भौजिया
यह वह सूरज नहीं जो रोज़ ढलकर सुबह फिर लौट आता है। यह वह सूरज है जो कुछ हफ़्तों से हमेशा के लिए डूबने की तैयारी में है। अभी आँखों से ओझल नहीं हुआ, मगर दूरी हर पल बढ़ती जा रही है। उसकी आत्मा को ढोने वाले रथ का घोड़ा अब थक चुका है, गति मंद पड़ गई है—मानो उस परम नियामक का यही अंतिम निर्देश हो।
रथ भले ही जर्जर हो गया हो, पर चेहरे का तेज आज भी वैसा ही प्रखर है। स्मृतियाँ अभी भी भ्रम से परे और अडिग हैं। फिर भी, देह की विवशता देख हम अंदर ही अंदर जानने लगे हैं कि रथ को खींचने वाला यह अश्व शीघ्र ही क्षितिज के उस पार चला जाएगा, जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता।
यह नश्वर काया तब अग्नि को समर्पित हो जाएगी और शेष रह जाएँगी बस स्मृतियाँ। दौर आधुनिक है, तो अनगिनत तस्वीरों में हम उन्हें ताउम्र जीवित रखने की कोशिश करेंगे।
पर क्या कभी कोई मातृ-ऋण से उऋण हो पाया है? कदाचित नहीं। हम सिसकते रह जाएँगे, अश्रु-सिक्त नयनों से उनके साथ बिताए पलों को समेटकर जीवन की बची हुई सीमाओं को पार करेंगे। वर्षों बाद भी स्मृतियाँ धूमिल नहीं पड़ेगी, क्योंकि तब ये पंक्तियाँ उस वात्सल्य को पुनः पुनः जीवंत करती रहेंगी —
देह रगड़-रगड़ जब नहलाती,
मैं बन जाता था उच्छृंखल।
वह मेरी यशोदा मैया होती थी,
मैं होता उसका कन्हैया विट्ठल।
दुलारती थी, पुचकारती थी मुझे,
वह करती थी प्यार अविरल।
उसने मुझे करुणा-अमृत पिलाया,
बड़ा हो गया चूस-चूस उसका वक्षस्थल।
हम भले ही उम्र के किसी भी पड़ाव पर पहुँच जाएँ, बुढ़ापे की दहलीज़ लाँघ लें, पर माँ के सामने हम हमेशा अबोध नेना ही रहते हैं।
चरणों में अश्रुपूर्ण विदाई और अनंत प्रणाम। 🙏
अमर नाथ ठाकुर, 24 अक्तूबर, 2026, कोलकाता।
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