Tuesday, 9 September 2014

क्या-क्या नहीं देखा हमने



गणित बदलते ,
भूगोल बदलते देखा है हमने ।
ईमान बदलते देखा है हमने ।

धर्म बदलते ,
कर्म बदलते देखा है हमने ।
मर्म समझते देखा है हमने ।

झूठ-सच करते ,
काले-सफ़ेद करते देखा है हमने ।
अर्थ का अनर्थ लगाते देखा है हमने ।

दोस्त को दुश्मन बनते ,
देव को दानव बनते देखा है हमने ।
(साधु को शैतान बनते देखा है हमने।) 
पशु को मानव बनते देखा है हमने ।

कुत्ते की वफादारी ,
बिल्ली की होशियारी देखी है हमने ।
शिशु की समझदारी देखी है हमने ।

दिन में चाँद – सितारे ,
रातों को सूरज चमकते देखा है किसी ने ?
प्रकृति को अप्राकृतिक होते सुना है किसी ने ?

लेकिन झेलम-तवी को तो उफनते देखा है सबने ।
फिर  वहाँ प्रकृति को लूट मचाते देखा है सबने ।
वो भारत का मुकुट है ,
जहाँ  कराहती मानवता को देखा है सबने ।
अबकी जहाँ आत्मा को भी विलखते देखा है सबने ।
हृदय विदीर्ण हुआ जाता ,
क्या-क्या वहाँ  नहीं देखा हमने ।



अमर नाथ ठाकुर , 9 सितंबर , 2014 , कोलकाता ।      

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