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Sunday, 18 October 2026

कोलकाता में आंसुओं के बीच बहता आस्था का प्रवाह

 कोलकाता में आंसुओं के बीच बहता आस्था का प्रवाह

बारिश की अप्रत्याशित फुहारें और उसके बाद मची अफरा-तफरी ने कोलकाता के उत्सव की धड़कनों को एक पल के लिए थाम दिया। 19 जिंदगियों का असमय चले जाना और दर्जनों का घायल होना हर शहरवासी के सीने में एक गहरी टीस छोड़ गया है। चारों ओर एक गमगीन सन्नाटा है, एक ऐसा सन्नाटा जिसकी मिसाल पिछले तीन चार दशकों में शायद ही कभी हमने देखी सुनी हो।

कोलकाता की दुर्गा पूजा सिर्फ एक त्योहार नहीं, एक जीवंत नदी है। यहाँ सड़कें संकरी हैं, पंडालों में जगह सीमित है और सामने इंसानों का असीम समंदर। इसके बावजूद, इस शहर की पहचान रही है इसका अनुशासन, इसका सहज प्रवाह और एक अनकही तारतम्यता। लाखों की भीड़ में बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और पुरुष एक साथ एक ही लय में बहते हैं। कोई शाम की चकाचौंध और भीड़ से बचने के लिए देर रात निकलता है, तो कोई भोर के शांत अंधेरे में पंडालों की भव्यता निहारने पहुंचता है। दिन हो या रात, यहाँ कोई भी समय खाली नहीं रहता। पंचमी से लेकर दशमी तक हिंदू, मुस्लिम, ईसाई—हर धर्म, हर उम्र का इंसान सड़कों पर उतरकर इस शहर को एक बड़े उत्सव में तब्दील कर देता है।

पंडालों की कारीगरी, रोशनी का सम्मोहन और वातावरण में गूंजती वीरेंद्रकृष्ण भद्र की चिरपरिचित आवाज; चंडी पाठ के सुर हर हृदय की तंत्री को झंकृत कर देते हैं। इस शहर की ऊर्जा अद्वितीय है, जो किसी को भी अपने आगोश में ले लेती है।

कल की हृदय विदारक घटना ने निश्चय ही हम सभी को झकझोर दिया है। हर आंख नम है और हर मन भारी। जिन अपनों को माँ दुर्गा ने असमय अपने चरणों में समेट लिया, प्रार्थना है कि माँ उनकी आत्मा को शांति और सद्गति प्रदान करें और उनके परिजनों को यह असह्य पीड़ा सहने का संबल दें।

कोलकाता सिसक रहा है, मगर यह शहर ठहरना नहीं जानता। शोक की गहरी उदासी के बावजूद, यह आस्था, संगीत और आत्मीयता की भूमि है। गम के आंसुओं को पोंछते हुए कोलकाता आज शाम फिर माँ के जयकारों और ढाक की थाप के साथ धीरे-धीरे अपने उसी चिर-परिचित प्रवाह में बहने को तैयार होगा—क्योंकि आस्था यहाँ का विश्वास है, और आगे बढ़ते रहना इस शहर का मिजाज।


अमर नाथ ठाकुर, 18 अक्टूबर, 2026, कोलकाता

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