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Sunday, 13 May 2018

जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी कीजै


जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी कीजै

मैं कूड़े के ढेर के पास खड़ा हूँ
सड़ांध आती है
यहाँ से खिसक जाने का मन करता है
यहाँ पहले भी जब आता था
बदबूदार हवा का झोंका आता था
और तुरत ही यहाँ से खिसक जाता था
अब खिसक कर एक कोने में आ गया हूँ
लेकिन यहाँ भी  भिनभिनाती मक्खियाँ आती हैं
कभी कन्धे पर बैठती है
कभी नाक पर बैठती है
और हर क्षण परेशान करती है
इसलिये फिर खिसक जाता हूँ
किन्तु इधर भी कूड़े का एक ढेर होता है
और वही सड़ांध , वही कीड़े , वही मक्खियाँ
और वही बदबूदार हवा
यहाँ भी साँस लेना मुश्किल है
खड़ा होना दूभर है ।
कहाँ-कहाँ खिसक कर जाऊँगा
कब तक खिसकता रहूँगा ।

इसलिये अब हमने एक तरीका सोचा है
अब हमने परिस्थिति से  समझौता कर लिया है
सड़ांध बदबू को आत्मसात कर लिया है।
अब मैं हमेशा कूड़े के बोझ लिए ही चलता हूँ
इसलिये कहीं भी खड़ा हो लेता हूँ
कहीं भी दोस्तों के साथ बात करने लगता हूँ
कहीं भी खड़े-खड़े चाय पी लेता हूँ
कोई भी परेशानी नहीं होती है
क्योंकि अब मेरी सोच कूड़े जैसी हो गयी है
बदबूदार सोच , सड़ांध सोच
अब मेरे जेहन में है, रग-रग में है ।
जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी कीजै।

मुझे अब कोई परेशानी नहीं है ।

अमर नाथ ठाकुर , 28 अगस्त ,  2016  ,  मेरठ ।





Monday, 7 May 2018

हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है

हमारा मित्र हमें ब्राह्मण कहने लगा है


हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है
और अब हमसे कट-कट कर रहने लगा है ।

हमारा मित्र कायस्थ क्षत्रिय भूमिहार पर बरसने लगा है
 ब्राह्मण   बनियों   जैनियों  पर  कटाक्ष करने लगा है
और इन्हें अगड़ी कहकर पुकारने लगा है ।
वो पिछड़ी को भेदभाव का शिकार कहने लगा है
दलितों पर हो रहे अत्याचार पर लिखने लगा है
हमारा मित्र हमसे कट-कट कर रहने लगा है ।
हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।

वो कहता है, तुमलोग अगड़ी जाति से हो
तुमलोग सिर्फ पन्द्रह प्रतिशत वाली प्रजाति हो

कब्जा तुम लोगों ने पचासी प्रतिशत सम्पत्ति 
और नौकरी पर कर लिया हुआ है
इसलिये हमारा मित्र हमें अब 
सवर्ण कहकर पुकारने लगा है
हमारा मित्र हमें घूर-घूर कर देखने लगा है
हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।

हम जातिवादी हैं हम मनुवादी हैं
हमने शताब्दियों से पिछड़ों को सताया है
युगों से दलितों पर अत्याचार बरपाया है
उनके अधिकारों को बेरहमी से छीना है
उनको निकृष्ट जीवन जीने पर विवश किया है
वो कहता है ये अब उन्हें पता चल गया है
इसलिये हमारा मित्र अब 
हम से कट-कट कर रहने लगा है
हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।

वो आरक्षण समर्थक रैलियाँ करता है
आरक्षण खत्म करने के किसी भी
विचार पर शब्द-वाण चलाता है
दलित एक्ट में किसी भी
 बदलाव का विरोध करता है
किसी भी कीमत पर अगड़ी से
प्रतिशोध की वकालत करता है ।
रास्ते चौराहों पर मिलकर भी अब नजरें फेरने लगा है
हमारा मित्र अब हमें ब्राह्मण कहने लगा है ।

हमारा मित्र जाति विहीन समाज की 
परिकल्पना पर व्याख्यान देता है
वो जातिवाद का पुरजोर विरोध करता है
लेकिन वोटों के समय जाति-आधारित 
राजनीति जोर-शोर से करता है
जाति-आधारित आरक्षण में किसी भी
 बदलाव को राजनीतिक हथकंडा कह देता है 
वो  इसे अगड़ी जातियों की
 कॉन्सपिरेसी तक करार देता है
हमारा मित्र पिछली दोस्ती को अब भूलने लगा है
हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।

‘अगड़ी के मुख पर कालिख लगाओ
सवर्ण को  समाज से दूर भगाओ’
'अगड़ी को दूर भगाओ
सवर्ण से देश बचाओ'
के जैसों नारों पर तालियाँ बजाने लगा है
जब भी गरीबी को आरक्षण का
 आधार बनाने के विषय पर बोला
उसने हमें पिछड़ी और दलित विरोधी तक कह डाला
हम अम्बेडकर को पसन्द करें
 इसे वो ढोंग कहने लगा है
हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।


एक बार जिसने आरक्षण लिया 
बार-बार उसने और उसके परिवार ने ही लिया है
जो पहले  आरक्षण नहीं पाया
 उसका परिवार इस लाभ से अब तक वंचित रहा है
इसलिए कहते हैं आरक्षण उस दलित या पिछड़े को दो
जिसके परिवार को अभी तक नहीं मिला है
इसलिए भी हमने पदोन्नति में आरक्षण का विरोध किया है
इस पर हमारा मित्र हम से नाराज रहने लगा है
और वो हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।

आज तक जात पता कर हमने भारत वर्ष में
कहीं किसी को नमस्कार करते नहीं देखा है
हमने कई गरीब अगड़ी और ब्राह्मणों को
 दलित और पिछड़े अधिकारी के घर नौकरी करते देखा है
हमने गरीब अगड़ी को दलित अधिकारी के सामने
 निस्संकोच सिर नवाते देखा है
इसलिये कहते हैं 
जिस पिछड़ी और दलित ने 
आरक्षण का फायदा लिया है
उनने अपना सामाजिक 
और आर्थिक स्तर सुधार लिया है
इसलिये आरक्षण पदोन्नति में क्यों हो
इसलिए आरक्षण पुश्त-दर-पुश्त क्यों  हो          
यदि हम ऐसा कहें तब से 
हमारा मित्र हम से नफरत करने लगा है
हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कहने लगा है ।

हमारा मित्र हम से अब कट-कट कर रहने लगा है
और हमारा मित्र हमें अब ब्राह्मण कह चिढ़ाने लगा है ।







        अमर नाथ ठाकुर ,मई 6 , 2018 , मेरठ .

Sunday, 6 May 2018

मालूम होता है यह अपना शहर है

मालूम होता है यह अपना ही शहर है

ढेर के  ढेर पड़े कूड़े सड़क किनारे
उस कूड़े में मरे चूहे बहुतेरे 
तिस पर उछल-कूद करते कौए
रेंगते  कीड़े,भिनभिनाती मक्खियाँ और ततैये  
दुर्दान्त दुर्गन्ध का कहर है ।
मालूम होता है यह अपना ही शहर है !

ओवरफ्लो होता सीवर का काला काला पानी
सड़क बीच बिना कवर का मेनहोल विनाशकारी
जगह -जगह दीवाल पर पेशाब करते खड़े लोग
और उससे आती भीषण बदबू का जहर है ।
मालूम होता है यह अपना ही शहर है !


सरसराती सरपट भागती गाड़ियाँ
गड्ढों से  पानी छिटकाती गाड़ियाँ 
दुबकते सहमते चलते लोग
सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क है ।
मालूम होता है यह अपना ही शहर है !

एम्बुलेंस को भी ओवरटेक करती गाड़ियाँ
सायरन बजाती  नेताओं वाली गाड़ियाँ
रौंग साइड से भी तीव्र गति में गुजरती सवारियाँ
चौराहे पर लाल बत्ती पर भी जो ढाए कहर है ।
मालूम होता है यह अपना ही शहर है !

बस , ट्रेन के छत पर सफर करते लोग
ट्रेन की खिड़की से लटकती सायकिलें
बस की खिड़की से लटकते  दूध के कैंटर
ऑटो ड्राइवर के दाहिने भी बैठी सवारियाँ
सड़क बीच भी चढ़ती-उतरती सवारियाँ
यह ऐसा कैसा लॉ एंड ऑर्डर है ?
मालूम होता है यह अपना ही शहर है !

धुआँ छोड़ती गाड़ियाँ बेशुमार
हॉर्न बजाती गाड़ियों की भरमार 
तौर तरीक़े सब तार तार 
सड़क पर प्रदूषण की  यह कैसी  लहर है ?
मालूम होता है यह अपना ही शहर है !


बीच सड़क पर पगुराती गायें
चहलकदमी करती भैंस, बकरे-बकरियाँ 
 ट्रैफिक नियम को धता बताते ।
सड़क किनारे की झुग्गी झोंपड़ियाँ
और शौच करते बच्चों की किलकारियाँ
स्वच्छता अभियान का मज़ाक उड़ाते।
हार छिनने की बातें , 
मोबाइल झपटने की करामातें ,
सड़क पर घटती हर क्षण और हर प्रहर है ।
मालूम होता है यह अपना ही शहर है !

ऑफिस के कोनों में थूकते कर्मचारी
पान और खखार से सने पटे दीवार
टॉयलेट से आते पेशाब की बदबू अपार 
चोक हो रखा पानी से भरा वाश बेसिन
लिफ्ट रोककर मिनटों बतियाते लोग
गेट पर झपकी लेते सेक्युरिटी के जवान
नहीं कहीं कोई कुछ भी जैसे उलट- पलट और गड़बड़ है ।
मालूम होता है यह अपना ही शहर है !

सड़क किनारे हनुमान की मूर्त्तियों के पहरे
बस स्टेशन पर, पार्क में,सड़क किनारे
चादर फैलाए नमाज़ पढ़ते मौलवी बहुतेरे
मन्दिर में आरती , मस्ज़िद में कान फाड़ू अज़ान
भीड़ भरे बाज़ार में भी लुटते लोक-जहान  
अपहरण  और  रेप  की    घटना आम  ।     
गोली चले,बम फूटे फिर भी पब्लिक बेखबर है ।
मालूम होता है यह अपना ही शहर है !

जिस शहर में भी जाता हूँ कठिन नहीं गुज़र बसर है ।
शहर की वही दिनचर्या है शहर का वही जीवन चक्र है ।
और मालूम होता है हर शहर ही अपना शहर है !

अमर नाथ ठाकुर , 6 मई , 2018 , मेरठ ।


























Thursday, 3 May 2018

हम परमानेन्ट मुर्गा होते हैं

हम परमानेन्ट मुर्गा होते हैं

जब भी लेट उठा और लेट से स्कूल आया
टीचर ने तब उकड़ूँ बैठाया
दोनों हाथों को दोनों टांगों के पीछे से फँसवाकर
और कान पकड़ कर मुर्गा बनवाया ।
शरीर में हलचल होते ही छड़ी की मार भी खाया ।
मुर्गा बनने के डर से समय पर स्कूल जाता रहा
समय पर होमवर्क करता रहा
नाखून की सफाई करता औऱ साफ कपड़े पहनता रहा
पहाड़े और कविताएँ याद करता रहा
मुर्गा बनने के डर से एक अनुशासित छात्र बना
और तब आज इस सरकारी नौकरी के पात्र बना ।

सरकारी नौकरी में यहाँ कोई टाँग खींचता है
और प्रोमोसन भी रुक जाता है
कोई कपड़े खींचता है
और ट्रांसफर भी रुक जाता है
कोई आंखों में पिन चुभोता है
और बॉस का कान भी भर आता है
कोई सीने पर डंडा चलाता है
और बॉस की फटकार भी आ जाती है
कोई गर्दन मरोड़ता है
और बॉस का मेमो भी मिल जाता है
 टारगेट पूरा करने के लिए बॉस का शब्द-वाण  दिल में   चुभता  है
सबऑर्डिनेट की मेडिकल बिल, एडवांस नहीं मिलने पर भड़ास सुनायी देती है
हमारी छुट्टी तो अक्सर रद्द हो जाती है
किन्तु हमारे अधीनस्थ की छुट्टी की जिद्द रह जाती है
बॉस और अधीनस्थ  के पत्थरों  के बीच हम पिसते रहते हैं ।
बाड़ में फड़फड़ाते मुर्गे की तरह
हलाल होते मुर्गे की तरह
ऑफिस रूपी जेल में हम चीखते रह जाते हैं ।
फाइलों के नोट शीट में एक - एक शब्द , कोमा
फुल स्टॉप की अशुद्धियां ठीक करते हुए
एक-एक कर दाना चुगते हुए
गुटरगूँ करते भविष्य- हीन मुर्गे की भाँति
 जीना यहां -  मरना यहां -  इसके सिवा जाना कहां
हम सिर्फ गुनगुनाते भर रह जाते हैं ।

यहाँ हम क्या कम मुर्गा होते हैं !
मुर्गा छुरी से जब हलाल होता है
खून से लथपथ हो जाता है ,
यहाँ सी बी आई, विजिलेंस,सी वी सी के पास की
 शिकायत और विभिन्न जाँच की छूरियाँ हमारे सीने में
भी सदा घुपती रहती है
रक्त-रंजित लथपथ हमारे  विचार हो जाते हैं
 हमारे प्राणों की हुक - हुकी निकलती होती है
भय से  होंठ काँपते रहते हैं
कलेजा  धक-धक करता रहता है
छटपटाहट में हम कहाँ चैन से सो पाते हैं
बुरी खबरों की संशय में हमारी नौकरी के दिन बीत रहे होते हैं।

मुर्गा तो एक ही दिन कटता है
पर मुक्त हो जाता है,
हम तो यहां रोज कटते हैं
यहाँ बार-बार कट-कट कर जीते हैं
यहाँ तो हम कई गुना मुर्गा होते हैं
हम परमानेंट अमृतपान किये हुए मुर्गा होते हैं ।


अमर नाथ ठाकुर , 29 अप्रैल , 2018, मेरठ।







Friday, 19 January 2018

मित्रता का बाज़ार


1.
कितने दिन बाद मिले
महीनों वर्षों बाद मिले
शुरू हो गए गिले-शिकबे
उन पुराने दिनों की बातें हुईं
जब उन्होंने फरमाया था
जिस पर मेरा मन डगमगाया था
और  मैं ने नहीं कुछ कर दिखाया था,
तिस पर उनका मन भी नहीं हरषाया था ।
आज उस दिन को बार-बार याद किया
कई क्षण उस पर बरबाद किया
फिर इस पर मुश्किल से बात बनी
उस दिन और उस घटना को स्मृति-पटल से बाद किया ।


बातों का  सिलसिला आगे बढ़ा
चाय की चुस्कियों का जोर चला,
पकौड़े भी बीच-बीच में चल रहे थे
और हम दोनों यादों में तैर रहे थे,
कभी डूब भी रहे थे कभी उपला भी रहे थे,
तू-तू, मैं-मैं तथा नोंक-झोंक के पुराने
 खरोंच पर मरहम पट्टी कर रहे थे,
कुछ विस्मृत पल को खंगाल भी रहे थे ।

हाँ, उस दिन तुमने अपनी हठधर्मी
दिखाई थी
मित्र ने कहा, बात नहीं मेरी तू ने मानी थी
वह तुम्हारा निरा हठ था
तुम्हारी मनमानी थी,
मेरी बात काट कर बढ़ना
मेरा अपमान था
अपनों का यह तिरस्कार था
और रक्त-पान समान था
इसलिये फेवर्ड फ्रेंड लिस्ट से तूुम्हें
तुरन्त निकाल बाहर किया था
तुझे हमने सदा के लिये अनजान किया था
और फिर अन्य कृत्यों द्वारा लाँछना भी प्रदान किया था ।

2.
आजकल ‘मित्रता’ में पहले कुछ लिया जाता है,
और फिर हिसाब से लौटाया जाता है ।
लेन-देन आधारित जब हो मित्रता
तो क्या कम है बदले की शत्रुता ।

शत्रुता में शत्रु को कुछ न कुछ दिया जाता है,
ज्यादे लौटाने का शत्रुओं का भी एक धर्म होता है,
तभी तो ईंट का जबाव पत्थर होता है ।
हिंसा का जबाव प्रति हिंसा से
ईर्ष्या-द्वेष का कटुता से दिया जाता है ।
शत्रु के साथ जो किया जाता है
वह तो आशानुरूप और सम्भावित होता है।

‘मित्र’ के साथ सब प्रतिकूल होता है
और सब अप्रत्याशित होता है ।
यहाँ मुस्कान की ओट होती  है
और हृदय में शूल चुभाया जाता है,
यहाँ अपनों की चोट होती है
और सम्बन्धों में खोट ही खोट होती है ।

3.
जब लेन-देन ही आधार हो,
और सम्बन्ध एक व्यापार हो,
क्या जरूरत है ऐसी छद्म मित्रता की !
क्यों न पूछ हो सिर्फ ‘साफ’ शत्रुता की !
क्यों न खुला एक बाजार हो,
जहाँ ‘शत्रुता’ और ‘मित्रता’ का
क्रय-विक्रय वाला तुला साकार हो
और `बदले` के बटखरे की भरमार हो।

सम्बन्धों के तराज़ू पर ‘मित्रता’ और ‘शत्रुता’
का जब मोल-तोल होगा
इस आधुनिक जगत में निष्कपट ‘शत्रुता’ के
पलड़ा का ही भारी बोल होगा !

अमर नाथ ठाकुर , 23 नवम्बर , 2017, मेरठ ।



Wednesday, 9 August 2017

वह और मैं

वह और मैं

1.

मैं भी कल
वह भी कल

फर्क है कि मैं बीता हुआ हूँ
और वह आने वाला है ।
मैं शाम हूँ तो वह सबेरा है
मैं रात की अँधियारी तो वह
दिन का ऊजाला है
मैं बुझा हुआ राख हूँ
तो वह धधकता हुआ शोला है ।

2.

कितनी बार हँस -  हँस कर मैं रो चुका हूँ
कितनी बार खट्टा – मीठा चख चुका हूँ ,
मैं सोकर जाग चुका हूँ
मैं जागकर सो चुका हूँ ।
मैं तो वर्षों से  थपेड़े खाकर
कब से दुःख-सुख निगलने लगा हूँ ।
समय के चक्र पे सवार ऊपर – नीचे
आगे - पीछे हो चुका  हूँ ।

उसका तो अभी हँसना शुरू हुआ है 
रोने का उसे पता नहीं हुआ है ।
वह अभी - अभी तो आया है 
अभी कहाँ समझने लगा है ।


3.

मैं पसीना बहा चुका हूँ
मैं रक्त में नहा चुका हूँ
अब आकर यह दिन कमाया है 
जब हर क्षण को सजाया है ।

मुझे हर मौसम जाना जाना - सा लगता है
मुझे हर जगह पहचाना-सा लगता है
जानी पहचानी - सी लगती है गलियाँ
जानी पहचानी - सी लगती है बोलियाँ

वही रोज़ निकलने वाला राह दिखाने वाला
होता है सूरज अकेला ,
रोज़ वही राह रोकने वाला वही
उमड़ते-घुमड़ते  बादलों का रेला ।
वही असीमित गिनती वाले आकाश के तारे ,
वही हँसी बिखेरता इठलाता चाँद मामा हमारे ।

पों-पों करती गाड़ियाँ
चहचहाती चिड़ियाँ ,
हरे-भरे पेड़
वही खेत वही मेड़ ,
जानी पहचानी - सी रातें
वही दुहराती-सी बातें ।

कभी अकेले रोया
कभी अकेले हँसा
कभी मिलकर रोया
कभी मिलकर हँसा ।
अब जब सब समझ चुका हूँ
सारे के सारे बाल तभी तो पका चुका हूँ,
अब क्या हँसना
अब क्या रोना ,
क्या खुशी क्या गम
नहीं कोई अब सम-विषम ।

वह अभी-अभी तो आया है
अभी ही क्या समझने लगा है ।
अभी वह हँसने पर ही तो शुरू हुआ है
अभी ही क्यों उसका रोने का क्रम आने को हुआ है !

अमर नाथ ठाकुर , 6 अगस्त , 2017 , मेरठ ।




Saturday, 1 July 2017

मेरे कुछ दोस्त मेरे रिलेटिव लगने लगे हैं


क्यों मेरे कुछ दोस्त अब मेरे रिलेटिव लगने लगे हैं ?
वो मेरी सैलरी पूछने लगे हैं
बाहरी इनकम का अनुमान लगाने लगे हैं
किस हिल स्टेशन पर घूमने गए
किस स्टार होटल में रुके पूछने लगे हैं
मेरे कुछ दोस्त अब मेरे रिलेटिव होने लगे हैं .

वो मेरे कपड़े का ब्रांड और दाम पूछने लगे हैं
कितने घर और किस लोकेलिटी में खरीदा पूछने लगे हैं
वो मेरे हर उत्तर की जांच भी करने लगे हैं
मेरे कुछ दोस्त अब मेरे रिलेटिव होने लगे हैं .

विमुद्रीकरण के समय कितना ठिकाने लगाया पूछने लगे हैं
मेरे उत्तर पर कुटिल मुस्कान और शंका की दृष्टि से ताकने लगे हैं
मेरे कुछ दोस्त अब मेरे रिलेटिव होने लगे हैं .

मेरी ईमानदारी और सत्य-निष्ठा पर सवाल दागने लगे हैं
मेरे हर उत्तर को विजिलेंस एंगल से परखने लगे हैं
मेरे कुछ दोस्त अब मेरे रिलेटिव होने लगे हैं .

फिक्स्ड लाइन में कितनी भी घंटी बजे नहीं उठाते
क्योंकि अब वो मेरा नंबर पढ़ने लगे हैं 
गलती से उठा लें तो हेलो-हेलो कह कर रखने लगे हैं 
मोबाइल पर तो ‘आउट ऑफ स्टेशन हूँ’ कहकर टरकाने लगे हैं
मेरे कुछ दोस्त मेरे रिलेटिव होने लगे हैं .

हँस कर भी कुछ पूछ लिया तो बुरा मानने लगे हैं
रो कर कराह कर पूछूँ तो नाटक समझने लगे हैं
मेरे कुछ दोस्त मेरे रिलेटिव होने लगे हैं .

कहाँ गए वो दिन जब वो 
मेरे बिछौने पर कूद जाते थे
बिना जूता खोले लेट जाते थे
पसीना बिना पोंछे भी गले लग जाते थे
थप्पड़ लगा दो तो भी हँस देते थे
दूसरे थप्पड़ के लिए सर बढ़ा देते थे
हम भूखे होते थे तो भी प्लेट से 
समोसा झपट कर भाग जाते थे
साले हमेशा भुक्कड़ बनकर आता है 
हम भी कह हँस जाते थे
वो ठहाके लगा कर हँसते थे 
कहते थे , और मँगा और खाएँगे
और हम भी हँसकर और मँगा लेते थे
फिर प्यार से बाँट-बाँट कर खाते थे
फिर दुकानदार को पैसे दिलाने के लिए
हँगामा भी खड़ा कर देते  थे .
लेकिन होस्टल आकर हिसाब जब वो करने लगते थे 
तो फिर हम उसे थप्पड़ लगा देते थे –
साले रिलेटिव समझने लगा है !
कहकर हेय-दृष्टि से उसे देखते  थे 
और माँफी माँग कंधे पर हाथ रख वो फिर हँसने लगते थे .



मुझे याद है एक बार जब मैं रोया था
ले जाकर उसने मुझे भर पेट खिलाया था
खुद नीचे लेटकर मुझे अपने बेड पर सुलाया था
क्योंकि वह मेरा दोस्त था 
और मैं उसका नहीं पराया था .

अब वो दिन याद आने लगे हैं
जब कि कुछ दोस्त भी रिलेटिव लगने लगे हैं
न हाल-चाल,न चाय,समय नहीं है
कहकर वो कदम बढ़ा लेने लगे हैं
ईर्ष्या-द्वेष और दुश्मनी का भी भाव सँजोने लगे हैं 
सामने राम-राम बोलेंऔर बगल में छूरी रखने लगे हैं 
मेरे कुछ दोस्त मेरे रिलेटिव लगने लगे हैं .

सामने से भी गुजरकर अब नज़र फेरने लगे हैं
रास्ते बदलने लगे हैं , क्योंकि विचार बदलने लगे हैं
इसलिए कुछ दोस्त  अब रिलेटिव लगने लगे हैं .


अमर नाथ ठाकुर , ३० जून , २०१७ , मेरठ .





कॉमन सेंस और सिविक सेंस

  कॉमन सेंस और सिविक सेंस ‘ कॉमन सेंस’ (सामान्य समझ) और ‘सिविक सेंस’ (नागरिक बोध या सामाजिक बोध)—ये दोनों शब्द जितने सहज हैं, आज के सामाजिक ...