कॉमन सेंस और सिविक सेंस
‘कॉमन सेंस’ (सामान्य समझ) और ‘सिविक सेंस’ (नागरिक बोध या सामाजिक बोध)—ये दोनों शब्द जितने सहज हैं, आज के सामाजिक आचरण में उतने ही दुर्लभ और असामान्य होते जा रहे हैं। हम जाने-अनजाने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच की विभाजन रेखा को निरंतर मिटाते चले जा रहे हैं।
वस्तुतः यह समझ हर साधारण से साधारण नागरिक में नैसर्गिक रूप से विद्यमान होती है, किंतु दुखद यह है कि लोग इसके प्रयोग से विमुख होते जा रहे हैं। जब तथाकथित पढ़े-लिखे और साधन-संपन्न लोग ही इस बुनियादी नागरिक कर्तव्य की अवहेलना करने लगें, तो वे समाज और पड़ोसियों के लिए गंभीर संकट खड़ा करते हैं। कई बार यह उपेक्षा किसी की जान पर भी भारी पड़ जाती है, फिर भी लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते।
जिस दिन समाज इस सामाजिक बोध को अपने आचरण में उतार ले, उस दिन नगर, राज्य और देश की आधी से अधिक समस्याओं का समाधान स्वतः हो जाए।
सड़कों और चौराहों पर कूड़े के ढेर न दिखें, नदियां और नाले मैला ढोने के साधन न बनें, और हवा में सड़ते कचरे की दुर्गंध न घुले। सार्वजनिक स्थलों, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर पान-मसाले की वीभत्स पीक दिखाई न दे। सड़कों के किनारे लघुशंका की बदबू से निजात मिल जाए, और पालतू गाय, बैल , भैंस लावारिसों की तरह सड़कों पर न भटकें। कागज़ के टुकड़ों से मुक्त होकर शहर सांस लेने योग्य बनें, और 'अनुशासन देश को महान बनाता है' केवल दीवारों पर लिखा नारा न रहकर हमारे जीवन की वास्तविकता बन जाए।
किंतु विडंबना यह है कि यह अनुशासनहीनता केवल सार्वजनिक सड़कों तक सीमित नहीं है; हमारी आधुनिक बहुमंजिला आवासीय सोसायटियों का यथार्थ इससे भी अधिक पीड़ादायक है।
रास्तों पर गुटखे की तीखी पिचकारियां और सीढ़ियों की दीवारों पर पान के अमिट दाग आम दृश्य हैं। सिगरेट के अधजले टुकड़े बिना बुझाए फेंक दिए जाते हैं। पचीस-तीस मंज़िल की गगनचुंबी इमारतों के नीचे से गुजरना किसी जोखिम भरे अभियान से कम नहीं लगता। ऊपर की बालकनियों और खिड़कियों से अचानक गंदा पानी, अंडों के छिलके या तरकारियों का कचरा सिर पर आ गिरता है। भारी वस्तुओं के गिरने से सिर फूटने या प्राण जाने की आशंका लगातार बनी रहती है। नीचे खड़ी गाड़ियों पर चम्मच, ग्लास या सीधे गमले गिरते हैं और लोग बाल-बाल बचते हैं। इतना ही नहीं, दूसरों के आरक्षित पार्किंग स्लॉट में बेधड़क अपनी गाड़ियां खड़ी कर घंटों गायब हो जाना और टोकने पर एक औपचारिक खेद तक प्रकट न करना—यह किस संवेदनहीनता का परिचायक है?
लोग अपने पालतू कुत्तों को आंतरिक मैदानों और टहलने के रास्तों पर शौच कराते हैं, लिफ्ट और सीढ़ियां पेशाब की दुर्गंध से भर जाती हैं। हद तो तब हो जाती है जब आप अपनी बालकनी में दो पल सुकून के बिता रहे हों और ऊपर से बिस्कुट के टुकड़े, जलती सिगरेट की राख या पौधों को सींचते समय बचा हुआ मैला पानी आपके सिर पर आ गिरे। आप ताजी हवा का आनंद ले रहे हों और ऊपर वाले सज्जन अपनी बालकनी में कालीन झाड़कर आपको धूल में नहला दें। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, हर रोज की असहनीय दिनचर्या है। बच्चे सुबह-सवेरे इस्तरी किए हुए साफ स्कूल यूनिफॉर्म में नीचे निकलें और ऊपर से गिरती पानी की धार उन्हें भिगो दे, जिससे गाड़ी छूटने के डर से वे बिलखने लगें। भवनों के एसी लेज पर ऐसे अवांछित कपड़े और वस्तुएं अटकी मिलती हैं, जिनका नाम लेना भी शिष्टता के विरुद्ध लगता है। इस तरह के सामान सोसाइटी की अंदर की सड़क और पगडंडी पर भी बिखरे होते हैं।
शांति और विश्राम का अधिकार भी सुरक्षित नहीं है। खिड़कियों के पास देर रात तक होने वाला भारी शोरगुल नींद उड़ा देता है। आधी रात को दो बजे सोसाइटी के भीतर बेपरवाह हॉर्न बजाकर पूरे परिसर की नींद में खलल डालना, अथवा जहां वृद्ध और बच्चे टहल रहे हों वहां तीस-चालीस की गति से कार और दोपहिया दौड़ाना—यह कैसी आधुनिकता है?
सवाल उठता है कि आखिर उच्च शिक्षा पाकर भी हम नागरिक बोध क्यों गंवाते जा रहे हैं? ‘कॉमन सेंस’ इतना 'अन-कॉमन' क्यों होता जा रहा है? हम अपनी नैतिकता, अनुशासन और सामाजिक संवेदनाओं का त्याग कर इस कदर आत्मकेंद्रित और असभ्य क्यों बनते जा रहे हैं?
क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था में कोई गहरा अभाव रह गया है, या फिर हम अपनी भावी पीढ़ी को सुसंस्कृत और संवेदनशील नागरिक बनाने में कहीं चूक रहे हैं?
यदि हम सब अपने भीतर केवल इस न्यूनतम 'सिविक सेंस' को जाग्रत कर लें, तो हमारा परिवेश स्वच्छ और सुरक्षित हो जाए, समाज के अधिकांश गतिरोध बिना किसी बाहरी प्रयास के सुलझ जाएं, और आने वाली पीढ़ी शालीन व अनुशासित बने। एक नागरिक के रूप में हम ही तो व्यवस्था और सरकार की बुनियादी इकाई हैं; जब हमारी व्यक्तिगत चेतना जागेगी, तभी एक गरिमापूर्ण समाज का निर्माण संभव होगा।
अमर नाथ ठाकुर, 30 अक्तूबर, 2026, कोलकाता।
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