अराजकता
कौवे की 'कूक' जब सुहानी लगे,
और कोयल की 'कांव-कांव' से
मन विच्छिन्न हो जाए।
लोमड़ी की 'दहाड़' से
दिशाएँ जब दलमलित हो उठें,
और शेर की 'म्याऊँ-म्याऊँ' से
मन विह्वल हो जाए।
जब गजराज का झुंड
घास छीलने लगे,
और गिलहरी की दुलत्ती से
महल धराशायी हो जाए।
जब 'तिलचट्टे' स्वच्छता का प्रतीक बन जाए
और लोग इससे अपना घर सजाने लगें।
जब ये सारे व्यतिक्रम
स्वाभाविक लगने लगें,
जब उलट-पुलट ही
सही क्रम प्रतीत होने लगे—
तब समझना,
अराजकता है।
और तब
धृतराष्ट्र के दरबार में
प्रतिदिन होगा चीरहरण,
भीष्म, द्रोण और कृप के
ठहाकों का
सामूहिक संगीत गान।
और फिर चलता रहेगा
युवराज दुर्योधन का
द्रौपदियों को साड़ी वितरण का
'न्यायिक महोत्सव'!
एक नया युग,
एक नया अराजक युग,
जहाँ बदल जाएगी
परिभाषा
सत्य की,
न्याय की
और नैतिकता की।
भनक सुनाई दे रही है!
अमर नाथ ठाकुर, 28 अक्तूबर, 2026, कोलकाता।