गंभीर का दंभ: भारतीय क्रिकेट का दुर्भाग्य
मुख्य कोच की भूमिका खिलाड़ियों की प्रतिभा को तराशने की होती है, उन्हें कुंद करने की नहीं। कोई भी खिलाड़ी अपनी योग्यता और निरंतर प्रदर्शन के बल पर ही टीम में जगह बनाता है। वैभव सूर्यवंशी को भी बीसीसीआई और चयनकर्ताओं ने पिछले कई महीनों के उनके असाधारण खेल, आईपीएल के चमत्कारी प्रदर्शन और उनकी अद्वितीय प्रतिभा को देखकर ही भारतीय टी-20 टीम में शामिल किया था। आईपीएल के फॉर्मेट को देखते हुए, एक ओपनर और आक्रामक बल्लेबाज के तौर पर वर्तमान में पूरे भारत का कोई भी बल्लेबाज वैभव के आसपास भी नहीं ठहरता। ऐसे में आयरलैंड और इंग्लैंड के इस टी-20 दौरे पर उन्हें लगातार बाहर रखना मुख्य कोच गौतम गंभीर की किस मानसिकता और रणनीति को दर्शाता है, यह समझना बिल्कुल भी कठिन नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि गंभीर अपने पुराने झगड़ालू स्वभाव और भेदभावपूर्ण रवैये के वशीभूत होकर देश की एक उभरती हुई महान प्रतिभा को नष्ट करने पर तुले हैं। यदि वे इस समय भारत में होते, तो खेलप्रेमी ऐसे फैसलों का स्वागत फूलों से नहीं, बल्कि ताजे टमाटरों और अंडों से करते, ताकि उन्हें जनता के आक्रोश की चोट का अहसास हो पाता।
जब भारतीय टीम आयरलैंड जैसी फिसड्डी टीम से हार गई, तो पूरा देश गहरे अफसोस और गुस्से में डूब गया। कोच और कप्तान की गलत नीतियों के कारण जो डर था, वही हुआ—संजू सैमसन, अभिषेक शर्मा, ईशान किशन और स्वयं कप्तान श्रेयस अय्यर जैसे स्थापित खिलाड़ी बुरी तरह फ्लॉप साबित हुए। गंभीर के पास एक मौका यह भी था कि वे वैभव को खिलाते और यदि टीम असफल होती, तो हार का ठीकरा उन पर फोड़ देते। लेकिन गंभीर अपने अहंकार, गुमान और दंभ में इतने सराबोर रहे कि उन्होंने अपने कर्तव्य की ही बलि दे दी, जिसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय टीम अपने लगातार 16 सीरीज की जीत के शानदार सिलसिले को एक बेहद साधारण टीम के हाथों गंवा बैठी।
अब जब इंग्लैंड के खिलाफ बेहद कठिन मुकाबला सामने है, और सलामी बल्लेबाज के तौर पर संजू और अभिषेक दोनों ही पूरी तरह नाकाम हो चुके हैं, तब गंभीर के पास वैभव सूर्यवंशी को मौका देकर अपनी भूल सुधारने का आखिरी अवसर है। यदि अब भी वे अपनी जिद पर अड़े रहे, तो भारत वापसी पर उनकी भारी फजीहत तय है। अब देखना यह है कि क्या यह चमत्कारी बालक अंतिम एकादश में मौका पा पाता है या नहीं। भारतीय क्रिकेट को मुंबई और दिल्ली की लॉबी के वर्चस्व से मुक्त होना ही होगा; खेल में राजनीति, जिद और दंभ के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। गंभीर ने टीम चयन में जिस बौद्धिक भ्रष्टाचार का परिचय देश के सामने रखा है, उसका ध्वस्त होना अनिवार्य है। आने वाले मैच यह तय करेंगे कि अंतिम ग्यारह में चयन योग्यता, प्रतिभा और प्रदर्शन के आधार पर होता है या फिर कोच की सड़ांध मारती जिद के आधार पर। भारतीय टीम से फिर से किसी अच्छे प्रदर्शन की अपेक्षा तभी की जा सकती है, जब टीम में न्याय हो।
हम तो यही चाहते हैं कि इस अद्भुत बालक का 'वैभवपूर्ण' प्रदर्शन अन्य वरिष्ठ खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बने, न कि ईर्ष्या का जरिया। ऐसा इसलिए, क्योंकि वैभव जैसी प्रतिभाएं साधारण नहीं होतीं, वे ईश्वरीय देन और अद्वितीय वरदान से युक्त होती हैं, जिनका सम्मान होना ही चाहिए।
अमर नाथ ठाकुर, 29 जून, 2026, कोलकाता।
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