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Thursday, 8 December 2011

सजनी की अक्षत मांग को सजा दूं



तुम्हारे लाल होंठ ,

चंचल चितवन ,

मीन - सदृश आँखें

और कान के ये झुमके --



घनी केश राशि ,

विस्तृत ललाट , 

उस पर अवस्थित बिन्दिया

जब रात्रि की चाँदनी में चमके -


बालों को लहरा दूं ,

साड़ी को फहरा दूं ,

ग्रीवा को सहारा दूं ,


रूप माधुर्य से मन की तृष्णा को मिटा लूँ -----


गुनगुनाकर बन जाऊं भ्रमर,

नीहार लूँ तुम्हें एक प्रहर,

किन्तु मध्य में एक नहर ,

जो मुझे रोक रहा -

और रात्रि वेला की ये चन्द्रप्रभा ,

जो मुझे टोक रहा --


ओ कजरारे बादल ,

ज्योति धवल छुपा जा ,

नहर ऊपर महासेतु एक बना जा -

चला जाऊं उस पार

और सजनी की अक्षत माँग को सजा दूं !



अमरनाथ ठाकुर , १९८५ .

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