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Sunday, 29 April 2012

एक प्रत्यक्ष - भोगी की साल २००८ की बानगी

       

      १

शायद यही हो महाप्रलय
अनंत वियोगों का विलय
न कोई खुशी
न कोई कलह
विरह ही विरह

        २

फसल डूबा
सड़कें डूबी
पुल और नहर हुआ क्षत-विक्षत
ग्राम-ग्राम सब
 जन-जानवर  विहीन हुआ
भूगोल बदला शत प्रतिशत
कैसी तूं कोशी मैया
क्यों पसारा तू ने ये मृत्यु -शय्या

        ३

द्रुत गति से पानी आया
जैसे घोड़े पर सवार
ह ह ह ह ह ह ह
पांच हाथ ऊंचे दीवार की भांति
दैत्याकार
इधर-से
उधर-से
उत्तर से
पश्चिम से भी
न कल्पित कभी
अचंभित सभी
धार इधर मुडती है
उधर चढ़ती है
इधर मचलती है
उधर कूदती है
 यहाँ उफनती है
यहाँ सहमती है
यह मरोड़
यह तोड़
चकरी की भाँति घूमता वृत्ताकार
वहाँ सर्पाकार
यहाँ निराकार
भाई , ये कौन सा प्रकार
ये पानी तो उन्मादी है
बेलगाम है
पाजी है
भाई जाग
जाग
और भाग


        ४
         
उधर से छागर , इधर से स्वान
गाय-बैल बिल्ली      अनजान
सांप-छुछंदर मानव सब एक समान
सब डूब उपला रहे
समूल-पेड़ पत्ते सब बहे जा रहे

          ५

अबला का उजड़ा सुहाग
शिशु का बिछुड़ा भाग
किसी बाप का पाग

        ६

वह कहाँ
वह बहा
ये लुटिया
ये खटिया
ये पटिया
वह काठ का बक्सा
वह तख्ता
ये टिनही थाली
ये लोटा
ये झोली
ये बाबा का सोटा
उनका कुर्ता
माँ की पोटली
माँ की साड़ी
जिंदगी भर की सारी कमाई
सब  'जमा' गया
सब समा गया
सब भरमा गया
काका का घर चरमरा गया
काकी का कोठा भरभरा गया
बुढ़िया दादी का संदूक बह गया
अलगनी से झूलता दादा का इकलौता अध भींगा कुर्ता  किंतु रह गया
चहारदीवारी लड़खड़ा गया
कल्पित भविष्य चरमरा गया
प्रलय सब बिखरा गया

        ७


ये संकटों का संकट
पानी पहूंचा अब आकंठ
जल-तल से घर की ऊँचाई
रह गयी तिहाई
रही न कहीं खाई
छोर रहित झील
मीलों-मील
कोई इस घर पर
कोई उस घर पर
कोई पेड़ पर
कोई नहर के छहर पर

        ८

हम यहाँ
पत्नी वहाँ
बालक कहाँ

         ९


अब न कोई पुकार
न कोई हाहाकार
न इस पार
न उस पार
नहीं अब कोई आर-पार
न कोई कोलाहल
न कोई चीत्कार
यही है प्रलय साकार


        १०  



भविष्य जैसे भूत हो
बाप जैसे पूत हो
बुद्धि भ्रमित
बूढ़ा-बच्चा सब एक समान
कहाँ अब कोई अरमान
लहूलुहान वर्त्तमान
एक सूर्य ऊपर
सौ-सौ सूर्य जल में तरंगित
बिखेरता सिर्फ कुटिल मुस्कान


        ११

जीवन एक प्रक्रिया
मृत्यु एक लक्ष्य
जन-जन जाने यह दर्शन
प्रलय सब पलट दे
मृत्यु को प्रक्रिया कर दे
और लक्ष्य बना दे जीवन

पलकों में जिसकी गणना हो
यह जीवन अब क्षणिक है
मृत्यु अब नहीं संकुचित
पलकों से आगे घंटों - दिनों में पहुंचा गणित है



अमर नाथ  ठाकुर , २९ अप्रैल ,२०१२ , कोलकाता.










Saturday, 14 April 2012

दुखों का सुख क्यों न मिले

लंगड़े  की  सरपट  चाल  की   कामना
अंधे  की   दिव्य -ज्योति  की  साधना
गूंगे   की    अट्टहास   की       कल्पना
कनफुसकी पर बहरे का शुरू हो जाना

ये सब तुम करे , हे कृष्ण लले---


निर्धनों के धन में
भिखारियों के मन में
किन्तु मंदिरों के बाहर कण-कण में

तुम गगन के  ऊपर , गगन के भी तले--

दुखियों के क्रंदन  में
अपाहिजों के चरण  में
शबरी के जूठन में
घायलों के रक्त-रंजित घावन  में

हे हरे  !  तुम वहाँ   पले, तो फिर कैसे मिले --
क्षितिज का पीछा हम करें,  क्षितिज के पार तुम चले --

कष्टों का भी आनंद और दुखों का भी सुख
अतः क्यों न मिले , जहां तुम खिले -----------


अमर नाथ  ठाकुर , १४ अप्रैल , कोलकाता .



Thursday, 5 April 2012

क्यों न रहें अनजाने


कोई नहीं हो अपना
जब इस शहर में
नहीं घट सकती कोई दुर्घटना --

अनजाने को कौन जाने
जो कोई बन्दूक ताने
लूटें हमारे खजाने --

जरूरत भी क्या जो हम लगे यहाँ सजाने
धन , पद  और गुमान की ढोल बजाने --

झुक -झुक कर जब काम चले
क्यों कोई  चले यहाँ सीना ताने
और लोग बोलें  पागल -दीवाने --

पके फल जब खुद गिरे
क्यों कोई  पत्थर मारे --

मुस्की से जब काम चले
क्यों चले ठहाका लगाने --

फिर क्यों कोई देख ललचाए
और कुछ अनहोनी घट जाए

न कोई बने अपना --
क्यों घटे कोई दुर्घटना ---


अमर नाथ ठाकुर , ५ अप्रैल , २०१२. 

Monday, 26 March 2012

आत्म -तुष्टि



आसमान में अदृश्य होता -सा धुंआ
झील में विलीन होते -से  वर्षा -बूँद
भीड़ के कोलाहल में असुना -सी शिशु की चीत्कार --

ख़ाक होती -सी कल्पनाएँ
बिखर- बिखर जाती  -सी आशाएँ
"हाय बचाओ " की अनसुनी -सी पुकार --

सिमटकर रहने की -सी विवशता
रुग्णता की लक्ष्यहीन -सी परिधि
पुनः सीढ़ियों पर डगमगाते -से पग बारम्बार --



ऐसे में भी जीवनाकृति का खींच पाता प्रारूप ---
और देख लेता भविष्य की कँपकँपाती खोह में थोड़ी -सी धूप---


अमर  नाथ ठाकुर ,  १९८९ .

रास्ते जीवन के



हमने तुम्हारा पीछा किया
और तुम भागते रहे -

हम जब भागे
तो तुम मुड़ते रहे -

तुम्हारे पेंच समझ में नहीं आए -

जब हम तेज होते गए
तो फिर चौराहे मिलते गए
और हम भटकते रहे --

अट्टालिकाएँ तुम में नज़रें गड़ाए
भग्नावशेष पीठ घुमाए
पेड़ मुस्कराते -से रहे -
फिर भी हम चलते रहे -

मील -पत्थरों से तुम सीमित हुए,
गड्ढों से तुम बाधित हुए,
और हम आशान्वित हुए (शायद लक्ष्य  समीपता का संकेत समझ कर)
जब तुम्हारी छाती को एक नदी चीर -सी गयी,
लेकिन हम तो डूब गए -----


अमर नाथ ठाकुर , मार्च , १९८९ .  

Thursday, 8 March 2012

होलिका की होली

चुनावी दंगल की कैसी ये ठिठोली--
जिसने उकेरी रंग -रंगीली
जाति-धर्म -भेद की अठखेली --

गरिमा रहित  'हाथी ' थामता अब दलितों की टोली --
जन सवारी  ' साइकिल ' क्यों सवारे सिर्फ मुस्लिम -यादव जोड़ी --
भेद -भाव की लगाम ताने कैसे बजे एक  'हाथ' से ताली --
धर्म -भेद- आरोप  के निर्जल पंक में राष्ट्र  'कमल ' भी नहीं खिली --

हिंद - प्रदेश में चर्चा गली -गली --
लोध , कुर्मी , जाट-जुलाहे और नहीं  अगड़ी भी भली --
किन-किन नेताओं की किस-किस जाति ने उतारी पगड़ी --


अबकी होली -
रही नहीं निराली और भोली -
क्योंकि अखंड -भारत की
खंडित राजनीति की
 अजर -अमर होलिका नहीं जलाने देती
भेद जाति - धर्म कंटीली ---


अमर नाथ ठाकुर ,८ मार्च ,२०१२ .

Saturday, 28 January 2012

भटक -भटक हम किधर जा रहे



झूठ ,फरेब और भ्रष्टाचार ---
यही हमारा अब व्यवहार ---

हिंसा , लूट  और बेईमानी ---
जैसे ये 'गुण' हो गए हों खानदानी ---

ह्त्या , अपहरण और चोरी ---
बनी हमारी बेवशी और लाचारी ---

फिर ईर्ष्या , द्वेष और घृणा ---
इनके बिना -
हमने माना -
नहीं संभव सामाजिक ताना -बाना -----


यही बनते मील -स्तंभ ,
यही रास्ते 'आकाश'  के---
यही सफलता -सूत्र
और कुंजी आज विकास के -----

नैतिकता जल रही  , धरोहर हम गँवा रहे ----
भटक -भटक किधर हम जा रहे ---



अमर नाथ ठाकुर
२८ जनवरी ,२०१२. 

धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य

 धर्म, विचार और सभ्यताओं का भविष्य मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका समाज बनता है। उसके विचार शून्य में जन्म नहीं लेते; वे उसके धर्म, दर्शन...