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Saturday, 21 June 2014

मस्ती में



वह पतलून नहीं पहनता
गरदन से ही फटी लंगोट लटकती हुई
कुर्त्ता उसे पसंद नहीं
गंजी की जरूरत नहीं
वक्षस्थल तक दाढ़ी लहरती हुई
बिखरे बाल कंधे को चूमती हुई
मूंछें मुँह को ढंकती हुई
नसें खिंचीं हुई
हाड़ उभरी हुई
ललाट पर लेप चन्दन-विभूत का
टीका सिंदूर का
मुख पर गहरी मुस्कान है
कमण्डल में जैसे सारा जहान है ।
मोह-माया-ममता से दूर
राजनीति से बेखबर
व्यापार की चाह नहीं
राग-ईर्ष्या-द्वेष का न कोई चक्कर
वह साधू भिखारी है
किन्तु दिल उसका बखारी है
जो भरा है करूणा के आभूषण से
असीमित आनंद के ज्योति पुंज से
उसके खजाने से नादान
लूटेरे बिलकुल अनजान ।
वह भटकता है सुनसान जंगल में
रात के अंधेरे या दिन के मंगल में
क्यों न हो चोर-उचक्कों की माँद में
न किसी आतंकी  की साँठ-गांठ में
मांगता है चार दाने चावल के
भगवान के नाम पर
पुण्य के दान पर
जाति-धर्म के परिचय से अनजान बस्ती में
बेफिक्र , निर्भीक , बेखौफ मस्ती में ।


अमर नाथ ठाकुर , 20 जून , 2014 , कोलकाता ।  



Wednesday, 11 June 2014

एक दिन चला जाऊंगा : आत्मा की आवाज




खूब तुम मुझे गालियां दो
खूब तुम मुझे दुत्कारो
और खूब तुम मुझे उलाहने सुनाओ
मैं सब सुन लूँगा ।

लाख तुम मेरी निंदा करो
लाख तुम मेरी अवहेलना करो
और लाख तुम मेरा परित्याग करो
मैं विरक्त नहीं होऊँगा । 

लाख तुम मुझे चोर-ठग कहो 
लाख तुम मुझे लूटेरा समझो  
और लाख तुम मुझे व्यभिचारी बुलाओ 
मैं लक्ष्यहीन नहीं होऊँगा । 

खूब तुम मेरा गला दबाओ
खूब तुम मेरे ऊपर लात चलाओ
और खूब तुम मुझे मारो  
मैं सब स्वीकार करूंगा ।

खूब तुम मेरी कमीज़ फाड़ो
खूब तुम मेरे बाल नोंचो
और खूब तुम मेरे मुख पर कालिख पोतो
मैं और नज़दीक खड़ा हो जाऊंगा ।

खूब तुम मेरे ऊपर चीत्कार करो
खूब तुम मेरा  तिरस्कार करो
और खूब तुम मुझे अभिशप्त करो
मैं सब सहन कर लूँगा ।

खूब तुम मुझे अविश्वासी कहो
खूब तुम मुझे बेईमान कहो
और खूब तुम  मुझे पागल-शैतान कहो
मैं सब भूल जाऊंगा ।

खूब तुम मुझे भगोड़ा कहो
खूब तुम मुझे स्वार्थी कहो
और खूब तुम मुझे ढोंगी कहो
मैं ऐसा ही प्रतीत होऊंगा ।

खूब तुम मुझे आतंकी कहो
खूब तुम मुझे देशद्रोही कहो
और खूब तुम मुझे भ्रष्टाचारी कहो
मैं सब पचा जाऊंगा ।

खूब तुम मुझे आग लगाओ
खूब तुम मुझे पानी में डूबाओ
और खूब तुम मेरे ऊपर गँड़ासे चलाओ
मैं नहीं विमुख होऊंगा ।

खूब तुम मुझे गोलियों से भून डालो
खूब तुम मेरी बोटी-बोटी नोच डालो
मुझे खौलते झील में फेंक डालो
चाहे हिमालय की चोटी से गिरा डालो 
'मैं' अविच्छिन्न रहूँगा , ‘मैं’ नहीं मरूँगा । 

क्योंकि मैं ऐसा ही हूँ ।
मैं अजर-अमर अविनाशी हूँ ।
लोग मुझे नहीं समझ पाते हैं ।
ये गालियां , ये अपमान और ये मार
ये दुत्कार ,ये उलाहने और ये तिरस्कार
मुझे नहीं डिगाते
मुझे नहीं सताते
मुझे नहीं मालूम 'तुम' ऐसा करते हो
या  तुम्हारी आत्मा करती है  ?
जब मुझे यह पता हो जाएगा
तो उस दिन यह फैसले की घड़ी होगी
क्योंकि मेरी ड्यूटी उस दिन  
सुनने सहने खाने – पीने की पूरी हो जाएगी ।
मैं नूतन वस्त्र धारण करने चला जाऊंगा ।  
मैं एक दिन चला जाऊंगा सदा के लिए उस पार
जहाँ बसता है परमात्मा निराकार ।


अमर नाथ ठाकुर , 11 जून , 2014 , कोलकाता । 

Tuesday, 10 June 2014

भिखारी




आती-जाती बिजली से भी
भंग नहीं होता हुआ
घुप्प  अंधेरा
चोर , उचक्कों एवं जेब कतरों
का जहां हो  बसेरा
रात भर ऐसे प्लेटफॉर्म पर
रुपये , गहने एवं कपड़े की रक्षा में
वर्षों की कमाई की सुरक्षा में
असहाय निरुपाय जर्जर तन
बादलों की भांति बेचैन मन
उमड़-घुमड़ करता रहा  
नींद से लड़ता रहा
भय से आक्रांत
कंक्रीट के बेंच पर अशांत ।
इतने में कटी-फटी   धोती पहने
नंग-धड़ंग कंकाली कंधे से
पताके की तरह गमछी लहराए   
असंयमित मूँछों बिखरे बालों से सजे  
मटमैले फर्श के असीमित फैलाव के मज़े  
लेता वह टांगें पसार  लेट गया ।
मेरी तरफ ताकता
मंद-मंद मुस्कान उड़ेलता
सर्वस्व से था वह वंचित
व्यवस्था से जरूर रहा होगा कुपित ।
वह भिखारी
मेरी कुलीनता का मखौल उड़ाता
बेखौफ खर्राटे मारने लगा ।
सवेरे-सवेरे
सूरज के उगने से पहले
जग कर
मेरी बेवशी पर
टुकुर-टुकुर ताकते हुए
मुड़-मुड़ कर देखते हुए
हो गया विदा ,
अपने साथ लेकर
अपनी मुस्कान , अपनी निर्भयता
और अपनी नींद की संपदा ।
मैं घड़ी में समय का हिसाब लगाता रहा
अपनी गठरी को गिनते हुए
बटुए पर अपना भार बढ़ाते हुए
नींद से फिर लड़ते हुए
सूरज के उगने की इंतजारी में ।
किन्तु वह भिखारी मुझे उद्विग्न कर गया
सोचने के लिए मुझे विवश कर गया ...
सोता वही है जो बेखौफ रहता है ।
जीता वही है जो निर्लिप्त निर्विकार रहता है ।
हमारा जीना भी क्या जीना जो न तो सो पाता है
और न तो फटी जेब भर भी हँस पाता है ।


अमर नाथ ठाकुर , मई , 2014 , कोलकाता । 

क्या रह जाता है




जब माला से फूल बिखरने लगे
जब हार से मोती निकलने लगे
जब परिवार से सदस्य बिछुड़ने लगे
जब प्रेम-जीवन में गालियाँ चलने लगे
तो फिर क्या बच जाता है ?

विश्वास में शंका वास करने लगे
जब भक्ति में स्वार्थ दिखने लगे
जब प्रसाद में कंकड़ मिलने लगे
जब पके आम में कीड़े सहरने लगे
तो फिर क्या बच जाता है ?

जब स्कूल से बच्चे ही मुकरने लगे
जब संगीत के स्वर गायब होने लगे
जब गीत से लय जाने लगे
जब सितार के तार टूटने लगे
तो फिर क्या बच जाता है ?

जब किताब के पन्ने फटने लगे
जहाज के सम्मुख चट्टान मिलने लगे
जब खड्ड में सड़क विलीन होने लगे
पिंजड़ा खुल जाए और परिंदा उड़ने लगे
तो फिर क्या बच जाता है ?

जब आत्म-विश्वास ही डिगने लगे
घोड़ा दब जाए तोप से गोले दगने लगे
जब शरीर से प्राण –पखेरू उड़ने लगे
तो फिर क्या बच जाता है ?


अमर नाथ ठाकुर , 10 जून , 2014 , कोलकाता । 

Sunday, 25 May 2014

जीवन दर्शन



कौन है कहाँ  , कहाँ है कौन
कौन है बोलता  , कौन है मौन ।
अथाह ज्ञान की सीमित कथा
सीमित ज्ञान की अधूरी व्यथा ।
खोखले ज्ञान की अज्ञानता में डूब
पीता रहा अज्ञानता का ज्ञान ,
जानकर भी हम अपने आत्म
से क्यों रह गए अनजान ?
श्रुति की बातें , गीता का भी सार
करूणा का प्रदर्शन , जीव मात्र से  प्यार ।
निष्काम कर्म  , फल बिना  विचार
ज्ञान – पथ  कंटीला , भक्ति-योग ही आधार ।
जीवन तो मृत्यु - पथ का द्वार
मृत्यु जीवन की निश्चित हार ।
कौन है अपना , कौन पराया
ये सब माया का संसार ।  
ये काया भी असत्य , निरर्थक
आत्मा बिना यह अचल निराधार ।  
दुःख – सुख तो मन का भ्रम है
हास - क्रंदन नहीं कोई व्यापार ।
क्षणिक तुष्टि  में क्यों हों उल्लसित
ईश्वर भज जो अनंत आनंद का पारावार ।
निर्बल-दुखिया की सुध ले ले रे बंदे ,
जो  कृष्ण-ईशा-खुदा का रूप साकार ।



अमर नाथ ठाकुर , 24 मई , 2014 ,  कोलकाता । 


Friday, 9 May 2014

सुप्रभात




शांत ,     नीरव ,     निश्छल      क्षण ।
सहस्र   रश्मियाँ   सूर्य – रथ      अश्व बन
अट्टालिकाओं    के     बीच    से छन-छन । 
पंक्ति-बद्ध   वृक्ष-पुष्पों   से सुसज्जित उपवन
मोती बन चमक उठा तृण - फुनगी जल कण ।
पक्षियों के  कलरव से झंकृत  उन्मुक्त गगन ।
शीतल-शीतल        मंद-मंद          पवन
कोमल-कोमल       लघु-लघु       स्पंदन ।
विस्फारित नयन और मुक्त वदन का सिहरण ।

कुत्सित विचारों का कर   लेगा हरण
न शेष ईर्ष्या – द्वेष , न कोई जलन
और न अब रहेगा कलुषित भी मन ।
आएगा शीघ्र वह क्षण सुप्रभात बन
चिर हास से कर देगा जगमग-जगमग जीवन । 



अमर नाथ ठाकुर , 9 मई , 2014 , कोलकाता ।     


Monday, 14 April 2014

माँ



बचपन के बीते मधुर पल
छूते जब ये स्मृति-पटल । 
ढोल मजीरा ध्वनित करतल
झंकृत कर देता मन – चंचल । 
दृग कोनों से ढलकाता अविरल
ऊष्ण – जल ये अश्रु –जल ।

न था कोई अनुशासन बोझिल
न था कोई पोशाक जटिल । 
लुका-छिपी के खेल में
आश्रय देता था माँ का आँचल ।

दौड़ –दौड़ जब थक जाता
पैर दबाती थी होकर विकल ।
अंग-अंग में तेल मसलती  
और लगा देती आँखों में काजल ।

पत्थर फेंकता , गेंद उछालता
बच्चों – संग मचाता था कोलाहल । 
चावल बिखेरता , आँटा उड़ेलता
पानी डाल सब कुछ कर देता था तरल ।
लौट शाम को पिताश्री लगाते
झापड़ ,थप्पड़ ,छड़ी और चरण-कमल ।
देर रात तक क्रंदन करता
माँ तब हो जाती थी विह्वल ।
गोद में बिठाकर कौर खिलाती
फिर मैं हो जाता था हर्षित चपल ।

देह रगड़-रगड़ जब नहलाती
मैं बन जाता था उच्छृंखल ।
वह मेरी यशोदा मैया होती थी
मैं होता उसका कन्हैया विट्ठल ।

दुलराती थी , पुचकारती थी मुझे
वह करती थी प्यार अविरल ।
माँ ने मुझे करूणा-अमृत पिलाया
बड़ा हो गया मैं चूस-चूस उसका वक्षस्थल ।

बचपन के मधुर पल ।  


अमर नाथ ठाकुर , 14 अप्रैल , 2014 , कोलकाता । 

कॉमन सेंस और सिविक सेंस

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