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Thursday, 3 May 2018

हम परमानेन्ट मुर्गा होते हैं

हम परमानेन्ट मुर्गा होते हैं

जब भी लेट उठा और लेट से स्कूल आया
टीचर ने तब उकड़ूँ बैठाया
दोनों हाथों को दोनों टांगों के पीछे से फँसवाकर
और कान पकड़ कर मुर्गा बनवाया ।
शरीर में हलचल होते ही छड़ी की मार भी खाया ।
मुर्गा बनने के डर से समय पर स्कूल जाता रहा
समय पर होमवर्क करता रहा
नाखून की सफाई करता औऱ साफ कपड़े पहनता रहा
पहाड़े और कविताएँ याद करता रहा
मुर्गा बनने के डर से एक अनुशासित छात्र बना
और तब आज इस सरकारी नौकरी के पात्र बना ।

सरकारी नौकरी में यहाँ कोई टाँग खींचता है
और प्रोमोसन भी रुक जाता है
कोई कपड़े खींचता है
और ट्रांसफर भी रुक जाता है
कोई आंखों में पिन चुभोता है
और बॉस का कान भी भर आता है
कोई सीने पर डंडा चलाता है
और बॉस की फटकार भी आ जाती है
कोई गर्दन मरोड़ता है
और बॉस का मेमो भी मिल जाता है
 टारगेट पूरा करने के लिए बॉस का शब्द-वाण  दिल में   चुभता  है
सबऑर्डिनेट की मेडिकल बिल, एडवांस नहीं मिलने पर भड़ास सुनायी देती है
हमारी छुट्टी तो अक्सर रद्द हो जाती है
किन्तु हमारे अधीनस्थ की छुट्टी की जिद्द रह जाती है
बॉस और अधीनस्थ  के पत्थरों  के बीच हम पिसते रहते हैं ।
बाड़ में फड़फड़ाते मुर्गे की तरह
हलाल होते मुर्गे की तरह
ऑफिस रूपी जेल में हम चीखते रह जाते हैं ।
फाइलों के नोट शीट में एक - एक शब्द , कोमा
फुल स्टॉप की अशुद्धियां ठीक करते हुए
एक-एक कर दाना चुगते हुए
गुटरगूँ करते भविष्य- हीन मुर्गे की भाँति
 जीना यहां -  मरना यहां -  इसके सिवा जाना कहां
हम सिर्फ गुनगुनाते भर रह जाते हैं ।

यहाँ हम क्या कम मुर्गा होते हैं !
मुर्गा छुरी से जब हलाल होता है
खून से लथपथ हो जाता है ,
यहाँ सी बी आई, विजिलेंस,सी वी सी के पास की
 शिकायत और विभिन्न जाँच की छूरियाँ हमारे सीने में
भी सदा घुपती रहती है
रक्त-रंजित लथपथ हमारे  विचार हो जाते हैं
 हमारे प्राणों की हुक - हुकी निकलती होती है
भय से  होंठ काँपते रहते हैं
कलेजा  धक-धक करता रहता है
छटपटाहट में हम कहाँ चैन से सो पाते हैं
बुरी खबरों की संशय में हमारी नौकरी के दिन बीत रहे होते हैं।

मुर्गा तो एक ही दिन कटता है
पर मुक्त हो जाता है,
हम तो यहां रोज कटते हैं
यहाँ बार-बार कट-कट कर जीते हैं
यहाँ तो हम कई गुना मुर्गा होते हैं
हम परमानेंट अमृतपान किये हुए मुर्गा होते हैं ।


अमर नाथ ठाकुर , 29 अप्रैल , 2018, मेरठ।







Friday, 19 January 2018

मित्रता का बाज़ार


1.
कितने दिन बाद मिले
महीनों वर्षों बाद मिले
शुरू हो गए गिले-शिकबे
उन पुराने दिनों की बातें हुईं
जब उन्होंने फरमाया था
जिस पर मेरा मन डगमगाया था
और  मैं ने नहीं कुछ कर दिखाया था,
तिस पर उनका मन भी नहीं हरषाया था ।
आज उस दिन को बार-बार याद किया
कई क्षण उस पर बरबाद किया
फिर इस पर मुश्किल से बात बनी
उस दिन और उस घटना को स्मृति-पटल से बाद किया ।


बातों का  सिलसिला आगे बढ़ा
चाय की चुस्कियों का जोर चला,
पकौड़े भी बीच-बीच में चल रहे थे
और हम दोनों यादों में तैर रहे थे,
कभी डूब भी रहे थे कभी उपला भी रहे थे,
तू-तू, मैं-मैं तथा नोंक-झोंक के पुराने
 खरोंच पर मरहम पट्टी कर रहे थे,
कुछ विस्मृत पल को खंगाल भी रहे थे ।

हाँ, उस दिन तुमने अपनी हठधर्मी
दिखाई थी
मित्र ने कहा, बात नहीं मेरी तू ने मानी थी
वह तुम्हारा निरा हठ था
तुम्हारी मनमानी थी,
मेरी बात काट कर बढ़ना
मेरा अपमान था
अपनों का यह तिरस्कार था
और रक्त-पान समान था
इसलिये फेवर्ड फ्रेंड लिस्ट से तूुम्हें
तुरन्त निकाल बाहर किया था
तुझे हमने सदा के लिये अनजान किया था
और फिर अन्य कृत्यों द्वारा लाँछना भी प्रदान किया था ।

2.
आजकल ‘मित्रता’ में पहले कुछ लिया जाता है,
और फिर हिसाब से लौटाया जाता है ।
लेन-देन आधारित जब हो मित्रता
तो क्या कम है बदले की शत्रुता ।

शत्रुता में शत्रु को कुछ न कुछ दिया जाता है,
ज्यादे लौटाने का शत्रुओं का भी एक धर्म होता है,
तभी तो ईंट का जबाव पत्थर होता है ।
हिंसा का जबाव प्रति हिंसा से
ईर्ष्या-द्वेष का कटुता से दिया जाता है ।
शत्रु के साथ जो किया जाता है
वह तो आशानुरूप और सम्भावित होता है।

‘मित्र’ के साथ सब प्रतिकूल होता है
और सब अप्रत्याशित होता है ।
यहाँ मुस्कान की ओट होती  है
और हृदय में शूल चुभाया जाता है,
यहाँ अपनों की चोट होती है
और सम्बन्धों में खोट ही खोट होती है ।

3.
जब लेन-देन ही आधार हो,
और सम्बन्ध एक व्यापार हो,
क्या जरूरत है ऐसी छद्म मित्रता की !
क्यों न पूछ हो सिर्फ ‘साफ’ शत्रुता की !
क्यों न खुला एक बाजार हो,
जहाँ ‘शत्रुता’ और ‘मित्रता’ का
क्रय-विक्रय वाला तुला साकार हो
और `बदले` के बटखरे की भरमार हो।

सम्बन्धों के तराज़ू पर ‘मित्रता’ और ‘शत्रुता’
का जब मोल-तोल होगा
इस आधुनिक जगत में निष्कपट ‘शत्रुता’ के
पलड़ा का ही भारी बोल होगा !

अमर नाथ ठाकुर , 23 नवम्बर , 2017, मेरठ ।



Wednesday, 9 August 2017

वह और मैं

वह और मैं

1.

मैं भी कल
वह भी कल

फर्क है कि मैं बीता हुआ हूँ
और वह आने वाला है ।
मैं शाम हूँ तो वह सबेरा है
मैं रात की अँधियारी तो वह
दिन का ऊजाला है
मैं बुझा हुआ राख हूँ
तो वह धधकता हुआ शोला है ।

2.

कितनी बार हँस -  हँस कर मैं रो चुका हूँ
कितनी बार खट्टा – मीठा चख चुका हूँ ,
मैं सोकर जाग चुका हूँ
मैं जागकर सो चुका हूँ ।
मैं तो वर्षों से  थपेड़े खाकर
कब से दुःख-सुख निगलने लगा हूँ ।
समय के चक्र पे सवार ऊपर – नीचे
आगे - पीछे हो चुका  हूँ ।

उसका तो अभी हँसना शुरू हुआ है 
रोने का उसे पता नहीं हुआ है ।
वह अभी - अभी तो आया है 
अभी कहाँ समझने लगा है ।


3.

मैं पसीना बहा चुका हूँ
मैं रक्त में नहा चुका हूँ
अब आकर यह दिन कमाया है 
जब हर क्षण को सजाया है ।

मुझे हर मौसम जाना जाना - सा लगता है
मुझे हर जगह पहचाना-सा लगता है
जानी पहचानी - सी लगती है गलियाँ
जानी पहचानी - सी लगती है बोलियाँ

वही रोज़ निकलने वाला राह दिखाने वाला
होता है सूरज अकेला ,
रोज़ वही राह रोकने वाला वही
उमड़ते-घुमड़ते  बादलों का रेला ।
वही असीमित गिनती वाले आकाश के तारे ,
वही हँसी बिखेरता इठलाता चाँद मामा हमारे ।

पों-पों करती गाड़ियाँ
चहचहाती चिड़ियाँ ,
हरे-भरे पेड़
वही खेत वही मेड़ ,
जानी पहचानी - सी रातें
वही दुहराती-सी बातें ।

कभी अकेले रोया
कभी अकेले हँसा
कभी मिलकर रोया
कभी मिलकर हँसा ।
अब जब सब समझ चुका हूँ
सारे के सारे बाल तभी तो पका चुका हूँ,
अब क्या हँसना
अब क्या रोना ,
क्या खुशी क्या गम
नहीं कोई अब सम-विषम ।

वह अभी-अभी तो आया है
अभी ही क्या समझने लगा है ।
अभी वह हँसने पर ही तो शुरू हुआ है
अभी ही क्यों उसका रोने का क्रम आने को हुआ है !

अमर नाथ ठाकुर , 6 अगस्त , 2017 , मेरठ ।




Saturday, 1 July 2017

मेरे कुछ दोस्त मेरे रिलेटिव लगने लगे हैं


क्यों मेरे कुछ दोस्त अब मेरे रिलेटिव लगने लगे हैं ?
वो मेरी सैलरी पूछने लगे हैं
बाहरी इनकम का अनुमान लगाने लगे हैं
किस हिल स्टेशन पर घूमने गए
किस स्टार होटल में रुके पूछने लगे हैं
मेरे कुछ दोस्त अब मेरे रिलेटिव होने लगे हैं .

वो मेरे कपड़े का ब्रांड और दाम पूछने लगे हैं
कितने घर और किस लोकेलिटी में खरीदा पूछने लगे हैं
वो मेरे हर उत्तर की जांच भी करने लगे हैं
मेरे कुछ दोस्त अब मेरे रिलेटिव होने लगे हैं .

विमुद्रीकरण के समय कितना ठिकाने लगाया पूछने लगे हैं
मेरे उत्तर पर कुटिल मुस्कान और शंका की दृष्टि से ताकने लगे हैं
मेरे कुछ दोस्त अब मेरे रिलेटिव होने लगे हैं .

मेरी ईमानदारी और सत्य-निष्ठा पर सवाल दागने लगे हैं
मेरे हर उत्तर को विजिलेंस एंगल से परखने लगे हैं
मेरे कुछ दोस्त अब मेरे रिलेटिव होने लगे हैं .

फिक्स्ड लाइन में कितनी भी घंटी बजे नहीं उठाते
क्योंकि अब वो मेरा नंबर पढ़ने लगे हैं 
गलती से उठा लें तो हेलो-हेलो कह कर रखने लगे हैं 
मोबाइल पर तो ‘आउट ऑफ स्टेशन हूँ’ कहकर टरकाने लगे हैं
मेरे कुछ दोस्त मेरे रिलेटिव होने लगे हैं .

हँस कर भी कुछ पूछ लिया तो बुरा मानने लगे हैं
रो कर कराह कर पूछूँ तो नाटक समझने लगे हैं
मेरे कुछ दोस्त मेरे रिलेटिव होने लगे हैं .

कहाँ गए वो दिन जब वो 
मेरे बिछौने पर कूद जाते थे
बिना जूता खोले लेट जाते थे
पसीना बिना पोंछे भी गले लग जाते थे
थप्पड़ लगा दो तो भी हँस देते थे
दूसरे थप्पड़ के लिए सर बढ़ा देते थे
हम भूखे होते थे तो भी प्लेट से 
समोसा झपट कर भाग जाते थे
साले हमेशा भुक्कड़ बनकर आता है 
हम भी कह हँस जाते थे
वो ठहाके लगा कर हँसते थे 
कहते थे , और मँगा और खाएँगे
और हम भी हँसकर और मँगा लेते थे
फिर प्यार से बाँट-बाँट कर खाते थे
फिर दुकानदार को पैसे दिलाने के लिए
हँगामा भी खड़ा कर देते  थे .
लेकिन होस्टल आकर हिसाब जब वो करने लगते थे 
तो फिर हम उसे थप्पड़ लगा देते थे –
साले रिलेटिव समझने लगा है !
कहकर हेय-दृष्टि से उसे देखते  थे 
और माँफी माँग कंधे पर हाथ रख वो फिर हँसने लगते थे .



मुझे याद है एक बार जब मैं रोया था
ले जाकर उसने मुझे भर पेट खिलाया था
खुद नीचे लेटकर मुझे अपने बेड पर सुलाया था
क्योंकि वह मेरा दोस्त था 
और मैं उसका नहीं पराया था .

अब वो दिन याद आने लगे हैं
जब कि कुछ दोस्त भी रिलेटिव लगने लगे हैं
न हाल-चाल,न चाय,समय नहीं है
कहकर वो कदम बढ़ा लेने लगे हैं
ईर्ष्या-द्वेष और दुश्मनी का भी भाव सँजोने लगे हैं 
सामने राम-राम बोलेंऔर बगल में छूरी रखने लगे हैं 
मेरे कुछ दोस्त मेरे रिलेटिव लगने लगे हैं .

सामने से भी गुजरकर अब नज़र फेरने लगे हैं
रास्ते बदलने लगे हैं , क्योंकि विचार बदलने लगे हैं
इसलिए कुछ दोस्त  अब रिलेटिव लगने लगे हैं .


अमर नाथ ठाकुर , ३० जून , २०१७ , मेरठ .





Monday, 15 May 2017

मेरा अंतःकरण मेरे ईश्वर



मेरा अंतःकरण,

मेरे ईश्वर !

 

​हम बात काट कर उलझा आते हैं,

पर यह सब सुलझा आता है।

हम खत लिख मना कर आते हैं,

यह भाग-भाग कर हाँ कह आता है।

हम शत्रुता का दम्भ भर हुंकारते हैं,

यह सुलह का संदेशा पहुँचा आता है।

​हम जब दो कदम बढ़ाते हैं,

यह मीलों आगे चल चुका होता है।

हम जब-जब कदम खींच लेते हैं,

यह वहाँ अटूट खम्भा गाड़ आता है।

हम जब क्रोधित हो आँखें लाल करते हैं,

यह जार-जार रो, आँसू बहा पछताता है।

​हम जब दौड़ते-दौड़ते राह मापते हैं,

यह आगे-आगे राह दिखाता चलता है।

हम जब घुप अँधेरे में भटकने लगते हैं,

यह हाथ पकड़ हमें आगे सरकाता है।

हम कभी खड़े-खड़े समर्पण कर आते हैं,

पर यह बार-बार ढाढ़स दे बहलाता है।

हम चौराहे पर किंकर्तव्यविमूढ़ भटकते हैं,

अंतःकरण प्रकाश-पुंज बन राह दिखाता है।

​हम जब शक्तिहीन और साधनहीन हो जाते हैं,

तब यह अंतःकरण पाथेय बन हमें जगाता है।

हम सताते हैं, गालियाँ बकते हैं, नफ़रत करते हैं,

पर यह माफी माँग सब बराबर कर आता है।

हम सदैव उसे अनसुना और अनदेखा करते हैं,

पर यह सतत हमें सुनता और देखता रहता है।

​अन्तहीन अतल सागर, लहरों के थपेड़ों में हम उपलाते रहते हैं,

वह मेरा सहभागी, पतवार थाम मेरी नैया खेता रहता है।

​मेरा अंतःकरण !

मेरे ईश्वर !




अमर नाथ ठाकुर , 14 मई , 2017, मेरठ ।



Sunday, 5 February 2017

बदल गया है सब कुछ

बदल गया है सब कुछ

यहाँ एक कच्ची  पगडण्डी गुजरती थी
जहाँ एक चौड़ी- सी पक्की  काली सड़क है ।
जहाँ साइकिल और बैलगाड़ी मटकती थी
वहाँ अब मोटरसाइकिल और कार की तड़क-भड़क  है ।
यहाँ फूस और मिट्टी का एक घर होता था
अब ईंट और एसबेस्टस का मकान है
खुली खिड़की और बिना दरवाजे के घर के बदले
चहारदीवारी , ग्रिल  और परदे से बन्द जहान है ।
धोती और लंगोट धारी बैठ बतियाते थे चटायी पर
 यहाँ विशाल आम  वृक्ष की हरी  डाली के  नीचे,
अब कुछ पतलून और टी शर्ट धारी होते हैं
 ठूठ आम के पेड़ से दूर कुर्सी में टेबुल के पीछे ।

जाड़े में फदी भैया के दालान पर घुरा लगता था
बैठने के लिये पुआल के बीड़े का घेरा लगता था
टोल भर के लोग जमा होकर हाथ-पाँव सेकते थे,
पास में कुत्ते भौंकते थे, घोड़े हिनहिनाते थे,
बकरी मिमियाती थी , गाय-बैल डकारते थे ।

गाँव भर के हर घर- परिवार की बात होती थी
जात-पात की भी बात  होती थी
 किन्तु बैठने की सबकी एक ही खाट होती थी ।
रेडियो पर गौर से  बी बी सी समाचार सुनते थे
बड़े बुजुर्गों के बीच कभी कोई पुराना अखबार पढ़ते थे ।
सोवियत रूस से दोस्ती पर गर्व करते थे
उस समय अमेरिका से नफरत करते थे
 कश्मीर पर सबका एक मत होता था
पाकिस्तान से लड़ाई की बात पर खून खौल जाता था ।
गिले-शिकवे और ईर्ष्या-द्वेष चुटकी में टाल देते थे
हँसी-ठिठोले में सबका हाल चाल ले लेते थे ।

अब घर-घर में गैस और इलेक्ट्रिक हीटर है
ठंढी हवा को रोकने के लिये शटर है ,
सब एक-दूसरे से अलग-अलग हट-हट कर है ,
घर-घर में टी वी है डिश कनेक्शन है
अब सीरियल और फिल्म देखने का चलन है  ।
लोग कहाँ मिलते हैं भाईचारा तर-बतर है
बुढ़िया- बूढ़े खांस रहे हैं परिवार तितर-बितर है ।

पहले गुलटनमा , टुनटुन , बबरा, हुकना , ठकना और चुकना था
जिसके साथ उठना बैठना खेलना और कूदना था ।
अब राजू , पीटर , सोनू, मोनू , पिंकू , पप्पू और गोल्डी जैसे बच्चे हैं
जहाँ कॉफी ड्रिंक्स आइसक्रीम चिप्स और गोल गप्पे के चर्चे हैं ।
घुच्ची की बात होती थी ,कौड़ी , लेड बॉल और निशाने की बात होती थी
पिल्लो डण्डा पीटो गुड्डी कबड्डी पच्चीसी ताश और कुश्ती की बात होती थी
अब क्रिकेट गोल्फ टेनिस और शूटिंग की बात होती है
बात-बात पर गोली बम पिस्तौल चलते हैं और शराब  साथ देती है ।

सुबह-शाम नौजवानों के अड्डे जमते थे और मिलते थे
सब हँसते थे और  दिल खोल कर ठहाके लगाते थे
अब जोक मेसेज करते  हैं मोबाइल टेलीफोन पर  बात करते हैं
अब ह्वाट्सएप में गड़े रहते  हैं फेस बुक पर ऑनलाइन दीखते हैं


बदल गया है सब कुछ
लुट गया है सब कुछ ।
अब वो संवेदना नहीं
अब वो चेतना नहीं ।
मिलकर चलने की बात होती थी
अब बँटकर बढ़ने की बात होती है ।
गाँव शहर में मिल रहे हैं
वो लहर हमें लील रहे हैं ।

अमर नाथ ठाकुर , 5 फरवरी , 2017 , मेरठ ।


Saturday, 4 February 2017

जिन्दगी में कुछ नहीं कर सकते

जिन्दगी में कुछ नहीं कर सकते

जब नहीं बोल सकते थे
जब नहीं चल सकते  थे
जब नहीं सोच सकते  थे
क्योंकि तब तो बच्चे थे ।
तब जुबान कड़वी नहीं थी
शरीर में दम नहीं था
मन किन्तु कितना सच्चा था ।
और सब दिखता अच्छा था ।

फिर जब बोलने लगे तो गलत ही बोलते थे
फिर जब चलने लगे तो गलत रास्ते ही चलते थे
फिर जब सोचने लगे तो  फिर गलत ही सोचते थे
क्योंकि तब तक जवान जो हो गये  थे ।
मन ,शरीर और सोच लहूलुहान हो गये थे ।

अब फिर नहीं बोल सकते क्योंकि जबान लड़खड़ाती है
चल नहीं सकते  क्योंकि कदम लड़खड़ाते हैं
अब सोच भी  नहीं सकते क्योंकि सोच गड़बड़ाते हैं
क्योंकि बूढ़ा जो हो चले हैं ।

पूरी जिन्दगी न बोल सकते
पूरी जिन्दगी न चल सकते
पूरी जिन्दगी न सोच सकते ,
तो फिर क्या यही है जिन्दगी ?

यही जिन्दगी है जब नहीं कुछ कर सकते ।

अमर नाथ ठाकुर , 4 फरवरी , 2017 , मेरठ ।


कॉमन सेंस और सिविक सेंस

  कॉमन सेंस और सिविक सेंस ‘ कॉमन सेंस’ (सामान्य समझ) और ‘सिविक सेंस’ (नागरिक बोध या सामाजिक बोध)—ये दोनों शब्द जितने सहज हैं, आज के सामाजिक ...