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Sunday, 12 October 2025

क्योंकि हम दलित हैं इसलिए....

क्योंकि हम दलित हैं इसलिए?


सर से उतार देते हो  साफ़ा,

फिर उतारते हो घोड़े से।

नाच-गाना जब हम करते हैं,

 तो फिर पीट देते हो कोड़े से।

उत्पात मचा उत्सव रोक हमें भगाते,

और हम भागते भगोड़े-से।

क्योंकि तुम्हारी नज़रों में हम दलित हैं — 

क्या बस इसी कारण थोड़े से?

शताब्दियों से जीते आए हैं झूझते 

हम इन तानों, ठोकरों और थपेड़ों से,

फिर भी टिका है हमारा अस्तित्व 

इन दुखों के पहाड़ों से, झंझावातों से।


पर कुंभ के संगम तट पर, साथ ही तो स्नान करते 

भंडारे में संग बैठकर तुम साथ ही तो प्रसाद पाते

अखाड़े के साधु तुम्हें आशीष देते हैं,

तो उनके हाथ हमारे सिर पर भी तो होते हैं।

सत्संग के पंडालों में, रामकथा, भागवत, 

गीता की स्वर लहरियाँ हमारे कानों में निर्बाध उतरती हैं।

सूरज और चाँद की किरणें  हमारे आँगन में भी पसरती है।

गंगा हो या गोदावरी हमें देखकर भी 

कल कल बहती ही रहती है।

आग की ज्वाला हमें ठंडी नहीं मिलती।

वर्षा की बूँदें हमारे मोहल्ले में भी पड़ती हैं। 

हवा की शीतलता तुम्हारे लिए अलग तो नहीं होती होगी?

कचड़े नालों की सड़ांध तुम्हें भी तो आती होगी ?

पुष्प की महक तो हमें भी महसूस होती है।

मिठाई हमें भी मीठी ही लगती है,

और नमक लगता उतना ही नमकीन।

मिर्च तुम्हें भी तो जलाती होगी,

और मृत्यु करता होगा गमगीन !

बैजू का राग हो या तानसेन की तान,

 हमारे परदादा के परदादा के कानों में भी गूँजी थी।

तुम्हारी बांसुरी की धुन हमारे दिल को अभी भी छूती है,

हमें देख यह बेसुरा नहीं हो जाती।

क्या हम शहनाई नहीं बजाते?

क्या उसकी गूँज राह भूल जाती है,

तुम्हारे कानों तक तो पहुँचती होगी?


क्या तुम्हारी माँ ने तुम्हें बिना प्रसव पीड़ा के जन्म दिया?

हमारी माएँ भी प्रसव पीड़ा में कराहती हैं।

तुम मौत पर रोते हो, 

हमारी आत्माएँ भी मृत्यु पर बिलखती हैं।

मेरे जन्म पर मेरी मां ने खुशियां बांटी थीं,

क्या तुम्हारे जन्म पर तुम्हारी मां रोयी थी ?



कभी सुना नहीं कि चारों धामों में,

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में, बावन शक्तिपीठों 

या वैष्णोदेवी के प्रांगण में, 

बालाजी, बद्री विशाल या रामेश्वरम में,

हमारे हाथों से चढ़ाए फूलों ने रास्ता बदला हो।

हमारे भी हाथों से दुर्बा, बिल्वपत्र, 

जौ और अक्षत शिवलिंगों पर,

वैसे ही चढ़ते हैं जैसे तुम्हारे।


फिर तुम हमारा रास्ता क्यों रोकते हो ?

हमें अपने समाज से विमुख क्यों करते हो? 

हमारा साफ़ा उतारकर,

 घोड़े से नीचे क्यों गिराते हो?

क्या सिर्फ इसलिए… क्योंकि हम दलित हैं?


अमर नाथ ठाकुर, 12 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।

Saturday, 11 October 2025

रमता योगी


रमता योगी 

चार पैसों की है ज़िंदगी,
चाहे तुम खरीद लो,
चाहे वह बेच दे।

सुबह से शाम तक खटा लो,
या कोड़े की मार लगा दो,
कोल्हू के बैल-सी घुमा लो—
हमारी कराह भीतर ही सिसकती रहेगी,
हमारी वेदना भीतर ही भटकती रहेगी।
हमारी आँखें नहीं डबडबाएंगी,
चार पैसों की है हमारी ज़िंदगी,
चाहे तुम पीट लो,
चाहे वह पीट ले।

धरती की हरियाली मेरा बिछौना,
मेघ है मेरा झरना,                                                              झीलें और सागर हैं मेरे तरणताल।

सूरज  मेरा दीपक,
चाँद करता रखवाली,
और तारों से सजा मुक्त आकाश
बनता मेरी मच्छरदानी ।


मैं खुश हूँ—मस्ती में डूबी है मेरी जिंदगानी,
मुझे नहीं कोई देनदारी।
चार पैसों की है मेरी ज़िंदगी,
चाहे तुम छोड़ दो,
चाहे वह छेड़ दे।

न कोई चाह धन-संचय की,
न कोई जीने की लालसा।
पंचभूतों का है यह बर्तन,
पर न पंच इंद्रियों का क्रंदन,
न पंच कोषों का कोई बंधन।
मैं हूँ रमता योगी,
मैं हूँ बहता पानी।
चार पैसों की है मेरी ज़िंदगी,
फिर क्यों फटके पास मेरे गंदगी?

न कोई प्रारब्ध शेष,
न कोई कर्म का बंधन।
न जन्म-मृत्यु से मैं सीमित,
न सुख-दुःख मुझे करते भ्रमित।
अतः चार पैसों की है मेरी ज़िंदगी,
चाहे तुम खरीद लो,
चाहे वह बेच दे।
मैं हूँ रमता योगी,
मैं हूँ बहता पानी।

अमर नाथ ठाकुर
11 अक्टूबर 2025, कोलकाता


रमता योगी

 रमता योगी



चार पैसों की है जिंदगी

चाहे तुम खरीद लो

चाहे वह बेच दे।


सुबह से शाम तक खटा लो

चाहे कोड़े की मार लगा दो

कोल्हू के बैल की तरह फेर लो

हमारी कराह हमारे अंदर ही सिसकती रह जाएगी

हमारी वेदना अंदर ही भटकती रह जाएगी

हमारी आँखें नहीं डबडबाएंगी 

चार पैसों की है हमारी जिंदगी 

चाहे तुम पीट लो

 चाहे वह पीट ले।


धरती की हरियाली जिसका बिछौना हो

मेघ जिसका झरना हो

झील और सागर हों जिसके तरण ताल

सूरज हो जिसका दीपक

चंदा जिसकी रखवाली करता

और तारों से सजा

मुक्त आकाश हो जिसकी मच्छरदानी

खुश हूं मस्ती भरी है मेरी जिंदगानी

मुझे नहीं कोई देनदारी

चार पैसों की मेरी जिंदगी

चाहे तो तुम छोड़ दो

चाहे वह छेड़ दे।


न कोई चाह धन संचय की 

न कोई जीने की लालसा

पंच भूतों का है यह बर्तन

पर न पंच इंद्रियों का क्रंदन

न पंच कोषों का कोई बंधन

मैं हूं रमता योगी

मैं हूं बहता पानी

चार पैसों की है मेरी जिंदगी

फिर क्यों फटके पास मेरे गंदगी


न कोई प्रारब्ध शेष

न कोई कर्म का बंधन

न जन्म मृत्यु से मैं सीमित

सुख दुःख नहीं करते भ्रमित

अतः चार पैसे की मेरी जिंदगी 

चाहे तुम खरीद लो

चाहे वह बेच दे।

मैं हूं रमता योगी

मैं हूं बहता पानी।


अमर नाथ ठाकुर, 11 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।

Thursday, 2 October 2025

विजयादशमी: असत्य पर सत्य की जय



विजयादशमी : असत्य पर सत्य की जय

आज दशहरा है। आज विजयादशमी भी है। कहने में कोई हिचक नहीं कि आज अंधकार परास्त हो गया है। पाप ने पुण्य के समक्ष समर्पण कर दिया है। असत सत्य के सामने असहाय हो गया है। यह हमारी केवल मानसिक कल्पना नहीं, बल्कि राम और माँ दुर्गा में हमारी निष्ठा की पराकाष्ठा है, जो हमारे विश्वास को दृढ़ता और हमारी आत्मा को ऊर्जा प्रदान करती है।

आज रावण धू-धू कर जल उठेगा, राम के तरकश से निकले वाण की ज्वाला में। और उस अग्नि की आभा में हमारा मन निर्मल हो जाएगा। आज ही रामलीला का समापन होगा।

इधर, माँ दुर्गा ने महिषासुर का संहार कर दिया है। चण्ड-मुण्ड, शुम्भ-निशुम्भ, रक्त बीज पहले ही उनके पैरों तले कुचले जा चुके हैं। विजयी मुद्रा में, विजय-घोष के बीच, आज माँ अपनी सवारी पर सवार होकर प्रस्थान करेंगी। हम विजय की इस बेला में भी अश्रुपूरित हैं। ये आँसू हार के नहीं, बल्कि जीत और आनंद के आँसू हैं।

उल्लूक ध्वनि और शंख नाद से गूँजते वातावरण में, सिंदूर खेला के बीच जब माँ विदा लेंगी, पीछे मुड़कर हमें निहारेंगी, तो हर चौराहे पर, हर पंडाल में उनकी स्मृति बस जाएगी। कोलकाता की गलियाँ, मोहल्ले, चौक-चौराहे आज माँ को आँखों में भरकर विदा करेंगे। जनता के नेत्रों से उमड़ते आँसुओं में प्रेम और आस्था की गंगा बह निकलेगी।

आज से  पंडाल से रोशनियों के झाड़-फनूस, सजावट की लकड़ियाँ, कपड़ों के पर्दे सब उतारे जाने लगेंगे। पर यह उत्सव की समाप्ति नहीं, बल्कि अगले आगमन की तैयारी का संकेत है। माँ के लौटते ही अगले वर्ष के पंडाल, उनकी थीम और साज-सज्जा पर चर्चा शुरू हो जाएगी।

यह आना-जाना जन्म-मृत्यु के शाश्वत चक्र जैसा है। हर वर्ष माँ आती हैं, और फिर चली जाती हैं, ताकि प्रतीक्षा और पुनर्मिलन का आनंद जीवित रहे। युगों-युगों से यह परंपरा चली आ रही है और न जाने कब तक चलती रहेगी। शायद तब तक, जब तक सारी आत्माएँ परम तत्व में विलीन न हो जाएँ।

उस अंतिम क्षण में, जब सृष्टि का पटाक्षेप होगा, ब्रह्मांड मौन हो जाएगा। फिर केवल एक उद्घोष गूँजेगा—"एकोऽहम् बहुस्यामः"। और उसी से एक नई सृष्टि का आविर्भाव होगा। एक नया चक्र, एक नया खेल, एक नया उत्सव।

इसलिए आज विजयादशमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह जीवन का दर्शन है—कि असत्य कितना भी शक्तिशाली क्यों न लगे, अंततः सत्य ही विजयी होता है।

जय श्रीराम
जय माँ दुर्गे

अमर नाथ ठाकुर, 2 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।


Wednesday, 1 October 2025

मां दुर्गा—संहार और वात्सल्य का संतुलन



मां दुर्गा—संहार और वात्सल्य का संतुलन 

चण्ड-मुण्ड, शुम्भ-निशुम्भ, महिषासुर जैसे असुरों का संहार करनेवाली मां दुर्गा आज इस कलियुग में क्यों शांत दिखाई देती हैं? माता कुमाता नहीं हो सकतीं—यह सनातन का सत्य है। तो क्या मां सब पर मातृवत प्रेम बरसाकर केवल वात्सल्यमयी रूप में ही प्रकट हो रही हैं? क्या मां अब संहार नहीं करेंगी? यदि संहार नहीं होगा, तो पाप पुण्य पर कैसे विजयी होगा, सत्य असत्य के सामने कैसे टिकेगा, और अंधकार प्रकाश के सामने से अपना साम्राज्य कैसे समेटेगा?

सच तो यह है कि हर मनुष्य मूलतः पुण्यात्मा है। हर हृदय में दिव्यता का अंश छिपा है—वह ईश्वर का ही अंश है। किंतु उसी मनुष्य के भीतर कहीं महिषासुर का अहंकार, शुम्भ-निशुम्भ की वासना और चण्ड-मुण्ड की हिंसा भी वास करती है। इन्हीं प्रवृत्तियों से समाज में अन्याय, शोषण, क्रूरता, भ्रष्टाचार और अंधकार फैलता है। मां का उद्देश्य जीवों का विनाश नहीं, बल्कि इन कुत्सित प्रवृत्तियों का संहार है। वह मातृवत वात्सल्य देती हैं ताकि मनुष्य अपने भीतर के असुर को पहचानकर उसका परित्याग करे। पर जब मनुष्य बार-बार चेतावनी के बावजूद इन प्रवृत्तियों को पोषित करता रहता है, तब मां संहारक रूप धारण करती हैं।

श्रीरामकृष्ण परमहंस ने कहा था—“मां वही शक्ति है जो सृजन करती है और वही शक्ति संहार भी करती है। मां दुष्ट का नहीं, दुष्टता का नाश करती है। मां पापी से घृणा नहीं करती, पाप से करती है।” यह वचन गहरा सत्य प्रकट करता है—मां की करुणा जीवित प्राणियों के लिए अनंत है, पर उनका संहारक रूप उन प्रवृत्तियों के लिए है जो धर्म, सत्य और न्याय को नष्ट करती हैं।

सृष्टि का नियम संतुलन है। प्रकाश और अंधकार, सत्य और असत्य, पुण्य और पाप—इनके बीच का संतुलन ही ब्रह्मांड को गतिमान रखता है। यदि अधर्म और पाप का पलड़ा भारी हो जाए तो मां का संहारक रूप अनिवार्य हो जाता है। यही कारण है कि दुर्गा पूजा केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। यह हमें हर साल याद दिलाती है कि अपने भीतर के असुर को पहचानो और उसका संहार करो। यही आत्म-संस्कार समाज का संस्कार बनेगा।

हमारी याचना मां से यही है—

तमसो मा ज्योतिर्गमय।
असतो मा सद्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय।

हे मां, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। हे मां, हमें असत्य से सत्य की ओर बढ़ाओ। हे मां, हमें मृत्यु के भय से अमरत्व की ओर उठाओ। और तब हम सब उद्घोष कर सकेंगे—

सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥

और तब हम भारतीय इस उद्घोषणा को शान से आगे बढ़ाते रहेंगे—“उदारचरितानाम् तु वसुधैव कुटुंबकम्।”

मां, आप कुमाता नहीं हो सकतीं। आपका वात्सल्य हमें बचाता है, लेकिन अब आवश्यकता है कि आप हमारे भीतर पल रही राक्षसी प्रवृत्तियों का संहार करें। जीवों को जीवित रखिए, क्योंकि जीवन आपका वरदान है, पर असत्य, पाप और अन्याय की दुष्प्रवृत्तियों को समूल नष्ट कीजिए।

यही जीवन-दर्शन है, यही सनातन सत्य है। करुणा और संहार का संतुलन ही धर्म की स्थापना है।

जय मां दुर्गा 

अमर नाथ ठाकुर, 1 अक्टूबर, 2025, कोलकाता।


Tuesday, 30 September 2025

मां फिर आएंगी

 

"मां फिर आएंगी"

ढम-ढीप-ढम जब ढाक बजे,

भोर से गुंजित हो वातावरण।
भद्र स्वर का सप्तशती पाठ,
भर दे हृदय में नव स्पंदन।

पंडालों की शोभा अद्भुत,
रंग-बिरंगी ज्योति छा जाए।
शेर पे आरूढ़ मातु दुर्गा,
महिषासुर का वध दिखलाए।

लाल नेत्र, कर में बरछी,
पापों का करती संहार।
अहंकार, ईर्ष्या, भय मिटे,
जग में छा जाए उजियार।

दस दिन का यह उत्सव पावन,
पाप-पुण्य का देता ज्ञान।
मां आती हैं हर वर्ष यहाँ,
करने धर्म का पुनः उत्थान।

विसर्जन में अश्रु छलकते,
मन होता है व्याकुल-सा।
पर विश्वास यही कहता है—
मां फिर आएंगी अगली दशा।

गीता का वह वचन स्मरण हो,
“यदा यदा हि धर्मस्य...”।
हर युग में होती है रक्षा,
धरा पर आती दिव्य शक्ति।

मां कुमाता कभी न होतीं,
संतानों को करती क्षमा।
हमारे पाप मिटाने हर बार,
फिर प्रकट हो जातीं मां।

सनातन का यही है संदेश—
सत्य का होगा सदा उत्थान।
पाप का संहार निश्चित है,
मां फिर आएंगी नव विहान। 


 अमर नाथ ठाकुर, कोलकाता, 30 सितंबर, 2025.

दुर्गा पूजा- एक जीवन दर्शन

  "दुर्गा पूजा—जीवन का दर्शन" ✍️


दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन का गहन दर्शन है। बंगाल विशेषकर कोलकाता की धरती इन दिनों एक अद्भुत वाइब्रेशन से गूंज उठती है। सुबह होते ही ढाक की ढम-ढम-ढाक की ध्वनि वातावरण को दलमलित कर देती है। फिर वीरेंद्र कृष्ण भद्र का मंत्रमुग्ध कर देने वाला दुर्गा सप्तशती का सस्वर पाठ हृदय को भीतर तक आंदोलित कर देता है।


शहर के कोने-कोने में सजे असंख्य पंडाल, रंग-बिरंगी रोशनियाँ और आभूषणों से सुसज्जित देवी दुर्गा की प्रतिमाएं एक अनुपम दृश्य रच देती हैं। शेर पर आरूढ़, रक्तरंजित तमतमायी नेत्रों वाली मां दुर्गा जब महिषासुर का वध कर रही होती हैं, तो यह केवल एक पौराणिक दृश्य नहीं होता, बल्कि हमारे अंतर्मन में जमे पापों, अहंकार, ईर्ष्या और भय के संहार का प्रतीक बन जाता है।


पूजा के दस दिन हमें यह अनुभूति कराते हैं कि पुण्य हमेशा पाप पर विजय पाता है। हम इन दिनों निष्पाप जीवन जीने की परिकल्पना में होते हैं, परन्तु वर्ष दर वर्ष पाप फिर लौट आता है, और फिर मां का आगमन होता है, ताकि वह महिषासुरी प्रवृत्तियों का नाश कर सके।


विसर्जन के समय जब हम मां को विदा करते हैं, तब नेत्र अश्रुपूरित हो जाते हैं, यह दृश्य हृदय विदारक हो जाता है। किन्तु इसी विरह में हमारी विह्वलता में आशा छिपी होती है—“मां फिर आएंगी।” यही विश्वास हर वर्ष दुर्गा पूजा को और अधिक जीवंत बना देता है।


यह परंपरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। जन्म और मृत्यु का अनवरत चक्र, पाप और पुण्य का सतत संघर्ष, और परम तत्व की खोज—यही सनातन सत्य है। श्रीरामकृष्ण परमहंस ने मां की उपासना के माध्यम से जिस परमात्मा से मिलन पाया, वही भाव वेद, उपनिषद और गीता में भी गूंजता है।

गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को विश्वास दिलाते हैं-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।

अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।

भगवान श्रीकृष्ण की इस उक्ति में समय का अंतराल छिपा हुआ है । हम आशा ही करते रहते हुए हैं आज तक कि भगवान प्रकट होंगे। लेकिन भगवान की शक्तिरूपा मां धर्म की स्थापना हेतु हर साल आती है भारत धरा पर, हम मां को विदा कर ले आते हैं और फिर विदा कर प्रस्थान भी कर देते हैं। मां मान जाती है क्योंकि माता कुमाता नहीं होती!

दुर्गा पूजा हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कितने ही महिषासुर क्यों न हों, अंततः दिव्यता की विजय निश्चित है। यही सनातन का मूल मंत्र है—

“पाप का संहार होगा, पुण्य का उत्थान होगा, और मां फिर आएंगी... हर साल आएंगी.....”


अमर नाथ ठाकुर, कोलकाता, 30 सितंबर, 2025.


कॉमन सेंस और सिविक सेंस

  कॉमन सेंस और सिविक सेंस ‘ कॉमन सेंस’ (सामान्य समझ) और ‘सिविक सेंस’ (नागरिक बोध या सामाजिक बोध)—ये दोनों शब्द जितने सहज हैं, आज के सामाजिक ...