"मां फिर आएंगी"
ढम-ढीप-ढम जब ढाक बजे,
भोर से गुंजित हो वातावरण।
भद्र स्वर का सप्तशती पाठ,
भर दे हृदय में नव स्पंदन।
पंडालों की शोभा अद्भुत,
रंग-बिरंगी ज्योति छा जाए।
शेर पे आरूढ़ मातु दुर्गा,
महिषासुर का वध दिखलाए।
लाल नेत्र, कर में बरछी,
पापों का करती संहार।
अहंकार, ईर्ष्या, भय मिटे,
जग में छा जाए उजियार।
दस दिन का यह उत्सव पावन,
पाप-पुण्य का देता ज्ञान।
मां आती हैं हर वर्ष यहाँ,
करने धर्म का पुनः उत्थान।
विसर्जन में अश्रु छलकते,
मन होता है व्याकुल-सा।
पर विश्वास यही कहता है—
मां फिर आएंगी अगली दशा।
गीता का वह वचन स्मरण हो,
“यदा यदा हि धर्मस्य...”।
हर युग में होती है रक्षा,
धरा पर आती दिव्य शक्ति।
मां कुमाता कभी न होतीं,
संतानों को करती क्षमा।
हमारे पाप मिटाने हर बार,
फिर प्रकट हो जातीं मां।
सनातन का यही है संदेश—
सत्य का होगा सदा उत्थान।
पाप का संहार निश्चित है,
मां फिर आएंगी नव विहान।
अमर नाथ ठाकुर, कोलकाता, 30 सितंबर, 2025.
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