"दुर्गा पूजा—जीवन का दर्शन" ✍️
दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन का गहन दर्शन है। बंगाल विशेषकर कोलकाता की धरती इन दिनों एक अद्भुत वाइब्रेशन से गूंज उठती है। सुबह होते ही ढाक की ढम-ढम-ढाक की ध्वनि वातावरण को दलमलित कर देती है। फिर वीरेंद्र कृष्ण भद्र का मंत्रमुग्ध कर देने वाला दुर्गा सप्तशती का सस्वर पाठ हृदय को भीतर तक आंदोलित कर देता है।
शहर के कोने-कोने में सजे असंख्य पंडाल, रंग-बिरंगी रोशनियाँ और आभूषणों से सुसज्जित देवी दुर्गा की प्रतिमाएं एक अनुपम दृश्य रच देती हैं। शेर पर आरूढ़, रक्तरंजित तमतमायी नेत्रों वाली मां दुर्गा जब महिषासुर का वध कर रही होती हैं, तो यह केवल एक पौराणिक दृश्य नहीं होता, बल्कि हमारे अंतर्मन में जमे पापों, अहंकार, ईर्ष्या और भय के संहार का प्रतीक बन जाता है।
पूजा के दस दिन हमें यह अनुभूति कराते हैं कि पुण्य हमेशा पाप पर विजय पाता है। हम इन दिनों निष्पाप जीवन जीने की परिकल्पना में होते हैं, परन्तु वर्ष दर वर्ष पाप फिर लौट आता है, और फिर मां का आगमन होता है, ताकि वह महिषासुरी प्रवृत्तियों का नाश कर सके।
विसर्जन के समय जब हम मां को विदा करते हैं, तब नेत्र अश्रुपूरित हो जाते हैं, यह दृश्य हृदय विदारक हो जाता है। किन्तु इसी विरह में हमारी विह्वलता में आशा छिपी होती है—“मां फिर आएंगी।” यही विश्वास हर वर्ष दुर्गा पूजा को और अधिक जीवंत बना देता है।
यह परंपरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। जन्म और मृत्यु का अनवरत चक्र, पाप और पुण्य का सतत संघर्ष, और परम तत्व की खोज—यही सनातन सत्य है। श्रीरामकृष्ण परमहंस ने मां की उपासना के माध्यम से जिस परमात्मा से मिलन पाया, वही भाव वेद, उपनिषद और गीता में भी गूंजता है।
गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को विश्वास दिलाते हैं-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।
भगवान श्रीकृष्ण की इस उक्ति में समय का अंतराल छिपा हुआ है । हम आशा ही करते रहते हुए हैं आज तक कि भगवान प्रकट होंगे। लेकिन भगवान की शक्तिरूपा मां धर्म की स्थापना हेतु हर साल आती है भारत धरा पर, हम मां को विदा कर ले आते हैं और फिर विदा कर प्रस्थान भी कर देते हैं। मां मान जाती है क्योंकि माता कुमाता नहीं होती!
दुर्गा पूजा हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कितने ही महिषासुर क्यों न हों, अंततः दिव्यता की विजय निश्चित है। यही सनातन का मूल मंत्र है—
“पाप का संहार होगा, पुण्य का उत्थान होगा, और मां फिर आएंगी... हर साल आएंगी.....”
अमर नाथ ठाकुर, कोलकाता, 30 सितंबर, 2025.
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