलबली मचाने वाले
उथल-पुथल मचा देने वाले
निम्न विचार भी
चंद दिनों में
न जाने कहाँ
विलीन हो जाते हैं ।

ये निम्न विचार  
नयी ताज़गी लिए
वृक्ष की नयी कोंपलों की भाँति 
हो जाते हैं पुनः प्रकट ।

नयी कोंपलें तो
छाया और सौंदर्य देती हैं ,
सुनहरे भविष्य की संभावना होती हैं ।  
लेकिन ये निम्न और ओछे  विचार ,
समाज की भलाई से इसका नहीं कोई सरोकार  
पुनः पुनः आकर फैला जाती है विकृतियाँ और कुसंस्कार ।




अमर नाथ ठाकुर , 13 सितंबर , 2014 , कोलकाता ।  

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