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Thursday, 8 December 2011

मन क्यों रोया रे


भागती बस ने दर्जनों को कुचला

तो मन पिघला

क्योंकि कुचली लाशों में सब अपना ही नजर आया रे –

हाथ फैलाए भीख माँगते बुजुर्गों की होती देखी फजीहत

तो मन को मिली कोई नसीहत

क्योंकि सब अपना ही नजर आया रे –


पहले ही तिरस्कृत

फिर निष्कासित

लाठी पर लटकी वृद्धा को देख –

मन बिलखा रे ----

क्योंकि फिर उसमें अपना ही नजर आया रे ---



लुटती महिला, पिटता नौकर

नंग-धडंग अनाथ बच्चे

दीन-हीन भूखे गँवार

जो देखीं थर्रायी पथरायी आँखें हजार

पुनः रोया जार-जार ---

क्योंकि सब में अपना ही अपना नजर आया रे ---



इसलिए आज मन रोया रे !!!

इसलिए आज मन रोया रे !!!

अमरनाथ ठाकुर , १२ नवंबर २०१०.

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