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Monday, 4 February 2019

मैं ने अपनी मौत का जश्न देखा है

मैं ने अपनी मौत का जश्न देखा है

 कल्पना में मैं कभी-कभी मर जाता हूँ
और अपनी लाश के इर्द-गिर्द घूमता रहता हूँ
कुछ लोग मेरी याद में वहाँ रो रहे होते हैं
जो मुझे बहुत सुकून पहुँचाता है
रोतों के साथ मैं भी अदृश्य खड़ा हो जाता हूँ
मेरी आँखों से वसु धारा प्रस्फुटित हो जाती है
और मैं भी निःशब्द स्वयं पर रोना शुरू हो जाता हूँ ।

मेरी लाश के पास कुछ लोग खुश हो रहे होते हैं
कुछ मुस्करा भी रहे होते हैं
कुछ टीका-टिप्पणियाँ कर रहे होते हैं
कुछ गालियाँ और पुराने भड़ास निकाल रहे होते हैं
चाय-कॉफी की चुस्कियां और समोसे चला रहे होते हैं
मौत पर जश्न मेरे लिये अचरज भरा होता है
मैं  प्रतिवाद नहीं कर पाता हूँ
क्योंकि मैं सूक्ष्म शरीर में अदृश्य होता हूँ 
किन्तु मैं व्यथित हो जाता हूँ
पुनः निःशब्द विदीर्ण हो रोने लगता हूँ
अपनी लाश में तब अविलंब समा जाता हूँ
और जिंदा हो अपने आँसू खुद पोंछ लेता हूँ ।

मैं ने अपनी मौत का जश्न देखा है
इसलिए अपनी मौत से बहुत कुछ सीखा है
हमने अपना-पराया और मित्र-शत्रु को परखा है
रुदन में हँसी और हँसी-मज़ाक में रुदन को चखा है
जो जीते जी नहीं पता चलता है
वह सब मृत्यु उपरांत का जश्न बताता है
जो खुश हो नहीं पता चलता है 
दुखी हो सब समझ में आ जाता है 
मैं ने अपनी मौत का जश्न देखा है
और इसलिए बहुत कुछ सीखा है !

अमर नाथ ठाकुर , 3 फरवरी , 2019 , कोलकाता । 

Sunday, 9 December 2018

टकराते रहना ही जीवन है

टकराते रहना ही जीवन है

हर वक्त हम टकराते  ही रहते हैं
आज टकरा गये हवा के झोंके में खुल रही खिड़की से
पिछली बार टकराये थे बंद हो रहे दरवाजे से
जब भी टकराते  हैं चोट लगती है
हमेशा न हमारी गलती  और न कोई खोट  होती है

एक बार छत से तेजी से घूम रहा एक पंखा गिर गया था
और मेरी 'नाक' कट गयी थी
खून से लथपथ  हुआ था
मरहम पट्टी दवा-दारु करानी पड़ी थी
कई दिनों तक दर्द से कराहा था
फिर टकराने के ‘महत्त्व’ को जाना था
क्योंकि तभी तो दर्द में कराहना सीखा था

जब जीवन पथ काँटों से भरा हो
सर्वत्र कंकड़ पत्थर ही सना पटा हो
तब हर कदम पर टकराना होता है
कभी कांटे चुभते हैं कभी नाख़ून उखड़ते हैं
कभी हड्डी टूटती है कभी चमड़े छीलते हैं
और तभी चलते रहने का अहसास होता है
टकराकर हम सब हमेशा पछताते हैं
लेकिन तभी अपना मूल्यांकन स्वयं कर पाते हैं

जब वैचारिक टकराव होते हैं
तब तीखी बहस होती है
जब भ्रष्टाचार से टकराते हैं
तब तन- मन उद्वेलित होता है
दूसरों के अत्याचार से भी टकराना होता है
स्वयं की सोच से भी टकराना होता है
कभी टकराता देश और समाज के लुटेरों से
कभी निंदा और गाली की बौछारों से
कभी अंतर्द्वद्व से कभी जीवन के व्यतिक्रम से
फिर कभी छिन्न-भिन्न मन के भ्रम से
कभी तो टकराकर भटकने लगते हैं
कभी जीवन पथ से भी बहकने लगते हैं
टकराने के बाद पुनः टकराने का क्रम चल पड़ता है
एक-एक कर अनुभव में कुछ जुटता चलता जाता है

टकराना जीवन में चल रहा अनवरत  है
यह जीवन पथ पर चलते रहने का द्योतक है
नहीं तो लगता यात्रा की दिशा ही भ्रामक है
लक्ष्य की ओर बढ़ते जाने का यह मील-स्तम्भ है
बिना टकराए चलते चलें यह तो मिथ्या दम्भ है                  

टकराते चलते रहना ही सरस जीवन है
निर्बाध चलते रहना तो नीरस है मरण है

अमर नाथ ठाकुर , 25 नवम्बर , 2018 , कोलकाता

Sunday, 10 June 2018

विजयी आत्म-समर्पण



विजयी आत्म-समर्पण

उलाहने जब कोई सुना जाता है
शुरू हो जाती है खुद से लड़ाई
और पिटता रहता हूँ अन्तर्द्वन्द्व से
मैं बेचैन हो जाता हूँ
नींद गायब होने लग जाती है
तर्क-वितर्क चलने लगता है
पूरी रात गुजर जाती  है
खुशियाँ गायब हो जाती है
चेहरा मलिन पड़ जाता है
हज़ामत भूल जाता हूँ
बाल सँवारना रह जाता है
कपड़े की इस्तरी रह जाती है
जूते की पॉलिश नहीं हो पाती है
मौजे से बदबू आती रहती है
खाना बेस्वादू हो जाता है
फिर पूरा दिन भी गुज़र जाता है
और कई दिन-रात गुजरते चले जाते हैं
कमज़ोर हो जाता हूँ
डॉक्टर कहता है मत सोचो इतना
क्यों लेते हो टेंसन इतना
खुद को परास्त महसूस करने लगता हूँ
और पहचान छुपाने चेहरा ढँक लेता हूँ
फिर तब होता है आत्म समर्पण
 उस असीम के चरणों पर ।
और तब होता है अन्तर्चेतना का अभ्युदय
तर्क-वितर्क खत्म हो जाता है
खुद को समझने लगता हूँ
मैं ऊर्जान्वित हो जाता हूँ
तभी मैं मुस्कुरा उठता हूँ
प्रकृति हरी - भरी नज़र आने लगती है
सूर्य रश्मियाँ मार्ग दर्शक बन जाती हैं
चाँदनी सुकून पहुँचाने लगता है
दिनचर्या दुरुस्त हो जाती है
अहंकार का मिट जाता है नामो – निशान
सुनाई देता है वहीं विजय घोष की तान
निःस्वार्थ सेवा भाव की अभिलाषा से
विजयी मुद्रा में कर देता तन-मन तब अर्पण
 जब एक हो जाते हैं मैं और मेरा अन्तर्मन ।

अमर नाथ ठाकुर , 7 जून , 2018 , मेरठ ।














Sunday, 3 June 2018

जब भी आप याद आते हैं

जब भी आप याद आते हैं
आप दगा देकर निकल रहे होते हैं ।
आप तिरछी आँखों से देखते हैं
यह कहाँ पता चल पाता है
आप मीठी ही बातें बोलते हैं
यह स्वाद तो हमें लग ही जाता है
आप साथ में खाना खा लेते हैं
और कैसे बिल थमा जाते हैं
आपकी गाड़ी में चल लेता हूँ
कब आप भाड़ा ले लेते हैं !

उस दिन तो कमाल हो गया
जब आपने हमसे रुमाल ले लिया
पसीना आपने अपना पोंछा
मेरा पसीना ढलकता निढाल हो लिया ,
मेरा विश्वास आपने चुरा लिया
आपका हाथ अपने कंधे पर चढ़ा लिया
और कदम में कदम मिला जोर से चलने लगा
न जाने कब आपने मेरा गला दबा दिया !

साथ -साथ खाते-पीते रंग बदलते  रहे हैं
और मज़ा लेते हुए सज़ा भी देते रहे हैं
चुगलखोरी तो स्वभाव वश करते ही रहे हैं
खिल-खिला कर हँसते हुए सब छुपाते रहे हैं
 काम  करने का वादा भी आप करते रहे हैं
और फिर बिना पता चले दगा भी देते रहे हैं

परामर्श तो आप मुझे समय - समय पर देते रहे
हम इसे आपकी भलमनसाहत समझते रहे
आकाश से गिर कर खजूर पर भी हम नहीं लटक सके
यह मेरी बदनसीबी थी जब हम जमीन पर गिरे पाए गए
धूल - धूसरित तो हम हुए ही कीचड़ में भी सन दिए गए !
कितने अच्छे भले  आप मित्र मेरे थे
यह पता तो तब चला जब ये सबक सिखा गए ।
आपका शुक्रिया आप कम-से-कम बहल तो गए
आपका और शुक्रिया हम भी आपसे बहला गए ।

अमर नाथ ठाकुर , 1 जून , 2018 , मेरठ ।









Sunday, 20 May 2018

आधा तुम खाओगे आधा हम खाएँगे

आधा तुम खाओगे आधा हम खाएँगे

आधा तुम लो आधा मैं लूँ
चलो मिल-जुल कर बाँट खाएँ
भ्रष्टाचार का पुल बनाएँ
उस पर राजनीति की बस चलाएँ
बस में विधायक और सांसद चलेंगे
मुख्यमंत्री कंडक्टर बनेंगे
और प्रधानमंत्री ड्राइवर बनेंगे
पुल जब टूटेगा नीचे जनता मरेगी
लाशों पर मंच बना भाषण चलेंगे
जनता की चीत्कार कौन सुनता है
क्योंकि हम तो जोर-जोर से तालियाँ बजाएँगे
फिर मृतक सम्बन्धियों को पुरस्कृत करेंगे
घायलों के लिये राहत के प्रसाद बँटेंगे
जो उसे ये कहाँ मिलेंगे
क्योंकि हम लोग सब झपट खाएँगे
आधा तुम खाओगे आधा हम खाएँगे ।

अप्रैल में जब ट्रान्सफर  लिस्ट निकलेंगे
वर्मा जी यादव जी के चहेते हैं वह वहीं रहेंगे
लाख टके तो जरूर मिलेंगे
मिल-बाँट कर खाएँगे
आधा तुम खाओगे आधा हम खाएँगे ।

मेहरा जी मंत्री के मौसी की चचेरी
बहन के दामाद के मित्र हैं
उन्हें क्यों कोई फिक्र है
वह भी इसी स्टेशन में रहेंगे
पम्प, घर, सड़क और सप्लाई का ठेका बाँटते रहेंगे
और वह तो बिना काम के भी 
बिल -पे- बिल पास करते रहेंगे
कमीशन के टके बटोरते रहेंगे
और ऊपर तक पहुँचाते रहेंगे
उसमें कुछ हमें भी मिलेंगे
मिल-बाँट कर खाएँगे
आधा तुम खाओगे आधा हम खाएँगे ।



अगले इलेक्शन में वोटों का खेल खेलेंगे
जनता तो भोली है उन्हें पाँच सौ मिलेंगे
वोटों को खरीद कर हम चुनाव जीतेंगे
संसद विधायक यदि कम पड़ेंगे
क्या दिक्कत है हम उन्हें भी खरीद लेंगे
सरकार तो हमारी ही बनेगी फिर मौज़ करेंगे
ठेके में दस बीस प्रतिशत के कमीशन भी मिलेंगे
फिर मिल-बाँट कर खाएँगे
आधा तुम खाओगे आधा हम खाएँगे ।


इलेक्सन के पहले जातियों में जनता को बाँटेंगे
धर्म की राजनीति कर भेदभाव फैलावेंगे
वोटों का ध्रुवीकरण कराएँगे
हम जीतेंगे हमारी पार्टी के लोग जीतेंगे
सरकार हमारी बनेगी हम राज करेंगे
हंग एसेम्बली हुई तब भी किंग मेकर बनेंगे
तब तो हम कई मंत्री बनवाएँगे
बिना जिम्मेवारी के सारा काम करवाएँगे
रिमोट से ही सही सरकार हम ही चलाएँगे
सरकार को परमानेन्ट बनाए रखेंगे
खूब कमाएँगे खाएँगे ऐश करेंगे
लेकिन मिल-बाँट कर खाएँगे
आधा तुम खाओगे आधा हम खाएँगे ।

देश के लिये हथियार खरीदेंगे, विमान खरीदेंगे
विश्वास बढ़ाने बिचौलिये हम क्यों रखेंगे
सप्लायर्स से पूरा कमीशन स्वयं वसूलेंगे
फिर खुद कम्प्लेन कराएँगे
अपनी एजेंसी से खुद अपनी जाँच करवाएँगे
अपने को पाक साफ साबित खुद करेंगे
मिल-बाँट कर खाएँगे
आधा तुम खाओगे आधा हम खाएँगे ।

पत्रकारों का जखीरा साथ रखेंगे
जो सिर्फ हमारी खबर छापेंगे
जो नेता मंत्री अधिकारी व्यवसायी नहीं सुनेंगे
उनके चरित्र हनन के समाचार छपेंगे
सीबीआई, सीवीसी, ईडी से जाँच करवाएँगे
फिर छापे पड़ेंगे, बरामदगी के समाचार छपेंगे
पत्रकार वसूलेंगे, हम भी वसूलेंगे
मिल-बाँट कर खाएँगे
आधा तुम खाओगे आधा हम खाएँगे ।

नौकरी के विज्ञापन आएँगे
रिश्वत से ही बहाली कराएँगे
अपनी जाति वाले अधिकारी बनेंगे
कैडर वाले तो जरूर बढ़ेंगे
कुछ जन कल्याण के भी काम करेंगे
जो सिर्फ दिखाने के ही होंगे
फिर मिल-बाँट कर खाएँगे
आधा तुम खाओगे आधा हम खाएँगे ।

कुछ मामले जो नहीं संभलेंगे 
वो न्यायालय में जाएंगे
लेकिन हम फिर भी नहीं डरेंगे
न्याय भी तो बिकते हैं खरीद लेंगे
आखिर न्यायमूर्ति भी तो खेलेंगे
वो भी खाएंगे उनके लोग भी खाएंगे
सब मिल बांट कर खाएंगे
आधा तुम खाओगे आधा हम खाएंगे ।

आरक्षण की राजनीति करेंगे
धर्म की राजनीति को सेवेंगे
असहिष्णुता का दुष्प्रचार करेंगे
कुछ लेखक और समाजसेवी पुरस्कार त्यागेंगे
संविधान खतरे में है अफवाह फैलाएँगे
डेमोक्रेसी, न्याय व्यवस्था तब चरमराएँगे
अखबारों में फिर ऐसी ही खबर छपेंगे
केंद्र सरकार की गद्दी को हिला नींद हराम कर देंगे
फिर अपने विरुद्ध के सभी मामले वापस करा लेंगे
अपने कुकृत्यों का पर्दाफाश नहीं होने देंगे
फिर मिल-बाँट कर खाएँगे
आधा तुम खाओगे आधा हम खाएँगे ।

अमर नाथ ठाकुर , 19 मई , 2018 , मेरठ ।
























Sunday, 13 May 2018

जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी कीजै


जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी कीजै

मैं कूड़े के ढेर के पास खड़ा हूँ
सड़ांध आती है
यहाँ से खिसक जाने का मन करता है
यहाँ पहले भी जब आता था
बदबूदार हवा का झोंका आता था
और तुरत ही यहाँ से खिसक जाता था
अब खिसक कर एक कोने में आ गया हूँ
लेकिन यहाँ भी  भिनभिनाती मक्खियाँ आती हैं
कभी कन्धे पर बैठती है
कभी नाक पर बैठती है
और हर क्षण परेशान करती है
इसलिये फिर खिसक जाता हूँ
किन्तु इधर भी कूड़े का एक ढेर होता है
और वही सड़ांध , वही कीड़े , वही मक्खियाँ
और वही बदबूदार हवा
यहाँ भी साँस लेना मुश्किल है
खड़ा होना दूभर है ।
कहाँ-कहाँ खिसक कर जाऊँगा
कब तक खिसकता रहूँगा ।

इसलिये अब हमने एक तरीका सोचा है
अब हमने परिस्थिति से  समझौता कर लिया है
सड़ांध बदबू को आत्मसात कर लिया है।
अब मैं हमेशा कूड़े के बोझ लिए ही चलता हूँ
इसलिये कहीं भी खड़ा हो लेता हूँ
कहीं भी दोस्तों के साथ बात करने लगता हूँ
कहीं भी खड़े-खड़े चाय पी लेता हूँ
कोई भी परेशानी नहीं होती है
क्योंकि अब मेरी सोच कूड़े जैसी हो गयी है
बदबूदार सोच , सड़ांध सोच
अब मेरे जेहन में है, रग-रग में है ।
जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी कीजै।

मुझे अब कोई परेशानी नहीं है ।

अमर नाथ ठाकुर , 28 अगस्त ,  2016  ,  मेरठ ।





Monday, 7 May 2018

हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है

हमारा मित्र हमें ब्राह्मण कहने लगा है


हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है
और अब हमसे कट-कट कर रहने लगा है ।

हमारा मित्र कायस्थ क्षत्रिय भूमिहार पर बरसने लगा है
 ब्राह्मण   बनियों   जैनियों  पर  कटाक्ष करने लगा है
और इन्हें अगड़ी कहकर पुकारने लगा है ।
वो पिछड़ी को भेदभाव का शिकार कहने लगा है
दलितों पर हो रहे अत्याचार पर लिखने लगा है
हमारा मित्र हमसे कट-कट कर रहने लगा है ।
हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।

वो कहता है, तुमलोग अगड़ी जाति से हो
तुमलोग सिर्फ पन्द्रह प्रतिशत वाली प्रजाति हो

कब्जा तुम लोगों ने पचासी प्रतिशत सम्पत्ति 
और नौकरी पर कर लिया हुआ है
इसलिये हमारा मित्र हमें अब 
सवर्ण कहकर पुकारने लगा है
हमारा मित्र हमें घूर-घूर कर देखने लगा है
हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।

हम जातिवादी हैं हम मनुवादी हैं
हमने शताब्दियों से पिछड़ों को सताया है
युगों से दलितों पर अत्याचार बरपाया है
उनके अधिकारों को बेरहमी से छीना है
उनको निकृष्ट जीवन जीने पर विवश किया है
वो कहता है ये अब उन्हें पता चल गया है
इसलिये हमारा मित्र अब 
हम से कट-कट कर रहने लगा है
हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।

वो आरक्षण समर्थक रैलियाँ करता है
आरक्षण खत्म करने के किसी भी
विचार पर शब्द-वाण चलाता है
दलित एक्ट में किसी भी
 बदलाव का विरोध करता है
किसी भी कीमत पर अगड़ी से
प्रतिशोध की वकालत करता है ।
रास्ते चौराहों पर मिलकर भी अब नजरें फेरने लगा है
हमारा मित्र अब हमें ब्राह्मण कहने लगा है ।

हमारा मित्र जाति विहीन समाज की 
परिकल्पना पर व्याख्यान देता है
वो जातिवाद का पुरजोर विरोध करता है
लेकिन वोटों के समय जाति-आधारित 
राजनीति जोर-शोर से करता है
जाति-आधारित आरक्षण में किसी भी
 बदलाव को राजनीतिक हथकंडा कह देता है 
वो  इसे अगड़ी जातियों की
 कॉन्सपिरेसी तक करार देता है
हमारा मित्र पिछली दोस्ती को अब भूलने लगा है
हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।

‘अगड़ी के मुख पर कालिख लगाओ
सवर्ण को  समाज से दूर भगाओ’
'अगड़ी को दूर भगाओ
सवर्ण से देश बचाओ'
के जैसों नारों पर तालियाँ बजाने लगा है
जब भी गरीबी को आरक्षण का
 आधार बनाने के विषय पर बोला
उसने हमें पिछड़ी और दलित विरोधी तक कह डाला
हम अम्बेडकर को पसन्द करें
 इसे वो ढोंग कहने लगा है
हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।


एक बार जिसने आरक्षण लिया 
बार-बार उसने और उसके परिवार ने ही लिया है
जो पहले  आरक्षण नहीं पाया
 उसका परिवार इस लाभ से अब तक वंचित रहा है
इसलिए कहते हैं आरक्षण उस दलित या पिछड़े को दो
जिसके परिवार को अभी तक नहीं मिला है
इसलिए भी हमने पदोन्नति में आरक्षण का विरोध किया है
इस पर हमारा मित्र हम से नाराज रहने लगा है
और वो हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।

आज तक जात पता कर हमने भारत वर्ष में
कहीं किसी को नमस्कार करते नहीं देखा है
हमने कई गरीब अगड़ी और ब्राह्मणों को
 दलित और पिछड़े अधिकारी के घर नौकरी करते देखा है
हमने गरीब अगड़ी को दलित अधिकारी के सामने
 निस्संकोच सिर नवाते देखा है
इसलिये कहते हैं 
जिस पिछड़ी और दलित ने 
आरक्षण का फायदा लिया है
उनने अपना सामाजिक 
और आर्थिक स्तर सुधार लिया है
इसलिये आरक्षण पदोन्नति में क्यों हो
इसलिए आरक्षण पुश्त-दर-पुश्त क्यों  हो          
यदि हम ऐसा कहें तब से 
हमारा मित्र हम से नफरत करने लगा है
हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।

हमारा मित्र हम से अब कट-कट कर रहने लगा है
और हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कह चिढ़ाने लगा है ।







        अमर नाथ ठाकुर ,मई 6 , 2018 , मेरठ .

कॉमन सेंस और सिविक सेंस

  कॉमन सेंस और सिविक सेंस ‘ कॉमन सेंस’ (सामान्य समझ) और ‘सिविक सेंस’ (नागरिक बोध या सामाजिक बोध)—ये दोनों शब्द जितने सहज हैं, आज के सामाजिक ...