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Thursday, 8 December 2011

ये जो तुम चले जाते हो


ये जो कि तुम चले जाते हो --
विवेक-शून्य कर जाते हो--

सहस्र -सूर्यकिरण  जैसे खोती आभा
ओस-सिक्त-हरी घास की सूखी ज़रा
धवल-पूर्ण -चन्द्र की ओझल होती प्रभा --

वीराना हुआ जैसे शहर   
वृक्ष -रहित  जैसे जंगल 
कल-कल ध्वनि -रहित जैसे निर्झर---

यह काया जो कि माया है 
क्या किसी का साथ निभाया है

ये जो कि तुम चले जाते हो --
निशाने- ख़ाक  छोड़ जाते हो --

अमरनाथ ठाकुर , ४ दिसंबर , २०११ .

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