मां दुर्गा—संहार और वात्सल्य का संतुलन
चण्ड-मुण्ड, शुम्भ-निशुम्भ, महिषासुर जैसे असुरों का संहार करनेवाली मां दुर्गा आज इस कलियुग में क्यों शांत दिखाई देती हैं? माता कुमाता नहीं हो सकतीं—यह सनातन का सत्य है। तो क्या मां सब पर मातृवत प्रेम बरसाकर केवल वात्सल्यमयी रूप में ही प्रकट हो रही हैं? क्या मां अब संहार नहीं करेंगी? यदि संहार नहीं होगा, तो पाप पुण्य पर कैसे विजयी होगा, सत्य असत्य के सामने कैसे टिकेगा, और अंधकार प्रकाश के सामने से अपना साम्राज्य कैसे समेटेगा?
सच तो यह है कि हर मनुष्य मूलतः पुण्यात्मा है। हर हृदय में दिव्यता का अंश छिपा है—वह ईश्वर का ही अंश है। किंतु उसी मनुष्य के भीतर कहीं महिषासुर का अहंकार, शुम्भ-निशुम्भ की वासना और चण्ड-मुण्ड की हिंसा भी वास करती है। इन्हीं प्रवृत्तियों से समाज में अन्याय, शोषण, क्रूरता, भ्रष्टाचार और अंधकार फैलता है। मां का उद्देश्य जीवों का विनाश नहीं, बल्कि इन कुत्सित प्रवृत्तियों का संहार है। वह मातृवत वात्सल्य देती हैं ताकि मनुष्य अपने भीतर के असुर को पहचानकर उसका परित्याग करे। पर जब मनुष्य बार-बार चेतावनी के बावजूद इन प्रवृत्तियों को पोषित करता रहता है, तब मां संहारक रूप धारण करती हैं।
श्रीरामकृष्ण परमहंस ने कहा था—“मां वही शक्ति है जो सृजन करती है और वही शक्ति संहार भी करती है। मां दुष्ट का नहीं, दुष्टता का नाश करती है। मां पापी से घृणा नहीं करती, पाप से करती है।” यह वचन गहरा सत्य प्रकट करता है—मां की करुणा जीवित प्राणियों के लिए अनंत है, पर उनका संहारक रूप उन प्रवृत्तियों के लिए है जो धर्म, सत्य और न्याय को नष्ट करती हैं।
सृष्टि का नियम संतुलन है। प्रकाश और अंधकार, सत्य और असत्य, पुण्य और पाप—इनके बीच का संतुलन ही ब्रह्मांड को गतिमान रखता है। यदि अधर्म और पाप का पलड़ा भारी हो जाए तो मां का संहारक रूप अनिवार्य हो जाता है। यही कारण है कि दुर्गा पूजा केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। यह हमें हर साल याद दिलाती है कि अपने भीतर के असुर को पहचानो और उसका संहार करो। यही आत्म-संस्कार समाज का संस्कार बनेगा।
हमारी याचना मां से यही है—
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
असतो मा सद्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय।
हे मां, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। हे मां, हमें असत्य से सत्य की ओर बढ़ाओ। हे मां, हमें मृत्यु के भय से अमरत्व की ओर उठाओ। और तब हम सब उद्घोष कर सकेंगे—
सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥
और तब हम भारतीय इस उद्घोषणा को शान से आगे बढ़ाते रहेंगे—“उदारचरितानाम् तु वसुधैव कुटुंबकम्।”
मां, आप कुमाता नहीं हो सकतीं। आपका वात्सल्य हमें बचाता है, लेकिन अब आवश्यकता है कि आप हमारे भीतर पल रही राक्षसी प्रवृत्तियों का संहार करें। जीवों को जीवित रखिए, क्योंकि जीवन आपका वरदान है, पर असत्य, पाप और अन्याय की दुष्प्रवृत्तियों को समूल नष्ट कीजिए।
यही जीवन-दर्शन है, यही सनातन सत्य है। करुणा और संहार का संतुलन ही धर्म की स्थापना है।
जय मां दुर्गा
अमर नाथ ठाकुर, 1 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।
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