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Sunday, 5 February 2017

बदल गया है सब कुछ

बदल गया है सब कुछ

यहाँ एक कच्ची  पगडण्डी गुजरती थी
जहाँ एक चौड़ी- सी पक्की  काली सड़क है ।
जहाँ साइकिल और बैलगाड़ी मटकती थी
वहाँ अब मोटरसाइकिल और कार की तड़क-भड़क  है ।
यहाँ फूस और मिट्टी का एक घर होता था
अब ईंट और एसबेस्टस का मकान है
खुली खिड़की और बिना दरवाजे के घर के बदले
चहारदीवारी , ग्रिल  और परदे से बन्द जहान है ।
धोती और लंगोट धारी बैठ बतियाते थे चटायी पर
 यहाँ विशाल आम  वृक्ष की हरी  डाली के  नीचे,
अब कुछ पतलून और टी शर्ट धारी होते हैं
 ठूठ आम के पेड़ से दूर कुर्सी में टेबुल के पीछे ।

जाड़े में फदी भैया के दालान पर घुरा लगता था
बैठने के लिये पुआल के बीड़े का घेरा लगता था
टोल भर के लोग जमा होकर हाथ-पाँव सेकते थे,
पास में कुत्ते भौंकते थे, घोड़े हिनहिनाते थे,
बकरी मिमियाती थी , गाय-बैल डकारते थे ।

गाँव भर के हर घर- परिवार की बात होती थी
जात-पात की भी बात  होती थी
 किन्तु बैठने की सबकी एक ही खाट होती थी ।
रेडियो पर गौर से  बी बी सी समाचार सुनते थे
बड़े बुजुर्गों के बीच कभी कोई पुराना अखबार पढ़ते थे ।
सोवियत रूस से दोस्ती पर गर्व करते थे
उस समय अमेरिका से नफरत करते थे
 कश्मीर पर सबका एक मत होता था
पाकिस्तान से लड़ाई की बात पर खून खौल जाता था ।
गिले-शिकवे और ईर्ष्या-द्वेष चुटकी में टाल देते थे
हँसी-ठिठोले में सबका हाल चाल ले लेते थे ।

अब घर-घर में गैस और इलेक्ट्रिक हीटर है
ठंढी हवा को रोकने के लिये शटर है ,
सब एक-दूसरे से अलग-अलग हट-हट कर है ,
घर-घर में टी वी है डिश कनेक्शन है
अब सीरियल और फिल्म देखने का चलन है  ।
लोग कहाँ मिलते हैं भाईचारा तर-बतर है
बुढ़िया- बूढ़े खांस रहे हैं परिवार तितर-बितर है ।

पहले गुलटनमा , टुनटुन , बबरा, हुकना , ठकना और चुकना था
जिसके साथ उठना बैठना खेलना और कूदना था ।
अब राजू , पीटर , सोनू, मोनू , पिंकू , पप्पू और गोल्डी जैसे बच्चे हैं
जहाँ कॉफी ड्रिंक्स आइसक्रीम चिप्स और गोल गप्पे के चर्चे हैं ।
घुच्ची की बात होती थी ,कौड़ी , लेड बॉल और निशाने की बात होती थी
पिल्लो डण्डा पीटो गुड्डी कबड्डी पच्चीसी ताश और कुश्ती की बात होती थी
अब क्रिकेट गोल्फ टेनिस और शूटिंग की बात होती है
बात-बात पर गोली बम पिस्तौल चलते हैं और शराब  साथ देती है ।

सुबह-शाम नौजवानों के अड्डे जमते थे और मिलते थे
सब हँसते थे और  दिल खोल कर ठहाके लगाते थे
अब जोक मेसेज करते  हैं मोबाइल टेलीफोन पर  बात करते हैं
अब ह्वाट्सएप में गड़े रहते  हैं फेस बुक पर ऑनलाइन दीखते हैं


बदल गया है सब कुछ
लुट गया है सब कुछ ।
अब वो संवेदना नहीं
अब वो चेतना नहीं ।
मिलकर चलने की बात होती थी
अब बँटकर बढ़ने की बात होती है ।
गाँव शहर में मिल रहे हैं
वो लहर हमें लील रहे हैं ।

अमर नाथ ठाकुर , 5 फरवरी , 2017 , मेरठ ।


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