'डिजिटल इंडिया' में भारतीय रेल: क्या GPS सिर्फ कागज़ों पर है या डेटा में हेरफेर सिस्टम की मजबूरी है?
हाल ही में ट्रेन संख्या 03185/03186 (मधुबनी-कोलकाता स्पेशल) से यात्रा के दौरान एक ऐसा अनुभव हुआ, जिसने रेलवे के आधुनिकीकरण, RTIS (GPS ट्रैकिंग) और यात्री सेवा तंत्र के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
यह केवल कुछ घंटों की देरी का मामला नहीं है, बल्कि सिस्टम की पारदर्शिता, झूठी सूचनाओं और बुनियादी सुविधाओं के अभाव का एक स्पष्ट केस स्टडी है।
1. GPS और RTIS के दौर में 'मैनुअल टाइम-टैंपरिंग' का खेल होता है क्या ?
रेलवे का दावा है कि ट्रेनों को इसरो समर्थित RTIS (Real-Time Train Information System) और GPS डिवाइसेस से ट्रैक किया जा रहा है। यदि ऐसा है, तो 139 और रेल इन्क्वायरी पोर्टल पर ट्रेनों की स्थिति में सेकंड-दर-सेकंड अंतर क्यों आता है?
केस स्टडी का वास्तविक डेटा:
- 139 इन्क्वायरी का पहला अपडेट: ट्रेन संख्या 03185 दोपहर 12:53 बजे बरौनी से रवाना हुई और 13:35 बजे समस्तीपुर पहुंचेगी।
- 14:15 बजे की स्थिति: जब ट्रेन का दोबारा स्टेटस देखा गया, तो सिस्टम ने बताया कि ट्रेन 13:58 बजे बरौनी से खुली है।
एक ट्रेन स्टेशन से 12:53 बजे भी खुलती है और बाद में उसी स्टेशन से खुलने का समय 13:58 दिखा दिया जाता है। साफ है कि सिस्टम में डेटा ऑटोमैटिक GPS से नहीं, बल्कि लेटलतीफी और डिविजनल नाकामी को छुपाने के लिए मैनुअली अपडेट और टेंपर किया जा रहा है। जब डेटा ही मनगढ़ंत दर्ज होगा, तो आम यात्री किस आधार पर अपनी यात्रा की योजना बनाए?
2. 'स्पेशल ट्रेन' उपेक्षा की शिकार ट्रेन होती है ?
त्योहारों और भीड़ के समय चलने वाली स्पेशल ट्रेनों का किराया सामान्य से अधिक होता है, लेकिन सुविधाएं किसी साधारण पैसेंजर गाड़ी से भी बदतर:
- डेढ़ गुना समय: सकरी से कोलकाता की जो दूरी सामान्य ट्रेनें 12–14 घंटे में तय करती हैं, 03186 के टाइम-टेबल और चाल के अनुसार उसे 19+ घंटे लग रहे हैं।
- बंचिंग का बहाना: रेलवे का आधिकारिक जवाब आता है कि "ट्रेन पिछली डिविजन से लेट मिली और बंचिंग के कारण रुकी है।" सवाल यह है कि यदि आपके पास ट्रैक कैपेसिटी और ट्रैफिक मैनेजमेंट का ब्लूप्रिंट नहीं है, तो बिना तैयारी के स्पेशल ट्रेनें चलाकर यात्रियों का समय बर्बाद क्यों किया जा रहा है?
3. बुनियादी सुविधाओं का अभाव (ट्रेन 03186 का हाल)
- AC की स्थिति: ट्रेन काकरघाटी स्टेशन पर एक घंटे से अधिक समय तक खड़ी रही, लेकिन कोच (B2) का AC पूरी तरह बंद रहा। यात्रियों को बताया गया कि जब तक ट्रेन चलेगी नहीं, AC काम नहीं करेगा। बंद खिड़की-दरवाजों वाले कोच में यात्री कैसे सफर करें?
- पानी की किल्लत और लीकेज: कई स्टेशनों तक B2 कोच में पानी नहीं था। वहीं दूसरी ओर टॉयलेट लॉबी की छत से लगातार पानी टपक रहा था।
4. 'प्रक्रिया' के नाम पर शिकायत का भटकाव
सोशल मीडिया पर जब पूरे सिस्टम की नाकामी (ट्रेक जाम, लेट रनिंग, गलत डेटा) उजागर की जाती है, तो रेलवे का मानक ऑटोमेटेड जवाब आता है: "कृपया PNR और मोबाइल नंबर साझा करें।"
- सवाल: क्या ट्रेन के आउटर पर घंटों खड़े रहने, AC बंद होने या 139 पर गलत डेटा प्रसारित होने की समस्या को सुलझाने के लिए एक यात्री के PNR की ज़रूरत है? यह समस्या ट्रेन और रूट-मैनेजमेंट की है, जिसे PNR के नाम पर व्यक्तिगत शिकायत बनाकर बंद करने की कोशिश की जाती है।
नीति-निर्माताओं और रेल प्रशासन से सीधे सवाल:
- डेटा की सत्यता: क्या जनता के सामने पेश किए जा रहे ऑन-टाइम परफॉर्मेंस (OTP) के आंकड़े वास्तविक हैं या 139/NTES में समय बदलकर कागज़ी रिकॉर्ड दुरुस्त किए जाते हैं?
- GPS की भूमिका: यदि लोकोमोटिव में GPS लगे हैं, तो पब्लिक डोमेन में अनएडिटेड और बिना मानवीय हस्तक्षेप वाला रियल-टाइम डेटा क्यों उपलब्ध नहीं कराया जाता?
- स्पेशल ट्रेनों की जवाबदेही: स्पेशल ट्रेनों को 'अवांछित' मानकर मुख्य ट्रैक से घंटों किनारे क्यों खड़ा किया जाता है?
रेल मंत्री @AshwiniVaishnaw जी और @PMOIndia से आग्रह है कि केवल हाई-स्पीड और प्रीमियम ट्रेनों के प्रचार तक सीमित न रहकर, साधारण व मध्यम श्रेणी की ट्रेनों, इन्क्वायरी सिस्टम की पारदर्शिता और बुनियादी यात्री सुविधाओं की जमीनी हकीकत की भी समीक्षा करें। यात्रियों को ऊंची-ऊंची बातें , हाई टेक बातें करके बरगला नहीं सकते हैं।
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अमर नाथ ठाकुर, 16 अक्टूबर, 2026, कोलकाता।