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Tuesday, 30 June 2026

राम मंदिर की चोरी नहीं, यह पूरे तंत्र का आईना है


राम मंदिर की चोरी नहीं, यह पूरे तंत्र का आईना है



जहाँ धन होगा, वहाँ आकर्षण होगा; जहाँ आकर्षण होगा, वहाँ लालच भी जन्म लेगा। और जहाँ लालच होगा, वहाँ भ्रष्टाचार की संभावना भी बनी रहेगी। यही मानव स्वभाव है। इसलिए जब अयोध्या के राम जन्मभूमि मंदिर में दान-दक्षिणा से जुड़ी कथित चोरी की खबर सामने आई, तो मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। हाँ, दुःख अवश्य हुआ। दुःख इसलिए कि भगवान राम के नाम पर समर्पित श्रद्धा भी भ्रष्टाचार की इस महामारी से अछूती नहीं रह सकी।

वास्तविकता यह है कि भ्रष्टाचार आज भारतीय समाज की सबसे भयावह बीमारी बन चुका है। देश का शायद ही कोई कोना, कोई संस्था या कोई व्यवस्था इससे पूरी तरह मुक्त हो। हमारा तंत्र भीतर तक खोखला हो चुका है। इसे सुधारने में वर्षों नहीं, दशकों लगेंगे।

जब व्यवस्था के हर स्तर पर बेईमानी का विष फैल चुका हो, तब चोर ही चोर को पकड़ेगा, वही उसकी जाँच करेगा, वही आरोप-पत्र तैयार करेगा और वही उसे दंडित भी करेगा। ऐसी स्थिति में चोरी समाप्त नहीं होती, केवल चोर बदलते रहते हैं। तब समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह रह जाती है कि हम चोरों की तुलना करके यह तय करने लगते हैं कि उनमें सबसे छोटा चोर कौन है। वही हमें सबसे ईमानदार दिखाई देने लगता है।

समाचारों से ज्ञात हुआ कि राम मंदिर में दान-दक्षिणा के प्रबंधन का दायित्व ऐसे कर्मचारियों को सौंपा गया था, जिनका मासिक वेतन लगभग 12 से 20 हजार रुपये था। क्या आज के समय में इतनी आय पर कोई व्यक्ति अपने परिवार का सम्मानपूर्वक पालन-पोषण किसी शहर में कर सकता है? उत्तर सहज ही 'नहीं' में मिलेगा।

उनका दायित्व केवल रुपये गिनना और बैंक में जमा कराना नहीं था। वे करोड़ों रुपये की ईमानदारी के भी प्रहरी थे। उनसे अपेक्षा थी कि वे प्रतिदिन अपार धनराशि के बीच रहकर भी उसके प्रति तनिक भी आकर्षित न हों। प्रश्न यह है कि क्या हम उनकी इस ईमानदारी का मूल्य चुकाते हैं? उनके वेतन में उनके श्रम का मूल्य तो था, पर उस असाधारण चरित्र और आत्मसंयम का मूल्य कहाँ था, जिसकी हम उनसे अपेक्षा करते हैं?

यह तर्क चोरी का समर्थन नहीं है। चोरी किसी भी परिस्थिति में अपराध है। लेकिन यदि व्यवस्था ऐसे लोगों से असाधारण ईमानदारी की अपेक्षा करे, जिनका अपना जीवन आर्थिक संघर्षों से घिरा हो, तो यह व्यवस्था की कमजोरी अवश्य कही जाएगी। सार्वजनिक जीवन में तीन दशक से अधिक समय बिताने के बाद इतना अनुभव तो हो ही जाता है कि केवल नैतिक उपदेशों से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होता; उसके लिए ऐसी व्यवस्थाएँ भी बनानी पड़ती हैं, जिनसे प्रलोभन की संभावना न्यूनतम हो जाए।

इसीलिए मेरा मानना है कि यदि आज की व्यवस्था यथावत बनी रही, तो केवल अधिकारियों के चेहरे बदल देने से कुछ नहीं बदलेगा। चाहे पूरे प्रबंधन में वरिष्ठ IAS, IPS अथवा अन्य उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को ही क्यों न बैठा दिया जाए, भ्रष्टाचार की संभावना समाप्त नहीं होगी।

आप हजारों सीसीटीवी कैमरे लगा दीजिए, खुफिया कैमरों से हर कोना ढक दीजिए, निगरानी की हर आधुनिक व्यवस्था स्थापित कर दीजिए—फिर भी बेईमानी अपना नया रास्ता खोज लेगी। तकनीक अपराध को कठिन बना सकती है, असंभव नहीं।

कारण स्पष्ट है। समस्या व्यक्ति नहीं, व्यवस्था है। यदि राजनीति, प्रशासन, पुलिस और अन्य न्यायिक संस्थाओं में नैतिकता लगातार कमजोर होती जाए, तो किसी एक संस्था से पूर्ण पवित्रता की अपेक्षा करना यथार्थवादी नहीं होगा।

हाँ, भ्रष्टाचार को काफी हद तक कम अवश्य किया जा सकता है। दान-पेटियाँ पूरी तरह आधुनिक तकनीक से युक्त हों। उनमें लगे सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर प्रत्येक दान का तत्काल रिकॉर्ड तैयार करें। मशीन द्वारा दर्ज आँकड़ों का सप्ताह या पंद्रह दिन में एक बार भौतिक सत्यापन किया जाए।

गिनती करने वाले कर्मचारी बिना जेब वाले वस्त्र पहनकर ही प्रवेश करें। पूरी प्रक्रिया की लाइव रिकॉर्डिंग हो। बाहर निकलते समय उनकी अनिवार्य सुरक्षा जाँच हो। सीसीटीवी का रिकॉर्ड स्थायी रूप से सुरक्षित रखा जाए। श्रद्धालुओं को नकद के स्थान पर QR कोड, UPI, बैंक ट्रांसफर अथवा चेक के माध्यम से दान देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। सोना, चाँदी और अन्य बहुमूल्य दान का तत्काल डिजिटल पंजीकरण हो।

यदि संभव हो तो ऐसे प्रबंधन में त्याग और वैराग्य का जीवन जीने वाले संन्यासियों अथवा प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थाओं के सेवाभावी व्यक्तियों की भी भागीदारी हो सकती है। इससे चोरी पूरी तरह समाप्त भले न हो, पर उसकी संभावना अवश्य घट सकती है।

लेकिन यह मान लेना कि अयोध्या में राम मंदिर में भ्रष्टाचार का पूर्ण उन्मूलन हो जाएगा, शायद यथार्थ नहीं है। यदि किसी के पास ऐसा कोई विभाग, संस्था या कार्यालय का उदाहरण हो जहाँ कभी भ्रष्टाचार न होता हो, तो वह हमें अवश्य बतायें।

मीडिया में जब ऐसे मामलों पर भारी शोर मचता है, तो कभी-कभी ऐसा लगता है मानो यह देश की पहली चोरी हो। बहसें होती हैं, विश्लेषण होते हैं, नैतिक प्रवचन दिए जाते हैं। पर क्या कोई पूरे विश्वास के साथ यह कह सकता है कि इस व्यवस्था का प्रत्येक प्रहरी स्वयं हर प्रकार की बेईमानी से पूर्णतः मुक्त है?

अंततः मेरी दृष्टि में यह किसी एक मंदिर की चोरी की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था का दर्पण है जिसमें चोर ही चोर को देखता है, चोर ही शोर मचाता है, चोर ही जाँच करता है, चोर ही आरोप-पत्र लिखता है, चोर ही बहस करता है, चोर ही निर्णय सुनाता है और अंततः चोर ही चोर को जेल भेज देता है। चोर फिर कोई व्यवस्था कर चोरी से जेल से बाहर आ जाता है। मतलब वही चक्र फिर प्रारंभ हो जाता है। और यह चक्र चलता रहता है ... अनवरत।

हम क्षणिक आक्रोश व्यक्त करते हैं, कुछ देर संतोष कर लेते हैं कि हमसे बड़ा चोर पकड़ा गया। फिर जीवन अपनी पुरानी गति से चल पड़ता है।

बस, समझने का फेर केवल इतना ही है।


अमर नाथ ठाकुर, 30 जून, 2026, कोलकाता।

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