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Monday, 20 May 2013

लूट भर का सफर


-१-
लूट   की  फसल   लहलहाती   है
जब इसमें रिश्वत की खाद डलती है
लूटेरों और रिश्वतखोरों की चलती है
मेहनती और ईमानदार प्रजा सिर्फ हाथ मलती है .

-२-
कमाल  करे   यह   रिश्वत
मंत्री , अधिकारी सब दण्डवत
फिर   चले    लूट  अनवरत
जनता  फिरती  बन मूकदर्शक .

-३-
कोयला आवंटन हो या प्रमोशन का रेल
टू   जी  फोन  हो  या राष्ट्रमंडल खेल
हेलिकोप्टर डील हो या अम्बानी का तेल
हलाल करे सबको यह लूट-रिश्वत का मेल.

-४-
लूट का निमंत्रण मिले , मिले जब कमीशन
इस  युगल   का , भाई  अटूट   गठबंधन
साथ-साथ   बंधी   होती   इनकी     खूंट
मेहनत , ईमान  सब  इनके  सामने  झूठ .

-५-
मौन है मोहन , भ्रष्ट बनी सरकार
भारत अब लूट-कमीशन का बाज़ार
तंत्र छिन्न हुई , व्यवस्था तार-तार
लाचार प्रजा रोए दिन-रात जार-जार .

-६-
माना , ये रिश्वत अजर-अमर है,
जीवन    लूट  भर का सफर है .
अबकी   यही  शाश्वत  खबर है
शेष   सब   क्षणिक  लहर   है .

अमर नाथ ठाकुर , १९ मई , २०१३ , कोलकाता.  

Friday, 15 March 2013

दुर्विचार से मुक्ति : एक भ्रम


-१-

घर में घुटन होती है –
मैं मुख्य दरवाजा खोल देता हूँ –
और वह ( ईष्या-द्वेष-घमंड ) बुदबुदाना शुरू कर देती है-
कहती है हवा आती है –
धूल और धुआँ लाती है-
बाहर से बालों का गुच्छा आ जाता है-
पड़ोसिन की दाल-सब्जी का छौंक छींक पैदा करता है –
पड़ोसियों के आने-जाने की चहल-पहल बाधा पहुंचाता है-
पड़ोसी के घर की भजन-संगीत-ध्वनि कोलाहल मालूम पड़ती है-
वह झपट्टा मारकर आती है-
धड़ाम से दरवाजा बंद कर देती है –
अमन-चैन के लिए मैं चुप रहता हूँ-
जैसे ही वह दूसरे कमरे में जाती है
नज़रों से ओझल होती है-
मैं फिर से दरवाजा खोल देता हूँ-
उसे घ्राण-शक्ति से पता चल जाता है-
झल्लाकर बकती हुई आती है-
और दरवाजा पुनः बंद कर जाती है-
मैं फिर से बंद कमरे में कैद रह कर रह लेता हूँ-
मैं उसे समझा नहीं पाता हूँ-
मेरी तर्क शक्ति फेल हो जाती है-
दरवाजे के खोलने और फिर बंद कर दिये जाने का यह क्रम वर्षों से चल रहा है-

-२-
आज वह नहीं है –
मेरा हाथ सिटकनी को नीचे उतारने के लिए बढ़ता है –
और फिर वापिस आ जाता है-
दरवाजा बंद ही रह जाता है-
क्योंकि यह अब मेरी भी आदत बन चुकी है मेरी लत बन चुकी है –
इसका मुझे पता नहीं चलता है-
मेरी संवेदना शेष हो चुकी है-
अब मुझे भी अपने दुर्विचारों में रहना-खेलना अच्छा लगता है-

-३-

आज दुर्विचारों का रौद्र – रूप धारण हो चुका है-
वह चीत्कार करती है-
हाहाकार मचाती है-
गालियों और दुर्वचनों का पारावार बनाती है-
असीमित शापित वचनों से कुल-खानदान को कलंकित करती है-
गला फाड़-फाड़ कर पड़ोसियों से भी दूर सड़क
जाते लोगों के भी ध्यान को खींच लाती है-
पूरा घर दलमलित हो गया है –
कण-कण कम्पित हो चला है-
वह इस कोने-से उस कोने में भागती है-
घर का कोलाहल निर्बाध प्रवाहित होना चाहता है-
दूर-दूर तक अपना आक्रोश संचारित करती है-
चहुँ-दिशाओं में लोगों को बता देना चाहती है-
वह सख्त पद-प्रहार से दरवाजा तोड़ देती है-
शीतल पवन का झोंका आकर मेरा रोम-रोम पुलकित कर देता है-
मेरे अंदर के व्याज-सहित संचित पाप का मिश्रधन स्वतः फूट पड़ता है –
लगता है जैसे अब दुर्विचार-संग से पूर्ण मुक्ति मिल गयी-
मैं अब उन्मुक्त विचरण कर सकता हूँ-

अमर नाथ ठाकुर , १४ मार्च , कोलकता .

Wednesday, 13 March 2013

घर वाली नारी


-१-

अलगनी पर फैला
भींगा-भींगा तौलिया मैला
उस पर कमीज़ और उसके ऊपर पायजामा
कपड़ों और सिर्फ कपड़ों का हंगामा .

बिछौने की सिलवटें
जैसे शब्दहीन आहटें

असंयमित तकिये तकिया के ऊपर
तिस पर असभ्य गंदा-सा चादर
फिर बगल में लंबायमान कंबल
जैसे कर रहा हो सबको बेदखल.

कोने-कोने में लटके मकड़ी के जाले
दरवाजे और खिडकी पर अधखुले परदे भोले-भाले.

फेरे कपड़ों का अंबार
बिखरे अखबार .

जंगले की जाली में पड़ी धूल की परतें
अधमोड़े फटे कालीन जैसे तोड़ती शर्तें .

रसोई का तो ढंग ही निराला
अंचार खुला है और बिखरा है मशाला
खरकटल जूठे बर्त्तनों के ढेर
सब्जियों के छिलके सेर-के-सेर
टिप-टिप-टिप-टिप करते नल
गिरे-पड़े-अधभरे पानी के बोतल
खुली तेल की शीशी
थाली कटोरा चम्मच चार
बासी भात बासी रोटी
तिस पर तैरती मक्खी तिलचट्टे बेशुमार .

बाथरूम का अधखुला दरवाजा
बेडरूम की अधखुली अलमारी
उटपटांग कुर्सियां असंतुलित स्टूल
की करती हुई घुड़सवारी.

उलटे चप्पल, करवट लिए जूते
और मौजे से रह-रह  आते बास
खूंटी से उलटे टंगे लहराते
फटे कैलेण्डर के व्यंगपूर्ण अट्टहास.

तीन दिनों से पड़ी
आधी चाय वाली प्याली
टेबुल पर छोड़ती पेंदी की
वृत्ताकार भूरी निशानी .
टूथ-ब्रश डाइनिंग  टेबुल पर
टूथ-पेस्ट विराजती बालकनी में
साबुन फ्रिज पर , हिंग गोली बाथरूम में
फर्श पर पड़ी चाभियां दांत बिचकाए भ्रम में.

भले ही न हो कोई कटाक्ष
और न हो कोई मजाक
न कोई ताली या गाली
घर बनेगा भूतन का डेरा
यदि न हो घर में घरवाली .



-२-


घर में व्यवस्था लाने वाली
अब यहाँ नहीं बसने वाली
वह घर की लक्ष्मी दुर्गा या काली.

जिस नारी से घर होता सुसज्जित
उस नारी से क्यों न हो देश व्यवस्थित
नारी नहीं अब सिर्फ घर का गहना
अब क्यों कोई जुल्म सहना
नारी सशक्तिकरण के उद्घोष से
नारी दिवस पर हनुमान सरीखी जोश से
गदा थामेगी अब घर वाली नारी .

नारी अब आँसू नहीं बहाएगी
नारी अब आँचल नहीं फैलाएगी
वात्सल्य पौरुष की निशानी बनेगी
घर-आँगन के बंधन तोड़ नारी
अब दुनिया चलाएगी .

दया माया करुणा ममता स्नेह
ये सब पुरुष तुम भी  संभालो
नफरत दुश्मनी क्रोध हिंसा तोड़-फोड़ नारी-सुलभ
गुण भी बनेंगे , पुरुष ! ये मन तुम बना लो.


अमर नाथ ठाकुर , नारी -दिवस पर ,  मार्च , २०१३ , कोलकाता .


Monday, 25 February 2013

अनंत प्रतीक्षा : एक कल्पना



उन्मुक्त आकाश की प्राची में

काले बादलों के बीच सिंदूरी लालिमा – सी

नील-नभ की विस्तृत साड़ी में

तुम दूर होती जाओगी .

और क्षितिज पर मेखला की भाँति

घिर कर रह जाएगा हिलोरें लेता मेरा मन.

भूखंड की विशाल भुजाएँ फैलाए ,

प्रेम की सौगात लिए ,

बादलों के बीच से सूरज –सी तुम हँस पड़ोगी.

पक्षियों के कलरव का मधुर-संगीत का तान निकलेगा .

मैं पीत  चादर-किरण की ओट में छुप जाउंगा .

गोधूलि की शंखनाद से जब तंद्रा टूटेगी

तुम होगी पाश्चात्य क्षितिज पर

प्राची की अनंत प्रतीक्षा में .

किन्तु पुनः आशा से संचारित अंधकार  होगा

सागर किनारे से सागर किनारे तक

आर-पार .

तुम और हम

दो किनारे रहकर भी

कल्पित हाथ के सहारे

सेतु बनाए

नभ में प्यार के तारे बिखराए

मिलने के स्वांग रचते रहेंगे

पल-पल

क्षण-क्षण .


अमर नाथ ठाकुर , १९९३. 

Saturday, 23 February 2013

क्षणिक सोचें



क्षण कराहते,
क्षण – क्षण कराहते,
क्षण – क्षण की इंतजारी में,
जीवन भर की यारी में.

होती क्षण भर की भी समझदारी
तो क्यों होती क्षण – क्षण की बेकरारी ,
और फिर क्षण –क्षण न पड़ती बेड़ी .
क्षण न घायल होते,
यदि क्षण भर भी कायल होते .

क्षण भर का संयम ,
क्षण भर का चिंतन ,
दूर करे
क्षण – क्षण का      ताप,
क्षण – क्षण का विलाप ,

क्यों फिर क्षण – क्षण से ऊब हो,
क्यों क्षण – क्षण का भी युग हो .

क्षण –क्षण बदलती  तस्वीर .
क्षण-क्षण बदलता चरित्र .
तस्वीर का चरित्र कौन पढ़ पाता .
चरित्र का तस्वीर कौन खींच पाता .
ये क्षण अनमोल है .
ये क्षण-क्षण का बोल है .


अमर नाथ ठाकुर , १ फरवरी , २०१३ , कोलकाता .

माँ तूं जस – की – तस नहीं हो : एक पश्चात्ताप


     -१-

माँ की आँखें तब देख पाती थीं,
वह चावल से कंकड़ बीन लेती थी
चूड़ा से धान और भूसा अलग कर लेती थी
चीनी में तैरती चींटियों को अलग कर देती थी
सरसों और राई भी अलग-अलग कर लेती थी
वह मुझसे आँखें चार कर लेती थी
फिर मेरी खुशी मेरी पलकों से पढ़ती थी
मेरा विलाप और मेरी हैरानी के आंसू गिन लेती थी
होंठों की रेखा से मेरी प्यास और भूख सूंघ लेती थी
माँ की तीक्ष्ण-नज़र मुझे बींध जाती थी 
और मेरे चोर हृदय की  धड़कन भी पढ़ जाती थी

    -२-

अब मैं जवान हो गया हूँ
और मेरी माँ बूढ़ी हो गयी है
उसकी आँखों में मोतिया हो गया है
वह साफ नहीं देख पाती है
कहती है चेहरा धुंधला नज़र आता है
जलता बल्ब एक शोला नज़र आता है
अब वह हमसे आँखें चार नहीं कर पाती
ओठों की लकीरें नहीं गिन पाती
फिर भी वह वात्सल्य की तीक्ष्ण – नज़र चलाती है
और मेरे मन का हर चोर पकड़ लेती है
मेरे पद-चाप से मेरे प्रेम और दूराव को नाप लेती है
मेरे स्वर के भारीपन से मेरी उदासी को समझ लेती है
बहू के रूखेपन एवं तिरस्कार को महसूस कर लेती है
उसकी उपेक्षा भरी भौंहों की सिकुड़न को  
उसकी हर क्रियाओं से भाँप लेती है
गिरने से अथवा गिराकर प्याली टूटने के भेद को पढ़ लेती है
गिलास में दूध की ठंढी से क्रोध की ज्वाला नाप लेती है
थाली में रोटी की आवाज से नफरत की धुंध को थाह लेती है
चाय की मिठास से घर के सौहार्द्रपूर्ण वातावरण को पढ़ लेती है
लेकिन मेरी अभी जवान आँखें होती है 
जो माँ की नम आँखों को भी अनदेखा कर जाती है
मैं कितना बेबस , संकुचित और कृतघ्न हो गया हूँ
पत्नी की प्रेम-वासना में  कितना निमग्न हो गया हूँ
मैं शायद जानबूझ कर चेतना-शून्य हो जाता हूँ
माँ की मोतिया की झिल्ली के ऊपर सारा दोष मढ़ देता हूँ
और कह देता हूँ – माँ अरी  
तूं तो जस-की-तस कहाँ रही .

अमर नाथ ठाकुर , २ फरवरी ,२०१३ , कोलकाता .

संस्कार की कमजोरी


गगन घिरा हो मेघों से
तो घरों में हम छिपते ,
आंधी हो या तेज किरण
नहीं सीना पीठ हम तानते .
                क्यों ऐसा चलन है
                यही अब प्रचलन है.
सीमा में हम भौंकते
सीमा पार हम गिड़गिड़ाते
विपदा में हम पिघलते
खुशियों में हम दहाड़ते.
                 क्यों ऐसी रीति है
                 यही अब नीति है.
फाइलें       जब रूकती हैं
गिन-गिन नोट हम दिखाते ,
इमान कटाते , सत्य छिपाते
भ्रष्टाचार     हम  पनपाते .
                  ऐसी    क्या     मज़बूरी है
                  बहके संस्कार की कमजोरी है.

अमर नाथ ठाकुर , ७ फरवरी ,२०१३, कोलकाता .

धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन...