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Thursday, 11 November 2021

ठोकर


घर में भी टकराते हैं ....

कभी खुल रही खिड़की से

कभी बन्द हो रहे दरवाजे से

कभी दीवार से , कभी शीशे से  

छत से तेजी से घूम रहे पंखे से 

टूट कर गिरते पंखे से 

कभी ऊँगली कटती 

कभी नाक कटती

कभी खून से लथपथ  होता 

कभी मरहम पट्टी कभी दवा-दारु होती 

टकराने का दर्द से सहोदरी रिश्ता होता है 

टकराकर पछताते हैं  

लेकिन तभी तो अपना मूल्यांकन स्वयं कर पाते हैं

कभी खुले पथ पर भी टकराते हैं ...

जब पथ काँटों से भरा हो

सर्वत्र कंकड़ - पत्थर ही सना पटा हो

तब हर कदम पर टकराना होता है

कभी कांटे चुभते हैं कभी नाख़ून उखड़ते हैं

कभी हड्डी टूटती है कभी चमड़े छीलते हैं

कभी सपाट समतल पथ पर भी कदम लड़खड़ाते हैं

और गिरते हैं  

पीड़ा जब होती है 

फिर टकराने के ‘महत्त्व’ को जानना होता है 

तभी चलते रहने का अहसास होता है

कभी विचारों से टकराते हैं .....

कभी सिद्धान्तों से टकराते हैं .....

जब टकराव होते हैं

तब बहस होती है

एक हलचल मच जाती है 

जब भ्रष्टाचार से टकराते हैं

तब आन्दोलन होता है

दूसरों के सोच से टकराना होता है

स्वयं के सोच से भी टकराना होता है

कभी विरोधी विचारों से

कभी निंदा और गाली की बौछारों से

कभी अंतर्द्वद्व से

कभी छिन्न-भिन्न मनः स्थिति से

कभी तो टकराकर भटकने लगते हैं

और तभी तो सुपथ मिलते हैं 

टकराने के बाद पुनः टकराने का क्रम चल पड़ता है

एक-एक कर अनुभव में कुछ जुटता चलता जाता है

इस तरह टकराना अनवरत चलता ही रहता है

जब टकराते हैं तभी पता चलता है कि चल रहे हैं

यह चलते रहने का द्योतक है

यह हमारी दिशा का उद्घोषक  है

जीवन पथ का मील-स्तम्भ है टकराना                    

टकराते चलते रहना ही सरस जीवन है

निर्बाध चलते रहना तो नीरस जीवन है . 

 अतः चलते रहो 

टकराते रहो 

जीवन रस पान करते रहो .

अमर नाथ ठाकुर , 25 नवम्बर , 2018 , कोलकाता

 

Tuesday, 2 November 2021

बिहार का चुनाव

 बिहार का चुनाव !


वर्षों का कांग्रेसी शासन।कांग्रेसी करते रहे और करते ही रह गये।पूरा न कर पाये।कुछ भी नहीं हुआ और बिहार कराहता रहा ।


कर्पूरी जी भी कुछ करना चाह रहे थे शायद समय ज्यादा न मिला।

एक दशक से ज्यादा उसी समय जातीय संघर्ष का दौर चला - बैकवर्ड-फॉरवर्ड की लड़ाई।जनजागरण जरूर हुआ होगा किन्तु बिहार की शिक्षा व्यवस्था चरमरा गयी। क़ानून-व्यवस्था का गिरता स्तर और बढ़ता भ्रष्टाचार बिहार का पर्याय हो गया।


फिर लालू का युग आया। इन्होंने ने तो जैसे ठान रखा था, कुछ नहीं करना है। और इन्होंने कुछ नहीं किया। बिहार रसातल में चला गया। यही दौर था जब गाली और बिहारी एक दूसरे के समानार्थी होने लग गये। लालू के फूहड़ सस्ते मजाकिये अंदाज ने स्तर और गिरा दिया। अपहरण एक फलता-फूलता व्यवसाय बन गया। 


फिर नीतीश का उदय होता है जब कि जनता ने काफी उम्मीदें पाली हुई थीं। कुछ काम बना। जनता ने साँसें लेनी शुरू कर दी थीं। क़ानून-व्यवस्था की हालत सुधरी ,अपहरण कम होने लगे । भ्रष्टाचार भी कम हुआ । सड़क और बिजली के क्षेत्र में भी काम होने  लगे। आंगनबाड़ी,शिक्षामित्र  आदि अनेक तरह की बहालियाँ हुईं। कुछ लाख शिक्षकों की भी बहाली हुई। गुणवत्ता में ये सब खरे नहीं थे । फिर भी इतने रोज़गार पाकर बिहार की जनता में नयी आशा का संचार हुआ। लोग जाति आधारित झगड़े फसाद को भूलने लग गये। किन्तु इन सबका सारा श्रेय नीतीश को ही नहीं दिया जा सकता है, उनके पीछे भारतीय जनता पार्टी का सशक्त समर्थन और सहयोग भी था ।


 किन्तु शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में तो जो भी हुआ उसे ऊँट के मुँह में जीरा समान कार्य ही कहा जा सकता है। 

जो हो बिहारियों की घर वापसी शुरू नहीं हुई और न ही बिहारियों का पलायन रुका। लगता है अभी प्रवासी बिहारी कुछ और देखकर आश्वस्त हो लेना चाहते थे। लेकिन बिहार के नसीब में अच्छे दिन नहीं लिखे थे। नीतीश और भाजपा  झगड़ पड़े। बिहार की जनता के हित में ये लड़ाई रोक सकते थे। लड़ाई किन्तु रुकी नहीं। बिहार का दुर्भाग्य जो था ।


 किसकी गलती थी गहराई में अभी नहीं जाना, किन्तु नीतीश का अहंकार जरूर परिलक्षित हुआ।


बिहार के विकास की पटरी उखड़ गयी थी । बिहार तेजी से नीचे की तरफ जाने लगा। नीतीश अपने धुर विरोधी कांग्रेसी और लालू के नजदीक आकर अपनी सरकार के स्थायित्व के लिये ज्यादा मेहनत करने लग गये। बिहार के विकास का एजेंडा गौण हो गया। राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गयी।


नीतीश की गिरती लोकप्रियता का परिणाम यह हुआ कि अगले चुनाव में नीतीश पूरी तरह धराशायी हो चुके थे। नरेंद्र मोदी का भगवा झंडा आसमान में लहरा रहा था। नीतीश ने जनता की  नब्ज़ नहीं पहचानी । उसका अहंकारी मन पराजय को नहीं स्वीकार कर सका।


मांझी को मुख्यमंत्रीत्व सौंप कर एक अनूठा एवं आदर्श उदाहरण पेश करना चाहते थे, लेकिन उनके मन का मैल ऊपर आ गया। वह लालू और सोनिया स्टाइल में मांझी को हांकना चाहते थे। मांझी राबड़ी और मनमोहन से आगे निकले।फिर नीतीश ने अपना असली रंग दिखा ही दिया । नीतीश सत्ता पर फिर से कब्ज़ा कर बैठे। सत्ता का अतीव लालच नज़र आया जनता को नीतीश की कारगुज़ारियों में। 


नीतीश के द्वारा लालू का समर्थन लेना सबसे बड़ा पहलू बनता है नीतीश के कमज़ोर राजनीतिक चारित्रिक व्यक्तित्व का। जनता  लालू के जंगल राज को अभी पूरी तरह भूली  भी नहीं थी।जनता के अध पके घाव को नीतीश ने फिर से खरोंच लगा दिया था। स्राव होने लगा।


चुनाव के इस अंतिम चरण में जनता क्या यह समझती है ----


1. कांग्रेसियों के समय में  15 पैसे सरकारी पैसे जनता तक रिस - रिस कर आते थे । 

2. लालू के समय में जनता तक पैसे रिसने बंद हो गए थे।

3. नीतीश के समय में 25-30 पैसे तक जनता तक रिस कर आने लगे थे । 


तो जनता उसको क्यों न मौका दे जो पूरा का पूरा सौ पैसे जनता तक रिस कर आने देने का वादा करे। वैसे भरोसा क्या है ? जो किन्तु फेल हो गये उस पर फिर क्यों का भरोसा।


जनता को यह समझना होगा कि


1. कांग्रेस काम करती रही , करती ही रह गयी और कर ही नहीं सकी।इसलिए कुछ हुआ ही नहीं।

2. लालू ने करना ही नहीं चाहा और इसलिए कुछ नहीं हुआ।

3. नीतीश करना चाह रहे थे लेकिन कर ही नहीं सके।


इसलिए मौका उसे मिले जो अब नया हो , करना चाहता हो। और कोई च्वाइस भी तो नहीं है। बार - बार किसी आज़माए हुए को फिर क्यों आज़माऍं।


जय बिहार !

जय हिन्द !

अमर नाथ ठाकुर, 2 नवम्बर, 2015, कोलकाता ।

Sunday, 10 October 2021

सनातन एवं इस्लाम धर्म की पारस्परिक ग्राह्यता एवं सौहार्द्र

 


15-16 साल पूर्व की एक घटना ने इस्लाम के बारे में कुछ अन्यथा सोचने के लिये मेरे अन्तर्मन को झकझोर दिया। एक दिन मेरे एक  समकक्ष मुस्लिम महिला ऑफिसर मित्र  के ऑफिस में बहुत जोरों का हंगामा चल रहा था। उनका घेराव हो रखा था। घेराव करने वाले ऑफिस के ही सारे स्टाफ और ऑफिसर थे। मुझे जैसे ही पता चला  मैं  उस महिला अधिकारी के बचाव में तुरन्त ही चला गया। चूँकि हम दोनों के ऑफिस एक ही बिल्डिंग में थे और एडमिनिस्ट्रेटिव हेड  और उस ऑफिसर के महिला होने की वजह से मैं वहाँ उनके बचाव में चला गया था। जाने के बाद पता चला कि मामला ऑफिसियल कम धार्मिक ज्यादा था। जब इन महिला अधिकारी ने यहाँ के ऑफिस में ज्वाइन किया था, पहले ही दिन काली और रामकृष्ण वाले कैलेन्डर को उतरवाकर  कमरे से बाहर ले जाने को कह दिया था। बाजार से ऐसा कैलेंडर मंगवाया गया जिस पर किसी देवी- देवता का फोटो न हो, इन्होंने एक चटाई भी खरीदवायी थी जिस पर ऑफिस में ही वो नमाज पढ़ती थी, शुक्रवार यानी जुम्मे के दिन सेकंड हाफ में ही ऑफिस आती थी अथवा ढाई-तीन घंटों के लिए ऑफिस से चली जाती थी पास के किसी नामी मस्जिद में जुम्मे की नमाज़ के लिये। इस तरह स्वयं ये महिला ऑफिसर ऑफिस आने जाने में एवम् अपने धार्मिक कार्यों में भरपूर स्वतंत्रता बरतती थी, लेकिन अपने ऑफिस में लेट आने वाले स्टाफ को ये मेमो थमा देती थी, उनको रजिस्टर में अनुपस्थित भी मार्क कर देती थी। उनका यह आचरण स्टाफ लोगों को बड़ा ही भेद- भाव पूर्ण लगा। अतः स्टाफ लोगों ने इनके धार्मिक रंग पर चोट करने की सोची और उन लोगों ने भी योजना के तहत मंगलवार या सोमवार या शनिवार को पहले हाफ में ऑफिस आना बंद कर दिया। महिला अधिकारी के पूछने पर स्टाफ लोगों ने भी कहना शुरू कर दिया कि वो लोग भी पूजा करने मन्दिर गये हुए थे। इस तरह इस महिला अधिकारी से स्टाफ लोगों का विरोध बढ़ने लगा था और धीरे-धीरे इस तरह झगड़ा इतना उग्र रूप ले चुका था कि आज का दिन उनके प्रतिक्रियात्मक घेराव में परिणत हो चुका था। घेराव मानसिक रूप से ऑफिसर के प्रताड़ना का जबरदस्त जरिया होता है बंगाल में। खैर, किसी  तरह  बात बनी और बड़ी जद्दो-जहद के बाद घेराव छूटा। महिला अधिकारी ने अपने एकतरफा क्रिया-कलाप से पैदा किये असन्तोष को बाद के समय में कम करने की जरूर कोशिश की, लेकिन कुछ ही दिनों में उनका कोलकाता से ट्रान्सफर हो गया था ।


मैं सोचने लगा। सनातनी तो मूल रूप से सहिष्णु होते हैं, प्रतिक्रियावादी नहीं होते, सनातनी तो उदार, सरल, अनुग्राही और समझौतापरक होते हैं। मैं  सनातनी उन मुस्लिम महिला अधिकारी की  कट्टरता की प्रतिक्रया में कट्टर नहीं हो सकता था,  इसलिए सिवाय अफ़सोस और नफरत के मुझे कुछ नहीं हुआ, जो सिर्फ अपने तक में ही सीमित रहा। लेकिन क्या हर हिन्दू सनातनी ऐसा ही रहेगा। मुमकिन नहीं है। कुछ इन सब घटनाओं से प्रतिक्रियावादी हिन्दू तैयार हो जाएंगे। वर्षों बाद आज जब हम उन घटनाओं की विषद विवेचना कर रहे हैं तो कश्मीर से निकाले गये कश्मीरी पंडितों का ख्याल आता है जब कश्मीर हिन्दू शून्य हो जाता है। पता करता हूँ, सुबह में और पाँचों वक्त जोर-जोर से अजान की ध्वनि कानों से टकरा कर क्या संदेश देती है? तमिलनाडु के उस मुस्लिम बहुसंख्यक गाँव की बात याद आ जाती है कि जो सुप्रीम कोर्ट तक चली जाती है कि उस गाँव में हिन्दू मन्दिरों में वार्षिक पूजा न हो और वार्षिक रथ यात्रा भी हिन्दू इसलिए न निकालें कि यह मुस्लिम बहु संख्यक गाँव है और इसलिये भी कि इस्लाम में मूर्ति पूजा की सख्त मनाही है। केरल के एक जिले में जब मुस्लिम आबादी आधी से ज्यादे हो जाती है तो वहाँ मुस्लिमों द्वारा सिर्फ मुस्लिम जिलाधिकारी की माँग होने लगती है। बंगाल, उत्तरप्रदेश और केरल जैसे राज्यों में मुस्लिम बहुसंख्य क्षेत्रों में हिन्दुओं की पूजा अर्चना पर इस सेकुलर देश में भी मनाही हो जाती है। पाकिस्तान में हिन्दूओं की आबादी आजादी के समय के 23 %  के मुकाबले  2-3 % पर आ गयी होती है। बांग्लादेश में भी हिन्दू आबादी 1947 की आजादी के बाद से करीब तिहाई से भी कम पर आ गयी होती है। अफगानिस्तान हिन्दू आबादी शून्य हो गया होता है। अधिकाँश मुस्लिम देश में इस्लामी शरिया कानून लागू है। अधिकाँश मुस्लिम देशों में मन्दिरों में पूजा की मनाही है। अफगानिस्तान में बुद्ध के ऐतिहासिक मूर्ति को तोड़ दिया जाता है। पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे देशों में आये दिन मन्दिरों में तोड़ - फोड़ होते ही रहते हैं, मुसलमान मूर्ति भंजक बन जाते हैं, हिन्दुओं का जबरन धर्म परिवर्त्तन, उनकी बच्चियों से जबरन शादी की बातें वहाँ आम होती हैं, जिस पर वहाँ की सरकार की तरफ से भी कोई ख़ास कार्रवाई नहीं होती है। अफजल गुरु की फाँसी के बाद उसके जनाजे में अपने यहाँ हजारों की भीड़ जमा हो जाती है, ओसामा बिन लादेन के समर्थन में नारे लग जाते हैं, अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार के समर्थन में  आवाजें गूँजने लगती हैं। कहीं गजवा-ए-हिन्द का पाठ, कहीं लव-जेहाद, कहीं जबरन या कहीं लालच देकर धर्म परिवर्त्तन, कहीं मॉब लिंचिंग, तो कहीं घर वापसी आदि की सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़ने की बातें आम हो रही होती हैं ।


बहु-संख्य-मुस्लिम समाज अल्प-संख्य इतर धार्मिक समुदाय को कभी नहीं स्वीकारता। इतिहास इसका गवाह है। ईरान, ईराक या अन्य सभी मुस्लिम देश इसके उदाहरण हैं। वर्त्तमान में अफगानिस्तान इसका उदाहरण हैं, पाकिस्तान, बांग्लादेश इसके उदाहरण बनते जा रहे हैं। कश्मीर से हिन्दू पण्डितों का निष्कासन इसका ताजा-ताजा ज्वलंत उदाहरण है। अतः कल्पना कीजिए 1947  में भारत का विभाजन नहीं हुआ होता तो अखंड भारत में 100 करोड़ हिन्दू के मुकाबले में करीब 65-70 करोड़ मुसलमान होते और ऐसी स्थिति में मार-काट, लूट-पाट, बलात्कार, धर्म-परिवर्त्तन, महिलाओं पर अत्याचार, महिलाओं का दिन-दहाड़े अपहरण आदि एक असह्य सीमा को पार कर गया होता (जैसा पाकिस्तान, बांग्लादेश में होता है, अफगानिस्तान में हुआ, कश्मीर में हुआ, उन आधारों पर कहना है), अधिकाँश भारत में शरिया कानून होता, पूरा देश बोको हराम, आइएसआइएस  एवं विभिन्न आतंकवादी मुस्लिम संगठनों की गिरफ्त में होता (आज दुनियाँ में 50 से ज्यादे खूँखार मुस्लिम आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं)। आज भारत कई हिस्सों में नहीं बँटा होता तो 165-170 करोड़ आबादी वाला एक इस्लामिक राष्ट्र होता। सनातनी हिन्दू से सम्बन्धित किताबों में लिखी बातें लिखे तक ही सीमित रह गयी होती। धन्यवाद जिन्ना और नेहरु (यदि नेहरु भी 1947 के भारत विभाजन के लिए जिम्मेवार  साबित हो रहे हों) को जिसने भारत को 1947 में बांटा और उस समय सिर्फ 30-40 लाख के नरसंहार पर बात सीमित रह गयी, नहीं तो आज हमलोग (हिन्दू एवम मुस्लिम दोनों, ईसाई को भी जोड़ सकते हैं) कई-कई  करोड़ नरसंहार में कट रहे होते, और आज दुनियाँ अहिंसा, सहिष्णुता, मैत्री, भाईचारा जैसे सुसन्देश देने वाले सनातनियों के संग का सौभाग्य खो गये होते और वेद और उपनिषद, गीता और रामायण अमेरिकन और यूरोपियन विश्वविद्यालयों के  पाठ्यक्रम का सिर्फ हिस्सा होते, अयोध्या, मथुरा, काशी, कन्याकुमारी, पुरी, केदारनाथ, बद्रीनाथ, द्वारिका और दक्षिण के विलक्षण मंदिर सब इतिहास की बात होती, शायद उनके भग्नावशेष भी नहीं होते। इस क्रम में कुछ अच्छे-अच्छे इस्लामिक स्ट्रक्चर भी भग्नावशेष में बदल चुके होते। 


कहते हैं कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन जब करीब-करीब सभी आतंकी एक ही धर्म वाले पाए जाते हैं तो लगता है यह सिद्धान्त गलत है। गलती कहाँ है? दोष कहाँ है? मुसलामानों के धर्म की हम निंदा नहीं करते और करना भी नहीं चाहिए क्योंकि किसी सनातनी के लिए यह सर्वमान्य बात है, लेकिन हम इस्लाम को लेकर सन्दिग्ध क्यों होने लगते हैं ?  हमारे हिन्दू धर्म में ही कालांतर में ढेर सारी बुराइयाँ आ गयी थीं/है, लेकिन  हिन्दू धर्म में लगातार सुधार होते रहे हैं, अभी भी चल रहे हैं। लेकिन हमें लगता है हिन्दू धर्म की तर्ज पर इस्लाम में भी रिफार्म की आवश्यकता है। उनके कुरआन मजीद के ऐसे आयत जो सीधे-सीधे नफरत या हिंसा या किसी भेद-भाव का संदेश देते हैं,  के अर्थ को उदारवादी बनाना होगा। जन्नत, काफिर,मुशरिक आदि शब्दों के गलत सन्देश प्रसारित करने वाले अर्थ को सर्वग्राही बनाना होगा । मदरसे में कुरान मजीद की शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्त्तन करना होगा। क्योंकि वहाँ "अल्लाह भगवान से अलग है , गैर मुस्लिम काफिर है और काफिरों को मारने में कोई बुराई नहीं, मूर्ति पूजा से घृणा, जन्नत में हूर मिलती हैं आदि"  विकृतियों से भरी शिक्षा दी जाती है और मुस्लिम बच्चों में कट्टरता जागती है। अल्लाह हिन्दुओं के भगवान अथवा ईसाईयों के गॉड से अलग अर्थ नहीं  रखता, ऐसा आम मुस्लिमों तक को बताना पड़ेगा। सनातनी किसी की पूजा पद्धति से घृणा नहीं करता फिर मुस्लिम ऐसा क्यों करता। इस्लाम बुत परस्ती से मना करता है लेकिन यदि बुत परस्तों से या हिन्दुओं की इस प्रथा से नफरत करना भी सिखाता है तो ऐसे इस्लाम की समझ को बदलना पड़ेगा, क्योंकि ऐसे में हिन्दू और मुस्लिम कैसे साथ रह सकते  हैं ? इसमें इस्लामिक स्कालर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं । सूफ़ियों के संदेश किस तरह सर्वग्राह्य हैं, क्यों नहीं इन्हें आगे आते रहने चाहिये ?


ईश्वर सबके प्रति दयावान होता है, यह भेद-भाव नहीं कर सकता, ईश्वर सभी धर्मों से ऊपर है, धर्म ईश्वर पाने के रास्ते  हैं, इसलिए ईश्वर या वो सुप्रीम अथॉरिटी के अपने धर्म के अनुसार अलग नाम हो सकते हैं, लेकिन सभी सुप्रीम अथॉरिटी समान हैं, एक हैं । यही सन्देश सभी धर्म क्यों नहीं दे सकते ?  सनातन धर्म के बड़े-बड़े साधु सन्त इस बात को डंके की चोट पर कहते हैं । रामकृष्ण परमहंस क्या कहते थे ..... उन्होंने तो बहुत से धर्मों का अनुशीलन किया था और तब कहा .....कि इस्लाम, ईसाई आदि धर्मों के अनुशीलन के उपरान्त हमें  वही अनुभूति हुई जो सनातन धर्म को पालन करने के उपरान्त हुई ..... क्या ऐसा ही सन्देश दूसरे धर्म के धर्म गुरु देते हैं ? यदि नहीं तो फिर ऐसा करने की आवश्यकता है। ला इलाहा इल्लल्लाह ...... का अर्थ है अल्लाह के सिवा और कोई भगवान नहीं, लेकिन यदि मुसलमान इसका अर्थ यह समझे कि सिर्फ अल्लाह होते हैं और भगवान-वगवान, गॉड कुछ नहीं तो इस धारणा को मिटाना होगा, बदलना होगा। यदि ईसाई जीसस को, मुसलमान मुहम्मद को मानते हैं तो उन्हें राम, कृष्ण के अवतार होने को नकारने की प्रेरणा कहाँ से मिलती है ? यदि ऐसी बात या इस तरह के विभेदकारी चिंतन की धारा उनमें है तो इसे त्यागना ही होगा .....हमारा अल्लाह उनके भगवान् से ऊपर है या बेहतर है..... इस धारणा को बदलना ही होगा । अराबिक में अल्लाह जो है वही संस्कृत में भगवान है, अंग्रेजी में गॉड है । श्री रामकृष्ण कितने साधारण ढंग से इस बात को बता देते थे .... अक्वा  कहो, वाटर कहो, जल या पानी कहो सब एक ही चीज है सबका वही स्वाद है और सबका काम प्यास बुझाना ही है । जब आपका सामना इनसे होता है तभी आप समझते हैं ये सब एक हैं। अलग भाषा से यह सिर्फ सुनने में अलग लगता है, वस्तुतः अलग है नहीं । जिस दिन अल्लाह से, गॉड से, भगवान से सामना हो जाय तो पता चले कि ये सब एक ही है। हर धर्म के विद्वान्, ज्ञाता, ठेकेदार ऐसी ही व्याख्या करते हैं ? यदि नहीं तो उसका तिरस्कार करना चाहिये, बहिष्कार करना चाहिये। यदि कहें कि इस्लाम घृणा नहीं सिखाता तो फिर हिन्दुओं की मूर्ति पूजा से मुसलमान घृणा क्यों करते हैं ? मुस्लिम मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते इसलिए उन्हें मूर्ति पूजकों से क्या नफरत की आजादी मिल जाती है ? बिलकुल नहीं । सिर्फ धर्म के मानने के आधार पर ईश्वर कभी भेदभाव, घृणा या मारकाट नहीं सिखाते। यदि ऐसा है तो ऐसी परिभाषा को बदलना ही होगा ।


सनातन धर्म का सन्देश  "वसुधैव कुटुम्बकम याने पूरी पृथ्वी ही परिवार है, सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुखभागभवेत" में क्या कहीं कोई भेद-भाव का लेश मात्र भी कोई अर्थ छिपा हुआ है ? क्या ये उक्तियाँ कहती है कि सिर्फ सनातनी या हिन्दू ही सुखी हों, निरोगी  हों या सिर्फ उन्हीं का कल्याण हो,   बिलकुल नहीं . ... अहिंसा परमो धर्म: .... सत्यमेव जयते .... हर मंत्र के उपरान्त शान्ति, शान्ति, शांति : .... कहने की परम्परा सनातन धर्म को कितना महान बनाता है। दूसरे धर्म द्वारा भी इस तरह के सन्देश देने वाले वचन ग्रंथों से निकाल कर क्यों न प्रचारित किया  जाता ? सनातन धर्म के विभिन्न वेद  या उपनिषद जैसे ग्रंथों में इस तरह के वचन भरे पड़े हैं । जब सनातन धर्म की विशेषताओं को संग्रहीत करते हैं तो लगता है सनातन धर्म में कितना लचीलापन है, कितनी सहिष्णुता है, कितनी उदारता है, सबको अपने में समेट कर आत्मसात करने की कितनी क्षमता है। एक और सनातनी मंत्र को देखें...... ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ......उपनिषद के यह मंत्र अद्वितीय हैं। इस तरह के अर्थ और भाव वाले वचन शायद और किसी और धर्म के किसी ग्रन्थ में नहीं ।



सनातन धर्म में ही ईश्वर की अवधारणा के अनेक मत हैं ......  कोई राम को मानता है, कोई कृष्ण को, कोई शैव है, कोई शाक्त। कोई कबीर पंथी हो सकता है या नानक पंथी। कुछ ब्रह्म समाजी हो जाते हैं, कुछ आर्य समाजी। सनातनी एक साथ इनमें कई मतों को मान सकता है। लेकिन इनमें अब तो कम-से-कम लोग इन भिन्नताओं की वजह से नहीं लड़ते। सनातनी  अद्वैतवादी, द्वैतवादी या विशिष्टाद्वैतवादी में से कुछ भी हो सकता है। इसके लिये उनके ऊपर कोई भी बन्दिश नहीं है। सनातनी मूर्त्ति पूजक हो सकता है  या नहीं भी। वह मन्दिर पूजा के लिये जा सकता है या नहीं भी। वह  नाना प्रकार के पेड़ों, पक्षियों, जानवरों, नदियों, पहाड़ों की पूजा कर सकता है  या नहीं भी। वह  व्रत रख सकता है या नहीं भी। वह  मन्त्रों का जाप कर सकता है, नहीं भी। सनातनी  शाकाहारी हो सकता है  या माँसाहारी भी। वह  नाना प्रकार के जानवरों का माँस खा सकता है। वह नाना प्रकार की मछलियाँ भी खा सकता है। इस तरह की सोच वाले सनातनियों को समाज वाले  या सनातनी धर्म के ठेकेदार समाज या धर्म से निष्कासित या बहिष्कृत नहीं करते  या इस वजह से कभी कोई धमकी भी नहीं  देते।



सनातनी अपनी इच्छा से  मन्दिर जा सकता है, मज़ार, मस्ज़िद, गुरुद्वारे में या चर्च में जाकर ईश्वर की वन्दना कर सकता  है। उसे माथे पर रुमाल बाँधने या जाली दार टोपी लगाने में ज़रा भी हिचक नहीं होती। वह  धोती या लूँगी या पतलून बेहिचक धारण कर लेता है। इन धार्मिक स्थलों में, इन अजीबोगरीब पोशाकों में उसे  ईश्वर के प्रति निष्ठा या श्रद्धा दर्शाने में कोई संकोच नहीं होता। उसका सनातन धर्म कभी इसमें बाधक नहीं होता। उसे सिख, जैन, बौद्ध, मुस्लिम, पारसी, यहूदी या ईसाई धर्मावलंबियों से कोई परहेज़ नहीं। इन सबों से सनातनी परम्परा ने कभी घृणा या द्वेष नहीं सिखाया। सनातनी  रामकृष्ण को, साईं बाबा को समान दृष्टि से पूजता है। वह  चर्च में जाकर क्राइस्ट के सामने सर नवा कर आ जाता है, वह  किसी सूफी की मजार पर अपनी  इच्छा पूर्ति के लिये चादर चढ़ा चला जाता है। सनातनी  परम्परा, धर्म, संस्कृति ऐसा करने को प्रेरित करते हैं। सनातनी अपने व्यवहार से दूसरे के धर्म ग्रंथों को न पढ़ते हुए भी एक आदर्श प्रतिस्थापित करता है। इस तरह के  सदआचरण  आम भटके हुए मुस्लिमों या ईसाईयों में देखने को नहीं मिलते। सनातनियों की किसी कड़े धार्मिक क्रिया-कलापों से दूर रहने के स्वभाव को या ऐसी कोई पाबन्दी नहीं होने को ईसाई या इस्लाम मानने वाले अपने धर्म की संकीर्ण व्याख्या या अपने धर्म के उद्धरणों से इस स्थिति को प्रतिकूल दृष्टि से देखते हैं। इस तरह देखा गया है कि अपने धर्म ग्रंथों की व्याख्या का सहारा लेकर नफ़रत या घृणा या दूरत्व का संकेत ईसाईयों या मुस्लिमों से मिलता है  न कि हिन्दुओं सनातनियों से। आम धारणा है कि इस्लाम में लचीलापन का एकदम अभाव है। इस्लाम में प्रवेश का प्रावधान तो है, किन्तु यहाँ से निकलना असम्भव है। इस्लाम में  कट्टरता चरम पर है। इस्लाम से निकलने की इच्छा करने वाले मौत के घाट उतार दिए जाते हैं। यहाँ ईश-निन्दा बहुत बड़ा अपराध है, जबकि सनातनी अपने ईश्वर प्रतीकों पर एक से एक चुटकुले तक बोल लेते हैं।  इस्लामी शरिया कानून चौराहे पर पत्थर से, कोड़े से मारने की सजा देता है, हाथ काटने की सजा का अभी भी प्रावधान है, जो अमानवीयता की पराकाष्ठा है। महिलायें दोयम दर्जे का व्यवहार पाती हैं। देश के संविधान से ऊपर अपने कुरानिक या शरिया कानून को रखने की बात करते हैं। सबसे बड़ी समस्या है कि वहाँ कोई विरोध के स्वर नहीं उठते। इसमें वहाँ के विशिष्ट पढ़े -लिखे और वहाँ के उदारवादी विद्वान् भी कोई विरोधी प्रतिक्रिया नहीं देते या दे सकते। ऐसे लोगों पर तुरन्त ही फतवा जारी कर दिया जाता है। वसीम रिजवी या आरिफ मुहम्मद खान जैसे मुखर व्यक्तित्व वालों का यही हाल है। इस्लाम में आन्तरिक लोकतंत्र नहीं है। कुरआन की आयतें पत्थर की लकीर है। इससे इतर ये नहीं सोचते। तर्क वितर्क के लिए कोई स्थान नहीं यहाँ। अल्लाह के वचन जिब्रील के द्वारा पैगम्बर मुहम्मद साहब को सुनाया गया जिसे किसी और ने लिपि बद्ध किया। यहाँ सवाल उठता है कि इसे लिपि बद्ध किये जाते समय क्या कोई मिलावट नहीं हुई ? कुरआन मजीद में २६ ऐसी आयतें  हैं जिस पर सवाल उठता है कि ये भेदभाव और हिंसा को बढ़ावा देता है, इसलिए ये  आयत कुरआन के नहीं हो सकते क्योंकि ईश्वर या अल्लाह हिंसा या भेद भाव का आदेश  साधारण स्थितियों में क्यों देगा। सर्व साधारण मुसलमान कुरान मजीद की आयतों का सर्व साधारण अर्थ लेते हैं और भेदभाव और हिंसा की बातों को कुरान सम्मत बता देते हैं। अधिकाँश मुस्लिम देशों में हिंसा व्याप्त है और हिंसा करनेवाले ये आतंकवादी इन हिंसा को कुरआन सम्मत बता न्यायोचित ठहराते हैं। हिंसा का महिमा मंडन सिर्फ इस्लाम में ही देखने को मिलता है। मुस्लिम देशों में या अपने देश में मदरसों में शायद यही तथाकथित शिक्षा दी जाती है, जैसा सुनने को मिलता है, जो बच्चों को कट्टर बना देती है।



सनातनी या हिन्दू धर्म घृणा या हिंसा का कभी महिमा-मण्डन नहीं करता। आपने सुना है लोग अपने बच्चे का नाम रावण, कंस या दुर्योधन, सुरसा, शूर्पणखा रखते हैं ? जाति-प्रथा या स्त्रियों के सम्बन्ध में आपत्ति जनक बातों के उल्लेख वाले धार्मिक ग्रंथों के हिस्सों को सनातनी हिन्दूओं ने तहे दिल से नकारा है, तिरस्कृत किया है। ज्यादेतर आपत्ति जनक बातें तो धार्मिक ग्रंथों के गलत अनुवाद अथवा गलत भावार्थ से आयी हैं। कहीं कहीं धर्म ग्रंथों में मिलावट के भी सबूत मिले हैं जो विभेदकारी संदेश देते हैं। यदि यह कहीं पायी भी गयी हैं तो  इन शास्त्रीय खण्डों की खुले आम निन्दा होती है। ऐसी निन्दा या आलोचना पर कभी कोई रोक या धमकी की उद्घोषणा नहीं होती है। हमारी सीमित जानकारी में  सनातन धर्म में जिहाद, फतवा या काफ़िर या तलाक़ जैसे शब्दों का समतुल्य शब्द नहीं। यदि ऐसा हो तो उसे नकारने या त्यागने में भी कोई भी प्रतिरोध नहीं। जो सबका है वह सनातन धर्म है। जो सबको स्वीकारता है वह सनातन धर्म है। जो आज़ादी देता है, जहाँ बंधन नहीं, भेद-भाव नहीं, घृणा या द्वेष नहीं जो सिर्फ प्रेम, विश्वास और जन कल्याण  का पाठ फैलाता है वह सनातन धर्म है। सनातनी यह कहना पसंद करते हैं कि जहाँ प्रेम और करुणा, विश्वास, आज़ादी, श्रद्धा और निष्ठा, सहिष्णुता इत्यादि का वास हो वहीं सनातन धर्म है ।




अतः सिर्फ सनातन हिन्दू धर्म ही सार्वभौमिकता की कसौटी पर खरा उतरता दीखता है। सनातन हिन्दू धर्म में दुनियाँ की अन्य सारी धार्मिक मान्यताओं को आत्मसात करने की क्षमता रखता है । इसका कारण है कि बौद्ध, जैन, ईसाई, इस्लाम आदि सनातन हिन्दू धर्म से ही कालान्तर में निकले हुए हैं। सन्ततियाँ अलग हो सकती हैं किन्तु माँ  - बाप उसे हमेशा स्वीकार लेते हैं। देवी दुर्गा की एक प्रसिद्ध प्रार्थना का एक अंश कि 'कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति'  उल्लेख किये  बिना नहीं रह सकते । 


इसलिए सिर्फ पूजा पद्धति बदलने से क्या हमें बदल जाने चाहिये  या हमारे मानव-मूल्य बदल जाने चाहिये ? नहीं, बिलकुल नहीं। इसलिए किसी सनातनी के घर में किसी मजार के या मक्का मदीना या यरूशलेम के फोटो वाले कैलेन्डर लगा दें उनको कोई दिक्कत नहीं होती। लेकिन इस्लाम या ईसाई धर्म को मानने वाले को दिक्कत हो जाती है। सनातनी के एक ही घर में कोई मूर्ति पूजक होता है कोई आर्य समाजी होता है कोई फर्क नहीं पड़ता। आप मूर्ति पूजक नहीं हो सकते लेकिन मूर्ति से नफरत वाले क्यों हो सकते हैं ? आप अजान सुन सकते हैं तो आरती, भजन या रामायण की पंक्तियाँ क्यों नहीं सुन सकते। यदि कोई हिन्दू ईद मिलन समारोह मना सकता है, इफ्तार की पार्टी रख सकता है, ताजिये के जुलुस में शामिल हो सकता है तो कोई मुस्लिम दीवाली के पटाखे क्यों नहीं उड़ा सकता, होली का रंग या गुलाल अपने ऊपर क्यों न पड़ने दे सकता ? यदि कोई मुस्लिम मूर्ति पूजक नहीं तो भंजक क्यों हो ? धार्मिक रीति रिवाजों के लिए किसी को कोई घृणा या गुस्सा क्यों हो ? किसी का भगवान यदि इस प्रकार के घृणा या क्रोध सिखाता है तो क्या वो भगवान् हो सकता है ? बिलकुल नहीं ।


सनातनी यदि गाय को पूजते हैं तो मुस्लिम या ईसाई उसे सम्मान करे । हिन्दुओं को भी सूअरों को मुसलामानों के धार्मिक भावना के हिसाब से उनके इलाके से दूर रखना चाहिये। निरामिष खाने के मामले में हमलोग भी एक दूसरे की  धार्मिक भावना का  आदर करें। एक दूसरे के धार्मिक ग्रंथों को पढ़ें, एक दूसरे के संतों को सुनें। संतों को भी चाहिये कि जो  सन्देश  हम अपने समुदाय में बाँट रहे हैं कहीं वो दूसरे समुदाय के लिए घृणा या हिंसा का वाहक तो नहीं। यही सबसे बड़ा तरीका होगा जिससे कि हमारे धार्मिक ग्रन्थ संदेह के घेरे में नहीं आएँगे और हमारे सभी पक्षों के सन्त भी श्रद्धा से सुने जाएँगे । यहाँ एक बात उल्लेख किये बिना चर्चा अधूरी रह जाएगी। सनातन धर्म के जैसा लचीलापन और सर्व ग्राह्यता क्या इस्लाम में है ? यदि हमारे जैसे गैर मुस्लिमों के मन में ऐसी शंका है तो मुस्लिम ऐसे लचीले और सर्व ग्राह्य उदाहरण क्यों नहीं प्रस्तुत करते ? उल्टे हलाल खाने के मामले में गैर सनातनियों के ऊपर इस्लामी हलाल खाना होटलों में, हवाई जहाज़ों आदि जगहों पर परोसने को विवश किया जाता है । आजकल तो थूके हुए खाने  मुस्लिम होटलों में या मुस्लिम रसोइयों के द्वारा परोसे जाने का मामला खूब प्रचारित हो रहा है। एक तरफ तो यह हदीथ द्वारा मुस्लिमों का पवित्र हलाल भोजन इस प्रक्रिया को करके पूरा होता है, दूसरी तरफ हिन्दू इसे सख्ती से अस्वीकारते हैं। यदि इन सब मामलों में कोई सामंजस्य नहीं बनता तो क्या हिन्दुओं के और मुस्लिमों के होटल और फलों- सब्जियों के दुकान एकदम अलग हो जाएँगे। ये हमारी अर्थ व्यवस्था को ही नहीं हानि पहुँचाएगा बल्कि धार्मिक समभाव और समरसता के ऊपर भी बहुत बड़ा धक्का होगा। इन सब वजहों से समाज बंटता जा रहा है, जो दुःखद है।


मेरे कहने का यह अभिप्राय न लिया जाय कि सारे मुसलमान या ईसाई भेद-भाव पैदा करने वाले होते हैं । मुझे याद है मेरे एक मुस्लिम दोस्त ने मुझे उस समय कुरआन मजीद दी थी जब गैर मुस्लिमों के लिए कुछ दशक पहले कुरआन किसी दुकान में खरीदना एक असम्भव-सा काम होता था। उस दोस्त ने मुझे एक विशेष दुकान का कबाब  खाने  से रोक दिया था यह कहकर कि वो दुकान भरोसे का नहीं था और मैं बीफ नहीं खाने वाला सनातनी जो ठहरा । आज भी इस्लाम या हिन्दू धर्म पर हम दोनों खुलकर बात करते हैं और सन्देशों का खुलकर आदान-प्रदान करते हैं। कुछ मुस्लिम मित्र तो मुझे अक्सर दुर्गा, सरस्वती, शिव या गणेश आदि  देवी- देवताओं वाले फोटो के साथ सुप्रभात नमस्कार भेजते हैं ।


सनातनियों में अधिकाँश सहिष्णु हैं, गलत के विरुद्ध आवाज उठाते हैं, लिखते हैं, लेकिन क्या इस्लाम मानने वालों में ऐसा है ? नहीं। वहाँ उल्टी बातें हैं । इस्लाम में गलत के विरुद्ध आवाज नहीं निकलती, वो लिख नहीं सकते। डरते हैं सर कलम कर दिए जाने से, फतवे से। अधिकाँश सनातनी सर्व समावेशी हैं, सहिष्णु हैं, दूसरे के धर्म को सम्मान देते हैं, उनकी पूजा पद्धति का सम्मान करते हैं, अल्लाह, ईश्वर, गॉड को एक मानते हैं, महिलाओं को सम्मान देते हैं, समान अधिकार देते हैं । लेकिन  इसके ठीक उलट इस्लाम में ऐसा  नहीं, अधिकाँश उलट अवधारणाओं वाले हैं। सनातनी देश हित के मामले में संविधान को उच्चता देते हैं, लेकिन इस्लाम मानने वाले शरिया को उच्चता प्रदान करते हैं, अरब देशों की परम्पराओं को अपना आदर्श मानने लगते हैं, भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को निकृष्ट दृष्टि से देखते हैं। 100 करोड़ से ज्यादे सनातनी अपनी हजारों लाखों वर्षों की सभ्यता और संस्कृति  का अपमान कैसे स्वीकार कर सकते हैं। इस्लाम में अधिसंख्य आबादी कठ मुल्लाओं की गिरफ्त में है, जो कुरान-शरीफ की व्याख्या में दूसरे धर्म के लोगों का ख्याल ही नहीं करते, मदरसों के द्वारा कुरआन की असंतुलित शिक्षा देते हैं, जबकि सनातनियों की धार्मिक किताबों में दूसरे धर्म के सिद्धान्तों के इतर कोई विद्वेष पूर्ण बात ही नहीं लिखी हुई है तथा यहाँ पंडित, संत या विद्वान् इस तरह का कोई अर्थ या भाव भी प्रचारित नहीं करते । 


सुकर्णो विदाई के समय नेहरु से पवित्र गंगा जल की मांग करते हैं और कहते हैं उन्होंने अपनी पूजा पद्धति बदली है अपने पूर्वजों को नहीं छोड़ा है। वाजपेयी जी भी इण्डोनेशियाई लोगों की इसी भावना का अपने भाषण में उल्लेख करते हैं जब उनके इण्डोनेशियाई समकक्ष वाजपेयी जी को इंडोनेशिया की रामलीला के मंचन के समय यही बात दुहराते हैं। इण्डोनेशियाई मुस्लिमों के अपने हिन्दू पूर्वजों के प्रति श्रद्धा हमें भारतीय सनातनियों को ओत-प्रोत कर देते हैं। इण्डोनेशियाई एयरलाइंस का नाम गरुड़ होना, वहाँ के रुपये पर गणेश की छवि होना इस्लामी  इंडोनेशिया हमें बहुत कुछ सिखाता है।  क्या हमारे यहाँ के मुस्लिम के लिए ये आचरण आदर्श बन सकते हैं ? 


हमारा मानना है कि सनातनी या हिन्दू धर्म के मानने वाले जहाँ भी दूसरे धर्म वालों पर हिंसा या अत्याचार में पाए गये हैं वह उनकी प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई होती है जो गन्दी राजनीति से प्रेरित और विद्वेषपूर्ण और असामाजिक तत्वों के द्वारा की गयी होती  है, यह इस्लामी कट्टरवाद की प्रतिक्रया में एक नयी अवधारणा की तरह पैदा हो रही है, और परिणाम स्वरूप कहीं-कहीं लिंचिंग की घटनाएँ भी प्रकाश में आयी हैं, जिसकी हिन्दुओं के द्वारा घोर निन्दा की जानी चाहिये और की भी जाती है। सनातनी धर्म ग्रंथों या संतों का इसमें हाथ नहीं होता है । हाँ, कुछ फर्जी भगवा धारी इसके अपवाद हो सकते हैं, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत-बहुत ही कम है। यहाँ अपने मित्र के साथ मेरठ में घटी सच्ची घटना का जिक्र किये बिना नहीं रह सकता । मेरा एक मुस्लिम सहयोगी किन्तु मित्र कई सप्ताह तक हिन्दू बाहुल्य इलाके में भाड़े का घर नहीं ढूंढ़ पाया क्योंकि इसके मुस्लिम होने से इन्हें कोई अपना भाड़ेदार बनाना ही नहीं चाहता था। अपने बच्चे की अच्छे स्कूल में पढ़ाई के लिए इसे पास के आवासीय इलाके में घर तो चाहिये ही था और ये पास का इलाका हिन्दू इलाका था, जहाँ लोग मुस्लिमों को घर नहीं देते थे। कमोवेश पूरे भारत वर्ष में ऐसी ही स्थिति है। हिन्दू मुस्लिम इलाके में नहीं रहेंगे और मुस्लिम हिन्दू इलाके में नहीं रहेंगे और यदि ये दूसरे के इलाके में रहना भी चाहेंगे तो लोग उन्हें घर देंगे नहीं।

 हिन्दुओं के प्रतिक्रियावाद मुस्लिमों के कट्टरवाद के विरोध में तेज़ी से पनप रहे हैं। कारण कुछ उदाहरण से समझना होगा। मुस्लिम लड़के हिन्दू लड़की से शादी करें तो हिन्दू लड़की अधिकांश मामले में मुस्लिम बनने के लिए विवश कर दी जाती है। कई-कई बार तो मुस्लिम लड़की हिन्दू लड़के को भी मुस्लिम बना देती है शादी के लिए। बहुत सारे मामले आ रहे हैं जबकि मुस्लिम लड़की हिन्दू लड़के से शादी के लिए उनके परिवार वालों के विरोध में रुक जाती है या हिन्दू लड़के हिंसा का शिकार होते हैं। हिन्दू लड़कियों के परिवार वाले अपनी बेटियों का मुस्लिम धर्म स्वीकारने की बात को भी ज्यादे आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। हिन्दू ज्यादे हिंसा पर उतारू नहीं होते। लेकिन समय बीतने पर मुस्लिमों के हिंसा की प्रतिक्रिया में हिन्दू भी प्रतिक्रियावादी होते जा रहे हैं। मुस्लिम हिन्दू मन्दिर या सिखों के गुरुद्वारे में नमाज पढ़ते पाए गए हैं, हिंदुओं तथा सिखों से उनमें उन्हें सद्भावपूर्ण सहायता भी मिलती रही है। इसके विपरीत मुस्लिम मस्जिद में  हिन्दू भजन कीर्तन के लिए कभी भी तैयार नहीं होते । ईद, बकरीद में हिन्दू मुस्लिमों के सेवइयां, कुर्बानी के बकरे के मांस को स्वीकार लेते हैं, लेकिन इसके विपरीत हिंदुओं के भगवान के पूजा प्रसाद मुस्लिमों को स्वीकार्य नहीं होते, गुरुद्वारे में मुस्लिम लंगर में नहीं खाते। हिन्दू हलाल मांस खाते पाए गए हैं जबकि हिंदुओं के घर मुस्लिम झटका माँस नहीं स्वीकारते। मुस्लिमों का दीन उन्हें ऐसा करने से रोकता है, यह उनका तर्क होता है। मुस्लिमों की कट्टरता से हिंदुओं की सहिष्णु, समझौतापरक, अनुग्राही, सरल और उदारवादी सोच धक्का खाती है और विरोध का स्वतः स्फूर्त स्वर फूट पड़ता है। मुस्लिमों के द्वारा सड़कों पर, स्टेशन, प्लेटफार्म, पार्कों पर नमाज पढ़ना सर्व साधारण हिन्दू को परेशान करता है, हिन्दू भी प्रतिक्रिया में सड़कों और पार्कों पर भजन कीर्त्तन करने लगे हैं, जो पहले ये कभी भी करते नहीं देखे गये। सबेरे-सबेरे अजान की ध्वनि जो कर्ण प्रिय लगती थी अब कटु लगने लगी है और हिन्दुओं का विरोध स्वर कई शहरों में उठने लगा है।


 तुष्टीकरण की राजनीति ने वोट पॉलिटिक्स को बढ़ावा देकर भारतीय समाज को बहुत ही घायल किया है। सेकुलरिज्म की विकृत परिभाषा से भी समाज को काफी हानि पहुँचती है। हम सब भारतीयों का एक ही डीएनए है याने हमारे पूर्वज एक ही थे, इस बात में बहुत ही दम  मालूम पड़ता है। यह  सभी  समुदायों में एकता के लिए बहुत ही अकाट्य  तर्क है। इसको यदि सभी समझने लग जाएँ तो फिर झगड़ा बहुत ही कम हो जाय क्योंकि कोई फिर क्यों अपने पूर्वजों को गाली दे। कुछ मुस्लिम तो सिर्फ तीन चार पाँच पीढ़ी पहले ही मुस्लिम में कन्वर्ट हुए हैं, क्या वो अपने दादा- परदादा या नाना-परनाना या दादी-परदादी या नानी- परनानी को गाली देंगे ?  बिलकुल नहीं। इस तर्क से फिर वो आततायी औरंगजेब या बाबर या खिलजी या लूटेरे तैमुर इत्यादि का कभी भी महिमा-मंडन नहीं करेंगे जिन्होंने भारतीय सनातन समाज को बेहद प्रताड़ित किया। यह नफरत की दीवार को कम करेगी। इतिहास लिखने वालों ने भी बहुत बड़ा नट  खेल किया है, विकृत इतिहास को परोसकर भारतीय समाज का बहुत बड़ा अपकार किया है। ये वामपंथियों की या अंग्रेजी मानसिकता वालों की कारगुजारी हो सकती है। इतिहास को ठीक करने का काम इसलिए सावधानी से करना होगा क्योंकि आज तक जो इस्लामिक इतिहास पढ़ते आ रहे थे उसे बदलना, लोगों की स्मृति से हँटाकर कुछ दूसरा परोसना लोगों की स्वीकृति की सीमा की परीक्षा होगी, जो एक महती दुष्कर काम होगा और भारतीयों की सोच को बदलने में कई दशक लग जाएँगे ।

 हमें ऐसे परिवर्त्तन का इन्तजार रहेगा ।


अमर नाथ ठाकुर ,१० अक्तूबर ,२०२१, कोलकाता ।

Thursday, 30 September 2021

बहिरागत

 साल्ट लेक के महिष बथान में तो दो साल पहले ही आ गया था रहने के लिए , लेकिन मतदाता पहचान पत्र अभी भी अलीपुर के पते का ही है. बड़े झमेले हैं नया बनवाने में , बहुत दौड़ाते हैं . आज तो  भवानीपुर उपचुनाव के लिये वोट डाल आता हूँ . आराम से फिर नया कार्ड बनवाएँगे . 

दस  बजे न्यू रोड ,अलीपुर पहुँच गये . मतदाताओं की सहायता के लिये मतदान केन्द्र के आस-पास भी छोटे-छोटे बूथ बने होते हैं , जो वास्तव में हेल्प डेस्क होते हैं , जहाँ विभिन्न पार्टी वाले अपने समर्थक मतदाताओं को वोटर लिस्ट में नाम की क्रम संख्या बूथ संख्या के साथ बता देते हैं , इससे पोलिंग बूथ पर वोटर लिस्ट में नाम  ढूंढ़ने में कोई दिक्कत नहीं होती है . पिछले पन्द्रह सालों से हमारा बूथ अलीपुर के  इलाहाबाद बैंक ट्रेनिंग  स्कूल प्रांगण में ही होता आया है . इस प्रांगण में चार बूथ होते हैं अतः अपना बूथ नम्बर पता करके जाना ही होता है , नहीं तो पुलिस  के जवान अन्दर नहीं जाने देते हैं . हमलोग वर्धमान रोड में इस एकमात्र पार्टी बूथ पर पहले गये . वहाँ कुछ वोटर मतदाता सूची में  अपना नाम फोटो देखकर दूंढ़ रहे थे और पार्टी के लोग उन्हें उनका नाम , बूथ नंबर और मतदाता क्रम संख्या लिख कर एक प्रिंटेड पुर्जे पर दे रहे थे . इस पुर्जे पर दीदी ममता बनर्जी का फोटो छपा हुआ था . धूप छाते के बगल में एक बड़ा-सा कट आउट दीदी का लगा हुआ था , इसलिये कहने की जरा भी आवश्यकता नहीं कि ये टीएमसी का बूथ था . जैसे ही एक दो लोगों की भीड़ छंटी, हमलोग भी उनके टेबुल के एकदम नजदीक पहुँच गये , अपना -अपना नाम और पता बताया और रिक्वेस्ट किया कि हमलोगों का बूथ नम्बर और मतदाता क्रमांक बता दें . हमारे नाम के सरनेम , बँगला बोलने के लहजे से उन्होंने जरुर कुछ अनुमान लगा लिया और तुरन्त ही बता दिया कि इलाहाबाद बैंक  वाले बूथ पर इस बार न्यू रोड वाले का पोलिंग बूथ नहीं है , यह इस बार यहाँ से दूर वाले जज कोर्ट से  थोड़ी दूरी पर अवस्थित बूथ पर होगा , इसलिए उनके पास उपलब्ध लिस्ट में हमलोगों का नाम नहीं है . उन लोगों ने कहा इस बार मतदाता सूची में खूब काट-छाँट और फेर- बदल हुआ है और बूथ नम्बर में भी खूब बदलाव हुआ है , इधर से उधर खूब किया गया है . 

हमलोगों को भरोसा करना था क्योंकि हमलोग अपना पहचान पत्र लेकर चल पड़े थे वोट गिराने इन्हीं लोगों के भरोसे कि ये लोग हमें सारी जानकारी दे देंगे . अपने मतदाताओं की सहायता के लिये और उससे अपनी पार्टी के पक्ष में वोट की आशा में विभिन्न पार्टी वाले पोलिंग बूथ के आस-पास इस तरह का हेल्प डेस्क जरुर लगाते हैं . वारिश के बाद वाली धूप बड़ी तेज मालूम पड़ रही थी और पसीने की बूँदें ललाट पर छलकने लग पड़ी थी . मेरे लड़के ने कहा छोड़ो , अब इतनी दूर पैदल कौन जाय , लौट चलें वोट बिना गिराये हुये. मेरा मन नहीं मान रहा था . हम २०-२१ किलोमीटर दूर से गये थे , अतः ये श्रम हम जाया नहीं जाने देना चाह रहे थे . हम ने कहा मुश्किल से एक किलोमीटर दूर भी नहीं होगा हमलोग पैदल चलेंगे और रवाना हो गये  अगले बूथ की खोज में . कुछ ही कदम चलने के बाद हमलोगों ने सोचा कि बूथ की जानकारी तो आजकल ऑनलाइन भी उपलब्ध होती है इसलिये इलेक्शन कमीशन के वेबसाइट पर क्यों न चेक कर लें. स्मार्ट मोबाइल साथ में था . हम दोनों ने गूगल पर सर्च शुरू किया . गूगल से इलेक्शन कमीशन के साईट पर पहुँच मेरे लड़के ने अपना नाम , बूथ नम्बर और मतदाता क्रमांक पता सहित ढूँढ लिया , फिर मेरा भी ढूँढ़ लिया . बूथ नम्बर में इस बार भी कोई परिवर्त्तन नहीं हुआ था . यह बिलकुल वही था जो अप्रैल महीने के चुनाव के वक्त था . हमलोग गये इलाहाबाद बैंक ट्रेनिंग स्कूल के प्रांगण से , जहाँ कोई भी भीड़ नहीं थी , कोई भी क्यू नहीं, कुछ ही मिनटों में अपना मतदान करके आ गये . 

न्यू रोड जाने के रास्ते में वर्धमान रोड से उसी पार्टी के बूथ के पास से पुनः गुजर रहे थे . वहाँ पार्टी के वही दो भद्र जन बैठे थे . उन्होंने हम दोनों को देख कर भी नहीं देखने का बहाना किया , लेकिन हम लगातार उनकी आँखों में देखते रहे , और अन्ततः हमने उनसे अपनी नजर मिला ही ली . हमने बायें हाथ की तर्जनी उनकी तरफ बढ़ा दी . नाखून पर  काली इंक देखकर उन्होंने कहा, " भोट गेरा दिया ." 

हमने कहा , "दादा , हम दोनों ने भोट गेरा दिया ."  कुछ रूककर हमने कहा , "बूथ तो वही है , कोई चेंज नहीं हुआ है . आप लोगों ने हमें गलत क्यों बताया ?" 

पार्टी के बूथ पर कुर्सी की दोनों बाजुओं के बीच  रंग बिरंगे धूप छाते के नीचे ममता दीदी के बड़े कट आउट  की साया में बैठे निर्लज्ज दोनों भद्र लोक सर हिलाते हुए बिना किसी अचरज के अपनी पैनी नजर से हमें देखते रहे . वो कुछ नहीं बोले . हमने कहा , "दादा भाई आम्रा बुझे ग्याछि , आपनारा ठीक ही बुझे छेन, आम्रा बहिरागत ." (दादा भाई , हमलोग आपको समझ गये , आप दोनों ने हमदोनों के लिए ठीक ही अनुमान किया था, हमलोग सही में बहिरागत हैं .)

भवानीपुर विधान सभा उपचुनाव के लिये टीएमसी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बीजेपी की प्रियंका टिबरेवाल है, जो गैर बंगाली महिला है , और इस चुनाव क्षेत्र में बहुत बड़ी संख्या गैर बंगाली मतदाताओं की भी है. दशकों से बंगाल में रह रहे ये सब एक झटके में बहिरागत की श्रेणी में चुनाव के समय में आ जाते हैं.


अमर नाथ ठाकुर , ३० सितम्बर , २०२१ , कोलकाता .

Wednesday, 22 September 2021

आप लोग हिन्दू हैं , सो सैड

 लखनऊ से स्थानान्तरण उपरान्त कोलकाता ज्वाइन किया था और कोलकाता के सबसे सम्भ्रान्त इलाके में एक बहुमंजिली इमारत में सरकारी आवास मिला था . सारे सामान के साथ हमलोग आ गये थे . उस बहुमंजिली इमारत में निवास करने वाली फैमिली घर आ - आकर हर  तरह के सहयोग का आश्वासन देकर आने - जाने लगी थी , कोई चाय बिस्कुट कोई पानी भी लेकर आती थी . हमारे घर में  सामानों के पैकेट्स खोले जा रहे थे और सजाये जा रहे थे . ड्राइंग रूम में लखनऊ से उपहार में मिले धातु के गणेश की चपटी प्रतिमा को सबसे पहले मेरी पत्नी ने दीवाल में लटका दिया था . अभी दो - तीन दिन ही हुए थे कि एक दिन की बात है घर का मुख्य दरवाजा खुला था . हमारे ही फ्लोर पर सामने रहने वाली फैमिली की एक 5-6 वर्ष की चुलबुली- सी गुड़िया-सी बच्ची हमारे घर में उछल - कूद करते हुए आ जाती है और ड्राइंग रूम में लटकाए गये गणेश जी की मूर्ति के सामने खड़ी हो जाती है . गौर से देखने के बाद  पूछती है , "आंटी , आपलोग हिन्दू हैं ? " . मेरी पत्नी ने कहा , "हाँ , बेटे ". और यकायक उस बच्ची के मुख से निकला , "सो सैड !" ( so sad ) और  फिर कुछ ही देर के बाद उछलती - कूदती हुई अपने घर में वापस चली गयी . हमारे घर में सब के सब दंग रह गये . इतनी छोटी बच्ची भी हिन्दू - मुस्लिम समझती है , जबकि यह अंग्रेजी स्कूल में पढ़ती थी . अनायास मेरे मुख से निकल आया "प्रथमे ग्रासे मक्षिका पातः" , कैसे बनेगी अली साहेब की फैमिली से , क्योंकि उसी इमारत के एक ही फ्लोर पर बिलकुल आमने - सामने हमलोग थे . शंका ने जड़ जमा ली . 

 हमारी शंका निर्मूल निकली . अली साहब की फैमिली और हमारी फैमिली वर्षों तक उसी इमारत में एक ही फ्लोर पर आमने - सामने साथ - साथ जो रही . बहुत ही मेल - जोल से हमलोग रहे . कुछ ही सप्ताहों में हमलोगों की फैमिली आपस में बहुत ही घुल - मिल गयी थी . हमलोग कुरआन मजीद के बारे में , मुसलमानी परम्परा के बारे में  , उनके पर्व त्योहारों के बारे में थोड़ा-थोड़ा जानने लग गये थे . उनकी रमजान  में कॉलोनी की बहुत सी हिन्दू फैमिली उनके लिये इफ्तार रखती थी , हमारी फैमिली भी रखती थी . उनकी ईद बकरीद में हमलोग भी निमन्त्रित होते थे . दीवाली और होली साथ मनाते थे. उनकी बच्चियाँ भी दीवाली में पटाखे उड़ाती थीं  , होली में रंग और गुलाल से खेलती थी . हमारी कॉलोनी में सरस्वती पूजा भी मनायी जाती थी , प्रसाद रूप में बंगाली खिचड़ी साथ मिलकर खाते थे . रक्षा बंधन में अली साहब की बच्चियाँ हमारे बेटों को राखी बाँधती थी और टीके लगाती थी . परिवार के बीच  अक्सर सब्जियों का और विशेष भोजन का आदान - प्रदान होता ही रहता था . मिठाइयों - पकवानों के उपहार जब बाहर से मिलते थे , आपस में बाँटे जाते थे . चाय साथ - साथ पीने की कोई गिनती नहीं . दोनों फैमिली साथ - साथ एक ही गाड़ी  में बाजार भी खरीद-बिक्री करने जाती थी . कभी भी फिर किसी हिन्दू - मुस्लिम की भेद वाली बात बीच में नहीं आयी . निःसंदेह बड़े ही खुले विचारों वाली यह मुस्लिम फैमिली थी . "क्या आप लोग हिन्दू हैं" , "सो सैड " की गाँठ कब की खुल कर सीधी हो गयी थी पता ही नहीं चली  . 

बाद में एक दुर्घटना घटी . उस मुस्लिम ऑफिसर अली ने आत्म ह्त्या कर ली और इस परिवार पर संकट के बादल आ गये . तब अली भाभी जी के माता- पिता अपना बसा - बसाया बिजनेस छोड़-छाड़ कर अपनी बेटी को सपोर्ट करने बिहार से कोलकाता आ गये . फिर, कुछ वर्षों बाद यह मुस्लिम फैमिली एक मुस्लिम इलाके में घर खरीद कर शिफ्ट हो गयी थी , लेकिन हमलोगों के फैमिली के बीच आना - जाना लगा रहा . हमलोग ईद बकरीद में उनके यहाँ जाते रहे , वो लोग भी हमलोगों के यहाँ कभी - कभार  आते रहे . लेकिन वो हमारे यहाँ होली - दीवाली में अब नहीं आते थे , लेकिन यह बात हमलोगों ने इतनी सीरियसली नहीं ली . शायद सरस्वती पूजा और रक्षा बन्धन भी उनकी फैमिली और उनके बच्चे अब न मनाते हों . हाँ , इन पर्वों के बाद कभी - कभार लेट लतीफी शुभकामना सन्देश उनकी फैमिली की तरफ से आ जाया करता था .

आगे कुछ वर्षों के बाद की बात है, मेरे बेटे की शादी थी . अली परिवार को भी निमन्त्रण का कार्ड सपत्नीक देकर आया था . बेटे की शादी में अली परिवार  का भी पधारना हुआ . हमलोग बड़े खुश हुए . हमलोग घूम - घूम कर अतिथियों का स्वागत कर रहे थे . हमलोगों ने खाने -पीने के आइटमों के बीच मटन का भी इन्तजाम किया हुआ था . सारे अतिथि गण खा रहे थे . हमने देखा अली भाभी की अम्मी और  पिताजी  मेरे बिलकुल पास आ गये हैं , उन्होंने  दर्जनों मेहमानों के बीच में एक प्रश्न पूछ लिया , "क्या ये मटन हलाल है ?"  पास खड़े और खा रहे अतिथि गण अवाक् हो गये .  भरी पार्टी में मैं क्या अनाप - शनाप बोलता . हमने कहा, "आंटी अंकल , मालूम नहीं , किन्तु यहाँ तो अधिकाँश कसाई मुस्लिम ही होते हैं उन्होंने शायद इस बात का ख्याल रखा हो ."  लेकिन  हमें बहुत अफ़सोस हुआ कि अंकल की फैमिली ने हलाल की चर्चा करने के बाद मटन के बिना ही भोजन किया . सामग्रियाँ बहुत थीं अतः हमें सन्तोष था कि उन्होंने सपरिवार पर्याप्त भोजन किया होगा . मुझे आज इस घटना पर हार्दिक दुःख हो रहा था क्योंकि पिछले कई सालों  से ईद और बकरीद में हमने सपरिवार उनके घर में बिना हलाल और झटका के बारे में जिज्ञाषा किये मटन और कबाब का आस्वादन किया हुआ था . खैर , यह अत्यंत ही निजी धार्मिक मामला बनता था , अतः हमने इस बात पर फिर से ज्यादे चिंतन - मनन नहीं किया . लेकिन मेरा धर्म मेरे से विमुख होता दीख पड़ा . इस वाकये से मेरे सनातनी होने का आधार ही हिल गया . हम सोचने लग गये ..... क्या जब हम एक ही कॉलोनी में साथ रह रहे थे उस समय की उनकी उदारता क्या ढकोसला थी ?..... अथवा मुस्लिम मोहल्ले में फिर रहने की वजह से वो बदल गये थे ......

 "क्या आप लोग हिन्दू हैं" , "सो सैड " वाली गाँठ जो कब कि सीधी हो गयी खुल गयी-सी थी , एक बार फिर से बन्ध-सी गयी थी .


अमर नाथ ठाकुर , 22 सितंबर , 2021, कोलकाता .

Thursday, 16 September 2021

सत्यम ब्रूयात

 

दोस्ती में धर्म आड़े आ जाती है , खासकर हिन्दू और मुसलमान में  . कई बार तो आप एक जैसा खाना साथ बैठ कर अपने घर में मुस्लिम दोस्त के साथ नहीं खा सकते . और तब लगता है कि आपकी दोस्ती चलने वाली नहीं . मुस्लिम तो माँसाहारी होते हैं और यदि आप निरामिष हैं  , तब शायद ज्यादे दिक्कत न हो क्योंकि  ऐसे में शुरू से ही अलग - अलग  प्रकार के भोजन की व्यवस्था होती होगी . लेकिन यदि आप हिन्दू होकर  माँसाहारी हैं तो समस्या  आती है ,  क्योंकि  बहुत सम्भावना  है  आप  बीफ नहीं  खाते होंगे . कभी - कभी  आप हिन्दू होकर पोर्क खाते होंगे लेकिन मुस्लिम बन्धु  निश्चित  रूप  से  पोर्क नहीं खाएँगे .  ऐसे में यदि हिन्दू और मुसलमान दोस्त आमन्त्रित किये जाने पर अपने घर पर साथ - साथ खाएँ तो दोस्ती पक्की और विश्वसनीय रखने के लिए जो दोनों को पसंद हो और जो दोनों के धर्म द्वारा  मान्य हो  वही खाना  बनवाएं और खाएँ . 


 हिन्दू और ईसाई परिवारों के बीच की  दोस्ती में भी ऐसा हो सकता है . ईसाईयों का माँसाहारी भोजन का दायरा तो और भी विस्तृत होता है . ईसाई सामान्यतया बीफ और पोर्क दोनों  ही  खाते हैं  . नागालैंड के लोग ज्यादेतर ईसाई होते  हैं ,  वो तो  कुत्ते के भी माँस खाते हैं . नागा लोग कुत्ते के माँस  तक ही नहीं  रुकते ,  वो सभी  तरह के उड़ने - सरकने - रेंगने - दौड़ने वाले पक्षी - कीड़े - मकोड़े  एवं  हाथी  पर्यन्त खा जाते हैं . 


हिन्दुओं में , जैनियों में अच्छी खासी संख्या निरामिषों की मिलेगी . वैसे कुछ माँसाहारी हिन्दू तो रोचक ढंग से बकरे का  माँस खाएँगे लेकिन  मुर्गा नहीं खाएँगे .  बहुत सारे हिन्दू भी मिलेंगे जो पोर्क नहीं खाते .  वैसे मुस्लिम भी कुछ विशेष  प्रकार  की  मछलियाँ नहीं खाते  हैं . इनमें  मुसलमान  कुरआन का अक्षरसः पालन करते हैं , जबकि हिन्दू किसी धर्म ग्रन्थ का सहारा नहीं लेकर सहस्रों वर्षों की सुस्थापित परम्परा पर चलते हैं . वैसे  वेद  के प्रतिकूल कुछ हिन्दू धर्म ग्रन्थ मांसाहार का उल्लेख करते हैं . एक और समस्या जो हिन्दू और मुसलमान दोस्तों के बीच माँसाहारी भोजन  को लेकर आती है , उसका उल्लेख करना बड़ा ही रोचक  होगा . मुसलमान हलाल माँस खाता है , जबकि हिन्दू  झटका , अतः  मुर्गा या बकरे का माँस जो हिन्दू  और मुसलमान दोनों खाते हैं , वह  भी साथ - साथ नहीं खा सकते . इस मामले में ज्यादेतर हिन्दू ज्यादे उदार होते हैं . यदि उन्हें मालूम हो जाय कि बीफ नहीं परोसा गया है तो वह  हलाल  या  झटका के वर्गीकरण  को जाने  बिना होटल हो , पार्टी हो या  किसी मुस्लिम  दोस्त के घर खाना हो , खुशी - खुशी स्वीकार कर लेता है . लेकिन मुसलमान ऐसा नहीं करता . हमने पढ़े - लिखे मुस्लिम ऑफिसर दोस्तों को देखा है हिन्दुओं के घर या पार्टी में मटन या मुर्गा खाने से इनकार करते हुए .


मेरे ऑफिस की एक समकक्ष महिला ऑफिसर ने , जो साथ ही एक ही कॉलोनी में रहती थी , मुस्लिम थी , बकरीद के दिन हमें सहमते हुए झिझक के साथ फोन किया , "आज हमने एक बकरे की कुर्बानी दी है और हम यदि उस बकरे का माँस भिजवाएँ तो स्वीकार करोगे ? "  हमने बिना कुछ सोचे-विचारे फ़टाफ़ट जबाव दिया , "क्यों नहीं, मैडम  ? आप भिजवाइये तो , हमें तो अच्छा लगेगा ."  उस समय मेरे मन में जो पहला विचार आया वह यह कि जैसे हमलोग काली या दुर्गा के सामने बलि चढाते हैं और फिर बकरे के माँस का प्रसाद बाँटते हैं , यह भी तो मुस्लिमों के द्वारा चढ़ावे के बाद के प्रसाद वितरण की भाँति  है , अतः हमें उस पवित्र प्रसाद ग्रहण करने में क्या आपत्ति होगी . हमें तो बड़ी खुशी थी कि उस मुस्लिम महिला मित्र ने अपने पर्व पर हमारा भी ख्याल रखा . हमें तो शर्मिन्दगी हुई कि पिछली दुर्गा पूजा या दिवाली में हमने उनको प्रसाद के लिए पूछा तक भी नहीं था .  लेकिन एक बात हमें खटकती रही कि उन्हें क्या हमारे ऊपर भरोसा नहीं था जो उन्होंने ऐसी परमिशन वाली भाषा का इस्तेमाल किया कि शायद हम कुर्बानी का माँस न स्वीकार करें धार्मिक विभेद की वजह से . मुझे चोट - सी पहुँची थी . जो  हो , बात आई गयी हो गयी . हमने बकरीद की शाम में सपरिवार मटन का भरपूर मजा लिया . मेरे घर में मेरी पत्नी या मेरे बेटे के मन में भी कोई शंका की बात नहीं थी . बाद में हमने उस मुस्लिम महिला ऑफिसर मित्र को  धन्यवाद भी ज्ञापित किया .


आगे फिर एक दिन की बात है ऑफिस में जोनल मीटिंग थी और कई दर्जन ऑफिसर उस मीटिंग को अटेंड कर रहे थे . जोरदार लंच का भी आयोजन था . निरामिष भोजन का भी इन्तजाम था और यह निरामिष भोजन कलकत्ते के बड़े नामी - गिरामी होटल से मंगवाया गया था . हमलोग बड़े चाव से आनंद ले रहे थे कि हमने देखा वह  मुस्लिम महिला अधिकारी यकायक मेरे पास आयी और पूछने लगी , "अरे , बताओ ज़रा पता कर कि यह नॉनवेज हलाल है क्या ?" हमने बड़ी तिरस्कारी नजर से उनकी तरफ देखा , हमें बड़ा अजीब लगा , बड़ा ही बेतुका - सा सवाल था , संकीर्ण और  हीन धार्मिकता की मुझे बू - सी आने लगी . लेकिन हमने इतना ही कहा , "मैडम, क्या फरक पड़ता है , एक ही स्वाद होता है हलाल हो या झटका ."  फिर हमने गौर किया , उस मैडम ने नॉन वेज नहीं लिया अपनी थाली में . मुझे इस दिन यह बात बड़ी चुभी कि  जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड की ऑफिसर जो कुछ ही दिनों में चीफ इंजीनियर होने जा रही थी ऐसी संकीर्ण सोच की क्यों है . 


कुछ महीने बाद की बात है , इस महिला मुस्लिम ऑफिसर को एक दिन हमने बहुत परेशान देखा . पूछने पर बताया कि अमेरिका में पढ़ रहा उनका बेटा आर्थिक सहूलियत के लिए फ्री टाइम में पेट्रोल पम्प पर पैकेज्ड फूड बेचता है जिसमें पोर्क भी हुआ करता था . पोर्क खाना मुस्लिमों के लिए घोर अधार्मिक क्रिया - कलाप में आता है ,  लेकिन क्या बेचना भी ? और मैडम का बेटा यह काम छोड़कर और अन्य काम करने को तैयार नहीं था . लाचारी थी उनके बेटे को . अन्य काम मिलने की सम्भावना कम थी . उस दिन धार्मिक कट्टरता की मुझे हद लगी . अब मैं समझ गया था बकरीद पर कुर्बानी के बकरे के माँस मुझे देने में ये क्यों झिझक रही थी . ये समझती थी शायद हम हिन्दू होकर मुस्लिम का दिया माँस न स्वीकार करें, शायद हम हलाल माँस न खाते हों , क्योंकि हिन्दू तो झटका माँस खाते हैं . उन्हें क्या पता कि  हम तो एक नंबर के लोभी ठहरे या बहुत ही उदारवादी या हम इतनी कट्टर सनातनी सोच में निष्ठा रखने वाले  नहीं . उनको नहीं पता कि सनातन धर्म में कट्टरता नाम की व्यवस्था ही नहीं .  नाना प्रकार के प्रतिक्रियात्मक विचार हमारे मन में आने लगे कि भविष्य में मुस्लिमों के यहाँ या उनके किसी अनुष्ठान में मटन न खाएँ , या हम भी पूछ लिया करें कि परोसा गया नॉन वेज झटका है या नहीं , झटका न होने पर हम भी क्यों न खाने से मना कर दें इत्यादि , इत्यादि . लेकिन यह तो गैर सनातनी बात होती , सनातनी तो मूल रूप से सहिष्णु होते हैं , प्रतिक्रियावादी नहीं होते , वो तो उदार , सरल, अनुग्राही  और समझौतापरक होते हैं . हम उनकी कट्टरता की प्रतिक्रया में कट्टर नहीं हो सकते थे .  इसलिए सिवाय अफ़सोस और नफरत के हमें कुछ नहीं हुआ . यह नफरत भी गैर सनातनी वाली बात हुई . 


एक और चोट पहुँचाने वाले व्यवहार से आगे चलकर मेरा  पाला पड़ा . मेरे कोई एक और नजदीकी समकक्ष मुस्लिम अधिकारी मित्र ने मेरे साथ मेरे घर में चिकेन न खाकर मेरे हृदय को तार - तार कर दिया . यह मित्र जब लखनऊ में था तो हम सपरिवार इनके यहाँ ईद में मिठाई लेकर जाते थे , गले मिलते थे , बड़े ही चाव से कबाब और मटन चाप खाकर आते थे . हमें  यह संदेह  भी नहीं रहता था कि कहीं हम बीफ खा रहे हैं . हमें अपने मित्र पर भरोसा था कि वह ऐसा नहीं करेगा क्योंकि उसे पता था कि हम बीफ नहीं खाते हैं , अतः वह निश्चित रूप से ही बीफ नहीं  खिला रहा होगा . इस मित्र को कलकत्ता आने पर एक बार हमने सपरिवार आमन्त्रित किया . नॉन वेज में चिकेन बनाया खुद पत्नी के साथ मिलकर , और भी कई आइटम थे किन्तु चिकेन उस दिन का मुख्य आइटम था . जब हमलोगों ने  अपने अतिथि मित्र को खाना परोसा तो उन्होंने  चिकेन खाने से मना कर दिया , उनकी पत्नी एवं बच्चों ने भी नहीं खाया . चिकेन बहुत बड़ी मात्रा में मिलकर बनाया था  , सब बेकार हो गया . जब मित्र ने नहीं खाया तो हमलोग भी उस दिन चिकेन चाव से नहीं खा पाए . इस दिन पता चल गया कि मेरा मित्र कितना कट्टर धार्मिक विचारों का था , उन्हें संदेह था कि चिकेन शायद हलाल न हो , मैं ने तर्क दिया कि हमारे मोमिनपुर में सारे कसाई मुस्लिम हैं जो शायद हमें भी वर्षों से हलाल ही खिलाता हो लेकिन मेरे मित्र को यह तर्क जमा नहीं . हम ने भी अपने को खूब कोसा कि हम भी कैसे अधार्मिक हैं कि हम झटका मीट  का पता  किये बिना मुर्गे या बकरे का माँस हमेशा ही खरीदते रहे और खाते रहे . हमने बिना कोई रोष या दुःख प्रकट किये मित्र को दूसरे आइटमों से सन्तुष्ट करने की कोशिश की . शायद मेरा मित्र संतुष्ट हो गया हो , लेकिन मैं और मेरी पत्नी पूरी तरह असन्तुष्ट रहे हमेशा के लिए . मेरा यह असन्तोष फिर से एक बार गैर सनातनी था क्योंकि सनातन धर्म में इस तरह के असन्तोष के लिए कोई स्थान नहीं .


आगे कुछ वर्षों के बाद ऐसा ही एक और वाकया मेरे साथ घटा जिससे मेरे सनातनी होने का आधार ही हिल गया . बेटे की शादी में मेरी पत्नी की एक मुस्लिम सहेली की फैमिली निमन्त्रण में आयी थी . मटन के बारे में उनकी अम्मी और  पिताजी ने भी मेरे पास आकर दर्जनों मेहमानों के बीच में ऐसा ही प्रश्न पूछ लिया , "क्या ये मटन हलाल है ?"  भरी पार्टी में मैं क्या अनाप - शनाप बोलता . हमने कहा, "आंटी अंकल , मालूम नहीं , किन्तु यहाँ तो अधिकाँश कसाई मुस्लिम ही होते हैं उन्होंने शायद इस बात का ख्याल रखा हो ."  लेकिन  हमें बहुत अफ़सोस हुआ कि अंकल की फैमिली ने हलाल की चर्चा करने के बाद मटन के बिना ही भोजन किया . सामग्रियाँ बहुत थीं अतः हमें सन्तोष था कि उन्होंने सपरिवार पर्याप्त भोजन किया होगा . मुझे आज इस घटना पर हार्दिक दुःख हो रहा था क्योंकि पिछले कई सालों  से ईद और बकरीद में हमने सपरिवार उनके घर में बिना हलाल और झटका के बारे में जिज्ञाषा किये मटन और कबाब का आस्वादन किया हुआ था . खैर , यह अत्यंत ही निजी धार्मिक मामला बनता था , अतः हमने इस बात पर फिर से ज्यादे चिंतन - मनन नहीं किया . लेकिन मेरा धर्म मेरे से विमुख होता दीख पड़ा .


बात यहीं तक खत्म होने वाली नहीं थी . एक और घटना ने मुझे कुछ अन्यथा सोचने पर विवश कर दिया . एक दिन मेरे उसी  समकक्ष महिला ऑफिसर मित्र , जिनकी चर्चा ऊपर कर चुके हैं , के ऑफिस में बहुत जोरों का हंगामा चल रहा था . उनका घेराव हो रखा था . घेराव करने वाले ऑफिस के ही सारे स्टाफ और कनिष्ठ ऑफिसर थे . मुझे जैसे ही पता चला  मैं  उस महिला अधिकारी के बचाव में तुरन्त ही चला गया . चूँकि हम दोनों के ऑफिस एक ही बिल्डिंग में थे और मेरा एडमिनिस्ट्रेटिव हेड  और उस ऑफिसर के महिला होने की वजह से मेरा वहाँ चला जाना नैतिक रूप से  उपयुक्त लगता था . जाने के बाद पता चला कि मामला ऑफिसियल कम धार्मिक ज्यादा था . जब इन्होंने  इस ऑफिस में ज्वाइन किया था , पहले ही दिन माँ काली और रामकृष्ण वाले कैलेन्डर को उतरवा दिया था और कमरे से बाहर ले जाने को कह दिया था . फिर बाजार से ऐसा कैलेंडर मंगवाया गया जिस पर किसी देवी देवता का फोटो नहीं था . इन्होनें एक चटाई  भी खरीदवायी थी जिस पर ऑफिस में ही वो नमाज पढ़ती थी , शुक्रवार यानी जुम्मे के दिन सेकंड हाफ में ऑफिस आती थी अथवा ढाई - तीन घंटों के लिए ऑफिस से चली जाती थी पास के किसी नामी मस्जिद में नमाज़ के लिये . लेकिन अपने ऑफिस में लेट आने वाले स्टाफ को मेमो दे देती थी , उनको रजिस्टर में अनुपस्थित भी मार्क कर देती थी  . यह बड़ा ही भेद - भाव पूर्ण लगा स्टाफ लोगों को . अतः लोगों ने इनके धार्मिक रंग  पर चोट करने की सोची और स्टाफ लोगों ने  भी योजना के तहत मंगलवार या सोमवार या शनिवार को पहले हाफ में  ऑफिस आना बंद कर दिया . इनके पूछने पर स्टाफ लोगों ने भी कहना शुरू कर दिया कि वो लोग भी पूजा करने हनुमान मन्दिर या शिव मन्दिर या दुर्गा मन्दिर गए हुए थे . अतः मैडम से स्टाफ का विरोध बढ़ने लगा . इस तरह झगड़ा उग्र रूप ले चुका था और आज का दिन उनके घेराव में परिणत हो चुका था . घेराव मानसिक रूप से ऑफिसर के प्रताड़ना का जबरदस्त जरिया होता है बंगाल में . खैर , किसी  तरह  बात बनी और बड़ी जद्दो-जहद के बाद घेराव छूटा . मैडम ने अपने एकतरफा क्रिया - कलाप से पैदा किये असन्तोष को बाद के समय में कम करने की जरूर कोशिश की , लेकिन कुछ ही दिनों में उनका कोलकाता से ट्रान्सफर हो गया था . 


मैडम तो अबकी चली गयी थी , लेकिन मुझे उधेड़बुन में डाल गई थी . लेकिन हमारी सनातनी सोच हमें अपने पथ से डिगने से  हमें बचा लेगी क्या ?  क्या हमारा सनातनी सोच इतना संकीर्ण है कि हम इन धार्मिक संकीर्णताओं में  बंध जाएँ कि अपने साथी मित्र या बन्धु के परिवार के साथ उसकी धार्मिक मान्यता के चलते उनके साथ खाना खाना छोड़ दें ? नफरत के बीज पालने लग जाएं ? बिलकुल नहीं . हम उस विशाल समावेशी धार्मिक मान्यता को मानने वाले हैं जो इस कदर असहिष्णु नहीं हो सकता , प्रतिक्रियावादी नहीं हो सकता , नफरत पैदा नहीं होने दे सकता . हमने निश्चय किया कि खाने - पीने के भेद या अंतर हमारे बंधुत्व को नहीं डिगा सकते . हमारे मन में यह विचार आया कि सारे मुसलमान इन इने गुने जैसा नहीं होते , तभी तो लखनऊ के मेरे एक मुस्लिम सहयोगी  अबरार ने 24-25 वर्ष पहले ऐसे समय में बाजार से मेरे लिए कुरान मज़ीद खरीद कर दी थी जिस समय सामान्यतया किसी गैर मुस्लिम को मुस्लिम दुकानदार कुरान बेचने से कतराता था ( कुछ बार हमने कुरआन शरीफ खरीदने की असफल कोशिश भी की थी ) , तभी तो मेरठ का वो मुस्लिम मित्र मुजीब मेरा सबसे ईमानदार और विश्वसनीय सहयोगी हुआ करता था , तभी तो बरेली का एक और मेरा मुस्लिम सहयोगी मित्र आलमगीर रामायण और महाभारत की ऐसी - ऐसी कथाएं निष्ठा पूर्वक सुनाता था जो हमें भी मालूम नहीं होती थीं , तभी तो हैदराबाद का  रहमतुल्ला  और वजीर और दुर्गापुर का आमीर , कोलाघाट का रहमत , मेरठ का एक और मित्र शकील मेरे सुहृदयों में था .


 फिर इसीलिए अभी तक हमने अपने इन सभी मुसलमान मित्रों के साथ पारिवारिक सम्बन्ध  बना कर रखा है . हम हर ईद बकरीद में उनको सनातन रूप से बिना ब्रेक के शुभकामना संदेश भेजते रहे हैं . हमें भी सभी पर्वों में शुभकामना सन्देश मिलते रहे हैं . बिना किसी प्रत्याशा के हम अपने सनातन धर्म पालन का प्रण लिए बढ़ते ही रहे हैं .


अमर नाथ ठाकुर , १५ सितम्बर , २०२१, कोलकाता .

Saturday, 4 September 2021

मंडल दा

 नौ - दश वर्षों बाद फिर कोलकाता पोस्टिंग पाया हूँ , लेकिन प्रोमोसन पर जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड में . मैं यहाँ एडमिन और प्लानिंग का हेड हूँ . पियून से लेकर असिस्टेंट इंजीनियर तक के ऑफिसर का ट्रान्सफर पोस्टिंग कर सकता हूँ . फील्ड से प्लानिंग या प्लानिंग से फील्ड में बंगाल , सिक्किम एवं अंडमान निकोबार में . ड्राफ्ट मैन , क्लर्कों एवं पियूनों का भी ट्रान्सफर एकाउंट्स से कॉरेस्पोंडेंस में या कॉरेस्पोंडेंस से एकाउंट्स में  कर सकता हूँ . मतलब मलाई वाली पोस्टिंग या हरियाली वाली पोस्टिंग या सूखा या रेगिस्तानी  पोस्टिंग का पूरा पॉवर मेरे ही हाथ में  है . मतलब बहुत ही पावरफुल पोस्ट , जैसा लोग समझते थे , इसलिए यूनियनों एवं एसोसिएसनों द्वारा साप्ताहिक - पाक्षिक घेराव  इस पोस्ट वाले ऑफिसर का चलता ही रहता था  . यहाँ कहने की जरुरत नहीं , ज्यादेतर लोग मुझे 'सर' कहकर सम्बोधित कर रहे  हैं . कुछ जो पुराने लोग थे जिन्होंने इस ऑफिस में एक दशक पहले कभी हमें सर नहीं कहा था  , अब इस ऊँचे पोस्ट में देखकर भी लज्जावश सर नहीं कह सकते थे , लेकिन उन्होंने भी हमें आदर पूर्वक स्वीकार कर लिया हुआ है . पुराने लोगों ने पुराने रिश्ते की बात याद दिलाते हुए  बहुत देर तक कुशल - मंगल किया, परिवार के बारे में पूछा . हमने भी पूछा , कुछ के साथ चाय भी पी . इसी क्रम में साँवला - सा एक भद्र स्टाफ आया , बीमार -सा  , सिर के बाल उड़े हुए , शर्ट के दो बटन ऊपर से खुले हुए , अन्दर का मटमैला बनियान दिखता हुआ , फ्लोर में चप्पल घसीटता हुआ, नीचे पैन्ट का कोर कटा हुआ , पान से ओठ लाल - लाल  किये  किन्तु मुस्कुराते हुए ......... सर , आमा के चिन्हते पारछेन, आमि मोण्डल , आपनार पियून छिलाम एई ऑफिसे,  जखन आपनि ४०१ रुमे आगे बोशतेन ( सर , मुझे पहचान पा रहे  हैं, मैं मंडल , आपका पियून था इसी ऑफिस में , जब आप रूम नम्बर ४०१ में बैठते थे पहले )................मैं  कुछ देर तक यादों के झरोखों को खंगालने लगा और उस घोर  कम्युनिस्ट कालीन पोस्टिंग के दिन-दिन  के पल - पल को  स्मृति पटल से जीने  लगा . जैसे ही मुझे देरी हुई उस विस्मृत क्षण को फिर से याद करने में , मंडल जी ने मुझे याद दिलाने के लिए एक घटना का तुरन्त जिक्र कर दिया ........ आपनार मामा ससुर एशेछिलेन जाके आपनि चा सिंघाड़ा रसोगुल्ला खाइये छिलेन .......आमि बाजार थेके कीने एने प्लेटे साजिये छिलाम ....... (.........आपके मामा ससुर आये थे जिनको आपने चाय , सिंघाड़ा , रसगुल्ला खिलाया था ....... मैं ने ही बाजार से खरीद कर प्लेट में सजाकर दिया था ........) वो कलकत्ता पुराना कलकत्ता मेरी नजरों से एक - एक फ्रेम गुजरने लगा ..... मैं खो गया पुराने कलकत्ते के आगोश में ... 

अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध में क्लास वन नौकरी की पहली ज्वाइनिंग यहीं कोलकाता में हुई थी . आते ही १८ सप्ताह की फील्ड ट्रेनिंग में भेज दिया गया . इस फील्ड ट्रेनिंग के दौरान कोलकाता और हावड़ा में खूब घूमा ....धर्मतला , एस्प्लेनेड , बड़ा बाजार , टिरेट्टा  बाजार , न्यू मार्केट , बीबीडी बाग़ , सेंट्रल अवेन्यु , बेंटिंक स्ट्रीट , अलीपुर , काली घाट, दक्षिणेश्वर , बेलूर मठ, उलटाडांगा , साल्ट लेक , दमदम , बजबज , उत्तरपाड़ा , हावड़ा मैदान , कदमतला , इच्छापुर इत्यादि . कोलकाता को भली - भाँति जानने में कोई कोताही नहीं बरती . यहाँ के प्लानिंग ऑफिस में फिर रेगुलर पोस्टिंग हो गयी . योगायोग भवन में  अब ऑफिस आने का सिलसिला शुरू हो गया ... ..करीब - करीब समय पर ऑफिस आने लगा  , आकर अपने टेबुल को पोंछा मारना , कुर्सी को पोंछना , उस पर तौलिया झाड़कर फैलाना , ग्लास धोना और ग्लास में पानी लेकर टेबुल पर सजाना , फाइलों को झाड़कर फिर अपने काम में लग जाना . ये सब काम हम अपने कुछ पुराने , अनुभवी , बुजुर्ग और कोलकाता के बंगाली लोकल सहकर्मी , जो हमारे ही हॉल में बैठते थे , को देखकर सीख गये थे . पियून  हमलोगों से एक आध घंटे बाद आता था  और आकर अपनी उपस्थिति पंजी में दर्ज कर कोरीडोर में हमारे हॉल के सामने दरवाजे के किनारे टेबुल पर बैठ जाता  था और अखबार पढ़ता रहता रहता था या ऊँघता रहता था . टेबुल को पोंछना , ग्लास धोना , उसमें पानी देना , फाइलों को झाड़ना इत्यादि का काम उनका नहीं जो एक दिन उसने शुरू में ही बता दिया  था . तो हमने पूछा था वो आखिर क्या काम करेंगे ? हमारे हॉल को सर्व करने वाले  पियून  ने मुझे साफ़ बता दिया था .......घंटी बजाने पर हम आएगा  , फ़ाइल एक कमरे से दूसरे कमरे में ले जाएगा  , किसी को बुलाना हो तो बुला देगा ............... . वैसे डेढ़ - दो सौ कर्मचारियों की संख्या वाले इस ऑफिस में ऑफिसर के लेवल के हिसाब से सात -आठ ऑफिसर ही हम  जूनियर क्लास वन ऑफिसरों से ऊपर के लेवल के थे लेकिन क्या मजाल कि कोई स्टाफ हमलोगों के बुलाने से भी हमारे हॉल में आ जाए . उल्टे चीफ ड्राफ्ट्समैन , क्लर्क , ऑफिस सुपरिन्टेन्डेन्ट , कैशियर आदि कभी भी अपने हॉल में हमलोगों को बुला लेता था . कागज , पेन्सिल, पेन , ग्लास , तौलिये , डस्टर आदि के लिए स्टोरकीपर के पास जाना ही होता था , भिजवाता नहीं था , लाइन में लगकर , सिग्नेचर उपरान्त सामान उपलब्ध कराता था . कैशियर तो सैलरी से लेकर हर कोई पेमेंट हमें बुलाकर , लाइन में खड़ाकर ही देता था . क्लर्क महाशय भी ऐसा ही करते थे . ऑफिसर होना मूल्य हीन था . हमलोग कलकत्ते के ऑफिस की इस समाजवादी साम्यवादी परम्परा से वाकिफ हो गये थे और ये हमारे व्यवहार और हमारी सोच का हिस्सा बन गया था . कैंटीन से चाय बांटने वाला आता था , चाय हमारे ग्लास में डालकर , पैसे लेकर चला जाता था . चाय  पीने के बाद ग्लास धोकर उसे फिर अपने ड्रावर में  हम रख लेते थे . . ऐसा नहीं है कि ये  स्टाफ लोग ऑफिस हेड या एडमिन हेड की नहीं सुनते थे , जिनके पास ट्रान्सफर - पोस्टिंग या बिल पास करने का पावर होता था उनकी एक घंटी पर ये दौड़कर जाते थे . वैसे किसी क्लर्क या पियून से कोई काम ऑफिसर वाली धौंस से तो ये लोग भी नहीं ही करा सकते थे . हम अपने ऑफिस हेड को अपना ब्रीफ केस खुद ढोते हुए देखते थे . अपने कमरे में वो आलमीरा खुद खोलकर फ़ाइल निकालते थे . छह बजने के एक आध घन्टे पहले ही ऑफिस खाली हो जाता था . क्लर्क और पियून को लेट से आने के लिए आप कुछ नहीं कह सकते थे , ये सुबह में ऑफिस टाइम के एक आध - घन्टे बाद ही आते थे , अधिकाँश एई,जेई लेवल के ऑफिसर भी यही रूटीन फॉलो करते थे . कुछ तो डेढ़ दो घन्टे तक लेट आते थे और एक डेढ़ घन्टे समय के पहले चले जाते थे .  यहाँ एक कहावत चलता था --- दो गलतियाँ एक दिन में नहीं कर सकते .... ग्यारह  के पहले आना नहीं पाँच के बाद जाना नहीं ....... इसलिए ग्यारह  के बाद ये आते थे याने लेट , और पाँच बजे भाग जाते थे याने जल्दी .............. लंच टाइम आधे घन्टे के बजाय घन्टे - दो घन्टे का भी हो जाय तो कौन टोक सकता था . इस तरह घन्टे , दिनों के काम सप्ताहों , महीने तक भी ये लोग पूरा नहीं करते थे . ऐसे लोग पार्टी करते थे  और ऑफिस के हेड भी उनको कुछ कहने से कतराते थे , यदि ये पार्टी नहीं भी करते थे तो भी पार्टी वालों के फोलोवर होते थे और उनका संरक्षण पाते थे . 

नमस्कार या प्रणाम जैसा अभिवादन सिर्फ हम क्लास वन लोग ही अपने बॉस को करते थे . अपने जैसे कुछ समान समझ वाले सहकर्मियों में ही नमस्कार - पाती चलता था . पियून या क्लर्क  या जेई या ड्राफ्ट मेन इस तरह की परिपाटी को  साम्यवाद आने के साथ ही छोड़ चुके थे . पियून यदि किसी काम से पास आ गया तो सामने कुर्सी पर बैठेगा और तब बात करेगा . यदि हमारा फोन भी इस्तेमाल करेगा तो कोई पूछना - वूछना नहीं , सामने की कुर्सी पर बैठेगा और बात करके टेलीफोन को उसके पोजीसन में किये बिना चला जाएगा . रहम करके नाम में जी अथवा साहेब लगाकर बुलाएगा ........... जैसे मुखर्जी साहेब , सिंह साहेब या सिंह जी ... इत्यादि . परोक्ष में  तो ऑफिसरों  के नाम में जी या साहेब शायद ही कोई लगाता . याद  नहीं कभी कलकत्ते में किसी ऑफिस के कर्मचारी ने हमें 'सर' कहकर बुलाया हो , नमस्कार किया हो . हाँ , जब खड़गपुर में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर के रूप में फील्ड में पोस्टिंग हुई थी , तो करीब-करीब सारे स्टाफ 'सर' से सम्बोधित करते थे , नमस्कार से अभिवादन करते थे . क्योंकि वहाँ मैं मलाई वाली पोस्ट पर था , ऑफिस हेड था , उपस्थिति चेक करता था , सबको काम बाँटता था , सारे बिल पास करने का पॉवर भी हमें था , टेंडर करता था , वर्क आर्डर साइन करता था आदि आदि !!!! वहाँ मेरी नाराजगी किसी को नुकशान पहुँचा सकती थी !!!! हमने कई बार मंथन किया आखिर ऐसा क्यों है बंगाल में .........सामान्य परम्परा में आदर देना , सम्मान देना , आदर या सम्मान से बातें करना यहाँ की संस्कृति से गायब क्यों हो गया ? अधिकार के लिए लड़ना , अधिकार की पूरी जानकारी रखना , लेकिन काम न करना , काम को टरकाना , भेदभाव मिटाने के बदले ऑफिसरों से भेदभाव करना आदि भी यहाँ के लोगों का खास चारित्रिक स्वभाव कैसे बन गया ? क्या बंगाल का साम्यवाद अथवा समाजवाद यही है ? हमारे मित्र डे साहब , विस्वास जी , दत्ता जी ने बहुत विस्तार से चीजें समझाईं .


बंगाल की धरती संतों , क्रांतिकारियों के लिए तो काफी उर्वरा रही है  लेकिन किसी कमजोरी वश  अँग्रेज यहाँ पहले आये और अपना जड़ जमा बैठे उस समय यहाँ के भद्र लोक ने ज्यादे प्रतिरोध भी नहीं किया , खैर यह तो इतिहासज्ञों के विवेचना की बात है . उल्टे यहाँ के लोगों ने टूटी - फूटी अंग्रेजी सीख ली और उन अंग्रेजों से चिपकने में अपना सम्मान समझने लगे . साथ में एक दूसरा वर्ग तैयार हो रहा था जो उन कुलीन वर्ग वालों से काफी प्रताड़ित - शोषित हो रहा था . लेकिन अँग्रेजों के रहते ये अपनी आवाज नहीं उठा पा रहे थे  .  आजादी के वर्षों बाद प्रतिरोध - विरोध का  पर्याय नक्सल मूवमेंट यहीं से फला - फूला  ........ नक्सल बाड़ी से .....जो यहीं है उत्तर बंगाल में . और फिर वामपंथी कम्युनिस्ट की सरकार 35-36 वर्षों तक लगातार चलती रही . बराबरी के नाम पर यहाँ की अधिकांश जनता ने साम्यवादी सोच के निकृष्ट पक्ष को  अपना लिया . यहाँ की साम्यवादी जनता ने फिर सीख लिया .....क्रान्ति  , आन्दोलन , हड़ताल करना .... .और चलबे ना , कोरबो ना , कालो हाथ भेंगे देबो, क्रान्ति हबे , जिंदाबाद - जिंदाबाद .. ... जैसे नारों से सड़क, बाजार , होटल , फैक्ट्री , ऑफिस , मैदान को गुंजायमान कर दिया . गली - मुहल्लों , वार्ड , पंचायत , म्युनिसिपेलिटी , नगर निगम आदि हर जगह साम्यवादियों का दबदबा हो गया . हर जगह गली - गली , घर - घर , ऑफिस - ऑफिस लाल झण्डे लहराने लगे . फैक्ट्रियाँ बंद होने लगीं , व्यवसायी समुदाय दुखी होने लगे और पलायन करने लगे . साम्यवादी विचारधारा से इतर विचार रखने वाले चुप रहने में भलाई समझने लगे , बंगाली भद्र लोक गुमशुम रहने लगे . गाँवों की जमीनों , शहर की खाली जमीनों पर लाल झण्डे खड़े कर  दिए गये .  इन सबके बावजूद गैर बांग्लाभाषी लोगों को कोई दिक्कत नहीं हुई . बंगाल की भूमि सबको बिना भेद - भाव के आत्मसात करती गयी . बिहार, यूपी , उड़ीसा आदि राज्यों के मजदूर वर्ग के लोग उस समय यहीं भरण - पोषण का आसरा पाते थे , सभी बाहरी मजदूर लाल झंडा थामते थे , उनको वोट देते थे और साम्यवादी नेताओं का संरक्षण पाते थे . कलकत्ता तो लघु भारत होता था सभी भाषा - भाषी के लोग यहाँ बँगला या हिन्दी बोलकर योगायोग करते थे .

उस समय साम्यवाद के नशे में बंगाल झूमता था . हर जगह बराबरी के  व्यवहार का नाटक होता था , बराबरी की चर्चा होती थी . बराबरी का व्यवहार होना जितना मनमोहक सुनने में लगता है उतना ही यह चुभने वाला होता था. अधिकतर  समय  तो लगता था , आप ऑफिसर क्लास में हैं तो इसलिए आपके साथ भेद - भाव हो रहा है . आप अपने रूखे  व्यवहार के लिए तुरन्त झिड़की खा जाएँगे , आपको धमकी मिल जाएगी . आप किसी मजदूर वर्ग के व्यक्ति  से बहस नहीं कर सकते ,  उसके  कर्त्तव्यों का उसको पाठ नहीं बता सकते . जो उसने कहा है वही सत्य मानना पड़ेगा  . मगर अपना अधिकार उसे सब पता है . आप किसी दुकान में सम्मान से बिठाये जाएँगे क्योंकि वह  व्यवसायी है उसे अपने व्यवहार से मुनाफ़ा कमाना है लेकिन उसी सम्मान की अपेक्षा आप रिक्शे वाले से , ऑटो वाले से या किसी कुली अथवा किसी मजदूर से नहीं कर सकते . दुकान वाले आपको पसंद नहीं तो आप दूसरे दुकान में जा सकते लेकिन रिक्शे या मजदूर एकता के सामने आप विवश हैं आप उससे ही सेवा लेने के लिए विवश हैं , कोई और उसके कम्पटीशन वाले आपके पास नहीं आएँगे और न आने दिए जाएँगे . आप बन्धक बना दिए जाएँगे . पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर सकती जब तक कि पार्टी ऑफिस या किसी पार्टी वाले से कोई  संकेत नहीं मिला हो . मजदूरों के आपस के झगड़े तो किसी भी हालत में पार्टी वाले ही सुलझाएँगे . भाई - भाई का झगड़ा , पति - पत्नी का झगड़ा , पड़ोसियों से झगड़ा सब पार्टी ऑफिस के अधिकार क्षेत्र का मामला हो गया  . फुटपाथ पर काम करने वाले , ठेले वाले , रिक्शा वाले , रेलवे स्टेसन के  कुली , हाट - बाजारों में सब्जी - फल बेचने वाले , बस के ड्राईवर , खलासी , स्लम में रहने वाले , दुकानों में सेल्स मैन , होटलों में बैरे , रसोइये , फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूर , कर्मचारी गण , ऑफिस में क्लर्क , चपरासी , कंस्ट्रक्शन साइटों पर काम करने वाले अधिकाँश लोग सीपीआईएम , सीपीआई आदि साम्यवादी पार्टियों के सदस्य हो गये .  ये   पार्टी के लोग कहे जाने लगे . कुछ लोग कांग्रेस कांग्रेस भी करते थे लेकिन उनकी संख्या कम थी . कहीं भी आप निकल जाएँ छोटे - छोटे होटलों, दुकानों में , ऑफिसों में , बैंकों में , टेलीफोन ऑफिसों में ........घेराव , नारे बाजी , लाल झण्डों की कतार  आपको दीख ही जाएँगे .  

साम्यवाद का नंगा स्वरूप कलकत्ते की सड़कों पर , ऑफिसों , फैक्ट्रियों में दीखता तो था  ही , उसे महसूस भी किया जा सकता था  . दत्ता साहेब बाहरी नए लोगों को एक  मजेदार उदाहरण से यहाँ के साम्यवाद समाजवाद  का चित्रण करते थे  . मान लीजिये आप कलकत्ते की सड़क पर पैदल चले जा रहे हैं और किसी दूसरे आदमी से जो सामने से आ रहे होते हैं उनकी आप से टक्कर हो जाती है , और आप दोनों गिर जाते हैं . सामने वाला तुरन्त उठेगा , आपको आदरपूर्वक उठाएगा ,  आपका धूल झाड़ेगा और अफ़सोस प्रकट करेगा कि उससे गलती हुई . लेकिन यदि आप साइकिल से जा रहे हैं और सामने वाले से , जिनकी नजर सामने नहीं होती है, याने उनकी गलती से  टकरा जाते हैं और आप दोनों ही गिर पड़ते हैं तो सामने वाला उठेगा और एक - आध गाली देगा , नसीहत देगा साइकिल ठीक से चलाने का और आपको घूरते हुए अपना शर्ट झाड़ते हुए चला जाएगा . लेकिन यदि आप मोटर साइकिल से जाते हुए  सामने वाले की गलती से उससे टकराते हैं और दोनों गिर जाते हैं तो सामने वाला गाली देते हुए उठेगा , दो - चार झापड़ आपको लगाएगा , चीत्कार करेगा , कुछ लोगों की भीड़ इकट्ठा कर देगा . आपको कुछ दूसरे लोग भी गाली देंगे  , कोई आपकी मोटर साइकिल पर पैरों से ठोकर मारेगा , आप काफी डर जाएँगे , आपकी धड़कन तेज हो जाएगी , भीड़ आपसे माफी मनवाएगी और फिर ठीक से गाड़ी चलाने की नसीहत देकर भीड़ छँट जाएगी . लेकिन यदि आप कार से जाते हुए सामने वाले की गलती की वजह से उससे टकराते हैं , आप जल्दी से ब्रेक लेते हैं , गाड़ी रोक आप जल्दी से उतर सामने वाले को उठाते हैं , उसकी धूल झाड़ते हैं , उसकी गलती होने के बावजूद आप ही सॉरी भी बोलते हैं , लेकिन गिरने वाला आदमी चोट नहीं लगने पर भी चोट का बहाना कर चीत्कार करेगा , गाली देते हुए आपकी तरफ झपट्टा मारेगा , भीड़ जमा कर देगा , थाने की तरफ आपकी गाड़ी ले चलने के लिए कहेगा , आपके ऊपर लप्पड़ ,थप्पड़,  झापड़ की बौछार हो जाएगी , खींचा - खींची में आपकी शर्ट का कालर , पॉकेट फाड़ देगा , कार को लोग पीटना शुरू कर  देंगे , कोई हेड लाईट तोड़ देगा, कोई साइड मिरर तोड़ देगा , कोई खिड़की के शीशे तोड़ देगा , कोई कार की चाभी लेकर  चला जाएगा , कोई आपका लाइसेंस ले लेगा , आप रोएंगे , गिड़गिड़ाएंगे फिर पांच सौ या हजार पे बात बनेगी और आप ये फाइन देकर बच पाएंगे . ये है कलकत्ते का साम्यवाद , स्टेटस में जितना अंतर आपकी उतनी पिटाई , उतना ज्यादे दण्ड और उतनी ज्यादे ही फजीहत .

हमारा ऑफिस इस साम्यवाद से अछूता कैसे रहता . इस साम्यवाद को अपनाने में फायदे ही फायदे ही थे , काम कम करना , ऑफिस आने - जाने के समय में आजादी . कोई डर नहीं , कोई मेमो मिलने का  ख़तरा नहीं , साथ ही पार्टी वाले आपको मनचाही पोस्टिंग भी करा देंगे . हमें ड्राइंग के लिए ड्राफ्ट मैन के पास जाना होता , फेरो प्रिंट के लिए फेरो प्रिंटर के पास , ड्राइंग की एंट्री के लिए चीफ ड्राफ्ट मैन के पास , फिर फील्ड ऑफिस में ड्राइंग भिजवाने के लिए क्लर्क के पास , हम खुद चले जाते . उन्हें बुलायें , वो न आयें तो,  इस असम्मान के डर से बचने के लिए अपने को पूरा ढाल लिया था . लेकिन इस क्रम में मेरा  इन कर्मियों से अच्छा बंधुत्व हो गया . मैं उन लोगों के पास जाता वो लोग अपनी कुर्सी से भले ही न उठते , लेकिन हमने महसूस किया मेरे जाने से वो खुश होते और अपनी मुस्कान और मीठी बोली से  मेरे साथ पेश आते . 

योगायोग भवन में कई महीने मेरी पोस्टिंग को हो गये थे .  एक दिन फोन पर कोलकाता में रहने वाले मेरे ममेरे ससुर ने अपने एक और रिलेटिव के साथ मेरे ऑफिस में मेरे से मिलने की इच्छा व्यक्त की . मैं बड़ा परेशान हो गया . मेरे  अपने गाँव में ,  ससुराल में लोग जानते थे  कि मैं क्लास  वन ऑफिसर हूँ . अब तो मेरी मिट्टी पलीद होने वाली है , मैं ने सोच लिया अपनी इज्जत अब बचने वाली नहीं . जब मेरे मामा जी देखेंगे ऑफिस में ये हाल कि हम उन्हें चाय - पानी भी नहीं करा सकते तो वो क्या सोचेंगे . एक क्लास वन ऑफिसर की औकात जान लेंगे . मेरे क्लास वन ऑफिसर की बात पर वो प्रश्न चिह्न लगा हर जगह प्रचार - प्रसार कर देंगे . कोलकाता में मैं इतने महीने बाद तक भी इस हीन भावना से ग्रस्त था . मैं बहुत चिंतित था . अपने कुछ सहकर्मियों से चर्चा भी की . सबने कहा ......भई , ऑफिस में जैसे ही आयें बाहर उस दास होटल में चले जाना ....वहाँ से चाय - पानी करा के ले आना , यहाँ लोग ऐसा ही करते हैं . हमें  ये उचित नहीं प्रतीत हुआ . यदि वे गेस्ट लोग हम - उम्र होते तो ठीक था , वो बुजुर्ग थे अतः उनको ऑफिस में बैठा कर ही चाय - वाय कराना वाजिब था . कलकत्ते में वहाँ के अनुरूप ढालने के बाद भी मेरे मन में क्लास वन का नशा अभी भी था . ऑफिस पियून की बात  कि वो सिर्फ फ़ाइल ढोएगा मुझे परेशान कर रही थी . उसके बाद हमने याद किया ........उस दिन सिंह साहेब ने बार - बार  घन्टी बजाई तो भी वो नहीं आया था, जब बाहर जाकर देखा तो हमलोगों का पियून मण्डल टेबुल पर बैठा ऊँघ रहा था , कहने पर उसने  सिंह साहेब को झिड़क दिया था ........अरे साहेब , परेशान मत कोरिये .... हमको  गुम (नींद ) आ रहा  है . इस घटना से मेरा तो विश्वास ही हिल गया था , मण्डल दा  से कोई उम्मीद नहीं कर सकते कि वो कोई हेल्प करेगा . शाम हो रही थी मैं हॉल से बाहर निकला , मंडल दा से आँख मिल गयी  , मंडल ने मुस्कुरा दिया , मेरी हिम्मत बढ़ गयी  .  मैं ने कहा अरे मण्डल दा कैसे हैं ? कहा ......... ठीक है . फिर मैं ने सोचा अच्छा मौक़ा है इसे रिक्वेस्ट कर के देख लें . मैं ने कहा ........... मंडल दा , कल मेरे मामा ससुर आएँगे साढ़े दश - ग्यारह बजे , उन्हें चाय - वाय कैसे पिलाएँगे ? बिना किसी विलम्ब के फट से बोला  ...... कोर देगा . मैं अचरज में था , ये कैसे हाँ बोल गया , कहीं गलती से तो नहीं बोल गया  . मैं ने फिर पूछ पक्का होना चाहा , उसने फिर कहा .......हम तड़ा- तड़ी आ जायगा ...... कोर देगा . मैं निश्चिन्त महसूस करने लगा . लेकिन मैं रात में भी सोच सोच कर  परेशान जरूर होता रहा कि कहीं इस मंडल के  ऊपर साम्यवादी सोच आकर उसके विचार को बदल न दे . तो फिर  क्या ........नीचे उतर दास होटल से उनको चाय-पानी करा देंगे ......... मैं ने ऐसा सोच अपने को दिलासा दिला दिया  .

अगले  दिन मैं ने देखा , मंडल दा  अन्य दिनों की अपेक्षा पहले आ गया है और उसने मेरे टेबुल को  बढ़िया से पोंछ दिया है, मेरी कुर्सी को और सामने रखी तीनों - चारों कुर्सियों को भी पोंछ दिया है , तौलिया को बढ़िया से झाड़कर मेरी कुर्सी पर कायदे से फैला दिया है , फ़ाइलों को सजा दिया है , ग्लास वगैरह को साफ़ करके तैयार कर रख लिया है , कुछ और ग्लास इकट्ठे कर लिया है . मेरे सीट के ऊपर के पंखे को ऑन कर दिया है , खिड़की के परदे को ठीक - ठाक कर दिया है . जैसे ही मेरे मामा ससुर आये , मंडल दा ने उन्हें पानी पिलाया , मेरे से टाका लेकर बाजार से  सिंघाड़े , रसगुल्ले और स्पेशल चाय लाकर आदरपूर्वक सर्व किया  , फिर मेरे रिलेटिव से पूछ कर उनकी पसन्द का पान भी लाकर खिलाया , टेबुल साफ़ किया और सभी जूठे ग्लास को धोकर सही जगह में रखा भी . ऑफिस में मंडल के द्वारा अतिथियों का आव - भगत करते देखकर दुसरे सभी ऑफिसर  दंग थे, मैं तो स्वयं इसे कल्पनातीत समझ रहा था . मैं ने मंडल दा को कहा  ...... मंडल दा , धन्नोबाद . फिर मंडल दा ने खुद कहा ............ साहेब , उन लोगों का काज हम इसलिए नहीं कोरता  कि वो लोग ओफिसियरी देखाता है ... वो हमको पसन्द नहीं ...... मैं आज अपने को धन्य समझ रहा था कि मैं ने अपने व्यवहार से अपने को विनम्र बना कर रखा है . मुझे लगा कि कलकत्ते में मैं यूनियन वालों से निपटते हुए  काम कर लूँगा .    

खड़गपुर में चार साल काम करने के बाद कुल आठ - नौ सालों के बाद बंगाल से मेरा  ट्रांसफर लखनऊ हो गया , अश्रुपूर्ण नेत्रों से विदाई लेकर लखनऊ में  ज्वाइन किया . वहाँ जाते ही पता चला क्लास वन की नौकरी क्या होती है .  ड्राईवर नमस्कार करता था , गाड़ी का गेट खोलता था , बंद करता था , पियून ऑफिस में पहुँचने के पहले टेबुल पर पोंछा लगा  चुका होता था , ग्लास धोना , पानी सर्व करना , बाजार से नाश्ते - पानी लाना , यहाँ तक कि खाने के बाद प्लेट हँटाना - धोना सब काम पियून करता था . चैम्बर में घुसते ही पंखे का स्विच ऑन करना , एसी चलाना , बैग गाड़ी तक पहुंचाना भी  उसका काम होता था . आप बाजार से पर्सनल काम भी किसी से करवा सकते थे , और हर स्टाफ बिना झिझक ऐसा किया करता था . आप ऑफिस में किसी भी क्लर्क , पियून , एई , जेई, एओ  , ड्राफ्ट मैन को बुला सकते थे . जब तक न बोलें कुर्सी पर नहीं बैठेंगे . आप सेक्शन में राउंड ले लें , हर कोई अपनी कुर्सी से खड़ा हो जाएगा सम्मान में . ये हम कहाँ आ गये थे किस दुनियाँ में , हम सातवें आसमान में उड़ने लग गये थे , कितना आनन्द आ रहा था !!!! ऑफिस का वर्क कल्चर ऐसा कि आप स्वर्ग की नरक से तुलना नहीं कर सकते हैं ..... लखनऊ एवं कोलकाता की तुलना ही नहीं हो सकती .  क्या आकाश और पाताल में कोई तुलना होती है . कोलकाता में काम नहीं करने के अनेक बहाने होते थे , यहाँ स्टाफ बहाना ढूंढ़कर काम कर लेते थे . हम निकृष्ट साम्यवादी कल्चर से दूर कहाँ आ गये थे . हम तो अपने स्टाफ से बिना उम्मीद के रहते थे लेकिन हमें जो काम और व्यवहार का आउटपुट मिलता हमारी सोच से कई गुना ज्यादे होता . हम बड़े आनंद में यहाँ पांच साल बिता गये . मुझे अब पता चल गया था ऑल इंडिया कैडर वाले ऑफिसर कोलकाता पोस्टिंग क्यों नहीं चाहते . कोलकाता नरक होता है . इस बीच मेरा फिर प्रोमोसन हो गया और मेरी पोस्टिंग का  आर्डर पुनः कोलकाता के लिए आ  गया .  प्रोमोसन की खुशी में हमने सोचा ही नहीं कि फिर उसी कोलकाता में ज्वाइन करने जा रहे हैं  , लेकिन ओफिसियरी लखनऊ  को समर्पित कर विनम्रता के साथ पुनः मैं ट्रेन का टिकट ले चुका था . 


 कोलकाता में जॉइनिंग के बाद आज जब मण्डल दा ने मेरे मामा ससुर वाली बात बतायी तो मुझे मण्डल दा द्वारा कही गयी वह बात भी  याद आ गयी कि .......... साहेब आपका काम हम इसलिए कर देता है कि आप हमारा जैसा ही रहता है और हमारा जैसा ही  लगता है , आप ओफिसियरी नहीं झाड़ता है ...........मैं  ने मंडल दा को पास बुलाया , मैं कुर्सी से उठ टेबुल के सामने आ गया .....और  फिर मंडल दा को गले लगा लिया ...

एडमिन सेक्सन वालों के सामने अपनी इच्छा व्यक्त की  कि मण्डल दा को बहुत  फैमिली प्रॉब्लम है , बीमार भी रहता है , उसे साल्ट लेक पोस्टिंग दे सकते हैं ? साल्ट लेक का आर्डर निकलते ही मंडल दा आँखों में आँसू लिए मुझे धन्यवाद देकर अविश्वास भरी नजर से मुड़-मुड़ कर देखते हुए  मेरे चैम्बर से बाहर जाते हुए दीख रहे थे .

 मैं मंडल दा के मूल मन्त्र को याद कर वामपंथी कलकत्ते की  फिर से इस नयी यात्रा के लिए आशा के साथ कूच कर गया था .


अमर नाथ ठाकुर , 4 सितम्बर , २०२१ , कोलकाता .

धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन...